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आलोचना

भारतीय राष्ट्रीय प्रतिरोध की मौजूदा संभावित बानगी
शंभु गुप्त


तू धन्य है , तुझे धिक्कार है!

उदय प्रकाश की कहानियाँ अधिकांशतः चर्चित, विवादग्रस्त और बहुपठित रही हैं। इस मामले में उदय प्रकाश किस्मत के धनी रहे हैं। इधर कहानी छपी नहीं कि उधर लोगों ने उन्हें हाथों-हाथ लिया नहीं। भारतीय भाषाओं के साथ कई विदेशी-यूरोपीय-भाषाओं में उनके अनुवाद हुए हैं। विवाद और चर्चा स्वभावतः हिंदी में ज्यादा हुई हैं। हिंदी में तो उन्हें लेकर लगभग यह स्थिति है कि 'तू धन्य है, तुझे धिक्कार है!' आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने यह उक्ति अपने एक मनोवैज्ञानिक ललित निबंध में कंजूसों के संदर्भ में कही है किंतु उदय प्रकाश के संदर्भ में हिंदी आलोचना पर भी बखूबी इसे लागू किया जा सकता है। लोग उनकी कहानियों का महत्व के साथ उल्लेख भी करेंगे लेकिन उन्हें लेकर उनके मन में एक रहस्यपूर्ण सा पूर्वाग्रह भी मौजूद रहेगा। उनके बिना उनका काम भी न चलेगा लेकिन दिल खोलकर उनकी कमियाँ या कमजोरियाँ भी न बताएँगे। एक सनसनी-सी पैदा करते रहेंगे और इस सब के बीच हिंदी आलोचना का जनाजा निकलता रहेगा। छोटे-मोटे ही नहीं, कई बार महत्वपूर्ण लोग भी कुछ इस तरह की दोगली बातें करते नजर आते हैं कि सामान्य पाठक हतप्रभ रह जाता है कि आखिर सत्य क्या है? एक विचित्र संभ्रम की स्थिति आलोचना में बन जाती है और स्पष्टतः कुछ भी तय नहीं हो पाता। हालाँकि इस संभ्रम से पैदा हुआ विवाद रचना के प्रति पाठकों और अध्येताओं की जिज्ञासा में बढ़ोत्तरी ही करता है और रचना बड़े पैमाने पर पढ़ी जाती है। किंतु आलोचना के क्षेत्र का कुहासा फिर भी बना ही रहता है। उदय प्रकाश के आस-पास यह कुहासा बहुत गहरा है। इसे गहरा करने में नामवर सिंह जैसे शीर्ष आलोचक का भी उतना ही हाथ है जैसे अन्य छोटे-बड़े आलोचकों का। हो सकता है, यह गुरु-शिष्य की क्लास-रूम जैसी मनोरंजक चुहलबाजी हो; जैसी कि उनमें आए दिन पत्र-पत्रिकाओं में देखने को मिलती है किंतु यह चुहल हिंदी-समीक्षा की वस्तुनिष्ठता पर गहरा आघात करती है। मसलन; नामवर जी ने 25 नवंबर 95 को वाराणसी में बच्चन सिंह के सम्मान में प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा आयोजित 'समीक्षा-संवाद' के अपने अध्यक्षीय भाषण में 'पॉल गोमरा का स्कूटर' के बारे में यह चलताऊ टिप्पणी की : 'अभी इंडिया टुडे में उदय प्रकाश की कहानी 'पाल गोमरा का स्कूटर' आई - पढ़ी, परंतु टिप्पणी नहीं करूँगा। हाँ इतना अवश्य कहूँगा कि यह एक महत्वपूर्ण कहानी है जिसकी शैली, फैंटेसी बहुत आकर्षक है और 1995 की दिल्ली के मीडिया में या उसके बाहर जो चालू फैशन के मुहावरे और शब्द हैं उसकी सारी जानकारी अकेले वह कहानी कह देती है और ऐसा लगता है कि लेखक यह कहना चाहता है कि ऐसा मैं जानता हूँ बेटा, तुम नहीं। जान लो तो अच्छा है। तभी तुम लेखक बनोगे।' (पहल 53; जन.फर.मार्च 1996; पृ. 47-48)। इस टिप्पणी से पहले जो बात नामवर जी दरअसल कह रहे थे और जो मूल संदर्भ था वह यह था - 'बीसवीं सदी के संकट को कुछ लोगों ने बेचने खाने का धंधा बना लिया है और मैं कह दूँ कि ऐसी कविताएँ और कहानियाँ भी लिखी जा रही हैं।' (वही; पृ. 47)।

नामवरजी उदय प्रकाश के जिस नएपन की यहाँ खिल्ली-सी उड़ा रहे हैं; कोई चार साल बाद उसी को हिंदी कहानी की रचनात्मकता के एक नए ढंग का रूप लेते चलने के उदाहरण के रूप में पेश करते हैं। 'अभिनव कदम' को दिए एक साक्षात्कार में संजय श्रीवास्तव के साथ बात करते हुए उन्होंने कहा - 'रचना के स्तर पर ऐसी रचनाएँ आई हैं जो पुराने प्रगतिशील ढंग की भी नहीं हैं और पुराने आधुनिकतावादी शिल्प में भी नहीं हैं। अब अगर सोचें कि ये रचना गंभीर और संवेदनशील हैं तो इस इलाके में अनेक रचनाकार हैं जिन्हें हम उत्तर आधुनिक कह सकते हैं लेकिन प्रगतिशील लोग आज भी अधिकांश इसी के बारे में जो लिख रहे हैं उनमें उसी तरह से देखने पर लगेगा - जैसे उदय प्रकाश की कहानी 'वारेन हेस्टिगंज का साँड़' या उसके पहले का संग्रह देखो 'पाल गोमरा का स्कूटर' या 'और अंतिम प्रार्थना' (?) - तो सोचो कि एक ऐसी फैंटसी वह रचना है और उसके द्वारा ऐसा प्रस्तुत करता है कि हम वह जो कुछ कहना चाहें उसकी तुलना में जरूरी है कि हम समझें कि उत्तर आधुनिक सृजन हो रहा है। यानी कि ये आधुनिकतावादी रचनाएँ नहीं हैं उसके बाद की रचनाएँ हैं, इनका रूपविधान भी और इनकी अंतर्दृष्टि भी। यह फार्म तोड़ने की जो प्रवृत्ति है यह उत्तर आधुनिक है रचनात्मकता एक नए ढंग का रूप ले रही है। हमारे समाज में इतनी तेजी से परिवर्तन हो रहा है इसको पुरानी दृष्टि से देखेंगे तो इसे परिभाषित ही नहीं कर पाएँगे।' (अभिनव कदम; 2-3; नवं. 99-अक्तू. 2000; पृ. 159-60)। नामवरजी एक समय जिसे नए ज्ञान का आतंक और बेचने-खाने का धंधा बता रहे थे, बाद में इसे उत्तर-आधुनिक और नई रचनात्मकता के रूप में पहचान रहे हैं। और यह उलटफेर मात्र चार साल के अंदर-अंदर हुआ। नामवर सिंह जैसे आलोचक का यह द्वैत और अंतर्विरोध आश्चर्य में तो डालता ही है; उनकी विराट छवि के प्रति हमें सशंकित और दुविधाग्रस्त भी बनाता है। इन दोनों में से किस बात को सच माना जाए? हालाँकि हम यहाँ उनकी बाद वाली मान्यता के साथ हैं लेकिन फिर पहले वाली स्थापना का क्या होगा? क्या इस तरह की चोंचलेबाजी सामान्य पाठक के साथ अन्याय नहीं है?

इसी तरह का एक और उदाहरण 'हंस' - संपादक राजेंद्र यादव की दृष्टिहीन टिप्पणियों का है जो समय-समय पर अपने संपादकीयों में उन्होंने की हैं। इन टिप्पणियों के अतिरिक्त एक चिंतनीय स्थिति 'हंस' के पन्नों की वह अखाड़ेबाजी भी है जिसे अधिकांशतः वे स्वयं प्रायोजित करते हैं। यह अखाड़ेबाजी हिंदी-जगत की अनेकानेक अभिजात्य कुंठाओं और दमित वासनाओं के प्रकटीकरण का खुला मंच है, हालाँकि यहाँ रैफरी की भूमिका केंद्रीय है। और हालाँकि गाहे-बगाहे एकाध विमर्श भी यहाँ काम का हो जाता है किंतु ज्यादातर स्थितियाँ पूर्व कल्पित और आरोपित ही देखी गई हैं। साहित्य के मौलिक प्रश्न भी यहाँ एक विशेष रंग में रँगकर पेश किए जाते हैं। एक मध्यवर्गीय बौद्धिक व्यायाम आए दिन यहाँ देखा जा सकता है। उदय प्रकाश की कहानियों को लेकर राजेंद्र यादव खासे चिंतित रहते हैं और रह-रहकर उनका बैताल 'हंस' की डालियों पर लटका दिखाई दे जाता है। राजेंद्र यादव को सबसे ज्यादा चिंता शायद उनकी 'वारेन हेस्टिंग्स का साँड़' को लेकर है। यह चिंता एक लेखक, एक संपादक और एक व्यक्ति के रूप में लगातार उनका पीछा करती रही है और कभी वे स्वयं और कभी 'हंस' का कोई लेख इस कहानी की खबर लेते रहे हैं। यह जागरूकता एक अच्छी पहल है बशर्ते कि यह पूर्वाग्रही छिद्रान्वेषी प्रक्रिया के तहत न हो। यह आशंका हमें इसलिए होती है कि यदि आप मौजूदा पत्रा-पत्रिकाओं की सामग्रियों पर नजर डाले तो लेखकों/संपादकों के एक-दूसरे पर कटाक्ष इन दिनों एक सामान्य सी बात है। व्यक्तिगत ईर्ष्या-द्वेष साहित्य के शब्दों के कंधों पर किसी मुर्दे की तरह यात्रा करते रहते हैं। गोष्ठियों और सभा-सम्मेलनों में यह नोंक-झोंक यदि समय की शोभा बढ़ाती है तो आलेखों में यही एक बोझ सा बन जाती है जिसे ढोते-ढोते भाषा का हलक सूखने लगता है। राजेंद्र यादव इस तरह की टिप्पणियाँ करने में अव्वल हैं। उधर उदय प्रकाश भी उनसे किसी भी तरह पिछड़ते नहीं हैं।

यहाँ दो उदाहरण पर्याप्त होंगे। 'वॉरेन हेस्टिंग्स का साँड़' के हिंदुत्ववादी कथा निष्कर्षों पर 'हंस' मई 1997 का संपादकीय लिखते हुए आदतन वे यह लिख ही जाते हैं कि 'मैं जानता हूँ, वे बेहद सेंसिटव भी हैं और उन्हें मेरे इन कुतर्कों या कहानी के कुत्सित (वल्गराइज्ड) पाठ-विखंडन से मर्मांतक तकलीफ होगी, क्योंकि किसी भी तरह की आलोचना उन्हें बुरी तरह अपसेट (विचलित) कर देती है।' (पृ. 4)। मुझे नहीं मालूम यह कहाँ तक सच है और सच भी है या नहीं। लेकिन इतना तय है कि इससे उदय प्रकाश की व्यक्तिगत छवि खराब होती है। यही हाल उदय प्रकाश का भी है। वे भी राजेंद्र यादव पर व्यक्तिगत प्रहार करने से नहीं चूकते। मसलन : 'दुर्भाग्यवश उस दौर के सबसे कमजोर कथाकार राजेंद्र यादव आज समकालीन हिंदी कथा-क्षेत्र के रुस्तम-ए-हिंद बने हुए हैं। उन्होंने कहानी लेखन को मास्टर चंदगीराम का अखाड़ा बना दिया है। मास्टर चंदगीराम तो फिर भी लँगोटबंद थे, राजेंद्र यादव की तो लँगोट भी खुली हुई है।' (वर्तमान साहित्य शताब्दी कथा विशेषांक जन., फर., 2000, पृ. 547; अजित राय के साथ बातचीत में)। अपनी कहानियों, विशेषतः 'वॉरेन हेस्टिंग्स का साँड़' पर 'हंस' में छापे गए लेखों और विशेषतः उक्त संपादकीय से खिन्न-सा होकर उदय प्रकाश ने अपने एक और साक्षात्कार में राजेंद्र यादव पर एक बार फिर व्यक्तिगत आक्षेप लगाएः "हंस' में राजेंद्र जी ने उस पर संपादकीय लिखे... 'हंस' के शताब्दी अंक में दो-दो लेख छापे। उन्होंने एक तरफ हिंदुत्व और गो-प्रेम, ब्राम्हण प्रेम का आरोप लगाया, दूसरी तरफ एडवर्ड सईद की किताब 'ओरिएंटलिज्म' के विचारों से प्रेरित बताया। तीसरी तरफ 'मार्केस बोर्खेस को रचा-पचा कर लिखी गई कहानी बताया। मेरा विश्वास कीजिए, मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ राजेंद्रजी ने इनमें से किसी को नहीं पढ़ा है। 'नेम ड्रॉपिंग' की उन्हें बहुत पुरानी आदत है।' (कथादेश, जुलाई 1999, पृ. 17; गौतम सान्याल के साथ बातचीत)।

कहानी में जो नहीं है , उसकी माँग

यह सारा प्रकरण कहानी और उसकी समझ के बाहर की और भरती की चीज है। हिंदी लेखकों की कुंठाओं का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है। हिंदी में ऐसे और अनेक उदाहरण हैं जहाँ ऐसी कुत्ता-घसोटी आए दिन देखने को मिलती है। इसमें कोई किसी से कम नहीं। दरअसल इसी तरह के दुराग्रहों का यह परिणाम है कि राजेंद्र यादव इस कहानी की चर्चा करते हुए एकदम संदर्भहीनता और कुतर्क पर उतर आते हैं। कहानी में 'दुनियाभर की इधर-उधर की बातें देखने' का उनका स्वनिर्धारित पैमाना विचित्र है। अपने इन कुतर्कों या कहानी के कुत्सित (वल्गराइज्ड) पाठ-विखंडन से वे स्वयं भी परेशान हैं और आत्मविश्वास की कमी का अनुभव करते हैं किंतु उनकी अतिबौद्धिकता निरंतर उन्हें बेचैन किए रहती है। यह सचमुच विचित्र है कि कहानी में जो है उसे परे करके उससे वह माँग की जाए जो वहाँ है नहीं। गाय या साँड़ की जगह कुत्ते की माँग लगभग ऐसी ही नाजायज है : 'सवाल यह भी है कि गाय या साँड़ ही क्यों, कुत्ता भी तो भारतीय कृषि-परिवार का उतना ही अविभाज्य अंग है, वह खुद उत्पादन न करता हो, मगर उत्पादन का एकमात्र रक्षक और मनुष्य का सबसे वफादार साथी सिर्फ कुत्ता ही है, सांस्कृतिक परंपरा में वह गाय से उन्नीस नहीं है - धर्मराज युधिष्ठिर के साथ गाय या साँड़ नहीं, कुत्ता ही अंतिम सीमा तक साथ रहा था - उसका डोबरमैन या ग्रेहाउंड अवतार भी हेस्टिंग्स को उसी तरह मार सकता था।' ...इत्यादि। (हंस मई 1997 पृ 4)। गाय या साँड़ (नंदी) के आधार पर किसी को हिंदुत्ववादी करार देना ठीक वैसा है जैसे किसी मुखौटे को या बहुरुपिए को सच मान लेना। इस तर्क से तो हिंदुस्तान के वे समस्त किसान या आम लोग जो अपने घरों में गाय रखते हैं या डेयरी चलाते हैं; हिंदुत्ववादी हो गए! यह दरअसल वही ओरिएंटल सोच है जिसके सहारे अंग्रेजों ने यहाँ अपना संप्रदायवादी कुचक्र चलाया और धर्म के आधार पर लोगों को बाँट दिया। ताज्जुब है कि राजेंद्र यादव ओरिएंटलिज्म का विरोध करते-करते अंततः इसी के चक्रव्यूह में फँस गए! दरअसल इस कहानी के विषय में यह पहले से तय कर लिया गया कि चूँकि यहाँ हिंदुओं से, उनकी जीवन-पद्धति एवं मान्यताओं से, संबंधित अनेकानेक सूचनाएँ, संदर्भ और चित्र हैं अतः यह कहानी हिंदुत्ववाद की स्थापना के लिए लिखी गई है। पाठकों को और स्वयं राजेंद्र यादव को यह बताने की जरूरत नहीं है; वे इस तथ्य से सुविज्ञ हैं कि हिंदुत्ववादी या हिंदुत्ववाद की प्रतिष्ठापना करने वाली कथा-शैली क्या व कैसी होती है। आर.एस.एस. की शाखाओं के बौद्धिकों तथा 'पांचजन्य' आदि पत्र-पत्रिकाओं में इसकी असल पहचान मौजूद है। उदय प्रकाश जिस शब्दावली में - कहानी के अंत में - वॉरेन हेस्टिंग्स पर प्राणघातक हमला करने वाले तथा इस घटना क्रम में अंततः मार दिए जाने वाले- जिसके आधार पर कि इस कहानी और उदय प्रकाश को हिंदुत्ववादी घोषित किया जा रहा है - इस हिंदुस्तानी साँड़ की शहादत का गवेषणात्मक विकल्पधर्मी आख्यान प्रस्तुत करते हैं; वह किसी हिंदुत्ववादी लेखक की शब्दावली नहीं कहला सकती : 'क्या वह अपने देश के मिथकों, पुराणों, ग्रंथों, अंधविश्वासों और पुरानी परंपराओं के लिए किसी कट्टरपंथी सांप्रदायिक की तरह लड़ा और मारा गया? (पॉल गोमरा का स्कूटर : पृ. 158)। दरअसल यह इस परिघटना का एक स्वाभाविक हिंदुत्ववादी संदर्भ है अतः कहानी में उसका इस तरह आना कला में यथार्थ के निरूपण की माँग के तहत ही है।

बहुलतावादी कथाशिल्प का लेखक उदय प्रकाश

हम यहाँ बहस इस बात पर तो कर सकते हैं कि वॉरेन हेस्टिंग्स के इस हिंदुत्व प्रेम के प्रति लेखक का रवैया क्या है; उसका पक्ष क्या है। इस बात पर बहस यहाँ व्यर्थ है कि स्वयं लेखक का यह पक्ष है या नहीं! बहस के ये दोनों बिंदु हालाँकि एकदम भिन्न नहीं हैं लेकिन एकदम अभिन्न भी तो नहीं हैं। इन दोनों के बीच एक बहुत ही पतली और हलकी विभाजक रेखा है जिसे पहचान लेने पर इन दोनों की दिशाएँ एक-दूसरे के विपरीत जाती दिखाई देती हैं। मसलन; यह देखने की बात है कि लेखक का रवैया वॉरेन हेस्टिंग्स के प्रति, उसकी गतिविधियों, कार्य-कलापों, रीति-नीतियों इत्यादि के प्रति शुरू से लेकर आखिर तक आलोचनात्मक रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि उदय प्रकाश निरंतर वॉरेन हेस्टिंग्स को किसी खराद सी पर चढ़ाए रखते हैं या कि किसी कठघरे से में लाते हुए उससे जिरह सी करते हैं। वे उसके प्रति मोहाविष्ट या कृतकृत्य नहीं हैं बल्कि एक सच्चे भारतीय राष्ट्रवादी की तरह उसके दूध का दूध और पानी का पानी करते चलते हैं। अब पहचान सिर्फ यह करनी होगी कि एक सच्चा भारतीय राष्ट्रवाद क्या है या होता है और इस कहानी में उसके कुछ तत्व हैं या नहीं? निश्चय ही यह एक बहुत पेचीदा मसला है और उदय प्रकाश जैसे बहुलतावादी कथाशिल्प वाले लेखक के मामले में और भी पेचीदा। उनकी कहानियों में बहुधा अवांतर प्रसंग होते हैं, पंचतंत्र की तरह कथा में से कथा, घटना में से घटना निकलती दिखाई देती है, पात्र पैंतरे बदलते दिखाई देते हैं। गरज यह कि यहाँ कुछ भी इकहरा या एकरेखीय नहीं है।

कहानी के एकरेखीय अध्ययन के खतरे

इन कहानियों के साथ सबसे बड़ी समस्या तब पैदा होती है जब इनका एकरेखीय अध्ययन किया जाता है। जैसे उनकी काफी पहले की एक कहानी 'टेपचू' को लिया जाए तो उसके बारे में बहुत दिनों तक हिंदी-आलोचना में यह धारणा बनी रही आई कि यह कहानी अतिक्रांतिकारी मिजाज की है और एक राजनीतिक विचारधारा-विशेष के तहत यह लिखी गई है। नामवर जी ने पहल पुस्तिका (1985) में सुरेश पांडेय के साथ साक्षात्कार में इस पर यह टिप्पणी की : ''टेपचू' मुझे बहुत गढ़ी हुई, नकली और झूठी कहानी लगी। अखबार की खबर पर बनाई हुई और एक अतिक्रांतिवादिता के कारण कहानी को जबरदस्ती मोड़ देने की, जिसे मैं कहूँ कि 'रोमांटिक रिवोल्युशनिज्म' की कहानी वह मुझे लगी।' (पृ. 60-61)। लेकिन देखा जाए तो ऐसा इसमें कुछ है नहीं। यह कहानी दरअसल एक घटना-विहीन कहानी है और जीवन की वास्तविकता या कि सच्चाई के दावे के साथ जिस पात्र को यहाँ उठाया गया है वह पात्र भी एक पात्र या कि व्यक्ति-विहीनता की स्थिति में आता चलता है। यह कहानी अर्चना जी की उस अपेक्षा को बखूबी पूरा करती है जिसके तहत मूर्तन की अद्भुत प्रतिभा अपनी तह में उतरकर कहानी को किसी अमूर्तन का स्पर्श कराती है या कराना चाहिए। टेपचू यहाँ एक व्यक्ति या पात्र नहीं बल्कि एक विचारावेग या जीवनाकुल अवधारणा का प्रतिरूप है जो लाश होकर भी लाश नहीं होती, एक सूत जगह चोट-रहित न होने और जगह-जगह थ्री-नाट-थ्री की गोलियाँ धँसी होने के बावजूद ऐन मौके पर जिसकी आँखें खुल जाती हैं; जो कभी मरती नहीं है : 'टेपचू कभी मरेगा नहीं - साला जिन्न है।' (दरियाई घोड़ा ; पृ. 103)। सशरीर टेपचू चाहे मर गया हो लेकिन यह संघर्षशीलता और संघर्षशीलता की यह अवधारणा अमर है : 'आपको अब भी विश्वास न होता हो तो जहाँ, जब, जिस वक्त आप चाहें मैं आपको टेपचू से मिलवा सकता हूँ।' (वही)। अब अगर इस अवधारणा को ही कोई रोमांटिक रिवोल्युशनिज्म कहे तो बात एकदम दूसरी हो जाती है।

'वॉरेन हेस्टिंग्स का साँड़' के साथ भी समस्या यही पैदा हुई है कि उसे इकहरे तौर पर हिंदुत्ववाद का प्रतीक/प्रतिरूप मान लिया गया है। मेरा विचार है कि यदि लेखक के मन में ऐसा करने की आकांक्षा होती तो इस कहानी का पूरा शिल्प एकदम दूसरे तरह का होता। तब कम से कम कहानी का रूप और घटना-विकास यह न होता जो अब है। हिंदुत्ववादी सोच के तहत यह कहानी लिखी जाती तो हिंदुत्ववाद का प्रतीक साँड़ हिंदू वॉरेन हेस्टिंग्स पर हमला करता दिखाई नहीं देता। यह एक बहुत ही पेचीदा सवाल है कि जब साँड़ हिंदुत्व का प्रतीक है तो वह अपने परिपालक वॉरेन हेस्टिंग्स से ही घृणा क्यों करने लग गया? इस कहानी पर हिंदुत्ववाद की स्थापना का आरोप लगाने वाले कह सकते हैं कि बाद में धीरे-धीरे वह ऐसा नहीं रह गया था। और इंग्लैंड लौट जाने के बाद तो वह एकदम बदल-सा ही गया था। लेकिन यह तर्क भी हिंदुत्ववाद के परिपोषक अन्य तर्कों की ही तरह लचर है। सत्य यह है कि न कभी वह हिंदुत्ववादी था, न उसे हिंदुत्व से कोई लेना-देना था। जो और जितना हिंदुत्व उसमें, कहानी में, दिखाई देता है वह उसकी सिर्फ एक 'लीला' है। एक स्ट्रटेजी और चाल है। उसे न यहाँ की संस्कृति से कोई लगाव है, न लोगों से। सब चीजों को वह एक आश्चर्य और एडवेंचर की तरह लेता है। यहाँ तक कि उसे अपने बाल-सखा बुंतू और सखी चोखी - जिसके साथ राधा या गोपी की तरह गोप या कृष्ण बनकर अरसे तक वह रास रचाता रहा - से भी उसे वहीं तक अपनापा है, जहाँ तक उसकी इच्छाएँ पूरी होती हों और काम सधते हों। चोखी के साथ यों वह गहरे आबद्ध था, ग्वाला या गड़रिया बना उसके आगे-पीछे घूमता रहता था, लगभग उस पर दिलो-जान से फिदा था लेकिन यह सब-कुछ भी वास्तव में उसकी एक लीला ही थी। वास्तविकता यह थी कि बावजूद इसके कि चोखी उसके स्वप्नों की दुनिया थी, उसकी फैंटेसी थी, उसका मिथक थी - जिसके अभाव में आगे चलकर वह 'स्मृतिहीन, अध्यात्मवंचित, स्वप्नशून्य, आदर्श विरत, सपाट, चौकोर, दुनियादार, तिकड़मी, घटिया आदमी' बनकर रह गया था (पॉल गोमरा का स्कूटर, पृ. 143) - उसके लिए एक 'नेटिव रखैल' से ज्यादा महत्वपूर्ण कभी नहीं रही। वह उन अन्य अंग्रेज अफसरों जैसा ही एक फिरंगी चरित्र है जिन के 'पास अपनी-अपनी नेटिव रखैलें हैं।' (वही, पृ. 133)। चोखी उसके लिए केवल एक खेल/लीला-भर थी उपभोग की वस्तु थी। वह उसे सदैव के लिए अपनी नहीं बना सकता, उससे विवाह नहीं कर सकता। जब बुंतू उसे यह सूचना देता है कि चोखी उसे 'प्यार करने लगी है' (पृ. 137) तो उस पर इसकी यह प्रतिक्रिया होती है : 'वारेन हेस्टिंग्स को लगा जैसे किसी ने उसकी कनपटी पर लोहे का हथौड़ा मार दिया हो।' (वही)। उसकी यह प्रतिक्रिया दरअसल इसलिए थी कि वह उसे 'सिर्फ कनेर की टहनी या रेत की ढूह, वृंदावन की किसी दीवार का चित्र या किसी कथा का कोई पात्र मानता था। (वही)। वॉरेन हेस्टिंग्स का असल चरित्र तब सामने आता है जब वह अपनी ही जाति और देश की एक औरत से विवाह कर उसे पत्नी बनाकर लाता है। उसकी यह पत्नी उसे सही मानों में इस देश का गवर्नर जनरल बनाती है। एक विदेशी विजेता शासक को जैसा होना चाहिए; वॉरेन हेस्टिंग्स तब उसी रूप में अभरकर सामने आता है।

समकालीन हिंदुत्ववादी राजनीति एवं सत्ता का असल चरित्र

किंतु ध्यान देने की बात यहाँ यह है कि वॉरेन हेस्टिंग्स का यह नया रूप एकाएक उभरकर आया हो; ऐसा कतई नहीं है। वॉरेन हेस्टिंग्स के भीतर इस समय जो ''सत्ताधारी', 'व्यावहारिक' और 'कुशल प्रशासक' पैदा हो गया था, जिसकी क्रूरता और बर्बरता की मिसाल 1769-90 के महाअकाल के दौरान कायम हुई।' (वही; पृ. 146); उसके सूत्र और बीज उसमें पहले से ही विद्यमान थे। गोवंश-प्रेम और अन्य अभिलक्षणों के आधार पर वॉरेन हेस्टिंग्स को हिंदुत्व-प्रेम का प्रतीक मान लेने का सबसे बड़ा खतरा यह है कि फिर हमें यह भी मानना पड़ता है कि हिंदुत्व का एक अनिवार्य व स्वाभाविक पक्ष यह भी है कि व्यक्ति - यदि वह शासक है या शासक-वर्ग से जुड़ा है तो - रिश्वत कमीशन और भ्रष्टाचार से अपनी तिजोरी भरने वाला, जालसाज, अपने सभी अधिकारों और अपने अधीन सभी संस्थाओं का अनैतिक, मर्यादाहीन और मनचाहा दुरुपयोग करने वाला, भाई-भतीजावादी, चापलूसी व चमचागीरी को पसंद करने वाला, क्रूर, बर्बर, अन्यायपूर्ण और निरंकुश इत्यादि-इत्यादि होगा! (द्रष्टव्य; वही, पृ. 145-47)। क्या हम यह मान लेने को तैयार है कि हेस्टिंग्स का यह जो उत्तर-व्यक्तित्व है; वह भी उसके हिंदुत्व का ही एक हिस्सा है और हिंदुत्व का यह हिस्सा उसका एक स्वाभाविक पक्ष है?

इस संबंध में यदि लेखक के पक्ष की तलाश की जाए तो बात और भी खतरनाक बिंदु पर पहुँचती दिखाई देती है। उदय प्रकाश इस कहानी में हेस्टिंग्स के माध्यम से वास्तव में समकालीन हिंदुत्ववादी राजनीति एवं सत्ता के असल चरित्र को सामने लाने का महत लेखकीय प्रयास करते हैं; ऐसा मेरा स्पष्ट मानना है। हेस्टिंग्स के उत्तरकालीन शासन के मार्फत उदय प्रकाश मानो भारत में शीर्ष दक्षिणपंथी राजनीतिक पार्टी-भाजपा- के शासन - संभवतः भाजपा के इकलौते पूर्ण बहुमत वाली सरकार के शासन - की संभावित कारगजारियों के पूर्व-संकेत इस कहानी में देते हैं। लेखक संभवतः कहना चाहता है कि इस देश में यदि कभी दक्षिणपंथियों का एकछत्र शासन कायम हुआ तो वह लगभग वैसा ही होगा जैसा वॉरेन हेस्टिंग्स का कार्यकाल था। हो सकता है, बाद में न्याय और जनतंत्र के दिखावे के लिए किसी अदालत में उसके मुखिया पर महा-अभियोग जैसा कोई मुकद्दमा चले लेकिन तब तक भगवा रंग में पूरी तरह रँग चुके न्यामूर्तियों का संभवतः वही फैसला होगा जो इंग्लैंड की अदालत के न्यायमूर्तियों ने वॉरेन हेस्टिंग्स के बारे में दिया था। वॉरेन हेस्टिंग्स पर सुनाए गए अदालती फैसले की जो भाषा कहानी में दी गई है वह मौजूदा दक्षिणपंथी राजनीति के सत्ताचरण की भाषा से भिन्न नहीं है। मौजूदा दक्षिणपंथी राजनीति का पूर्ण सत्ता का अभियान लगभग इसी मार्ग-दर्शन पर चल रहा हैः 'हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि साम्राज्य बनाने वाले बड़े राजनीतिज्ञों और प्रशासकों से पूर्ण नैतिक आचरण की उम्मीद करना ठीक नहीं है। क्या कभी पाप, अन्याय और अनैतिकता के बिना भी कोई साम्राज्य बनता है?' (वही, पृ. 156)। यहाँ विडंबना सिर्फ इतनी सी है कि मौजूदा दक्षिणपंथ की कथनी और करनी, सिद्धांत और आचरण; और इनके भी अंदरूनी और बाहरी प्ररूपों में; गजब अंतर है और यह अंतर पूरे होशो-हवास में और जानबूझकर - स्ट्रेटेजिक या कि कार्यनीतिगत - है। इस प्रकार की कार्यनीति अपनाकर ही एक विभ्रम की स्थिति पैदा की जा सकती है। विभ्रम की इस स्थिति के क्या फायदे हैं; यह कहने की जरूरत नहीं है। इसका सबसे बड़ा लाभ तो यही है कि इससे एक तरफ तो आप तत्ववाद की स्थापना करते हैं और तत्ववादियों की निगाह में चढ़कर उनकी शुभाशंसाएँ और समर्थन हासिल करते हैं और दूसरे यह कि इसकी आड़ में बहुत गुपचुप और रहस्यमय तरीके से आप अपने निहित स्वार्थीं को बेखट के और निरंकुश तरीके से अंजाम देते चलते हैं। यह पूरी प्रक्रिया जिस मुकाम पर पहुँचती है वह कुलमिलाकर एक ऐसी स्थिति होती है, जहाँ राजनीति और राज्य के नाम पर आप अपनी अब तक की दबी हुई महत्वाकांक्षाओं और कुंठाओं की परिपूर्ति का मार्ग प्रशस्त करते रहते हैं। इस स्थिति में आम जनता का जो हाल होता है, वह उससे भिन्न नहीं है जो वॉरेन हेस्टिंग्स के कार्यकाल में इतिहास में और इस कहानी में हम देखते हैं। जहाँ तक मूल्यों और मर्यादा और नैतिकता की बात है तो ये चूँकि आम जनता की जीवन-चर्या और जीवनादर्श के पर्याय होते हैं अतः आम जनता की बदहाली ही इस बात का स्वयंसिद्ध प्रमाण है कि राज्य तथा उससे जुड़े शासकवर्ग द्वारा इनकी अवहेलना और उपेक्षा की जा रही है। वॉरेन हेस्टिंग्स ने ऐसा किया और नेटिव्ह्स के प्रति अपनी सहज घृणा और निर्मोह से संचालित एक लुटेरे विदेशी आक्रांता की तरह किया। हम यह देखकर हैरान और लगभग सकते की स्थिति में हैं कि इस कहानी में चित्रित भारत के पहले अंग्रेज गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स और हमारे यहाँ केमौजूदा दक्षिणपंथी शासक-वर्ग में गजब समरूपता है! इस समरूपता का एक उदाहरण यह है - 'एक तरफ वह हिंदुत्व की बात करता था, दूसरी तरफ रिश्वत, कमीशन और भ्रष्टाचार से तिजोरी भरता था। एक तरफ वह गीता और पुराणों का अनुवाद करवाता था अरबी-फारसी और बंगला बोलकर अपने विद्वान होने की धाक जमाता था, दूसरी तरफ उसने अपनी फौज भेजकर निर्दोष रुहेलों का संहार करवाया। सैकड़ों रुहेल औंरतें उसकी फौज द्वारा बलात्कार की शिकार हुईं। छोटे-छोटे बच्चों तक को मार डाला गया।' (पृ. 145-46)। उसके व्यक्तित्व का यह अंतर्विरोध उसके धुर बचपन से ही उसमें मौजूद रहा है। यह हो सकता है कि बचपन में यह बीज या अंकुर के रूप में रहा हो और गवर्नर बनने के बाद पूरी तरह फला-फूला हो लेकिन यह नहीं है कि गवर्नर बनने के बाद यकायक उसमें यह पैदा हो गया। यह ठीक है कि बचपन से लेकर गवर्नर बनने तक हिंदुत्व और उसके विविध अवयवों के प्रति गजब का आकर्षण और मोह उसमें था और बाद में भी रहा; बुंतू और चोखी के सान्निध्य के प्रसंगों में उसका यह आकर्षण और मोह व्यक्त होता है, यह मोह और आकर्षण अपने मित्रों (मसलन मि. इमहॉफ) को लिखे पत्रों द्वारा उसके अपने देश इंग्लैंड भी पहुँचता है। किंतु इन्हीं प्रसंगों और पत्रों इत्यादि में यह भी व्यक्त होता है कि वास्तव में वह एक विदेशी व्यक्ति है और यहाँ के अर्द्धसभ्य और अर्द्धविकसित अर्द्धमानवों पर राज करने आया है। कहानीकार ने उसके आकर्षण और मोह के लगभग हर प्रसंग के साथ अंत में उसके इस स्वाभाविक संस्कार का उल्लेख आवश्यक रूप से किया है। इस मामले में कही भी चूक उसने नहीं की है। प्रतीत होता है कि वह इस अंतर्विरोध के प्रति सावधान और सचेत है। दरअसल इसी सावधानी में लेखक उदय प्रकाश की क्षमता और अंतर्दृष्टि निहित है। चोखी की आत्महत्या इन प्रसंगों का चरम-बिंदु है।

सच्चा देशज राष्ट्रवाद अर्थात चोखी की अंतर्कथा

चोखी की आत्महत्या इस कहानी का और विशेषतः हेस्टिंग्स के कथित हिंदुत्व-प्रेम के संभ्रम का निर्णायक बिंदु है। इस बिंदु पर आकर पाठक का संभ्रम भी तार-तार हो जाता है और हेस्टिंग्स का मूल रूप वास्तविकता में उभरने लगता है। हालाँकि जैसा कि कहा गया; हेस्टिंग्स के मूल रूप से लेखक पाठक को प्रारंभ से ही परिचित कराता चलता है। चोखी द्वारा उसी के ऐन सामने अपने पेट में खंजर भोंक लेना इसकी चरम परिणति है। आखिर क्यों भोंका चोखी ने स्वयं ही अपने पेट में खंजर? चोखी तो हेस्टिंग्स के साथ मस्त थी, जो सुविधाएँ, खाना-पीना, भोग-विलास इत्यादि की सामग्री उससे उसे मिल रही थी; वह उसे अपनी किस्मत समझ उस पर इतरा रही थी, हेस्टिंग्स को मन ही मन अपना आदमी मानने लगी थी, यहाँ तक कि उसके बच्चे की माँ तक बन रही थी; लेकिन यही चोखी - कहानी के अनुसार - वस्तुतः अंग्रेजों के खिलाफ प्लासी की लड़ाई में लड़ने वाले बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के वफादार और खेत रहने वाले सिपहसालार मोहन लाल की बेटी भी थी। उसकी रगों में देश के प्रति बफादारी, बलिदान और ईमानदार प्रेम की भावना का संस्कार भी मौजूद था। चोखी का यह संस्कार तब आहत हुआ जब उसे पता चला कि वॉरेन हेस्टिंग्स ने इस देश का एक नक्शा बनवाया है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि हिंदुस्तान का भौगोलिक नक्शा सबसे पहले अंग्रेजों ने - यानी पहले गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने - बनवाया था। इससे पहले यहाँ का कोई नक्शा नहीं था। यह एक बिना नक्शे का मुल्क था, हालाँकि तब भी यह एक मुल्क तो था ही। एक ऐसा मुल्क जो एक भावना की तरह, संस्कार की तरह यहाँ के निवासियों के दिलों में अंतर्व्याप्त था : 'समव्हेयर इन दि सोल एंड माइंड ऑफ दीज मिस्टोरियस इनहैबिटैंट्स।' (वही; पृ. 118)। और यदि चोखी के हिसाब से देखा जाए - और वास्तव में यह चोखी ही नहीं यहाँ के हर निवासी की मान्यता थी - कि किसी ने अब तक आखिर क्यों इस देश का नक्शा नहीं बनवाया तो बात यह सामने आती है कि - 'किसी ने ऐसा इसलिए नहीं किया क्योंकि कोई इस मुलुक को मिटाना नहीं चाहता था। हमारे यहाँ जिसको मारना होता है, उसका बेसन का पुतला बनाकर उसे तलवार से काटते हैं। जैसे-जैसे पुतला कटता जाता है, वह आदमी जिसका प्रतिरूप यह पुतला होता है, वह भी कटता जाता है। फिर पुतले को आग में डाल देते हैं। भसम कुंड में।' (वही; पृ. 142)। चोखी का यह कथन; इतिहास गवाह है कि; आगे चलकर शत-प्रतिशत सत्य सिद्ध हुआः 'बुंतू को, अब्दुल कादिर को, मेरे को, सबको पता है कि तुम फिरंग लोग उस कागज पर घोड़ा दौड़ाएगा, उसको बंदूक से मारेगा, उसको पिंजरे में डालेगा उसको चूस-चूसकर खाएगा और जब तुम लोग यहाँ से जाएगा तो वो नक्शा किसी अपने गुलाम को सौंप जाएगा।' (पृ. वही)। चोखी को मलाल दरअसल यह था कि वह समय रहते सावधान नहीं रह पाई। वह धीरे-धीरे और देर से उसके इरादों को भाँप पाई और इस बीच उसके पेट में उसका बीज आ गया! चोखी दरअसल अपने-आप को नहीं; अपने पेट में पल रहे इस फिरंग के बीज को खत्म करती हैः 'देख इस खंजर से कौन मर रहा है? मर रहा है तेरा बीज, जो मेरे पेट में है।' (पृ. 143)। चोखी को मलाल है कि वह एक फिरंग को अपना सब-कुछ सौंप बैठी थीः '...तू जैसे अपने नसल में लौटा है, वैसे ही अपने वतन को भी लौटेगा। तू यहाँ का नहीं है रे। तू फिरंग है, फिरंग।' (वही)।

यदि किसी को सच्चा राष्ट्रवाद देखना हो तो यहाँ देखे। चोखी के इस पश्चात्ताप और बलिदान में! आश्चर्य है कि इस कहानी पर हिंदुत्ववाद की स्थापना का आरोप लगाने वाले बुद्धिजीवी अपनी चर्चा में कहीं चोखी का जिक्र तक नहीं लाते! चोखी के चरित्र और उसकी इस आत्महत्या के प्रसंग के गहन विश्लेषण के बिना इस कहानी पर कोई भी बहस अधूरी और पूर्वाग्रहग्रस्त ही मानी जा सकती है। चोखी की यह कथा - दरअसल अंतर्कथा - इस कहानी में निहित लेखक की अंतर्दृष्टि को समझने की कुंजी है। लेखक की यह अंतर्दृष्टि है; उसका सच्चा राष्ट्रवाद। सांप्रदायिक या हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद नहीं बल्कि सच्चा देशज राष्ट्रवाद जिसका आधार धर्म या नस्ल नहीं बल्कि यहाँ का बृहद सामान्य जन-समुदाय है। यह सामान्य जन-समुदाय जगह-जगह यहाँ अपनी झलक देता चलता है। चोखी ही नहीं, बुंतू, अब्दुल कादिर जैसे लोग भी इसी सामान्य जन के प्रतीक-प्रतिनिधि हैं जो आगे चलकर यह स्पष्ट महसूस करते हैं कि 'अब हम गुलाम हो गए हैं'। (पृ. 147)

औपन्यासिक शिल्प में गुँथी तथ्यपुष्ट और प्रासंगिक कहानी : ' वॉरेन हेस्टिंग्स का साँड़ '

यहाँ थोड़ी देर रुककर यदि यह विचार किया जाए कि यदि सचमुच ही हिंदुत्व की स्थापना के उद्देश्य से यह कहानी लिखी गई होती तो इसका क्या रूप / प्ररूप होता? तो, इस मामले में यह लगभग निश्चित है कि चोखी आत्महत्या नहीं करती। न वह मोहनलाल की बेटी होती, न अंग्रेजों द्वारा मुल्क का नक्शा बनवाए जाने पर उसे क्रोध आता! वह बड़े प्रेम और फख्र से अपनी किस्मत पर लगातार इतराती रहती और हेस्टिंग्स को खूब भोगती और छककर उसके रस की लगातार बियारी करती रहती! वह उसके बीज को अपनी कोख में पालने और इस दुनिया में लाने का अभूतपूर्व ऐतिहासिक धार्मिक कार्यभार निभाते हुए स्वयं को धन्य महसूस करती। बुंतू का चेहरा भय और विस्मय से पीला नहीं पड़ता और वह बाउल गीत गाना बंद नहीं करता। वह अपने एकतारे को गवर्नर जनरल को कबाव बनाने वाले तंदूर में नहीं झोंक देता और किसी से यह नहीं कहता कि 'अब हम गुलाम हो गए हैं।' इत्यादि-इत्यादि। ...लेकिन नहीं! यह सब-कुछ भी नहीं! उदय प्रकाश हिंदुत्व की स्थापना के लिए अपनी ऊर्जा को इस तरह जाया नहीं करते! हिंदुत्व की स्थापना के लिए उन्हें कोई कहानी लिखने की जरूरत ही क्या / क्यों पड़ती! उसकी स्थापना तो इतिहास कर ही रहा था! ...मेरा स्पष्ट मानना है कि 'वॉरेन हेस्टिंग्स का साँड़' जैसी लंबी और औपन्यासिक शिल्प में गुँथी पर्याप्त तथ्यपुष्ट और समकाल में प्रासंगिक कहानी किसी घिसे-पिटे शातिराना उद्देश्य के लिए नहीं लिखी जाती! हिंदुत्व की स्थापना हिंदी में रचनात्मक साहित्य द्वारा नहीं; उसकी सांप्रदायिक व्याख्या द्वारा हुई है। यह काम आलोचकों और व्याख्याकारों ने ज्यादा किया है।

ढाई सौ साल पहले की कहानी आज की कहानी

जहाँ तक साँड़ द्वारा हेस्टिंग्स पर हमले की व्याख्या का सवाल है तो जैसा कि मैंने पहले कहा; वह - जैसा कि कहानी में उसका निरूपण है - हिंदुत्ववाद; दरअसल उग्र हिंदुत्ववाद; का प्रतीक नहीं माना जा सकता! इस साँड़ को उग्र हिंदुत्व का प्रतीक मानना भी हमारा एक पूर्वाग्रह ही होगा क्योंकि लेखक इसके विषय में और भी कई संदर्भ कहानी में बराबर देता चला है। मसलन यह कि - 'क्या वह साँड़ सिर्फ अपनी गाय और संतान के शोक में पागल हुआ था? क्या उसने यूरोप के निर्मम, अमानवीय और करूणाशून्य औद्योगिक समाज और पश्चिमी संस्कृति के विरोध में अपनी जान दी? घ्घ्घ् या वह एक मामूली साँड़ था, जिसे सैम्युएल टर्नर ने तिब्बत के एक बूढ़े लामा से प्राप्त किया था और भारत के पहले गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स को भेंट किया था? या वह गाय 'चोखी' और वह साँड़ उस 'नंदकुमार' के पुनर्जन्म थे, जिनकी मृत्यु में वारेन हेस्टिंग्स की भूमिका थी? या वह साँड़ वास्तव में शहीद हुआ था?' (पृ. 158)। साँड़ के इस विकल्पधर्मी उपस्थापन में उक्त विकल्पों के बीच में दो विकल्प और लेखक ने दिए हैं। एक यह है - जिसका उल्लेख पीछे हमने किया - 'क्या वह अपने देश के मिथकों, पुराणों, ग्रंथो, अंधविश्वासों और पुरानी परंपराओं के लिए किसी कट्टरपंथी सांप्रदायिक की तरह लड़ा और मारा गया?' (वही) और दूसरा यह 'क्या वह ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ एक देशभक्त राष्ट्रवादी भारतीय की तरह विद्रोह करता हुआ मरा?' ...ये सारे विकल्प संभवतः उस समय मौजूद थे और इसीलिए लेखक ने इन्हें लिया। अब इनमें लेखक का पक्ष कौन-सा है, यह कहना यदि आसान नहीं तो मुश्किल भी नहीं है। लेकिन इतना अवश्य है कि लेखक का पक्ष यहाँ वह नहीं है जिसे इस कहानी को लेकर प्रचारित-प्रसारित किया गया है। निश्चय ही यह कहानी एक 'विशफुल थिंकिंग' है। लेकिन उस अर्थ में नहीं जिसमें राजेंद्र यादव इसे लेते हैं : 'वॉरेन हेस्टिंग्स' कहीं अवचेतन में एक इच्छा-स्वप्न (विशफुल थिंकिंग) भी है; काश ऐसा हो जाता। कोई चमत्कारी देवता आता और दुश्मनों को झटके से मारकर हमें बचा लेता। इस अर्थ में वह सत्य के अंतिम विजय की धार्मिक कहानी है और उदय के पिछले कथा-प्रयोगों का अगला विस्तार है।' (हंस; मई 1997; पृ.5/संपादकीय)। यह कहानी एक इच्छा-स्वप्न इस अर्थ में है कि वॉरेन हेस्टिंग्स लंदन के न्यायमूर्तियों द्वारा महा-अभियोग से बरी किए जाने के बावजूद भारतीय (हिंदू नही; भारत-राष्ट्रीय) मानस में एक घृणास्पद और समूल नष्ट किए जाने योग्य चरित्र था। यह विशफुल थिंकिंग क्रांतिकारी नैतिकता के तहत है। इस कहानी की विशफुल थिंकिंग इस अर्थ में भी है कि हमारे यहाँ यह जो एक बार फिर आर्थिक उपनिवेशवाद प्रवेश कर रहा है और सुरसा की तरह लगातार अपना बदन बढ़ाता चल रहा है, - जो आगे चलकर हमें सांस्कृतिक एवं राजनीतिक उपनिवेश बनाएगा - उस पर अंकुश लगाया जाना, प्रहार किया जाना जरूरी है। यह अंकुश या प्रहार किसके द्वारा होगा; यह एक जलता-उबलता प्रश्न है। क्या यह अंकुश अमीनचंद, जगत सेठ, मीर जाफर, मीर कासिम जैसे लोग - दरअसल इन लोगों के आज के वंशज - लगाएँगे? या वे मुसलमान अमीरजादे और रईस हिंदू जो तब 'हिंदुस्तान की लूट में अंग्रेजों के साथ हिस्सेदारी चाहते थे; इन अमीरजादों और रईसों की संतानें यह अंकुश लगाएँगी / प्रहार करेंगी; या मोकांजी इंडस्ट्रियल ग्रुप के टी.के. मोकांजी जैसे लोग जिन्हें आज 'भारतरत्न' से नवाजा जा रहा है और जिनकी छवि एक महान स्वतंत्राता-सेनानी और समाजसेवी की बनी है लेकिन जिनके पूर्वज 'अंग्रेजी राज के दौरान फिरंगियों के जिमखाना, रेसकोर्स और डाइनर्स क्लब के भारतीय सदस्य हुआ करते थे' और जिनकी 'अंग्रेजभक्ति और निलहे मजदूरों के प्रति क्रूरता और अमानुषिक बर्बरता' का वर्णन उस समय के साहित्य में मिलता है ('पाल गोमरा का स्कूटर' कहानी पृ. 47-48)? आज यह कथन अजब तरीके से सच साबित हुआ है कि 'दो सौ सालों के बाद जब अंग्रेज मालामाल होकर वापस अपने वतन इंग्लैंड लौटेंगे तब भी इंडिया में उनके जैसे ही नेटिवों का राज होगा। वे लोग वही खाएँगे, जो अंग्रेज खाते हैं। वही पिएँगे जो अंग्रेज पीते हैं। वे वही भाषा बोलेंगे जो अंग्रेज बोलते हैं। उनके कपड़े, विचार, स्वप्न और आकांक्षाएँ अंग्रेज होगी। वे हर इंडियन चीज से घृणा करेंगे। वे इंडिया को उससे भी ज्यादा लूटेंगे, जितना विदेशी कंपनियों ने लूटा है।' ('वॉरेन हेस्टिंग्स का साँड़' कहानी; पृ. 109)। अंग्रेजों के जाने के पचास साल बाद आज भी यह क्रम जारी है; बल्कि और गहरा और व्यापक हुआ है। मिस्टर फ्रेयर के हवाले से गुजरात के एक मदारी के लड़के की उस समय की गई यह जो भविष्यवाणी कहानी में ली गई है, उसका कोई लिखित सबूत इतिहास में नहीं मिलता। यह लेखक की एक गढ़ी गई कल्पना है। लेकिन इस गढ़ाव में जो टटकी और सतर्क सृजनशीलता छिपी है; उसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। आजादी के बाद के इतिहास ने स्वतः इसे सिद्ध कर दिया है। बल्कि जैसा कि लेखक स्वयं अपना ध्येय बनाकर चला है; आज से ढाई सौ साल पहले की कहानी को आज की कहानी बनाने की प्रक्रिया के तहत यह उद्भावना सामने आई है। ढाई सौ साल पहले की कहानी को आज की कहानी बनाने वाला एक और तत्व कहानी में यह है : 'आज से ढाई सौ साल पहले भी, एक विदेशी सार्वजनिक कंपनी इंग्लैंड की एक प्राइवेट कंपनी से हार रही थी।' (पृ. 112)। आज हमारे यहाँ की सार्वजनिक कंपनियाँ हमारे यहाँ की तथा विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से हार रही हैं। अब तो स्थिति दरअसल यह नजर आती है कि यहाँ की केंद्र व राज्यों की सरकारें तक एक प्राइवेट कंपनी में तब्दील हो चुकी हैं। कल्याणकारी और समाजवादोन्मुख राज्य अब किसी निजी व्यावसायिक/पूँजीवादी प्रबंध-तंत्र में बदलता दिखाई दे रहा है। ढाई सौ साल पहले की कहानी को आज की कहानी बनाने वाला सबसे बड़ा सूत्र जो इस कहानी में है वह है लार्ड क्लाइव की; कंपनीराज में ऊपर से लेकर नीचे तक व्याप्त अराजकता, घूसखोरी, बेईमानी, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट को लेकर की गई लंबी टिप्पणी; जिसे लेखक ने कहानी में सबसे पहले उल्लिखित किया है। इसका कुछ अंश यहाँ दिया जाना दिलचस्प होगा : 'मैं सिर्फ यह कहूँगा कि अराजकता का ऐसा दृश्य, ऐसा भ्रम, ऐसी घूसखोरी और बेईमानी, ऐसा भ्रष्टाचार और ऐसी लूट-खसोट जैसी हमारे राज में आज दिखाई दे रही है, वैसी किसी और देश में न कभी सुनी गई न कभी देखी गई। अचानक धनाढ्यों की बेइंतहा दौलतपरस्ती ने विलासिता और भोग के भीषण रूप को चारों तरफ पैदा कर दिया है। इस बुराई से हर डिपार्टमेंट का हर सदस्य प्रभावित है। इसकी मिसालें ऊपर के पदों पर बैठे लोगों ने कायम की हैं, तो भला नीचे के लोग उसका अनुसरण करने में नाकामयाब क्यों रहें?

'यह रोग सर्वव्यापी है। यह नागरिक प्रशासन, पुलिस और फौज ही नहीं लेखकों, कलमनवीसों और व्यापारियों तक को अपनी चपेट में ले चुका है।' (पृ. 105)।

इस उल्लेख के ठीक बाद लेखक की यह टीप भी द्रष्टव्य है : 'और यही है वह बिंदु जहाँ ढाई सौ साल पहले की कहानी आज की कहानी बनती है। इतिहास फिर से निरंतरता हासिल करता है...' (पृ. वही)। इस उल्लेख के ठीक पहले लेखक ने यह भी लिखा : 'लेकिन सच यह भी है कि ढाई सौ साल पहले और आज के बीच कुछ ऐसा भी है, जो जरा भी नहीं बदला है। वह ज्यों का त्यों है।'

वर्तमान वास्तविकताओं के सूत्र और परंपरा

स्पष्ट है कि लेखक वर्तमान वास्तविकताओं के सूत्र और परंपरा अतीत में देखता है लेकिन स्पष्ट यह भी है कि यह एक अतीतवादी कहानी नहीं है। हालाँकि कहा तो यह भी जा सकता है कि आज के संकट और समस्याओं के समाधान की संभावना के सूत्र भी वह अतीत में देखता है क्योंकि आज उसे कहीं भी चोखी, नंदकुमार, मीर मदान, मोहन लाल जैसे प्रतिरोधी चरित्र नहीं दिखते। आज जो चरित्र उसे दिखाई देते हैं, उनमें ज्यादातर लोग या तो मीर जाफर और राय दुर्लभ और मोहिनी ठाकुर के माता-पिता जैसे ऊँची जात के रोम के गुलामों से भी ज्यादा गुलाम लोग हैं जिनका मानना था कि 'ईस्ट इंडिया कंपनी सारी इंडिया को अपने कब्जे में करेगी।' इसलिए इस स्थिति में ऐश करने के लिए जरूरी था कि वे 'जरा-सा प्रैक्टिकल' हो जाएँ। (पृ. 126)। अंग्रेजों के समय ये अंग्रेजों के पिछलग्गू थे जबकि अंग्रेजों से पहले मुगल शासन के दौरान ये मुगलों के मुसाहिब थे : 'मुगल शासन के दौरान उन्होंने बड़ी मेहनत से फारसी सीखी थी और दरबार से तमाम इनायतें पाई थीं। बदलते वक्त में वे अब अंग्रेजी सीख रहे थे।' (पृ. 123)। आज के मौजूदा समय में ये लोग जैसे के तैसे बरकरार हैं। आज जबकि खुले बाजार, वैश्वीकरण और अंतर्राष्ट्रीय व्यावसायिक पूँजी - बहुराष्ट्रीय प्राइवेट कंपनियों - का खुला खेल यहाँ शुरू हो गया है; यह वर्ग एक नए पैंतरे के साथ इस नए माहौल में अपनी संभावनाएँ और सुख-सुविधाएँ तलाशने की प्रक्रिया में आ गया है। उदय प्रकाश ने 'पॉल गोमरा का स्कूटर' में इस ताजातरीन स्थिति का सिलसिलेवार वर्णन किया है। मुक्तिबोध की 'अँधेरे में' कविता की कुछ प्रसिद्ध पंक्तियों द्वारा जिन जाने बूझे-से लगते चहरों वाले लोगों का जिक्र यहाँ आया है, वे वास्तव में वही उच्चवर्गीय और उच्चवर्गोन्मुख मध्यवर्गीय सुविधापरस्त और अवसरवादी लोग हैं जिनका उल्लेख ऊपर हमने 'वॉरेन हेस्टिंग्स का साँड़' कहानी में देखा। लोकतंत्र के चारों स्तंभों के कर्णधार इस वर्ग में शामिल हैं। उदय प्रकाश अपनी चिरपरिचित और जादुई यथार्थ की शैली में एक दृश्य उपस्थित करते हैं : 'तभी उनकी निगाह ऊपर टँगे हुए सूटकेस की ओर गई। उसका ढक्कन थोड़ा सा खुला हुआ था और इंडिया गेट से एक विशाल सीढ़ी ऊपर की ओर गई हुई थी। इस पर लोग चींटियों, चूहों और छिपकलियों की तरह रंग रहे थे। वे उस सूटकेस तक जाते और अपने दाँतों में नोटों की गड्डियाँ दबाकर नीचे कूद जाते। उनकी पीठ पर कागज की छोटी-छोटी चिप्पियाँ चिपकी थीं, जिन पर ग्रामीण विकास, रोजगार, आवास, सड़क, साक्षरता, प्लेग, गरीबी, चेचक, परिवार कल्याण, राहत, भूकंप, पर्यावरण, शौचालय, संस्कृति, एड्स, साहित्य आदि लिखे हुए थे। हर शब्द के अंत में एक अंतःसर्ग था जो हर चिप्पी पर मौजूद था - 'परियोजना।' (पृ. 57)। मौजूदा राज्य में फैला यह वही भ्रष्टाचार, बेईमानी और लूट-खसोट हैं जिसका जिक्र लार्ड क्लाइव की टिप्पणी में था और जिसकी परंपरा अव्याहत रूप से आज भी जारी है। इस कहानी में भारतीय नौकरशाही का शर्मनाक समकालीन चरित्र लेखक ने प्रस्तुत किया है। बानगी के रूप में छह उदाहरण उसने दिए हैं जो अश्लीलता/कामुकता, अधिकारों के निहित स्वार्थी दुरुपयोग, अपराधियों और माफिया के साथ मिलीभगत, राष्ट्र के साथ धोखाधड़ी, भाई-भतीजावाद, चापलूसीपसंदी इत्यादि-इत्यादि के प्रतीक हैं। नौकरशाही और अन्य सुविधापरस्त और अवसरवादी वर्गों का यह अहवाल यह आवश्यक संकेत करता है कि जिस राजनीति/व्यवस्था के संरक्षण में ये पल और फल-फूल रहे हैं, वह किस कदर अराजकतावादी होगी! लेखक ने सीधे-सीधे नहीं; अप्रत्यक्ष लेकिन विश्वसनीय संकेत इस ओर किए हैं।

राष्ट्रीय और सामाजिक संकट का सर्जनात्मक अधिगम

उदय प्रकाश सीधे-सीधे राजनीति या राजनेताओं को अपना पात्र नहीं बनाते। लेकिन ये परदे के पीछे निरंतर यहाँ मौजूद है। संभवतः 'और अंत में प्रार्थना' उनकी इकलौती कहानी है जिसमें राजनीति और राजनेता प्रत्यक्ष हैं। लेकिन जहाँ राजनीति सीधे-सीधे नहीं है वहाँ भी एक अप्रत्यक्ष नियंता की तरह वह मौजूद है। इसका स्वरूप ठीक मदारी के उस लड़के की तरह है जो 'वॉरेन हेस्टिंग्स का साँड़ में आसमान में छिपकली की तरह रेंगता हुआ गायब हो जाता था और वहाँ से अदृश्य रहते हुए ही भविष्यवाणी किया करता था। (पृ. 109)। राजनीति के बिना आज किसी कहानी की रचना संभव ही नहीं है। उदय प्रकाश 'पॉल गोमरा का स्कूटर' में आज के जिस उत्तर आधुनिक भारतीय परिदृश्य का अंकन करते हैं, उसके आदि-सूत्र आज से ढाई सौ साल पहले तक जाते हैं। और भी पहले जाते होंगे लेकिन फिलहाल लेखक कंपनी-राज पर केंद्रित है। लगभग वही कंपनी-राज आज एक नए रूप व चरित्र में हमारे चारों ओर उपस्थित है। हमें हर तरफ से घेर रहा है। पहले केवल एक कंपनी थी आज बीसियों हैं। हमारी राजनीति उसके सामने कोरनिश की मुद्रा में आदाब बजा ला रही है। भारतीय संदर्भ का सारा प्रतिरोध जैसे चुक गया है। 'पॉल गोमरा...' कहानी में नौकरशाही के उक्त चित्रण के तुरंत बाद लेखक की यह टिप्पणी गौरतलब है : 'कहीं से भी विरोध या आलोचना की चीं-चपड़ नहीं थी। किसी भी तरह के विरोध को यूरोप के समाजवाद की तरह पिछड़ा हुआ अप्रासंगिक हैंगओवर मान लिया गया था।' (पृ. 65)। इस कहानी में लेखक ने इतिहास, विचार इत्यादि के अंत, स्मृति / परंपरा के लोप के उत्तर-आधुनिक अभिलक्षणों का उल्लेख किया है। लोग स्मृतिहीनता की गिरफ्त में आते जा रहे हैं या उन्हें लाया जा रहा हैः 'लोगों की स्मृति उस कैसेट की तरह थी, जिसमें हर रोज नई छवियाँ और नई आवाजें टेप की जातीं और रात में उन्हें पोंछ दिया जाता। सुबह वे सबके सब स्मृतिहीन होकर उठते। उन्हें पिछला कुछ याद नहीं रहता था।' (पृ. 63)। जनता की स्मृति को तहस-नहस करने का यह उपक्रम आज का नहीं है। यह साम्राज्यवाद का एक पुराना हथियार है। लोगों को स्मृतिहीन करके ही उन्हें अपना उपनिवेश बनाया जा सकता है। वॉरेन हेस्टिंग्स भारत का गवर्नर जनरल बनने से पहले ही इस तथ्य तक पहुँच चुका था। शेक्सपियर के हवाले से वह तय पाता है कि - 'इफ यू हैव टू डिफीट देम, यू हैव टु किल देयर मेमोरीज। यू हैव टु डिस्ट्रॉय देयर पास्ट। यू हैव टू शूट देयर स्टोरीज।' (पृ. 114)। अतः यदि यह कहा जाए कि हमारे यहाँ और हमारे जैसे दुनियाभर के पुराने और परंपरागत औपनिवेशिक देशों में - जिसे तीसरी दुनिया कहा जाता है - उत्तर आधुनिक जीवन-शैली और विचार-सरणि के लिए पहले से एक पुख्ता और व्यापक जमीन बन चुकी थी तो कोई अत्युक्ति न होगी। अंतर सिर्फ इतना आया है कि पहले के सुविधापरस्त और अवसरवादी उच्च और संपन्न और संपन्नता की ओर उन्मुख वर्ग में अब काफी इजाफा हो गया है। हमारे यहाँ का विशाल मध्य वर्ग भी अब इस अन्धी दौड़ में शामिल हो गया है। यह वही मध्यवर्ग है; जिसने आजादी की लड़ाई में पर्याप्त योग दिया था और कुर्बानियाँ दी थीं। यह मध्यवर्ग अब अपनी जड़ों से उखड़कर एक नए सिरे से औपनिवेशिकता की प्रक्रिया में आ गया है। उदय प्रकाश ने 'पॉल गोमरा...' कहानी में इसके विविध उल्लेख किए हैं। अपने एक आत्मकथ्य 'मैं और मेरा समय' में उदय प्रकाश लिखते हैं - 'राष्ट्रीय नवजागरण, स्वाधीनता आंदोलन और स्वतंत्रता के बाद के वर्षों में उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय चेतना तथा आधुनिक, प्रगतिशिल लोकतांत्रिक चेतना का संवाहक यह मध्यवर्ग आज अपने परिवेश और समाज से कटा हुआ भोगवाद, विलासिता, धनलिप्सा और सत्ताकेंद्रित विमर्श का पुरोधा बना हुआ है।' (कथादेश; मार्च 1997; पृ. 9)। उदय प्रकाश ने इस प्रसंग में आगे लिखा कि - 'ईमानदारी, नैतिकता, सामाजिक प्रतिबद्धता, देश-प्रेम और कर्मठता जैसे तमाम मूल्य अब 'लोअर मिडिल क्लास' की ओर खिसक गए हैं। ये मूल्य अब ऊपर की ओर ताकते, पश्चिम की ओर भागते, भ्रष्ट राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र और विदेशी कंपनियों की लूट-खसोट में अपना भी बाँट-बखरा माँगते हमारे नव मध्यम वर्ग के मूल्य नहीं हैं।' (वही)। आगे एक पंक्ति उन्होंने यह लिखी : 'यह एक गंभीर राष्ट्रीय और सामाजिक संकट की सूचना है।' (वही)। मेरा मानना है कि 'भाई का सत्याग्रह', 'वॉरेन हेस्टिंग्स का साँड़' और 'पॉल गोमरा का स्कूटर' ये तीनों कहानियाँ इसी गंभीर राष्ट्रीय और सामाजिक संकट के सर्जनात्मक अधिगम के तहत लिखी गई हैं। न केवल अधिगम बल्कि इस संकट पर विचार और इससे निपटने की चेष्टा और उपक्रम भी। बड़े भाई, गोपाल राम सक्सेना और तिब्बत से लाए गए उस साँड़ का घृणा और क्रोध से भरा प्रतिरोध इसी चेष्टा और उपक्रम के अंतर्गत है। इन तीनों पात्रों में गजब साम्य है। ये तीनों ही मिलकर भारतीय राष्ट्रीय प्रतिरोध की मौजूदा संभावित बानगी पेश करते हैं। बड़े भाई और गोपाल राम सक्सेना मनुष्य हैं जबकि साँड़ (याक) एक पशु। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। एक तरह से देखा जाए तो ये तीनों ही प्रतिरोधी पात्र लेखक की वैचारिकता, वैचारिक प्रतिबद्धता और यदि राजेंद्र यादव के शब्दों में कहा जाए तो एक 'इच्छा-स्वप्न' है। ये तीनों ही पात्र मिलकर एक भारतीय राष्ट्रवादी प्रतिरोधी चरित्र की सृष्टि करते हैं। हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी नहीं; भारतीय राष्ट्रवादी! यो साँड़ के विषय में कहानी में कहा गया है कि 'वह नंदी है। हिंदुओं के देवता पशुपति का वृषभ।' (पृ. 149)। लेकिन इतना कहने भर से यह साँड़ हिंदुत्ववाद का प्रतीक नहीं बन जाता। मैने पहले कहा कि लेखक की दृष्टि हिंदुत्ववादी नहीं है; अतः कहानी में यदि हजार बार भी हिंदू या हिंदुत्व शब्द का उल्लेख हो तो उससे हिंदुत्व की स्थापना नहीं मानी जा सकती। उदय प्रकाश; यदि सही कहा जाए तो; हिंदुत्ववादी विचाराग्रहों को इस कहानी में बार-बार आशंका के घेरे में लाते हैं। उसकी सीमाओं को उभारते हैं और स्पष्ट करते हैं कि वह किस प्रकार असल भारतीय राष्ट्रवाद के सामने बौना है। अगर यह कहा जाए कि इस कहानी में उदय प्रकाश हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के बरक्स असल भारतीय राष्ट्रवाद की प्रतिष्ठापना करते हैं तो शायद यह इस कहानी की सबसे अच्छी व्याख्या होगी। हिंदी में असल भारतीय राष्ट्रवाद की एक झलक - और बहुत पुख्ता और प्रामाणिक झलक - मुक्तिबोध की कविताओं - विशेषतः 'अँधेरे में' - में मिलती है। यह अकारण नहीं है कि उदय प्रकाश को चाहे वे समकालीन राष्ट्रीय और सामाजिक संकट पर कोई कहानी लिखें या आत्मकथ्य या वैचारिक लेख - बार-बार मुक्तिबोध याद आते हैं।

पहले मैंने कहा था कि 'भाई का सत्याग्रह' और 'पॉल गोमरा का स्कूटर' ये दोनों कहानियाँ एक ही जमीन पर लिखी गई हैं। अब इस लेख के दौरान पाठाधारित अधिगम के पश्चात मैं इस नतीजे पर पहुँचा दूँ कि न केवल इन दोनों की बल्कि 'वॉरेन हेस्टिंग्स का साँड़' की भी एक ही जमीन है और वह जमीन है : इस देश का समकालीन गंभीर राष्ट्रीय और सामाजिक संकट। 'पॉल गोमरा...' 'वॉरेन हेस्टिंग्स', के बाद की कहानी है। इस कहानी का साँड़ 'पॉल गोमरा...', में एक विक्षिप्त किंतु असल भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति समर्पित कवि के रूप में मानो अपना 'पुनर्जन्म' ग्रहण करता है। प्रसिद्ध भारतीय अंग्रेजी लेखक और 'लिटिल इंडिया' मैगजीन (न्यूयार्क) के संपादक अमिताव कुमार ने प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रिका 'क्रिटिकल इन्क्वायरी' (न्यूयार्क) के ट्रांजिशन इश्यू 79 (1999) के 'अंडर रिव्यू' स्तंभ में कई समकालीन भारतीय अंग्रेजी कथाकारों की कृतियों पर विचार करते हुए तथा इसमें हिंदी कथाकार उदय प्रकाश की 'पॉल गोमरा का स्कूटर' कहानी को शामिल करते हुए 'व्हाट इज सो हॉट अबाउट इंडियन राइटिंग' उपशीर्षक के साथ लिखे गए 'लाउडर दैन बॉम्ब्स' शीर्षक अपने महत्वपूर्ण लेख में लिखा है : 'प्रकाश'ज स्टोरी इज अॅ फेबुल अबाउट सर्वाइवल अमिड् द फोर्स' दैट हैव लेजिस्लेटॅड एक्सटिंक्शन फॉर ऑल। पॉल गोमरा। लाइक हिज क्रिएटर, उदय प्रकाश, ऑर लाइक सर विदिया हिमसेल्फ - नोज वेरी वेल दैट ही विल नॉट बी लाइक्ड एनी बैटर इफ ही स्टॉप्स यॉकिग।' यहॉ 'यॉकिंग' शब्द पर गौर करें। दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर वाले आयोजन में राजधानी के शीर्षस्थ आलाचकों, संपादकों, केंद्रीय मंत्रियों, उच्च अधिकारियों, उद्योगपतियों, अभिनेता-अभिनेत्रियों, साहित्यकारों, कवियों यानी कि 'पावरफुल मनीड पीपॅल' के बीच नशे में धुत होकर पॉल गोमरा का अंट-शंट - हालाँकि अन्य अर्थों में अत्यंत महत्चपूर्ण - बकना तथा दुघर्टना के बाद एकदम बर्बाद और विक्षिप्त-सा हो जाने पर जी.टी. रोड (हाइवे) पर चलती हुई गाड़ियों के सामने और उनके बीच विविध एक्शन और धारा प्रवाह भाषण इत्यादि करना क्या उस साँड़ जैसी ही हरकत (यॉकिंग) नही है, जो वॉरेन हेस्टिंग्स पर प्राणघातक हमले के रूप में वहाँ सामने आई थी? 'सभ्य' और सत्ता से चिपटे तथा हाईवे के मुसाफिरों इत्यादि के लिए यह एक 'अराजकता, गुंडागर्दी, तोड-फोड, पागलपन', 'फूहडपन' (पृ.72) तथा 'एंटरटेनमेंट' और 'तमाशा' (पृ.76) जैसा हो सकता है लेकिन वस्तुतः यह उसका एक प्रतिरोघ ही था। पॉल गोमरा अपने भाषण में और अपनी गतिविधियों में - चाहे विक्षिप्तावस्था में ही सही - नाना साहब, धुंधू पंत, तांत्या टोपे, अजीमुलाह, भगतसिह, फड़नवीस, अशफाक, खुदीराम, तेग बहादुर जैसे नामों का जो उच्चार करता है (76) तथा भारतीय स्वतंत्राता संग्राम की महत्वपूर्ण घटनाओं/आंदोलनों की जो एक्टिंग-सी करता है; एक सामान्य पाठक के लिए उनका विशेष - भावनात्मक - महत्व है। कहानी जैसे एक सनसनी सी पैदा करके पूरी होती है। यह सनसनी इस कहानी के साथ-साथ 'वॉरेन हेस्टिंग्स का साँड़' 'भाई का सत्याग्रह', 'और अंत में प्रार्थना', जैसी उदय प्रकाश की लगभग सभी बाद की कहानियों में हम देखते हैं। ...ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है कि इन तीनों-चारों कहानियों के मार्फत उदय प्रकाश समकालीन भारतीय मध्य-वर्ग के उस संघर्ष, त्याग, बलिदान तथा सामाजिक सरोकारों की पहचान - ईमानदारी, नैतिकता, सामाजिक प्रतिबद्धता, देश-प्रेम और कर्मठता जैसे तमाम मूल्यों - की खोज का प्रयास करते हैं; जो फिलहाल उपभोक्तावाद, अपसंस्कृति, अपराध, देशद्रोह, जालसाजी, यौनवाद और पश्चिम की गुलामी की सर्वाधिक सक्रिय निर्लज्जताओं में गर्क होते प्रतीत हो रहे हैं। राम गोपाल विक्षिप्तावस्था से पहले भी जो कुछ सोचता जिस तरह की कविताएँ लिखता दिखाया गया है, वह इस तलाश का इससे भी बड़ा प्रमाण है। पॉल गोमरा की इन कविता-पंक्तियों में जैसे यह तलाश मूर्तिमान है - 'इतना पोपला अभी भी नहीं हुआ है / मेरा मुँह / कि हर आती-जाती हवा उसमें अपनी / सीटी बजा जाए...'


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हिंदी समय में शंभु गुप्त की रचनाएँ