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सिनेमा

हिंदी सिनेमा : कल, आज और कल
विनोद विप्लव


हमारे देश में क्रिकेट की तरह सिनेमा भी एक धर्म है और सिनेमा के सितारे चाहने वालों के लिए भगवान हैं। सिनेमा के प्रति यह जुनून आज से नहीं है, यह तभी से है जब सिनेमा तक हर तबके की पहुँच नहीं होती थी। आज तो सिनेमा टेलीविजन, वीसीडी और इंटरनेट के जरिए घर-घर में पहुँच गया है। बड़े शहरों ही नहीं, छोटे शहरों और कस्बों में भी मल्टीप्लेक्स की भरमार हो गई है। आज सिनेमा के बाजार का व्यापक विस्तार हुआ है। यहाँ तक कि यह बाजार घरों में आ गया है। आज सिनेमा बनाने और बेचने का ही नहीं बल्कि सिनेमा देखने का तरीका भी बदल गया है। आज की पीढ़ी को मनचाही फिल्म देखने के लिए किसी तरह की जद्दोजहद करने की जरूरत नहीं होती है। आज फिल्म देखने के लिए न किसी इंतजार की जरूरत है, न माता-पिता की मेहरबानी की और न ही टिकट खरीदने के लिए घंटों लाइन में खड़े होने की और न ही सिनेमा हॉल में घुसने के लिए धक्का-मुक्की करने की, लेकिन एक समय था जब फिल्म देखना युद्ध जीतने के समान होता था और फिल्म देखकर आना एक उपलब्धि हासिल करने की तरह होता था। आज जो सिनेमा है वह ढेर सारे बदलावों से गुजरते हुए यहाँ तक पहुँचा है, ऐसे में सिनेमा को समझने के लिए उन बदलावों पर भी गौर करना लाजिमी होगा, जिसे भारतीय सिनेमा ने पिछले 100 सालों से अधिक समय के दौरान देखा है।

1912 में केवल 15 हजार रुपये की लागत से बनने वाली पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' के प्रदर्शन के साथ शुरू हुआ हिंदी सिनेमा आज दुनिया का सबसे बड़ा सिनेमा उद्योग बन चुका है। आज एक मंहगी फिल्म बनाने पर 100 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। हिंदी फिल्म उद्योग का कारोबार दो अरब डालर से भी अधिक का हो चुका।

भारत में सिनेमा की शुरुआत का श्रेय दादा साहब फाल्के - धुंडीराज गोविंद फाल्के को जाता है। उन्होंने 1912 में 'राजा हरिश्चंद्र' बनाकर भारत में सिनेमा का श्रीगणेश किया। कुल 3700 फुट लंबी यह फिल्म तीन मई, 1913 को बंबई के कोरोनेशन सिनेमाघर में प्रदर्शित हुई तो सिनेमाघर में दर्शकों की भारी भीड़ लग गई।

इस सफलता ने धुंडीराज गोविंद फाल्के को और फिल्में बनाने, अपनी फिल्म यूनिट तैयार करने और एक बंद व ओपन स्टूडियो के निर्माण के लिए प्रेरित किया। उसके तुरंत बाद उन्होंने 'भस्मासुर-मोहिनी' (1913), 'सत्यवान-सावित्री' (1914), 'लंका दहन', 'कृष्ण जन्म' आदि फिल्मों के निर्माण के साथ अपनी एक फिल्म यूनिट भी बनाई, जिसके सदस्यों की संख्या बढ़ते-बढ़ते सौ से भी अधिक हो गई।

हिंदी फिल्म-निर्माण की जो शुरुआत मराठी-भाषी धुंडीराज गोविंद फाल्के ने की थी, उस कड़ी में जुड़ने के लिए कई और निर्माता-निर्देशक मैदान में आ गए, जिनमें धीरेन गांगुली तथा बाबूराव पेंटर प्रमुख थे। 1913 से 1937 तक मूक फिल्मों का दौर जारी रहा और हर तरह की फिल्मों का निर्माण हुआ। धार्मिक फिल्मों के अलावा सामाजिक, ऐतिहासिक, रोमांटिक व समसामयिक फिल्मों का निर्माण भी काफी हुआ। सती विषय पर बनी पहली मूक फिल्म 'सती पार्वती' (1920), मॉडर्न जमाने की समस्याओं पर पहली फिल्म 'इंग्लैंड रिटर्न' (1921), प्रथम ऐतिहासिक फिल्म 'अशोक' (1922), प्रथम रोमानी फिल्म 'लैला मजनूँ' (1922), प्रथम सामाजिक फिल्म 'लेडी टीचर' व 'तारा डांसर' (सभी 1922) ने भी इन विषयों पर बनने वाली फिल्मों के लिए नए द्वार खोले।

धुंडीराज गोविंद फाल्के ने पोस्ट सिंक्रोनाइजिंग संवादों के जरिए सवाक (बोलती) फिल्में बनाने की कोशिश की, ढेर सारे प्रयोग भी किए, लेकिन नाकामयाब रहे ईरानी (अर्देशिर ईरानी) ने 1930-31 में प्रथम बोलती फिल्म 'आलम आरा' (1931) बनाकर सवाक फिल्मों का श्रीगणेश किया। उन्होंने पहली रंगीन फिल्म 'किसान' बनाई साथ ही पहली बार सवाक फिल्मों में गानों का भी पिक्चराइजेशन किया।

गुजरात के दिहोर में 1904 में जन्मे शंकरलाल जे. भट्ट ने आठ हजार रुपये की लागत से 1925 में अपनी पहली फिल्म 'दिल्ली नो डौड चेटल' (गुजराती में) व 'फीयरलेस फेंटम' (हिंदी में) बनाकर एक साथ दो भाषाओं में, साथ ही सबसे कम खर्च में फिल्म बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने प्रकाश स्टूडियो का भी निर्माण किया तथा श्रीप्रकाश फिल्म्स के बैनर तले भारत की प्रथम डायमंड जुबली फिल्म 'बैजू बावरा' का भी निर्माण किया। इसके अलावा भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर रही फिल्म 'भरत मिलाप' तथा 'रामराज्य' का भी निर्माण किया। महात्मा गांधी ने अपनी जिंदगी में जो एकमात्र फिल्म देखी थी, वह थी - 'रामराज्य'।

फिल्म जगत में 'चंदूलाल शाह' के नाम से विख्यात चंदूलाल जे.शाह ने लीक से हटकर नए-नए विषयों पर फिल्म बनाने की परंपरा शुरू की। वह फिल्म-निर्माताओं की संस्था 'इंपा' जो आज भी सर्वाधिक अधिकारसंपन्न संस्था है - व 'मोशन पिक्चर्स सोसायटी ऑफ इंडिया' के संस्थापक थे। वह 'फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया' के प्रथम अध्यक्ष भी रहे। भारतीय सेंसर बोर्ड के फिल्म जगत से बनने वाले प्रथम सदस्य भी वही थे।

चंदूलाल शाह के बाद भारतीय फिल्मों के विकास में एक नया इतिहास रचने वाले जे.बी.एच. वाडिया ने 1933 में वाडिया मूवीटोन की स्थापना की और 'फीयरलेस वाडिया' सहित 70 से भी अधिक फिल्मों का निर्माण किया। हिंदी में फैंटेसी फिल्मों को लोकप्रियता दिलाने में उनका सबसे बड़ा योगदान रहा।

फिल्म जगत में चाचा के नाम से विख्यात चिमनलाल बी. देसाई ने ऊँचे दर्जे की फिल्में बनाने की शुरुआत की उन्होंने अपनी फिल्मों के माध्यम से एक और जहाँ फिल्म जगत को सुरेंद्र, मोतीलाल, जद्दनबाई (नरगिस की माँ), सितारा देवी, नलिनी जयवंत, कन्हैयालाल जैसे 'ए' श्रेणी के कलाकार दिए तो वहीं महबूब खान जैसे कुशल निर्देशक भी दिए। उन्होंने फिल्म प्रोडक्शन इक्विपमेंट के डिस्ट्रीब्यूटर एम.ए. फजल भाई, जो बाद में खुद भी निर्माता बन गए, के साथ मिलकर 'नेशनल स्टूडियो' (ताड़देव) व 'न्यू टॉकीज' (बांद्रा) का निर्माण किया। सर्वाधिक बड़ी एवं विश्वविख्यात फिल्मों का निर्माण नेशनल स्टूडियो में ही हुआ।

सवाक फिल्मों के निर्माण का प्रयास हालाँकि 1924 से 1927 के बीच ही शुरू हो गया था, लेकिन पहली सफलता आर्देशिर ईरानी (आलम आरा) को ही मिली। महात्मा गांधी के बढ़ते प्रयास का सर्वाधिक असर 1923-24 में फिल्म जगत में दिखलाई पड़ा जब पुणे के पांडुरंग तालगिरी ने गांधीजी के जनसहयोग आंदोलन से प्रभावित हो 'अछूत' और 'अछूतोद्धार' नामक दो मूक फिल्में बनाईं। किसानों के शोषण के खिलाफ महाराष्ट्रीयन फिल्म कंपनी ने 'सावकरी पाश' व मदन ने 'असहयोग आंदोलन' नामक कॉमेडी फिल्म बनाई। इस दौरान जहाँ सुलोचना व मिस गौहर जैसी अभिनेत्रियों का उदय हुआ, वहीं वी. शांताराम जैसे निर्देशक 'नेता पालकर' फिल्म के माध्यम से उदित हुए। 1925-26 में नारी-प्रधान फिल्मों का निर्माण अधिक हुआ और उनमें से अधिकांश की हीरोइन सुलोचना उर्फ रूबी मायर्स थीं। 1929 में बांग्ला के प्रख्यात उपन्यासकार बंकिमचंद्र के उपन्यासों ('कपाल' 'कुंडला', 'युगल', 'गरीब') तथा शरत्चंद्र के उपन्यास (देवदास) पर भी फिल्में बनीं और बहुत चर्चित हुईं। इसी दौर में हिमांशु राय (स्वराज), ए.आर. कारदार ('अनोखा बाग'), देवकी बोस ('अपराधी'), बी.एन.सरकार ('चोर-काँटा' व 'पाशार मेये') मूक फिल्मों के सुपर स्टारमास्टर विट्ठल बतौर निर्देशक ('प्रिंस एंड द पावर' पर आधारित 'आवारा शाहजादा'), नितिन बोस ('चंडीदास') आदि ने बतौर निर्देशक अपने करिअर की शुरुआत की थी।

1931 में 24 सवाक फिल्में बनीं जो 1935 में बढ़कर 120 की संख्या पार कर गई। न्यू थिएटर्स की चंडीदास से के.एल. सहगल-उमा शशि की तथा ईस्ट इंडिया फिल्म्स की 'सीता' (निर्देशक देवकी बोस) से पृथ्वीराज कपूर-दुर्गा खोटे की जोड़ी खासी लोकप्रिय हुई जो 'मुगल-ए-आजम' तक चली। 1934 में ही प्रेमचंद भी फिल्म जगत् में आए और मोहन भगनानी की फिल्म 'मजदूर' की कहानी व संवाद लिखे। उनके उपन्यास 'सेवासदन' पर नानूभाई वकील ने इसी नाम से फिल्म बनाई। 1933 में फारसी भाषा में पहली फिल्म 'दस्तूरे नूर' इंपीरियल फिल्म कंपनी ने बनाई, जिसमें काम करने वाले सभी कलाकार (कानन बाला, सुलोचना, त्रिलोक कपूर, इंदुबाला आदि) हिंदू थे और उन्होंने खालिस फारसी जबान में अपने संवाद खुद बोले थे, जिसे सुनकर अरबी-फारसी के विद्वानों तक ने मुंह में उंगली दबा ली थी। इसी वर्ष आगा हश्र कश्मीरी के प्रसिद्ध नाटक 'यहूदी की लड़की' पर इसी शीर्षक से अनोखी शैली में बनी फिल्म में के.एल. सहगल और रतनबाई ने अभिनय किया था। पंकज मलिक ने इसी फिल्म से बतौर संगीत-निर्देशक काम शुरू किया और उनके निर्देशन में सहगल द्वारा गाया गीत 'दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है' उस समय काफी लोकप्रिय हुआ था। किसी विदेशी फिल्मोत्सव में शामिल होने वाली 'सीता' पहली भारतीय फिल्म थी।

1934 की एक और महत्वपूर्ण देन थे - नितिन बोस, जिन्होंने इसी वर्ष न्यू थिएटर्स की चंडीदास (के.एल. सहगल, पहाड़ी सान्याल व उमा शशि) बनाकर फिल्म-निर्माण को एक नई दिशा दी थी जिसमें जाति-प्रथा की बुराइयों को उन्होंने पहली बार पर्दे पर पेश करने की हिम्मत की थी। चंडीदास से लेकर दिलीप कुमार की गंगा-जमुना तक नितिन ने दर्जनों महत्वपूर्ण फिल्में बनाई थीं जिनकी चर्चा भारत के साथ विदेशों में भी हुई। उनकी अधिकांश फिल्में बॉक्स पर सुपरहिट रहीं। 1935 में भारतीय सिनेमा के फिल्म-निर्माण को 'देवदास' (सहगल, जमुना) के रूप में एक नया स्वरूप मिला तथा पी.सी. बरुआ की प्रथम फिल्म 'रूपलेखा', जिसे उन्होंने न्यू थिएटर्स के लिए निर्देशित किया, न केवल सफल रही, बल्कि इस फिल्म में जमुना देवी ने पहली बार संवाद भी बोले। इसके पहले वे फिल्मों में कोरस डांस (समूह नृत्य) का एक अदना-सा हिस्सा थीं। तब न्यू थिएटर्स के बी.एन. सरकार को भी आभास नहीं था कि जमुना देवी के रूप में वे भावी सुपर स्टार को पेश करने जा रहे हैं।

जमुना देवदास की हीरोइन पारो बनीं और इसके रिलीज होते ही वह सारे देश में लोकप्रिय हो गईं। देवदास के गीत व संवाद पं. केदार शर्मा ने लिखे थे और विमल राय कैमरामैन थे। आगे चलकर ये दोनों ही हिंदी सिनेमा के कर्णधार साबित हुए। केदार शर्मा ने आने वाले दिनों में अपनी फिल्म 'नीलकमल' में राजकपूर को जहाँ बतौर नायक पहली बार मौका दिया, वहीं 'चित्रलेखा' (भगवतीचरण वर्मा की प्रख्यात कृति) जैसी अमर फिल्म का निर्माण-निर्देशन किया। बिमल राय ने बाद में 'देवदास' (दिलीप कुमार, सुचित्रा सेन, वैजयंती माला व मोतीलाल) का निर्माण-निर्देशन भी किया और सुचित्रा सेन को पहली बार हिंदी फिल्म में बतौर नायिका पेश किया। न्यू थिएटर्स के लिए मुंगेर (बिहार) में हुए भीषण भूकंप की विभीषिका पर 'आफ्टर द अर्थ क्वेक उर्फ इंकलाब' (पृथ्वीराज कपूर व दुर्गा खोटे) बनाकर समसामयिक फिल्मों के निर्माण का श्रीगणेश किया। राजकपूर ने बाल कलाकार के रूप में इसी फिल्म से पहली बार अभिनय की दुनिया में प्रवेश किया था। नितिन बोस के निर्देशन में बनी 'धूप-छाँव' (पहाड़ी सान्याल, के.सी. डे, उमा देवी) में पहली बार पार्श्व गायन की शुरुआत हुई थी।

कलकत्ता से बंबई आए हिमांशु राय ने इसी वर्ष बॉम्बे टॉकीज की स्थापना की और पहली फिल्म 'जवानी की हवा' (नजामुल हुसैन व देविका रानी) बनाई। अपनी फिल्मों में संगीत को और भी तरोताजा व लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होंने लखनऊ की संगीत शिक्षण संस्था 'मारिश' (जो बाद में भातखंडे संस्थान के नाम से प्रसिद्ध हुई) में संगीत की वरिष्ठ छात्रा खुर्शीद मिचोर होमजी को बंबई बुलाकर उन्हें संगीत-निर्देशक बनाया। सरस्वती देवी के नाम से संगीत देने वाली खुर्शीद भारत की प्रथम संगीत निर्देशिका थीं। इसी समय उस समय का सबसे अधिक वेतन (छह हजार रुपये प्रतिमाह) पाने वाली सुलोचना की 'अनारकली' (सलीम की भूमिका में डी. बिल मोरेया) ने बॉक्स ऑफिस के रिकॉर्ड तोड़े। सुलोचना न केवल महँगी सुपर स्टार थीं बल्कि उस समय बंबई फिल्म जगत व औद्योगिक घरानों में सिर्फ उन्हीं के पास शेवरलेट कार थी। बाद में फिल्मिस्तान की सुपरहिट फिल्म 'अनारकली' (बीना राय, प्रदीप कुमार) में सुलोचना ने सलीम की माँ जोधाबाई की भूमिका की। वी. शांताराम ने अपनी निर्माण संस्था प्रभात फिल्म केंद्र के बैनर तले अपनी प्रथम सवाक फिल्म 'धर्मात्मा' ('बालक ध्रुव', 'वासंती', 'रतप्रभा') का निर्माण व निर्देशन किया। इसके पहले वे मूक फिल्में ही बनाते रहे थे। अब समय था कि फिल्म-निर्माण धार्मिक, ऐतिहासिक, फैंटेसी फिल्मों की दुनिया से निकलकर सामाजिक व समसामयिक समस्याओं की तरफ मुडें और ऐसा ही हुआ। कुल 150 फिल्मों में से सर्वाधिक 64 फिल्में सामाजिक बनीं और फिल्म-निर्माण जन-जागरण का एक नया संदेश लेकर आया। फिल्मों के विषय-वस्तु की दिशा बदल गई।

1936 में निर्मित फिल्मों पर महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन व विचारधारा का व्यापक असर पड़ा। बॉम्बे टॉकीज की 'अछूत कन्या' (अशोक कुमार, देविका रानी) वाडिया मूवीटोन की 'जय भारत' (सरदार मंसूर, गुलशन), वी. शांताराम की 'अमर ज्योति' (दुर्गा खोटे, शांता आप्टे, चंद्रमोहन), 'अमर शहीद' (बाला साहब यादव, पवार), 'बेरोजगार' (लीला चिटनिस, जयराज), 'भारत का लाल' (चंद्रराव कदम, फिरोजा खातून), 'ग्रेजुएट' (एच.आर. डॉक्टर, गौहर कर्नाटकी), 'दलित कुसुम' (जरीना खातून, आफताब), 'हमारी बेटियाँ' (राजकुमार, जिल्लो, प्रमिला), 'हिंद महिला' (रतनबाई, मास्टर विट्ठल, साहू मोदक), 'परिवर्तन' (कज्जन, खलील, आफताब), 'संगदिल समाज' (सरदार अख्तर, पद्मा देवी, नाजिर) आदि फिल्मों में सामाजिक विसंगतियों, दलितोद्धार, आजादी की कोशिश आदि समसामयिक समस्याओं को प्रस्तुत किया गया। एक अछूत लड़की और ब्राह्मण लड़के के प्रेम और अछूतों के प्रति भेदभाव को बड़े संवेदनशील ढंग से पेश करने वाली 'अछूत कन्या' का निर्माण सिर्फ 75 हजार रुपये में दो महीने के भीतर हुआ था, लेकिन उसने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान कायम किए। प्रफुल्ल घोष ने माया में 'वंदे मातरम्' को स्वातंत्र्य गीत के रूप में पेश करने की हिम्मत की। मराठी में बनी 'संत तुकाराम' को वेनिस फिल्मोत्सव में विश्व की सर्वश्रेष्ठ तीन फिल्मों में शुमार किया गया।

1937 से 1940 का समय भारतीय सिनेमा का स्वर्ण युग कहा जा सकता है। 1935 में फिल्म जगत ने धूमधाम से अपनी रजत जयंती मनाई। 1937 दरअसल वी. शांताराम के क्रांतिकारी उदय का वर्ष था। उनकी श्रेष्ठतम फिल्मों में से तीन 'दुनिया ना माने', 'कुकु' (मराठी) व 'अनएक्सपेक्टेड' इसी वर्ष रिलीज हुई और समाजोद्धार की क्रांति जगाने में काफी सफल रहीं। न्यू थिएटर्स की विद्यापति व 'बड़ी बहन', पी.सी. बरुआ की 'मुक्ति' अपने विषयों के कारण हंगामेदार साबित हुई। इस वर्ष दो नए प्रयोग हुए। इंपीरियल की 'किसान कन्या' भारत में ही प्रोसेस की गई। यह प्रथम रंगीन फिल्म थी जिसकी पटकथा व संवाद सआदत हसन मंटो ने लिखे थे। दूसरी रंगीन फिल्म थी - 1938 में बनी सिनेकलर की 'मदर इंडिया' (शरीफ, प्रमिला, गुलाम मोहम्मद), लेकिन इनके खर्चीले होने तथा लागत वसूल न होने के कारण रंगीन फिल्मों की बजाय फिर ब्लैक एंड व्हाइट फिल्में ही बनने लगीं। दूसरा प्रयोग था - बिना एक भी गाने की फिल्म 'नवजीवन' का निर्माण।

नाजायज बच्चों के हक को लेकर 1938 में बनी न्यू थिएटर्स की 'अधिकार' एक कुरूप व्यक्ति की खूबसूरत बीवी के एक सुदर्शन पुरुष के साथ भाग जाने की कहानी पर बनी। सोहराब मोदी की 'जेलर', कुंवारी माँ के समाज से संघर्ष पर आधारित 'बसंती', वेश्याओं की जिंदगी व सामाजिक मान्यताओं पर प्रहार करने वाली वी. शांताराम की 'आदमी', सोहराब मोदी की भव्य ऐतिहासिक फिल्म 'पुकार', बॉम्बे टॉकीज की 'कंगन' तथा न्यू थिएटर्स की 'स्ट्रीट सिंगर' 1938-39 की बहुचर्चित फिल्में थीं। स्ट्रीट सिंगर में सहगल द्वारा गाया गीत - 'बाबुल मोरा नैहर छूटा जाय' आज भी अमर है। इसी वर्ष निर्माताओं की संस्था 'इंपा' व वितरकों की संस्था 'इंपडा' की स्थापना हुई, जो आज भी सर्वाधिक शक्तिशाली संस्था है और जिसका निर्देश हर निर्देशक, निर्माता व वितरक को मानना पड़ता है।

1940 की सबसे बड़ी देन थे - संगीतकार नौशाद, जिनकी फिल्म 'प्रेमनगर' (विमला कुमारी, रामानंद, हुस्नबानो) सुपरहिट हुई और चोटी के संगीतकारों में उनका शुमार होने लगा। रंजीत मूवीटोन की 'अछूत', बॉम्बे टॉकीज की 'नवजवान' (अशोक कुमार, लीला चिटनिस), महबूब खान की 'औरत' सर्वाधिक चर्चित फिल्में थीं। महबूब खान ने 'औरत' (सरदार अख्तर, सुरेंद्र, याकूब, कन्हैयालाल) अंग्रेजी फिल्म 'गुड अर्थ' से प्रेरित होकर बनाई थी और फिर उसे दोहराया वर्षों बाद 'मदर इंडिया' बनाकर।

1935 से 1940 तक का समय जहाँ भारतीय सिनेमा का भविष्य व मार्ग-निर्धारण, फिल्म-निर्माण की नींव पुख्ता करने, भारतीय सिनेमा को फैंटेसी, ऐतिहासिक व धार्मिक विषयों के घिसे-पिटे प्रकरण से निकालकर सामाजिक, रूढ़िगत व जर्जर हो रही विचारधाराओं के शिकंजे से मुक्त कर नई चेतना, सामाजिक व यथार्थ, मूल्यों, आदर्श व यथार्थपरक समाज व माहौल के निर्माण तथा समसामयिक व स्वातंत्र्य आंदोलन, प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पनपे जनजागरण क्रांति के नए संदेश फूंकने, नवजागरण व नवयुग की स्थापना का समय था। वर्ष 1941 से 1950 तक का समय पिछले पाँच वर्ष में पड़े इन क्रांतिकारी बीजों व सुदृढ़ नींव पर सिनेमा का सुदृढ़ गढ़ खड़ा करने का प्रयास था इसीलिए 1935 से 1940 के पाँच वर्षों को भारतीय सिनेमा का स्वर्ण युग कहा जाता है। इन पाँच वर्षों में भारतीय सिनेमा में जितना कुछ हुआ वह आने वाले दशकों में भी संभव नहीं हो सका। इन पाँच वर्षों के आधार पर ही भारतीय सिनेमा, सिनेमा उद्योग के रूप में खड़े होने का मार्ग प्रशस्त कर सका।

1941 से 1950 का दशक अपनी जिन खास उपलब्धियों के लिए भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर बना, उनमें से कुछ प्रमुख उपलब्धियाँ थीं - लोकप्रिय मधुर संगीत-गीत की मिठास, नई पीढ़ी के अभिनेता-अभिनेत्रियों का उदय, जिन्होंने सशक्त अभिनय का नया इतिहास रचा, खासकर दिलीप कुमार, राजकपूर व देव आनंद ने अपनी-अपनी जिन शैलियों की स्थापना की उसी का अनुसरण आज भी नायक कर रहे हैं। कलकत्ता व लाहौर के प्रतिभाशाली कलाकारों का वहाँ से मोहभंग होना तथा अधिक लोकप्रियता, शोहरत एवं धन कमाने की गरज से बंबई आगमन, भारत-पाक विभाजन के बाद काफी संख्या में मुस्लिम कलाकारों, फिल्मकारों व तकनीशियनों का पाकिस्तान पलायन, मद्रास (अब चेन्नई) में हिंदी फिल्मों के निर्माण की शुरुआत, द्वितीय विश्वयुद्ध, स्वातंत्र्य आंदोलन एवं स्वातंत्र्योत्तर भारत की स्थापना का फिल्मों पर व्यापक असर तथा रोमानी फिल्मों की बढ़ती लोकप्रियता।

इस दशक में जहाँ नौशाद की संगीत लहरियाँ जन-जन में लोकप्रिय हुई, खेमचंद्र प्रकाश, अनिल विश्वास, गुलाम हैदर, आर.सी. बोराल, पंकज मलिक, सरस्वती देवी, रफीक गजनबी आदि का वर्चस्व रहा। 1935-1940 के दशक के संगीतकारों ने मधुर व सुरीली धुनें बनाईं, वहीं एस.डी. बर्मन, सी. रामचंद्र, वसंत देसाई, एस.एन. त्रिपाठी, चित्रगुप्त, हुस्नलाल, मंगतराम, सुधीर फड़के, हंसराज बहल, शंकर, जयकिशन जैसे संगीतकारों का उदय भी इसी दशक में हुआ और इनमें से हर किसी ने आगे चलकर संगीत की दुनिया में अपनी अलग-अलग बोलियाँ विकसित कीं और काफी मधुर धुनें दीं। प्रख्यात सितारवादक पंडित रविशंकर भी संगीत निर्देशन के क्षेत्र में उतरे और 1946 में प्रदर्शित चेतन आनंद की पहली फिल्म 'नीचा नगर' (रफीक अनवर, उमा आनंद, कामिनी कौशल) का संगीत निर्देशन किया, लेकिन संगीत निर्देशन को उन्होंने अपना पेशा नहीं बनाया। इस दशक में संगीतकारों के लिए संगीत की दुनिया में स्थापित होने की जहाँ पृष्ठभूमि बनी वहीं इनकी लोकप्रियता, आम जनता में सर्वाधिक पसंद की जाने वाली धुनों तथा इन संगीतकारों की बढ़ती मांग के कारण पुराने संगीतकारों के करिअर धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर बढ़ चले। इस दशक में नए संगीतकारों ने फैंटेसी, ऐतिहासिक से लेकर रोमानी, सामाजिक, धार्मिक- हर तरह की फिल्मों में संगीत दिया, जिसके आधार पर उन्होंने आगे चलकर अपने करिअर को एक विशेष वर्ग में ढाल लिया। जैसे अगले दशक में एस.एन. त्रिपाठी की मांग धार्मिक तथा फैंटेसी फिल्मों में बहुत अधिक होने लगी।

अभी तक निर्माता-निर्देशक कारदार और संगीतकार नौशाद का ही अपना एक ग्रुप था, बाद में महबूब, एस.यू. सन्नी, के. आसिफ भी इस कड़ी में शामिल हो गए। इसी तरह 'बरसात' (1949) से राजकपूर ने शंकर-जयकिशन के साथ अपनी टीम बनाई तो देव आनंद ने एस.डी. बर्मन, वी. शांताराम ने वसंत देसाई व सी. रामचंद्र के साथ तथा भगवान ने भी सी. रामचंद्र के साथ अपनी टीम बनाई। आगे चलकर संगीत निर्देशकों व निर्माता-निर्देशकों की अपनी एक टीम बन गई। इस दशक की शुरुआत से ही कारदार-नौशाद की टीम ने 1942 में 'शारदा' (महताब, उल्लास), 'नई दुनिया' (शोभना समर्थ, जयराज), 1943 में 'कानून' (महताब, साहू मोदक), 1944 में 'पहले आप' (शमीम वासी, अनवर हुसैन), 1946 में 'शाहजहाँ', 'संन्यासी' (शमीम, नसीम, अमर), 1947 में 'दर्द' (मुनव्वर, सुल्ताना, नशरत, सुरैया), 1949 में 'दिल्लगी' (सुरैया, श्याम, शारदा), 'दुलारी' (मधुबाला, सुरेश, गीताबाली) और 1950 में 'दास्तान' (सुरैया, राजकपूर) जैसी सुपरहिट फिल्में दीं। दर्द सुरैया की पहली फिल्म थी। जिसमें सुरैया को 13 वर्ष की उम्र में नौशाद ने बतौर स्टार सिंगर पेश किया था। इसी तरह महबूब के साथ ही उनकी जोड़ी बनी और उन्होंने 'अनमोल घड़ी' (नूरजहाँ, सुरेंद्र, सुरैया), 1947 में 'ऐलान' (सुरेंद्र, मुनव्वर, सुल्ताना), 'अनोखी अदा' (नसीम, सुरेंद्र, प्रतिमा), 1949 में 'अंदाज' (दिलीप कुमार, नरगिस, राजकपूर) व 'आन' (दिलीप कुमार, निम्मी, नादिरा, प्रेमनाथ) जैसी सुपरहिट फिल्में दी थीं। इन फिल्मों के सभी गाने न केवल बेमिसाल थे, बल्कि बेहद लोकप्रिय भी हुए। महबूब ने नौशाद से पहले 1942 में विश्वास के साथ 'रोटी' (चंद्रमोहन, शेख मुख्तार, सितारा), रफीक गजनवी के साथ 1943 में 'नजमा' (अशोक कुमार, बीना, सितारा) व 'तकदीर' (नरगिस, मोतीलाल, चंद्रमोहन- नरगिस की पहली फिल्म), 1945 में गुलाम हैदर के साथ 'हुमायूँ' (अशोक कुमार, बीना, नरगिस) आदि फिल्में की, लेकिन उनके सभी गाने उस हद तक लोकप्रिय नहीं हो सके थे जिस हद तक 1946 से 1950 के बीच बनी फिल्मों के हुए थे। नौशाद ने उनके अलावा दूसरे निर्माता-निर्देशकों के साथ 'माला', 'दर्शन' (1941), 'नई दुनिया', 'शारदा', 'स्टेशन मास्टर' (1942), 'नमस्ते', 'संयोग' (1943), 'बहार, 'गीत', 'जीवन', 'रतन' व 'संन्यासी' (1944), 'कीमत' (1945), 'नाटक' (1947), 'मेला' (1948) आदि फिल्मों की धुनें बनाई थीं जिनमें आज भी 'रतन' व 'मेला' के गीत न केवल लोकप्रिय हैं, बल्कि इन्हें अमर संगीत की शृंखला में जोड़ा जाता है।

गुलाम हैदर की महत्वपूर्ण फिल्में थीं - 'खजांची', 'खानदान', 'जमींदार', 'चल-चल रे नौजवान', 'फूल', 'लैला-मजनू'। के. आसिफ की बतौर निर्माता-निर्देशक 'फूल' (बीना, पृथ्वीराज कपूर) प्रथम फिल्म थी। इसी तरह रफीक गजनवी की 'स्वामी', 'तकदीर', 'विषकन्या', सोहराब मोदी की 'एक दिन की सौतन', 'लैला मजनू' प्रसिद्ध फिल्में थीं। प्रथम संगीतकार जोड़ी के रूप में वास्तविक शुरुआत 1946 में हुस्नलाल-मंगतराम ने की।

1935-40 की महत्वपूर्ण देन खेमचंद्र प्रकाश इस दशक के सबसे व्यस्त संगीतकार थे। 'उम्मीद', 'हॉलीडे इन बॉम्बे', 'परदेसी', 'प्यास', 'शादी' (1941), 'दुःख-सुख', 'चाँदनी', 'फरियाद', 'इकरार', 'खिलौना', 'मेहमान' (1942), 'चिराग', 'गौरी', 'तानसेन' (1943), 'धनवान', 'भृर्तहरि', 'मुमताज महल', 'शहंशाह बाबर' (1944), 'धन्ना भगत' (1945), 'गाँव', (1946), 'मेरा गाँव', 'मुलाकात', 'समाज को बदल डालो' (निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट), फिल्मिस्तान की किशोर साहू निर्देशित 'सिंदूर' (1947) तथा 'आशा' उनकी महत्वपूर्ण फिल्में थीं। खेमचंद्र प्रकाश को फिल्मी धुनों की इंडस्ट्री कहा जाता था। अधिक से अधिक फिल्में करने के चक्कर में वे संगीत की धुनों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे सके, जिसके परिणामस्वरूप 1945 से उनके करिअर का सूर्यास्त शुरू हो गया। उनकी ही पीढ़ी के गुलाम हैदर व रफीक गजनवी ने कम किंतु चुनी हुई फिल्में कीं, लेकिन नए संगीतकारों की आँधी को ये दोनों भी ज्यादा समय तक नहीं झेल सके।

नए संगीतकारों में सी. रामचंद्र द्वारा 'मुस्कराहट' (1943), 'जगत', 'दिल की बात', 'ललकार', 'मनोरमा', 'रौनक' (1944), 'नगमा-ए-सहारा', 'सम्राट चंद्रगुप्त', 'सावन', 'बच्चों का खेल' (1945), 'सफर', 'अहिंसा', 'लीला', 'मतवाले', 'साजन', 'शादी से पहले' (1946), 'शहनाई', 'खिड़की', 'मेरा मुन्ना', 'नदिया के पार' (1947) आदि फिल्मों में संगीत दिया गया। इस दौर की अन्य महत्वपूर्ण फिल्में थीं- डॉ. कोटनीस की अमर कहानी, व्ही शांताराम की 'शकुंतला', 'शिकारी', 'अफसर', 'बरसात' आदि।

दिलीप कुमार, राजकपूर, देव आनंद के अलावा इस दशक की अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि थी- नरगिस, सुरैया, नूरजहाँ, मधुबाला, नलिनी जयवंत, कामिनी कौशल, मीना कुमारी, नूतन, रहमान, गीताबाली, शशिकला, बलराज साहनी, किशोर साहू जैसे सितारों का फिल्माकाश में उदय, जिन्होंने 1951-1960 के दशक व उसके बाद के दशकों में भी अपने सशक्त अभिनय की छाप छोड़ी और अभिनय की दुनिया में न केवल क्रांति की बल्कि अभिनय कला को उसके मौजूदा स्वरूप से अलग ले जाकर उसे एक नया स्वरूप दिया।

इसी दशक में के. आसिफ, एस.यू. सन्नी, किशोर साहू, चेतन आनंद, राजकपूर, देवेंद्र गोयल, एस.डी. नारंग, महेश कौल, फणि मजूमदार, रमेश सहगल, कमाल अमरोही, जिया सरहदी, के. ए. अब्बास जैसे सशक्त निर्देशकों का भी उदय हुआ। के. आसिफ ने 'फूल', एस.यू. सन्नी ने 'मेला' (1948), 'समाधि' (1950), ज्ञान मुखर्जी ने 'किस्मत' (1943), 'संग्राम' (1950), कमाल अमरोही ने 'महल' (1949), चेतन आनंद ने 'नीचा नगर' व 'अफसर' (1950) और राजकपूर ने 'बरसात' (1949) जैसी सुपरहिट फिल्में दीं। ये सभी विश्वप्रसिद्ध व सफलता के नए कीर्तिमान कायम करने वाली फिल्में थीं। इनमें से अधिकतर फिल्मों के नायक अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राजकपूर व देव आनंद थे।

1951 से 1960 का दशक पूर्व दशक में प्रारंभ हुए मूल्यों की स्थापना का वर्ष था। पिछले दशक में उदय होने वाले सितारे, निर्देशक, संगीतकार एवं अन्य तकनीशियन इस दशक में पूरी तरह से स्थापित हो गए। इसके साथ ही हॉलीवुड की फिल्मों की नकल व फिल्म के कलात्मक एवं सार्थक पक्ष पर ग्लैमर व व्यावसायिकता का जहर भी इस कदर घुला कि फिल्म जगत् उससे मुक्त होने की बजाय दिनोंदिन इस जहर में आकंठ डूबता चला गया, साथ ही फिल्म-निर्माण का स्तर दो भागों में बंट गया- उच्च स्तर व निम्न स्तर की सतही फिल्में। हॉलीवुड की कुछ फिल्मों की तो सीन-ब-सीन नकल की गई।

1961 में जिया सरहदी की 'हम लोग' (बलराज साहनी, नूतन, श्याम), राजकपूर की 'आवारा' (राजकपूर, नरगिस, पृथ्वीराज कपूर), भगवान की 'अलबेला', बी.आर. चोपड़ा की पहली फिल्म 'अफसाना' (अशोक कुमार, बीना, मुनव्वर, सुल्ताना), मद्रास में जैमिनी फिल्म्स की 'संसार' व ए.वी.एम. फिल्म्स की 'बहार', वी. शांताराम की 'अमर भूपाली', नवकेतन की 'बाजी', किशोर साहू की 'काली घटा', राजेंद्र जैन की 'दीदार' (अशोक कुमार, नरगिस, दिलीप कुमार, निम्मी) जैसी उल्लेखनीय एवं लोकप्रिय फिल्में बनीं तो वैजयंती माला (बहार) तथा बीनाराय (काली घटा) ने अपने अभिनय जीवन की शुरुआत की और तबस्सुम व परीक्षित साहनी पहली बार बाल कलाकार के रूप में दीदार में आए। दीदार चतुष्कोणीय प्रेम पर आधारित पहली फिल्म थी जो सुपरहिट भी हुई और लोकप्रिय भी। बी.आर. चोपड़ा ने अपनी पहली फिल्म सुपरहिट फिल्म 'अफसाना' का पुनर्निर्माण बाद में 'दास्तान' (दिलीप कुमार, शर्मिला टैगोर, प्रेम चोपड़ा) के नाम से किया, लेकिन वह अफसाना जैसा करिश्मा नहीं दिखा सकी।

1952 में अमिय चक्रवर्ती की 'दाग' (दिलीप कुमार, निम्मी), विजय भट्ट की 'बैजू बावरा' (भारत भूषण, मीना कुमारी), के.ए. अब्बास की 'अनहोनी' (राजकपूर, नरगिस), आर.बी. तलवार की 'संगदिल' (दिलीप कुमार, मधुबाला), जैमिनी की 'मि. संपत' (मोतीलाल) व हीरेन गुप्ता की 'आनंदमठ' इस वर्ष की श्रेष्ठतम फिल्में थीं। दिलीप कुमार की विभिन्न भूमिकाओं वाली कई फिल्में भी इसी वर्ष प्रदर्शित हुई थीं। 'आनंदमठ' हेमंत कुमार की बतौर संगीतकार पहली फिल्म थी।

महबूब खान ने 'आन' की शूटिंग भारत में 16 एम.एम. में की, जिसे लंदन ले जाकर उन्होंने 35 एम.एम. में परिवर्तित किया तथा दूसरे तकनीकी प्रयोग भी किए। इस तरह के प्रयोग वाली यह पहली भारतीय फिल्म थी, जिसका अनुकरण बाद में के. आसिफ (मुगल-ए-आजम) सहित कई निर्माताओं ने किया। बाद में 35 एम.एम. के कैमरे व लैंस भारत में भी उपलब्ध होने लगे।

1953 का वर्ष फिल्मिस्तान की नंदलाल-जसवंतलाल निर्देशित 'अनारकली' (बीना राय, प्रदीप कुमार), बिमल राय की 'दो बीघा जमीन' (बलराज साहनी, निरूपा राय) व 'परिणीता' (अशोक कुमार, मीना कुमारी), रमेश सहगल की 'शिकस्त' (दिलीप कुमार, नलिनी जयवंत), अमिय चक्रवर्ती की 'पतिता' (देव आनंद, उषा किरण), सोहराब मोदी की 'झाँसी की रानी' (महताब, सोहराब मोदी), राजकपूर की 'आह', वी. शांताराम की 'सुरंग' (शशिकला, शीला रमानी) व 'तीन बत्ती चार रास्ता' (संध्या, निरूपा राय, शशिकला) जैसी फिल्मों के लिए उल्लेखनीय रहा। इसी वर्ष शम्मी कपूर ने 'ठोकर' से अपने फिल्मी करिअर की शुरुआत की। अभी तक कलकता में रहकर दूसरे निर्माताओं के लिए फिल्में निर्देशित कर रहे बिमल राय अपनी टीम, जिसमें हृषिकेश मुखर्जी, नबेंदु घोष आदि उनके सहायक शामिल थे, के साथ बंबई आ गए और बिमल राय प्रोडक्शन की स्थापना की तथा 'दो बीघा जमीन' जैसी प्रयोगधर्मी व बॉक्स ऑफिस पर सफल फिल्म बनाकर अंतरराष्ट्रीय ख्याति के फिल्मकार बन गए।

1954-56 का दौर सुपरहिट फिल्मों का रहा। 1954 में फिल्मिस्तान की 'नागिन' (वैजयंती माला, प्रदीप कुमार), राजकपूर की 'बूट पॉलिश', गुरुदत्त की प्रथम फिल्म 'आर-पार' (गुरुदत्त, मधुबाला), सोहराब मोदी की 'मिर्जा गालिब' (भारत भूषण, सुरैया), विमल राय की बिराज बहू तथा 1955 में गुरुदत्त की 'मिस्टर एंड मिसेज 55' (गुरुदत्त, मधुबाला), सुबोध मुखर्जी निर्देशित 'मुनीमजी' (देव आनंद, नलिनी जयवंत), वी. शांताराम की 'झनक-झनक पायल बाजे' (गोपीकृष्ण, संध्या), विमल राय की 'देवदास' (दिलीप कुमार, सुचित्रा सेन, वैजयंती माला), जैमिनी की 'इंसानियत' (दिलीप कुमार, बीना राय, देव आनंद), पक्षीराज फिल्म्स की 'आजाद' (दिलीप कुमार, मीना कुमारी), अमिय चक्रवर्ती की 'सीमा' (बलराज साहनी, राजेंद्र कुमार), एस.यू. सन्नी की 'उड़न खटोला' (दिलीप कुमार, निम्मी) जैसी हिट फिल्मों ने फिल्म उद्योग का कारोबार और फैलाने में पर्याप्त मदद की।

'बूट पॉलिश' में जहाँ राजकपूर ने हॉलीवुड के प्रख्यात फिल्मकार विक्टोरिया डि रिका की शैली अपनाई, वहीं फिल्मिस्तान की 'शर्त' अल्फ्रैड हिचकाक की 'स्ट्रैंजर्स ऑन द ट्रेन', एच.एस. रवेल की 'मस्ताना', चार्ली चैपलिन की 'द किड', सत्येन बोस की 'परिचय' हॉलीवुड की जॉनी वोलिडा की नकल थी। आने वाले वर्षों में (1955 में) जहाँ जुबली कुमार के नाम से प्रसिद्ध राजेंद्र कुमार ने फिल्मों में पदार्पण किया, वहीं बंबई में सत्येन बोस, सुबोध मुखर्जी, मोहन सहगल, राजेंद्र सिंह बेदी (गरम कोट), तपन सिन्हा, आई.एस. जौहर (नास्तिक) कलकत्ता में तथा मद्रास में एम.वी. रमन (पहली झलक : वैजयंती माला, किशोर कुमार) ने बतौर निर्देशक अपने करिअर की शुरुआत की ओर आगे चलकर अपनी सशक्त एवं सार्थक फिल्मों के जरिए हिंदी सिनेमा को नई पहचान देने में कामयाब हुए।

1956 में प्रदर्शित राजकपूर की 'जागते रहो' व कलकत्ता में सत्यजित राय की 'अपराजिता', बिमल राय की डॉक्यूमेंट्री 'गौतम द बुद्धा' ने जहाँ अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार व ख्याति अर्जित की वहीं 'बरसात' से 'चोरी-चोरी' तक फिल्म जगत् की सर्वाधिक लोकप्रिय रोमांटिक जोड़ी (राजकपूर व नरगिस) अलग हो गई। 'जागते रहो' में नरगिस फिल्म के सिर्फ अंतिम एक दृश्य में आईं। वर्षों से सुपरहिट फिल्में बनाने और भारतीय सिनेमा को हर क्षेत्र में नई प्रतिभाओं को जन्म देने वाले न्यू थिएटर्स का इस वर्ष उदय हुआ तो हैदराबाद में आने वाले दिनों के सर्वाधिक पूजनीय महानायक एन. टी. रामाराव (नया आदमी) का उदय हुआ।

1957 से 1960 की सर्वाधिक भव्य उपलब्धि थी - महबूब खान की 'मदर इंडिया' (1957) व के. आसिफ की 'मुगल-ए-आजम' (1960), जिसने भारतीय सिनेमा में एक अलग क्रांति-सी ला दी थी। आज भी 'मदर इंडिया' व 'मुगल-ए-आजम' अमर फिल्में मानी व सर्वाधिक देखी जाती हैं। इनके अलावा 1957 में राजकपूर की 'अब दिल्ली दूर नहीं', ए.वी.एम. की 'भाभी' (बलराज साहनी, श्यामा, नंदा), वी. शांताराम की 'दो आँखें बारह हाथ' (वी. शांताराम, संध्या), अमिय चक्रवर्ती की 'कठपुतली' (बलराज साहनी, वैजयंती माला), बी. आर. चोपड़ा की 'नया दौर' (दिलीप कुमार, वैजयंती माला), सुबोध मुखर्जी की 'पेइंग गेस्ट' (देव आनंद, नूतन), गुरुदत्त की 'प्यासा' (गुरुदत्त, वहीदा रहमान, माला सिन्हा), एल. वी. प्रसाद की 'शारदा' (राजकपूर, मीना कुमारी), नासिर हुसैन की 'तुम-सा नहीं देखा', 1958 में सत्येन बोस की 'चलती का नाम गाड़ी' (अशोक कुमार, मधुबाला, किशोर कुमार), देव आनंद की 'काला पानी' (देव आनंद मधुबाला, नलिनी जयवंत, किशोर साहू), बिमल राय की 'मधुमती' (दिलीप कुमार, वैजयंती माला) व 'यहूदी' (सोहराब मोदी, दिलीप कुमार, मीना कुमारी), 1959 में हृषिकेश मुखर्जी की 'अनाड़ी' (राजकपूर, नूतन), बी. आर. चोपड़ा की यश चोपड़ा निर्देशित 'धूल का फूल' (अशोक कुमार, राजेंद्र कुमार, माला सिंहा, नंदा), विजय भट्ट की 'गूंज उठी शहनाई' (राजेंद्र कुमार, अमीता, अनीता), गुरुदत्त की 'कागज के फूल' (गुरुदत्त, वहीदा रहमान), जैमिनी की 'पैगाम' (दिलीप कुमार, वैजयंती माला, राजकपूर), तथा 1960 में 'मुगल-ए-आजम' (पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार, मधुबाला, अजीत, निगार सुलताना) के अलावा बी. आर. चोपड़ा की बिना गाने वाली 'कानून' (अशोक कुमार, राजेंद्र कुमार, नंदा), राजकपूर की 'जिस देश में गंगा बहती है' (राजकपूर, पद्मिनी, प्राण), गुरुदत्त की 'चौदहवीं का चाँद' (गुरुदत्त, वहीदा रहमान), कमाल अमरोही की किशोर साहू निर्देशित 'दिल अपना और प्रीत पराई' (मीना कुमार, राजकुमार, नादिरा), जैमिनी की रामानंद सागर निर्देशित 'घूंघट' (बीना राय, आशा पारेख, प्रदीप कुमार, भारत भूषण), देव आनंद की विजय आनंद निर्देशित 'काला बाजार' (देव आनंद, वहीदा रहमान, नंदा), एस.यू. सन्नी कृत 'कोहिनूर' (दिलीप कुमार, मीना कुमारी), फिल्मालय की आर. के. नैयर निर्देशित 'लव इन शिमला' (जॉय मुखर्जी, साधना) आदि सुपरहिट फिल्में थीं।

विजय आनंद (काला बाजार), यश चोपड़ा (धूल का फूल), प्रख्यात लेखिका इस्मत चुगताई के पति शाहिद लतीफ (सोने की चिड़िया), मनमोहन देसाई ('छलिया') तथा आर.के. नैयर ('लव इन शिमला') ने अपनी पहली ही फिल्म से निर्देशन की दुनिया में अपनी जगह बना ली। वहीं 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' से धर्मेंद्र, 'लव इन शिमला' से जॉय मुखर्जी व साधना ने अपने अभिनय जीवन की शुरुआत की और आने वाले वर्षों में लंबे समय तक स्टार बने रहे।

दरअसल 1961-1970 का दशक हर तरह से संधिकाल था जिसमें 1931-1940, 1941-1950 व 1951-1960 के कलाकारों, संगीतकारों, निर्देशकों का वर्चस्व बना रहा, खासकर 1941-1950 व 1951-1960 के दशकों में आए सितारों का। दिलीप कुमार, राजकपूर, देव आनंद, नरगिस, सुरैया, मीना कुमारी, गीताबाली, नूतन, माला सिंहा, वहीदा रहमान, बीना राय, नंदा, वैजयंती माला, राजेंद्र कुमार, राजकुमार, शम्मी कूपर, धर्मेंद्र, सुनील दत्त, मनोज कुमार, शशि कपूर, भारत भूषण, प्रदीप कुमार आदि कलाकारों का। इस दशक में दिलीप कुमार, राज कपूर व देव आनंद ने फिल्मों की संख्या काफी कम कर दी और सिर्फ गिनी-चुनी फिल्मों में ही काम किया। इन सभी ने इस दशक में कई महत्वपूर्ण फिल्में दीं जिनमें से कुछ अमर यादगार साबित हुई।

1961-1970 के दशक की सबसे महत्वपूर्ण देन थे- सायरा बानो (1961, जंगली), विश्वजीत (1962, बीस साल बाद), संजीव कुमार (1965, निशान), राजेश खन्ना व बबीता (1966, राज), हेमामालिनी (1968, सपनों का सौदागर), अमिताभ बच्चन (1969, सात हिंदुस्तानी), राखी (1970, जीवन-मृत्यु), रेखा (सावन-भादो), रेहाना सुल्तान, शत्रुघ्न सिन्हा व अनिल धवन (चेतना)। इसी दशक में 'संगम', 'आराधना', 'मेरा नाम जोकर', 'सत्यकाम', 'खिलौना', 'जॉनी मेरा नाम', 'उपकार', 'मेरे महबूब', 'अनुप्रभा', 'ताजमहल', 'साहब बीवी और गुलाम', 'मुझे जीने दो', 'तीसरी कसम', 'गाइड', 'लीडर', 'राम और श्याम', 'आदमी', 'काजल', 'सरस्वतीचंद्र', 'गुमराह', 'जंगली', 'पूरब और पश्चिम', 'बीस साल बाद' तथा 'राखी' जैसी संवेदनशील और सुपरहिट फिल्में प्रदर्शित हुईं। इनमें से कुछ ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति भी अर्जित की।

1971-1980 का दशक फिल्म जगत् के कमर्शियलाइजेशन स्टार सिस्टम व स्टार केटेगरी ब्रेक-अप (नंबर वन स्टेटस) का बुरी तरह शिकार हो गया। इस दशक में पिछले दशकों के मुकाबले हालाँकि सबसे ज्यादा फिल्में बनीं, लेकिन सबसे कम बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल कर सकीं। स्टार सिस्टम की शुरुआत पिछले दशक में उस समय शुरू हो चुकी थी जब फिल्म जगत् का एक पक्ष जुबली कुमार (राजेंद्र कुमार) को नंबर वन मानने लगा था तो दूसरा पक्ष रिबेल स्टार (शम्मी कपूर) को। इसी तरह अभिनेत्रियों में नंबर वन की लड़ाई वैजयंती माला व वहीदा रहमान के बीच अटक गई थी, लेकिन इसका कुरूप रूप 1971-1980 के दशक में आया जब राजेश खन्ना को सुपरस्टार, फिर एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन को सुपर-डुपर और इस समय शाहरुख खान को किंग खान के नाम से नवाजा जाने लगा।

1971-1980 के इस दशक में दर्शकों को रिझाने के लिए जहाँ एक तरफ अंग-प्रदर्शन और बोल्ड थीम वाली कम बजट की फिल्मों ('जरूरत', 'दोराहा', 'कामशास्त्र', 'गुप्तज्ञान', 'कामना', 'कॉल गर्ल', 'यौवन', 'समझौता', 'बस्ती और बाजार', 'कोरा आंचल', 'कुंवारा बदन', 'जलते बदन', 'चरित्र', 'नया नशा', 'अंग से अंग लगा ले', 'प्यासे दिन', 'कोरा बदन', 'बाजार बंद करो', 'आलिंगन', 'हवस' आदि) की जैसे आँधी-सी आ गई, वहीं सामाजिक, रोमानी एवं मानवीय संवेदना को उकेरने वाली फिल्मों की जगह ले ली हिंसा और मारधाड़-प्रधान एक्शन फिल्मों ने। फिल्म जगत में आए इस व्यापक एवं क्रांतिकारी बदलाव ने फिल्मों से जैसे उसका कलात्मक एवं मानवीय पहलू छीन लिया। इस बदलाव से जहाँ एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन का वर्चस्व-सा छा गया, वहीं रेहाना सुल्तान, राधा सलूजा, जीनत अमान, परवीन बाबी, योगिता बाली, जाहिरा तथा अंग प्रदर्शन के लिए पूरी तरह से तैयार नई अभिनेत्रियों की पूरी खेप फिल्म जगत में आ बिराजी, लेकिन इनमें सिर्फ जीनत अमान व परवीन बाबी ही प्रसिद्धि पा सकीं।

सेक्स एवं ग्लैमर की इस आँधी से राजकपूर व मनोज कुमार जैसे सार्थक फिल्म बनाने वाले निर्माता भी नहीं बच सके। राजकपूर ने 'सत्यम शिवम सुंदरम' व 'राम तेरी गंगा मैली' में तथा मनोज कुमार ने अपनी लगभग सभी फिल्मों में ग्लैमर, सेक्स व अंग प्रदर्शन को बखूबी भुनाया, लेकिन उन्होंने बहुत ही कलात्मक ढंग से ऐसे दृश्यों को फिल्माया और उन पर कुरुचिपूर्ण जिस्म प्रदर्शन को हावी नहीं होने दिया। दूसरी तरफ हृषिकेश मुखर्जी, गुलजार, श्याम बेनेगल तथा प्रकाश झा जैसे फिल्मकारों की एक अलग जमात थी जो सेक्स एवं एक्शन फिल्मों की आँधी के बीच भी सोद्देश्यपूर्ण फिल्में बनाने में जुटे हुए थे।

1981-1990 व 1991-2000 का दशक भी सेक्स व एक्शन-प्रधान फिल्मों के चक्रव्यूह से नहीं निकल पाया। यह सब डूबते फिल्म उद्योग व ग्लैमर व्यवसाय को बचाने के नाम पर किया गया। 2001 का यह दशक इस मामले में जरूरत से ज्यादा बोल्ड निकला सेक्स व अंग-प्रदर्शन के इस फॉमूले को और भी विकृत अंदाज में अपनाया और एक जमाने के सशक्त एवं सार्थक फिल्म-निर्माण के झंडाबरदार महेश भट्ट व उनकी अभिनेत्री बेटी पूजा भट्ट ने - 'जिस्म', 'पाप', 'मर्डर' आदि फिल्में बनाकर। इन फिल्मों की बॉक्स ऑफिस पर रिकार्डतोड़ सफलता ने फिल्म-निर्माण की दिशा में एक नया हंगामा पैदा कर दिया और बहुत सारे फिल्म-निर्माता एवं निर्देशक अपनी फिल्मों में नायिकाओं एवं अन्य अभिनेत्रियों के शरीर के अधिक से अधिक कपड़े उतारने में जुट गए। फिल्म जगत में शोहरत एवं धन कमाने के लालच में नई अभिनेत्रियों ने हर तरह के समझौते करने शुरू कर दिए। व्यवसाय के नाम पर कला का इससे अधिक पतन दूसरी कला विधाओं में नहीं हुआ। हॉलीवुड की फिल्मों में नग्नता और हिंसा के अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाने, बॉलीवुड में फिल्मों के ग्लोबलाइजेशन एवं अंतरराष्ट्रीय फिल्म व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता में, हॉलीवुड के मुकाबले खड़े होने की फिल्म-निर्माताओं की असीम आकांक्षा, लालसा और ललक ने भी फिल्म के कलापक्ष का ताबूत खड़ा करने का प्रयास किया, लेकिन बॉलीवुड के निर्माता यह तथ्य भूल गए कि तीन दशक पहले इसी सेक्स और हिंसा की बैसाखी पर खड़ी जापानी, फ्रेंच, स्वीडन एवं ब्राजील की फिल्मों ने भले ही विश्व बाजार में खड़े होने के पायदान ढूंढ लिए थे, लेकिन अंततः उनकी यही लालसा उनकी शवयात्रा का कारण भी बन गई और अंत में सशक्त एवं संवेदनशील फिल्मों की ओर लौटकर उन्हें अपनी अस्मिता बचानी पड़ी थी। अन्यथा उस दौर में उन्मुक्त सेक्स व नग्नता का जितना खुला प्रदर्शन जापान, फ्रांस, स्वीडन, बाजील व पोलैंड की फिल्मों में हुआ था, उतना अन्यत्र कहीं नहीं - हॉलीवुड तक में नहीं हुआ।

अशोक कुमार एकमात्र अभिनेता थे जिन्होंने पूरे सात दशक फिल्म जगत में बिताए और इस दौर के गौरवशाली इतिहास व उत्थान-पतन के चश्मदीद गवाह रहे। दिलीप कुमार, राजकपूर एवं देव आनंद इस कड़ी के दूसरी पीढ़ी के सशक्त एवं संवेदनशील अभिनेता रहे जिन्होंने अपनी मौलिक एवं सर्वग्राह्य अभिनय-शैली द्वारा अलग-अलग अभिनय स्कूल कायम किए जिसकी नकल अनेक अभिनेताओं ने की। एक समय तो यह भी कहा जाने लगा था कि आज का समूचा फिल्म जगत सिर्फ दिलीप कुमार, राजकपूर, देव आनंद एवं शम्मी कपूर के अभिनय स्कूल पर ही टिका हुआ है। उसकी खुद की कोई भी मौलिकता नहीं है अपने अभिनय में।

तीसरी पीढ़ी के अभिनेता अमिताभ बच्चन ने 'दीवार' व 'शोले' से फिल्म निर्माण की शैली व दिशा एकदम से बदल देने तथा आर्थिक पतन के कगार पर खड़े फिल्म उद्योग में अपनी एक्शन फिल्मों के जरिए नए प्राण फूंकने व उसे नवस्फूर्ति प्रदान करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने एक तरफ एक्शन फिल्मों में सशक्त अभिनय किया तो दूसरी तरफ 'आनंद', 'मिली', 'कभी-कभी', 'अभिमान', 'सिलसिला' और ढलती उम्र में 'अग्निपथ', 'मोहब्बतें', 'कभी खुशी कभी गम', 'आँखें', 'मेजरसाब', 'बागबान', 'देव', 'ब्लैक', 'चीनी कम' और 'सरकार' जैसी सशक्त एवं संवेदनशील फिल्मों में प्रभावशाली अभिनय किया।

'गुड्डी' से लेकर 'कल हो न हो' तक जया बच्चन ने सशक्त अभिनय का वह इतिहास रचा जो इससे पहले व बाद में किसी अन्य अभिनेत्री को नसीब नहीं हुआ। उनकी खुद की अपनी अभिनय-शैली, मौलिकता तथा प्रस्तुतिकरण का अंदाज एक अलग अभिनय स्कूल बन गया। वहीदा रहमान 'सी.आई.डी.' (देव आनंद) से लेकर 2003 में बनी 'ओम जय जगदीश' तक विभिन्न प्रकार की फिल्मों में हर तरह की सशक्त एवं संवेदनशील भूमिकाएं निभाने वाली अभिनेत्री रहीं।

1960 के दशक के आखिरी और 1970 के दशक के शुरुआत का दौर राजेश खन्ना और धर्मेंद्र जैसे अभिनेताओं और शर्मिला टैगोर, मुमताज, लीना चंदवारकर और हेलन जैसी अभिनेत्रियों द्वारा अभिनीत रोमांटिक और एक्शन फिल्मों का दौर था। 1970 के दशक के मध्य में रोमांटिक फिल्मों का चलन कम हो गया और उसकी जगह हिंसा प्रधान फिल्मों और डकैतों पर आधारित फिल्मों ने ले लिया। इस दौर में अभिनेताओं में एंग्री यंग मैन के रूप में विख्यात अमिताभ बच्चन, मिथुन चक्रवर्ती और अनिल कपूर तथा अभिनेत्रियों में हेमामालिनी, जया बच्चन और रेखा का वर्चस्व रहा और इनका वर्चस्व 1990 के शुरुआत तक कायम रहा।

हालाँकि श्याम बेनेगल, मणि कौल, कुमार शाहनी, केतन मेहता, गोविंद निहलानी और विजय मेहता जैसे कुछ हिंदी फिल्म निर्माताओं ने 1970 के पूरे दशक के दौरान वास्तविक समानांतर फिल्मों का निर्माण भी जारी रखा। हालाँकि आर्ट फिल्मों को संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ा इसलिए व्यावसायिक फिल्मों का चलन जारी रहा और 'शोले' (1975) जैसी फिल्मों का निर्माण हुआ जिसने अमिताभ बच्चन को मुख्य अभिनेता के रूप में स्थापित कर दिया। 1975 में ही धार्मिक फिल्म 'जय संतोषी मां' का भी निर्माण हुआ। 1975 की ही एक अन्य महत्वपूर्ण फिल्में थीं यश चोपड़ा निर्देशित और सलीम-जावेद लिखित फिल्म 'दीवार'। एक गैंग लीडर भाई के खिलाफ एक पुलिसमैन भाई पर आधारित यह आपराधिक फिल्म कुख्यात स्मगलर हाजी मस्तान की वास्तविक जिंदगी पर आधारित थी। हाजी मस्तान की भूमिका अमिताभ बच्चन ने निभाई थी। डैनी बोयल ने इस फिल्म की व्याख्या 'भारतीय सिनेमा की कुंज' के रूप में की थी।

1980 के दशक की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त फिल्म मीरा नायर की 'सलाम बाम्बे' (1988) थी, जिसने 1988 केन्स फिल्म फेस्टिवल में कैमरा डीयोर जीता और बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म के लिए अकेडमी अवार्ड के लिए नामांकित हुई।

1980 के दशक के आखिरी और 1990 के दशक की शुरुआत के दौरान 'कयामत से कयामत तक' (1988), 'मैंने प्यार किया' (1989), 'हम आपके हैं कौन' (1994) और 'दिलवाले दुलहनिया ले जाएँगे' (1995) जैसी पारिवारिक फिल्मों की सफलता से प्रेरित होकर परिवार पर आधारित रोमांटिक संगीतमय फिल्मों का दौर वापस लौट आया। इस दौरान आमिर खान, सलमान खान और शाहरुख जैसे अभिनेताओं का उदय हुआ। इन तीनों अभिनेताओं ने मिलकर उसी तरह की त्रिमूर्ति बनाई जैसी 50 और 60 के दशक में राजकपूर, देव आनंद और दिलीप कुमार की थी लंबे समय तक भारतीय दर्शकों के दिलों तक राज किया। उसी तरह 1990 से लेकर 2000 तक आमिर, सलमान और शाहरुख की त्रिमूर्ति का वर्चस्व कायम रहा। इस दौरान की अभिनेत्रियों में श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, जूही चावला और काजोल का उदय हुआ। इसी दौरान गोविंदा और अक्षय कुमार जैसे अभिनेताओं और रवीना टंडन एवं करिश्मा कपूर जैसी अभिनेत्रियों को लेकर एक्शन एवं कामेडी प्रधान फिल्में बनाई गई जो खूब चलीं दूसरी तरफ राम गोपाल वर्मा और अनुराग कश्यप जैसे निर्माता-निर्देशकों की नई पौध आई जिसने 'सत्या' जैसी फिल्मों के जरिए महानगरों की सामाजिक सच्चाई को खोलकर रखा। एक तरह से 1990 के दशक के अंत में समानांतर सिनेमा का एक बार फिर उदय होता प्रतीत हुआ। इस दौरान नाना पाटेकर और मनोज वाजपेयी जैसे कलाकार सामने आए तो मनीषा कोइराला, तब्बू और उर्मिला मातोंडकर जैसी अभिनेत्रियों का अविर्भाव हुआ।

नयी सदी के शुरुआती वर्षों में विश्व जगत में भारतीय सिनेमा की लोकप्रियता बढ़ी। इन वर्षों में सिनेमा निर्माण पर होने वाले खर्च और उससे होने वाली आमदनी में कई गुना इजाफा हो गया। टेलीविजन, इंटरनेट और मोबाइल फोनों जैसे संचार माध्यमों के अंधाधुंध विकास की बदौलत आमदनी बढ़ाने के कई रास्ते खुल गए। इस दौरान फिल्म निर्माण की गुणवत्ता, सिनेमेटोग्राफी, एनिमेशन और स्पेशल इफेक्ट्स आदि में काफी सुधार आया। इस दौरान भारतीय फिल्मों के बाजार में भारी विस्तार हुआ और विदेशों में भारतीय सिनेमा की मांग बढ़ी और विदेशी दर्शकों को ध्यान में रखकर भी फिल्में बनाई जाने लगी। इस दौरान रिलीज होने वाली 'लगान' (2001) 'देवदास' (2002), 'कोई मिल गया' (2003), 'कल हो ना हो' (2003), 'वीर जारा' (2004), 'रंग दे बसंती' (2006), 'लगे रहो मुन्नाभाई' (2006), 'कृष' (2006), 'धूम-2' (2006), 'चक दे इंडिया' (2007), 'ओम शांति ओम' (2007), 'रब ने बना दी जोड़ी' (2008) और 'गजनी' (2009) जैसी फिल्मों ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में खब कमाई की। इन फिल्मों से सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, ऋत्विक रोशन और अभिषेक बच्चन जैसे अभिनेताओं जबकि ऐश्वर्य राय, प्रीति जिंटा, रानी मुखर्जी, प्रियंका चोपड़ा और करीना कपूर जैसी अभिनेत्रियों का उदय हुआ।

हॉलीवुड की तरह ही भारतीय सिनेमा में शुरू से ही ऐसे प्रतिभाशाली एवं समर्पित फिल्मकार होते रहे हैं और होते रहेंगे जो सिनेमा को ऊँचाइयाँ देते रहे। भारतीय सिनेमा समय और दर्शकों की बदलती अभिरुचियों व मांग के तहत् खुद में परिवर्तन करता रहा है और यही कारण है कि आज जब जापान, पोलैंड, रूस, फ्रांस, स्वीडन, चेकोस्लोवाकिया आदि तमाम देशों में सिनेमा मरणासन्न अवस्था में भारत का सिनेमा दिन दूनी रात चौगुनी गति से तरक्की कर रहा है। 1980 के दशक में अंतरराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध जापानी फिल्म निर्देशक अकीरा कुरुसोवा ने कहा था कि भारतीय सिनेमा, खासकर हिंदी सिनेमा कभी मर नहीं सकता। आज कुरुसोवा का यह वक्तव्य सौ फीसदी सही साबित हो रहा है।

हालाँकि आज सिनेमा में कथ्य एवं संदेश से ज्यादा महत्वपूर्ण व्यवसाय हो गया है। 21वीं सदी में मल्टीप्लेक्स के आने की वजह से सिनेमा बनाने और देखने दोनों में व्यापक फर्क आ गया है। शहरों में मल्टीप्लेक्स ने दर्शकों को सुविधा और सुरक्षा दोनों प्रदान की है। नतीजतन घरों में बैठे दर्शक थिएटरों में आए इससे फिल्मों की आमदनी बढ़ी और निवेश भी। इनके साथ ही कुछ कारपोरेट घरानों ने फिल्म प्रोडक्शन में कदम रखा जिसके कारण फिल्म निर्माण का कारपोरेटाइजेशन हो गया। आज निर्माता, निर्देशक और वितरक का पूरा ध्यान कमाई पर रहने लगा है। आज फिल्में 100 करोड़ रुपये का व्यवसाय करने लगी हैं और आज फिल्मों के हिट या सफल होने के मायने बदल गए हैं। आज इस बात का मायने खत्म हो गया है कि दर्शकों को फिल्में कितनी पसंद आईं, महत्वपूर्ण यह हो गया है कि किस फिल्म ने कितने करोड़ की कमाई की। यह माना जाने लगा है कि फिल्म से जितनी कमाई होगी, वह फिल्म उतनी अच्छी होगी। यह कारण है कि कुछ सप्ताह पहले 100 करोड़ या उससे अधिक कमाई करने वाली फिल्मों को कोई याद नहीं रखता लेकिन लेकिन कुछ हजार या लाख रुपये की कमाई करने वाली फिल्में आज भी सिनेमा को दिशा दे रही है और उनकी नकल करके फिल्में बनाई जा रही है। बहरहाल, भविष्य में फिल्मों का रूप निश्चित ही बदलेगा और यह क्या रूप लेगा यह देखना एक अच्छी फिल्म की तरह दिलचस्प होगा।


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हिंदी समय में विनोद विप्लव की रचनाएँ