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निबंध

कहाँ से शुरू हुए; कहाँ पहुँचे
श्रीराम परिहार


पानी बरस रहा है। बरसते पानी के बीच निमाड़ का छोटा-सा गाँव यादों में उभर आया है। गाँव, जहाँ पर आँखें खुलीं। जहाँ खेतों में दौड़ते-कूदते सतरंगी सपने जागे। जहाँ नदी के घाट पर जल में जीवन के कई प्रतिबिंब उभरे और तिरोहित हुए। जहाँ स्कूल में शिक्षा का पहला ककहरा पढ़ा। सीखा। उसी गाँव-स्कूल के 15 अगस्त की सुबह स्मृतियों में साफ-साफ हो आई है। लगभग 40 वर्ष पहले का दृश्य सामने है। सुराज मिल गया है। लोग सुराजियों की जय-जयकार कर रहे हैं। पानी बरस रहा है। छोटे-छोटे हम स्कूली बच्चे बहुत सुबह-सुबह विद्यालय में इकट्ठा हो रहे हैं। गुरुजी ने एक दिन पूर्व ही समझा दिया है कि सबको साफ-सुथरी पाठशाला पोशाक पहनकर आना है और हाँ! सफेद टोपी हरेक को लगाकर आना है। अहा! उस सुबह का क्या दृश्य था; लग रहा था - स्वतंत्रता-संग्राम-सेनानियों का समूह आ जुटा हो।

गुरुजी हम सब बच्चों से पहले, दिन की किरन फूटने से पूर्व ही पाठशाला आ गए थे। गुरुजी क्या थे, साक्षात स्वराजी लगते थे। खादी की सफेद धोती, खादी का सफेद कुर्ता, खादी की सफेद गांधी टोपी, आँखों पर मोटी फ्रेम का चश्मा, और नंगे पाँव। गुरुजी ज्ञान का स्वरूप लगते थे। उनसे भय नहीं लगता था। उन पर श्रद्धा होती थी। उनके आचरण की भाषा बहुत ताकतवर थी; जो हम सब बच्चों पर एक जबरदस्त प्रभाव छोड़ती थी। बालमन की स्लेट पर गुरुजी की मूरत और उनके वचन आज भी अमिट हैं।

15 अगस्त के दिन जुलूस निकलना था। पाँचवी कक्षा का होशियार विद्यार्थी उस दिन धोती, कुर्ता और गांधी टोपी लगाकर आता था। वह राष्ट्रध्वज लेकर आगे चलता था। सारे स्कूल के बच्चे दो-दो की कतार में उसके पीछे चलते थे। पूरे जोर से भारतमाता की जय। महात्मा गांधी की जय। बापू अमर रहे। वंदे मातरम। स्वतंत्रता अमर रहे। आदि नारों से स्कूल का प्रांगण और गाँव का गगन गूँज उठता था। जुलूस प्रारम्भ होता था और साथ ही बहुत उत्साह से हम स्कूली बच्चे गाते थे - ''विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा।'' राष्ट्रध्वज की शान को बनाए रखने के नन्हें-नन्हें संकल्पों से जुलूस आगे बढ़ता था। गाँव की प्रत्येक गली में से गुजरता था। माताएँ, बहनें फाटक पर आकर नन्हें-नन्हें सुराजियों को देखती थीं। आशीषती थीं। सबको तिलक लगाती थीं।

अच्छी तरह याद है कि उस दिन गाँव का प्रायः प्रायः प्रत्येक व्यक्ति भी जुलूस के पीछे-पीछे साथ-साथ चलता था। गाँव उत्सव से भर उठता था। स्कूल के द्वार पर आम्र पल्लवों के वंदनवार लगाए जाते थे। जुलूस पुनः स्कूल प्रांगण में आकर रुक जाता था। हम सब बैठ जाते थे। तब गुरुजी स्वतंत्रता का महत्व समझाते थे। स्वतंत्रता की लड़ाई का वर्णन करते-करते उनकी आँखें पनीली हो आती थीं। वे एक मुट्ठी माटी उठाकर कहते ''इस मुट्ठी भर मिट्टी पर हमारा जीवन निर्भर है। पोषण करने से यह हमें भोजन, ईंधन एवं मकान की व्यवस्था कराने में सहायक होगी और सौंदर्य से घेर लेगी। दुरुपयोग करने से मिट्टी नष्ट हो जाएगी और अपने साथ मानव को भी नष्ट कर देगी। यह मिट्टी हम सबकी माँ है। भारत माता का मस्तक अब झुकने न पाए।'' हम सब हाथ उठाकर कहते ''भारतमाता की जय।'' ''स्वतंत्रता अमर रहे।''

आज मेरे गाँव में ऐसा कुछ नहीं होता है।

देश-धरम की नई परिभाषाएँ गढ़ी गईं, तो देश बदला और देश के गाँव भी बदल गए। 'इंडिया दैट इज भारत' को सुमरनी की तरह जपने वाले काले अँग्रेजों की जमात पैदा हो गई। माइकल जैक्सन के हाड़तोड़ नृत्य पर लटबौरे होने वाले युवाओं की भीड़ खड़ी हो गई। सुरा-सुंदरी की मस्ती में अलगौजा से बजते नवधनाढ्य लोगों की संतानों के नरक से तीर्थों-पर्यटन-स्थलों की नालियाँ गंधाने लगीं। विश्वसुंदरी प्रतियोगिताओं और विज्ञापनों की होड़ में नारी-शक्ति के सारे प्रतिमान टूट-टूट हो गए। हत्या, बलात्कार, सामूहिक दुष्कर्म की खबर से अखबार की शर्मसार होती अक्षर-लिपि अपने अर्थ खोने लगी। आज आम आदमी का 'भारत' खो-सा गया और उसके सुखों-दुखों के तमाम चेहरे पीछे छूटते चले गए। एक दरिंदा भारत के घर में आतंक बनकर घुस आया और संसद मुस्कुराती रही। गहराते अँधेरे में सन्नाटे को तोड़ने के सारे आमंत्रण मौन हो गए हैं।

लगता है रात सर्द है और पूरी नदी उद्गम से लेकर सागर-मुहाने तक जम-सी गई है। हमारे अंदर सब कुछ जड़ हो गया है। हमारे भीतर बहुत कुछ गलने लगा है। बाहर धुंध छा गई है। एक अंधी-खामोश यात्रा जारी है। इस यात्रा में अंधे संगी-साथियों को क्या नाम दें? इस यात्रा में आम आदमी; जिसमें आप-हम शामिल हैं; कितने अकेले हो गए हैं? कितने अधूरे, खाली और निरीह हो गए हैं। हम अपनी माटी, बानी-बोली और गाँव की गलियों को भूल गए हैं। अपने पुरखों की धरोहर को लातों से कुचलकर पुरानी समझकर बिखरा आए हैं। इस बौराएपन में हम अपना असली चेहरा भी भूल गए हैं। हम अपना असली 'भारत' खो बैठे हैं।

आम आदमी के प्रतिनिधियों ने और सरकारी तंत्र में बैठे काले अँग्रेजों ने अँग्रेजी के ध्वज को उठा रखा है। पाश्चात्य शिक्षा-प्रणाली, पंचसितारा जीवन-शैली और अनियंत्रित भोगवाद उस ध्वज के तीन रंग हैं। उन्हें देख सूरज रोज शर्मिंदा होता है और चाँद का चेहरा फीका पड़ जाता है। किसी फूल की कोई खुशबू हथेली पर नहीं ठहर पा रही है। नीले आसमान पर पंछियों के पंखों की अदृश्य रेखाएँ उभरती हैं और लोप हो जाती हैं। विश्व के 'ज्ञानगुरु' का मान सेमड़े बालक की लटकती टाई और अँग्रेजी वर्णमाला की रटंत में दबकर घायल हो रहा है। भारतीय संस्कृति 'हैप्पी दशहरा', 'हैप्पी दीवाली', 'हैप्पी होली' और 'हैप्पी न्यू इयर' के कुसंबोधनों और बदतमीज कामनाओं से बदरंग हो चली है। मैकाले की औलादों की भरमार है, जिनको और जिनके आचरणों को देख लंदन की मिट्टी में मिट्टी हो गई एक माँ अपनी कब्र में भी मुस्करा सकती है।

मेरे देश भारत अपना दुखड़ा किससे कहे? किसे सुनाए। यहाँ धृतराष्ट्र अंधे हैं। भीष्म पितामह परवश। धर्मराज विवश। द्रोपदी विपत गठरी बन बिलख रही है। कृष्ण के अवतरण की प्रतीक्षा है। कहीं दूर-दूर तक जागरण की आहट नहीं है। दूर हिम-मंडित चोटी से जब-तब एक चिड़िया भी दिखाई नहीं देती, मन जिल्लत से भर उठता है। सनसनाती बर्फीली खौफनाक हवाएँ चलती हैं, मन शंकाओं के नीचे दबा-दबा कराह उठता है। एक आस जागती है - कोई चिड़िया, कोई परिंदा दिखे, तो पूछूँ - मेरे पुरखों का घर कैसा है? मेरे माता-पिता क्या अभी भी आँगन में बैठे अँजुरी भर धूप पी रहे हैं? कैसा है मेरा देश, मेरी जन्मभूमि, भारत।

मेरा घर-गाँव, देश-धरम-भारत। मेरी जन्मभूमि-भारत। भारत सोने की चिड़िया। जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वह भारत देश है मेरा। भारत की भोर स्वर्णिम। भारत की शाम सुआपंखिया। भारत के सोने-से दिन; चाँदी सी रातें। भारत के पर्वत प्रहरी। भारत के वन खजांची। भारत की नदियाँ संस्कृति-पोषिता। भारत की धरती पुत्रवत्सला। भारत की गायें कामधेनु। भारत के वृषभ हलधर। भारत के किसान अन्न उपजाने में ब्रह्मा, अन्नदाता के रूप में विष्णु और सबका भला कर संतुष्ट होने में शिव। भारत की तरुणाई कर्मठ। भारत का मन त्याग में भोग का सुखानुभवी। भारत का ज्ञान सहस्रार के पार के लोक का द्रष्टा। भारत की नदी, नारी और संस्कृति - गंगा, गायत्री और गीता। भारत के नन्हें दीपक की लौ में प्रकट होती हैं प्रार्थनाएँ।

अँग्रेजों ने जब अपनी भूरी आँखों से भारत के इस सतरंगी स्वरूप को देखा, तो इसका सोनरंग व्यक्तित्व अँग्रेजों, फ्राँसिसियों, पुर्तगालियों, डचों को आकर्षित करने लगा। यूरोपवासियों में यहाँ आकर अपनी रोजी-रोटी कमाने की नहीं, इसके शोषण और इस पर शासन की खोट-इच्छा जागी। लार्ड आकविल ने अपनी विषाक्त लार टपकाते हुए इंग्लैंड के वायसराय को 1901 में लंबा पत्र लिखा था - 'भारत भूमि को छोड़ने का अर्थ है, इंग्लैंड को आधा-अधूरा करना, क्या आप जानते हैं, इन दिनों भारत से जो कच्चा माल ब्रिटेन के कारखानों के लिए आता है, उससे ब्रिटेन के मजदूरों को लगातार काम मिल रहा है और भारत तथा अन्य देशों में उसे बेचकर ब्रिटेन को कितना मुनाफा हो रहा है। भारत को छोड़ने के निर्णय से पहले इस पर विचार कर लिया जाए।'

खोटी नीयत, खोटा काम, भारत की बर्बादी। नष्ट हो गया भारत का गौरव। बिसरा दिया गया उसका पौराणिक इतिहास। छीन लिया गया उससे अपना सांस्कृतिक बोध। काट दिया गया उसे अपनी परंपराओं से। धूमिल कर दी गईं उसकी स्मृतियाँ। चुरा लिया गया उसका कालबोध। यह जीवित सच्चाई है। कोई माने या न माने। दूर-दूर तक अपसंस्कृति का मरुस्थल फैलता जा रहा है। किसी वृक्ष पर कोई पत्ता नजर नहीं आ रहा है। एक माटी के दीये की लौ मात्र जल रही है। हम सुबह के इंतजार में हैं।

रात सर्द हो चली है। चाँद बेवड़े (गेहूँ-चने) की रोटी सरीखा पीला दिखाई देने लगा है। पौष-माघ की ठंडाती रातों में कितनी ही जिंदगियाँ शीत से दो-दो हाथ करते मौन हो जाती हैं। पूरे विश्व की आबादी सात अरब है। सात अरब लोगों में से डेढ़ लाख लोग रात को सोते तो हैं, लेकिन सुबह उठ नहीं पाते। बर्फ के ढेले-जैसी जिंदगियाँ बेपानी होकर गल जाती हैं। यह हमारे विकास के मुँह पर पड़ता हुआ थप्पड़ है। ऐसी ही 16 दिसंबर 2012 की सर्द रात में 'क्राईम केपीटल' बनती जा रही दिल्ली की एक मोटर में छह दरिंदों द्वारा भारत की एक बेटी की देह को नोच-नोच कर लोथड़ा कर दिया जाता है। उसकी चीख मोटर के काले शीशों को तोड़ नहीं पाती और अपनी आँतों में घाव लिये मौन हो जाती है। इस पत्थरों के शहर और शीशे के घरों वाले नगर में चीख और आक्रोशित दहाड़ का कोई भी अर्थ नहीं रहा है। रात के अँधेरे में सड़क किनारे 'दामिनी' की बुझती रोशनी जनपथ पर कई सवाल छोड़कर सो जाती है। भारत का मध्यवर्ग और युवावर्ग नगर-नगर, गाँव-गाँव सड़कों पर उतरकर शांत किंतु उद्धत होकर इस जघन्य दुष्कर्म के विरोध में खड़ा हो जाता है। वह इस पापकर्म के विरोध में न्याय माँगता है। राजा विक्रमादित्य का देश अपने सत्ता मदांधों को यह दुष्खबर देने हेतु जगाना चाह रहा है। न्याय माँगने हेतु एकत्रित हुए उन युवाओं, युवतियों, महिलाओं पर लाठी चार्ज किया जाता है। भारत ने अपने ही स्वराज में अपने ही नुमाइंदों द्वारा अपने ही लोगों पर इस तरह की बेरहमी भरा काला दिन कभी नहीं बरसाया था। ऐसे जुल्मों के आगे शायद खुदा भी झुक जाए।

इस अनाचार, देशव्यापी भ्रष्टाचार और धर्म, संप्रदाय भाषा के नाम पर प्रचारित राजनैतिक झूठ की ज्वालाओं को बुझाने हेतु जल-कलशे लेकर आम जनता को घरों से निकलना ही होगा। पैंसठ बरस हो गए भारत को स्वतंत्र हुए। पैंसठ वर्षों में कला, साहित्य के नाम पर विदेशी विचारों की रोटी खा-खाकर मस्ताए तथाकथितों ने जो कुछ लिखा, चित्रित किया, वह साहित्य न तो परिवार के साथ बैठकर पढ़ने लायक है और न ही वह कला बच्चों-घर-परिवार के साथ देखने योग्य है। यथार्थ के नाम पर जो कुछ कथा-कविता में विगत तीस-पैंतीस वर्षों में लिखा गया, वह भारतीय जीवन का मर्यादित सच नहीं हो सकता। हुसैन की नंगी तस्वीरों से घर सजाने की चाह हमारी जीवित अस्मिता नहीं बन सकती। कुत्सित मनोवृत्ति से चित्रित सरस्वती का नग्न चित्र हमारे आचरण को बदनाम करने से कैसे रोक पाएगा? कला-साहित्य में झूठ और फरेब की फसल खूब बोई-काटी जा रही है। हमारा सुंदर सच और सुनहरा सपना अमेरिका के चरण-चाटुकारों, मार्क्स के गलत व्याख्याकारों और मैकाले के सपूतों ने चुरा लिया है। कुत्तों ने दुम नीची करके भौंकना शुरू कर दिया है। उनकी दाड़ में खून लग गया है। उनकी दाड़ों को तोड़ना या उन्हें मार भगाना आवश्यक हो गया है।

तथाकथित इक्कीसवीं सदी के भारत का चेहरा कैसा होना चाहिए; जरा पूछें तो अंडमान की जेल से टकराते समुद्र के काले पानी से। पूछें - गांधी, सुभाष, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, असफाक उल्लाह और ऐसे ही अनाम-अपरिचित राष्ट्र भक्तों से। हमारे ये पुरखे भारत को हमें सौंपकर गए हैं। यह भारत हमारा है। हमें अपनी आँखों के पर्दे की महीन पर्त की शर्म को बचाए रखना है।

अभी भी संभावनाएँ शेष हैं। हमारा वर्तमान अंधकार में है, लेकिन नन्हें दीये की लौ बल रही है। इसी के प्रकाश में हमें खोए हुए को तलाशना है। उस खोए हुए को जिसका लोहा पूरा विश्व मानता रहा है। उठो कि उठने का वक्त आ गया है। सँभालो अपने तीर और तरकश कि निशाना साधना है। राष्ट्रभक्ति की इस लौ को चिन्गारियों के वृक्ष और रोशनी के पहाड़ में बदलना है। हम भोर की प्रतीक्षा ना करें। सूरज का आह्वान करें। स्वर्णिम विहान का स्वागत करें। सूरज हमारे हाथों में होगा।

पूरब की ओर देखो - एक नन्हा सपूत भारतवर्ष के आँगन में खेलते-खेलते गा रहा है - 'अरुण यह मधुमय देश हमारा।'

इति शुभम्।


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