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कहानी

नोटिस
राजू शर्मा


आखिर समझावन जेल की सलाखों के पीछे पहुँच गया। उसकी बुद्धि के किसी खाने में हमेशा यह आशंका एक काले चमगादड़ की तरह बैठी रही थी। उस दिन से, जब शराब की झोंक में, श्मशान वाले कूड़ाघर से सूरी भाई के साथ लौटते हुए उसने पहली नोटिस के कागज को जलते कबाड़ में फेंक दिया था। वह रात, वह घटना उसे अच्छी तरह याद है।

एक कबाड़ी की, यूँ तो अधिकांश गरीब इनसानों की सौ में पचानबे आशंकाएँ सही साबित होती हैं। यह दस्तूर है विधान का, या ईश्वर का नियम, इसके बारे में ठीक से निश्चित नहीं किया जा सकता।

उसे केंद्रीय जेल भेजा गया था। जिस कोठरी में उसे डाला गया, वहाँ दस से ज्यादा कैदी पहले से बंद थे।

'अबे आजा साले, चिकने, हमारे लिए क्या संदेशा लाया है' एक कैदी लेटे लेटे बोला। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और उसकी ऊँचाई छह फुट से कम नहीं थी। ऐसा समझावन को लगा। वह खुद औसत लंबाई का है और रंग साँवला है। 'क्यों बे, बोलता क्यों नहीं रे तू सजायाफ्ता है या मुकदमायाफ्ता।' पीछे से एक और आवाज आई। समझावन ने कोई जवाब नहीं दिया।

समझावन नहीं जानता था सजायाफ्ता और मुकदमायाफ्ता में क्या फर्क होता है। पता नहीं उसे संकट दिखाई देता या सांत्वना मिलती अगर कोई उसे यह बताता कि इस देश में कई लाख 'अंडरट्रायल' हैं जो मुकदमों के लंबित रहने, चार्जशीट दाखिल न होने के कारण, या जमानत का इंतजाम न हो पाने की वजह से या महज दस्तावेज गुम हो जाने के कारण बरसों जेल में पड़े रहते हैं। बिना सजा पाए वे सजा भोगते हैं, उनके दंड का कहीं इंदराज नहीं होता और जेल के भीतर, और जेल के लिए वे एक संख्या बन जाते हैं। जैसे समय गुजरता है, एक व्यावहारिक सर्वानुमति के आधार पर उन्हें सजायाफ्ता मान लिया जाता है। उनके विरुद्ध मुकदमा कभी खत्म नहीं होता, न चार्जशीट पर किसी का ध्यान जाता है। इस कठिनाई का स्वाभाविक निस्तारण उनकी मृत्यु से होता है और जेल के रिकार्ड से उनका नाम हिसाब किताब सही रखने की दृष्टि से खारिज कर दिया जाता है।

जीवन में पहली बार समझावन ने दुनिया को जेल के सीखचों के पीछे से देखा। शासन की नित्य नई नीतियों का एक प्रभाव सामने की भूरी दीवार पर टिन के दो बोर्ड के रूप में अंकित था। छोटे बोर्ड पर लाल पेंट से लिखा था : 'पारदर्शिता सरकार की नीति में ही नहीं उसकी नीयत में भी दिखाई देगी - मुख्यमंत्री'। दूसरा बड़ा बोर्ड कम चौड़ा पर लंबा था। उस पर नीले अक्षरों में काफी कुछ लिखा था जो इतनी दूरी से साफ नहीं था। सिर्फ सबसे ऊपर लिखा शीर्षक दिखने में आ रहा था। 'नागरिक अधिकार पत्र'। यह बोर्ड देखने में जय जगदीश हरे की आरती के कलैंडर की तरह लगता था जो तुलसी (समझावन की पत्नी) ने उनके घर के एकमात्र कमरे में टाँग रखा था। रात में खिड़की से तेज हवा का झोंका आता तो वह कलैंडर फड़फड़ा जाता था। समझावन की नींद खुल जाती थी। वह बगल में बेखबर सोई तुलसी को कुछ क्षण अपलक देखता, कलैंडर के मतवालेपन को कुछ देर देखते रहता और न जाने कब नींद आ जाती। कभी कभी वह तुलसी के होंठ पर अपने होंठ रख देता और कलैंडर के साथ वे भी मतवाले हो जाते थे।

हाल में शासन के सभी विभागों और सरकारी संस्थाओं, सेवा प्रतिष्ठानों ने नागरिक अधिकारपत्र जारी किए थे और इसकी प्रगति की समीक्षा उच्च स्तरों पर लगातार की जा रही थी।


वह स्वर्णिम दिन था जब अफसर के महत्वांकाक्षी प्रोजेक्ट को अंतर्राष्ट्रीय डोनर एजेन्सी ने मंजूरी प्रदान की। उसी दिन शाम को अफसर की मुलाकात एक युवा महिला पत्रकार से हुई। डोनर एजेन्सी के सामने प्रेजेंटेशन करते हुए और पत्रकार को दिए एक मशहूर इंटरव्यू में अफसर ने कहा था : ' नागरिक अधिकार पत्र जनता और सरकारी तंत्र के बीच रिश्ते की परिभाषा और बुनियाद है। पूरा ध्यान जनता पर है, संस्था पर नहीं। यह अ धि कारपत्र सरकार का दायित्व है और जनता का मौलिक अधिकार। यदि सरकार इस दायित्व को पूरा नहीं करती तो आप उसे कटघरे में घसीट सकते हैं।' घसीटने पर अफसर ने कई बार जोर दिया। वह अपने प्रदर्शन से बहुत उत्साहित था।


जेल की सलाखों के पीछे से कैदी बड़े बोर्ड को पढ़ नहीं पाते थे क्योंकि वह दूर है। जब वे रिहा होते हैं तो उन्हें बाहर निकलने की जल्दी रहती है। जेल के अधीक्षक का यह विश्वास है कि इस चार्टर का संबंध नागरिक से है जेल से नहीं। लिहाजा इस आरती को आज तक किसी ने नहीं पढ़ा। उसके भजने का तो सवाल ही नहीं है।

दो रातें समझावन को जेल में काटनी पड़ीं। सूरी भाई ने जमानत की अर्जी दोबारा दाखिल की थी। उसकी तसदीक करने में दो दिन लग गए। वैसे तो जेल जाने की नौबत ही नहीं आनी चाहिए थी। पुलिस स्टेशन का इंस्पैक्टर चुस्त और स्मार्ट था। वह लंबा था, इकहरा बदन। वह कभी स्थिर नही होता था, हमेशा गतिमान। हमेशा आगे पीछे होते रहना, कभी बैठ जाना, फिर चलना शुरू कर देना; टेलीफोन पर बिजी, मोबाइल, सिपाहियों और गारद को आदेश देते रहना, लोकल सिटी केबल पर हमेशा एक नजर, पैनी आँखें उठतीं, गिरतीं, चमकती रहतीं, कुछ नहीं तो उँगलियाँ चटखाने लगता या मेज पर अँगूठी बजाने लगता या रिवाल्वर की नली से खेलना शुरू कर देता, बुलेट बार बार निकालना और डालना, इतना गतिशील कि सामने बैठे इनसान को लगने लगता कि वह एक बटालियन से घिरा हुआ है। यह साफ था कि यह छोटा पुलिस स्टेशन उसकी इनर्जी के लिए बहुत थोड़ा पड़ रहा था। उसका नाम विजय प्रकाश था।

इंस्पैक्टर ने स्मार्ट, चुस्त आवाज में कहा, 'मैं तुझे अंदर ले रहा हूँ। पर तेरे खिलाफ जो चार्जेज हैं वो बेलेबिल हैं। जमानत का इंतजाम कर लो, जा सकते हो।' न जाने किस संयोग से सूरी भाई ने समझावन को पुलिस स्टेशन में जमीन पर बैठे देख लिया। वह अपने स्कूटर पर अकेला लौट रहा था। पूरा वाकया समझाने या इंस्पैक्टर से बहस करने का समय नहीं था। सूरी भाई ने दौड़ धूप करके जल्दी से जमानत का इंतजाम किया। थाने के बाहर ही बैठ कर गार्ड की सहायता से कागजात भरे, दस्तखत किए। इस काम के लिए गार्ड को तीस रुपये दिए। पर ऐन वक्त पर पता चला कि वे कागजों पर एक जरूरी स्टांप लगाना भूल गए हैं।

नागरिक के मूल अधिकारों की मुस्तैदी से सुरक्षा के लिए विधान में यह प्राविधान है कि शाम के बाद बिना रिमांड लिए या मजिस्ट्रेट की इजाजत के गिरफ्तारी गैर कानूनी मानी जाएगी। दूसरा पक्ष यह है कि पुलिस व्यवस्था और उचित प्रकार के जेल प्रशासन के निर्माण के लिए शासन को आय और राजस्व की जरूरत होती है। इसलिए स्टांप के मामले में शिथिलता करना नामुमकिन है। अगर सरकार को राजस्व नहीं मिलेगा तो प्रशासन तंत्र का खर्चा चलेगा कैसे। इसलिए जो जमानत सूरी भाई ने पुलिस स्टेशन में दी थी वह बेकार हो गई और समझावन को जेल जाना पड़ा। जेल से समझावन दो दिन बाद घर लौटा। सूरी भाई के स्कूटर पर। चलने से पहले किसी आदमी ने उसे यह बताया कि एक दिन बाद उसे पुलिस स्टेशन में हाजिरी देनी है। पुलिस इस मामले की तहकीकात कर रही है और उससे पूछताछ की जाएगी, पूछताछ पुलिस स्टेशन में होगी, उसे जब बुलाया जाएगा उसे जाना होगा, अन्यथा उसे दोबारा जेल की यात्रा करनी पड़ सकती है।

एक दार्शनिक ने एक दुर्लभ पल में कहा था कि जिंदगी अच्छे और बुरे संयोगों के प्रभाव से चलती है। जब जन्म और मौत ही संयोग हैं तो उनके बीच घटने वाला जीवन और क्या हो सकता है जो इनसान इस प्रत्यक्ष सच को नहीं समझता वह मूर्ख है और जीवन भर दुख भोगता है। अब, दूसरा और अच्छा संयोग यह था कि सूरी भाई ने स्कूटर पर जाते हुए समझावन को थाने में देख लिया। पहला, और दुर्भाग्यपूर्ण संयोग यह था कि जब समझावन इंस्पेक्टर को अपनी मुश्किल बताने की कोशिश कर रहा था, उसी समय नगर निगम का वह क्लर्क जिसका नाम सुनील खरबंदा था, और जिसे उसके साथी खरबूजे के नाम से बुलाते थे, थाने पहुँचा। वह दफ्तर से घर लौटते हुए इंसपेक्टर को प्रणाम करने आया था। वे दोनों स्कूल में साथ पढ़े थे और अब दोनों की नौकरियाँ ऐसी थीं कि अनेक प्रसंगों में, जिसमें रिश्वतखोरी और साथ ही साथ अपना बचाव प्रमुख थे वे एक दूसरे के पूरक और मददगार बन गए थे, हालाँकि मन ही मन वे एक दूसरे से घृणा करते थे, शायद एक दूसरे के निर्लज्ज चेहरों में उन्हें अपनी असलियत दिखाई दे जाती थी।

उस दिन सुबह, तीन दिन पहले, दरअसल समझावन का थाने जाने का इरादा बिल्कुल नहीं था। किसी भी सरकारी दफ्तर या इमारत में जाने का उसका इरादा कभी नहीं था। व्यापक, दूर दूर तक छितरे सरकारी तंत्र और उसके बीच एक अनकहा मगर अनिवार्य फासला है। एक दूरी जो कुल संरचना और उसके संतुलन की दशा है, शर्त है। जैसे शेर और हिरन के दायरे हमेशा अलग रहते हैं। एक बहुचर्चित आँकड़ा बताता है कि सकल उत्पाद का करीब 40 प्रतिशत अंश सरकारी खर्चों से जुड़ा है। पर आँकड़े तो और बहुत सी बातें कहते हैं। जैसे सरकार हर साल प्रति व्यक्ति 1500 रुपये विकास के लिए खर्च करती है। या कि प्रति व्यक्ति कर अदायगी का भार एक साल में लगभग एक हजार रुपये है जो उसकी आय का करीब दस प्रतिशत है। यह भी कि सरकार ने हर आदमी को करीब 500 रुपये के उधार में डुबो दिया है जिसे कभी न कभी तो लौटाना ही होगा। पर इन सब बातों और आँकड़ों का समझावन से कोई लेना देना नहीं है। वह एक कबाड़ी है जो सोलह साल की उम्र से, जब वह गाँव से एक रौ में भाग कर शहर आ गया था, कूड़े और कचरे बीनने का काम कर रहा है। यह बात दूसरी है कि पिछले डेढ़ साल में उसकी किस्मत ने मामूली पलटा खाया है जबसे शहर में एक कंपनी आई है और जिसने सूरी भाई और उसे कचरे का 'रूट प्लान' बनाने के लिए नौकरी पर रख लिया है। सूरी भाई ने बताया था कि कंपनी दो तीन प्लांट डालने वाली है और उनमें से एक प्लांट में कूड़े से बिजली पैदा की जाएगी।

कंपनी जानती है, सूरी जानता है कि कूड़े कचरे की निमग्न, आप्लावित दुनिया का समझावन से बेहतर जानकार नहीं है। उसका कोई सानी नहीं। कूड़े का तंत्र, इसका हिसाब और विस्तार उतना ही जटिल है जितना अर्थ जगत का कोई दूसरा हिस्सा, इसका जाल कितना फैला है - जमीन के भीतर और ऊपर, सीवर के पाइप, बंद और खुली नालियाँ, रास्ते, गड्ढे और पड़ाव जहाँ से कूड़ा अपनी राह खामोशी से खुद तय करता है - और मैले की पैदाइश के असंख्य स्रोत और वे स्थान जहाँ पहुँच कर वह तिरस्कृत होता है - निकासी और निस्तारण के अभूतपूर्व जाल, अपशेष के ओझल नियम - इस अंदरूनी दुनिया की थाह पाने की अद्भुत क्षमता है समझावन के पास। एक सेन्स है उसके पास जिसके सहारे वह जानता है कि कूड़ा अपनी राह कहाँ और कैसे चुनता है। कंपनी के मालिक ने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा था, 'समझावन दिव्य दृष्टि है तुम्हारे पास और यह कंपनी उसकी कीमत जानती है।' समझावन आप्लावित अर्थतंत्र की मिसाल है और असंगठित अर्थ जगत की एक अनाम संख्या, सरकारी काम और कर्म से उसका क्या लेना देना।

औपचारिक और अनौपचारिक, मानक और असल, सूक्ष्म और स्थूल, संगठित और असंगठित, तंत्र और परातंत्र के मध्य एक संतुलन और सामंजस्य होता है जो उनके परस्पर संबंध के रोग निरोग से निर्धारित होता है।

वे नोटिसें एक प्रक्षेपास्त्र, विलग आगंतुक की तरह थीं, जिनसे यह संतुलन बिखर गया था।

तीन महीने पहले तक समझावन कभी किसी सरकारी विभाग, इमारत या दफ्तर में दाखिल नहीं हुआ था। ऐसा नहीं है कि उसके पास सरकार की कोई निजी तस्वीर या धारणा नहीं थी। जिस 'कच्चा तालाब कालोनी' में वह रहता था, वहाँ बहुत से ऐसे लोग भी रहते थे जो सरकारी महकमों में काम करते थे। उनमें से कई से उसकी दुआ सलाम थी। कूड़े के काम के वास्ते नगर निगम के कई जमादारों और सेनेटरी इंस्पेक्टरों से उसकी जान पहचान थी। पान की दुकान पर खड़ा हुआ वह किसी आदमी के सरकारी मुलाजिम होने को इस बिना पर पहचान लेता था कि वे लोग काम को ड्यूटी कहा करते थे।

समझावन को पिछले साल उंतीसवाँ साल लगा था। पर यह सही था कि किसी भी सरकारी कागज, रजिस्टर, दस्तावेज या प्रपत्र में उसका नाम अंकित नहीं रहा होगा। यानी वह एक अदृश्य नागरिक था। उसे हम अनागरिक भी कह सकते हैं। इसके पीछे भी एक दैवी घटना का हाथ है जो मनोरंजक भी है और दुखद भी।

समझावन का जन्म शहर से कोई सत्तर कोस दूर एक गाँव में हुआ था। माँ बाप उसके बचपन में ही मर गए थे। दूर के रिश्ते के चाचा ने उसे पाला। चाचा से उसकी कभी बनी नहीं इसलिए सोलह साल की उम्र में वह शहर भाग गया था। पर चाचा में एक अच्छाई थी। दारू ने उसके समूचे शरीर का नाश कर दिया था पर शिक्षा के लिए उसके मन में एक आदर भाव न जाने कैसे बचा रहा। समझावन ने गाँव से प्राइमरी की और फिर बगल के कस्बे से हाई स्कूल तक पढ़ गया। जब भी वह इंटर कालेज के अंदर पहुँचता था, वह खुद से एक बार जरूर कहता - एक दिन मैं इसी कालेज में पढ़ाऊँगा। पर एक रात एक अनहोनी, भयानक घटना घटी। गाँव के प्राइमरी स्कूल और इंटर कालेज की इमारत पर एक ही रात आकाशीय बिजली गिरी। उस रात न जाने क्यों इंटर कालेज के एक कमरे में तीन छात्र सो रहे थे। वे जल कर राख हो गए। घटना बड़ी बन गई, काफी अफरातफरी मची और जाँचों का सिलसिला बरसों तक चलता रहा। आखिर में, कालेज और स्कूल दोनों बंद हो गए। उनकी इमारतों को लोग भुतहा मानने लगे और यह कि इन पर देवी का शाप लगा है। स्कूल खंडहर में बदल गए। उस स्कूल और कालेज के हाजिरी रजिस्टरों में जरूर उसका नाम दर्ज रहा होगा। उस रात की घटना में वे सब भस्म हो गए थे।

सामाजिक व्यवस्था की अवधारणा में पुलिस स्टेशन वह जगह या आउटपोस्ट है जहाँ एक नागरिक किसी भी वक्त सहजता से सुरक्षा, सूचना और मौलिक अधिकारों की रक्षा की गुहार कर सकता है। अवधारणा का एक प्रमुख क्लेम यह भी है कि यदि नागरिक के सामने कोई मुश्किल है जिसका संबंध राज्य या समाज से है, तो वह सबसे पहले इस आउटपोस्ट का सहारा ले। तभी इस तरह की सूचनाओं को एफ.आई.आर. या प्राथमिकी की संज्ञा दी गई है। किसी समाज की परिपक्वता का एक सरल पैमाना यह भी है कि नागरिक मुश्किलों के वक्त या सूचना पाने के लिए कब और किस क्रम में थाने पहुँचता है।

समझावन सबसे बाद में थाने पहुँचा था। इसके पीछे आत्मरक्षा का एक अर्द्धचेतन भाव था। उसकी जगह अधिकांश लोग भी यही करते। इससे पहले वह तमाम सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा चुका था। इतनी बार कि वह यह भूलने लगा था कि वह कहाँ कहाँ जा चुका है और कहाँ नहीं। ऐसे अवसरों पर, जब वह कृतसंकल्प कदमों से किसी सरकारी कार्यालय में प्रवेश पाने के लिए निकलता, उसके हाथ में एक थैला होता था। चूँकि तेज गर्मी के दिन थे और बिना किसी पूर्व आहट के यदाकदा मूसलाधार बारिश हो जाया करती थी, वह एक छतरी अपने पास रखता था। सूरी भाई से उसने इन दिनों साइकिल माँग ली थी। साइकिल के पीछे कैरियर में उसका एक छोटा सा टिफिन लगा रहता था। पिछले नौ सालों से तुलसी एक नित्यक्रम में कभी नागा नहीं करती थी। समझावन चाहे जब, जितनी जल्दी काम पर निकले, वह चार परांठे, अचार की दो फाँक और एक सूखी सब्जी उसे टिफिन बाक्स में देना नहीं भूलती थी। कंपनी का काम और सरकारी कार्यालयों में पूछताछ, ये दोनों चीजें आपस में अजीब तरह से गड्मड् हो गई थीं। अक्सर यह होता कि वह रूट प्लान के काम के लिए घर से निकलता, रास्ते में कोई सरकारी कार्यालय दिख जाता और वह पूछताछ के लिए वहाँ पहुँच जाता। पर गनीमत है इसका उल्टा भी हो जाता था, इसलिए काम में ज्यादा विघ्न नहीं पड़ा। बल्कि इस गड्मड् में कुछ लाभ भी हुआ जिसका असर कालांतर में मिलेगा। समझावन ने सरकारी दफ्तरों के आसपास कूड़े कचरे के बहुत से नायाब, महत्वपूर्ण और अज्ञात रास्ते, स्रोत और निकास पाए। उसके लिए यह सुखद आश्चर्य था कि लगभग सभी सरकारी दफ्तरों से काफी समृद्ध और प्रचुर मात्रा में कचरे का निकास था, हालाँकि उसमें कागज की मात्रा सबसे अधिक थी। कभी कभी उसे शक होता कि कचरे का रूट, हो न हो, इन सब सरकारी कार्यालयों के सामने और निकट से ही बनेगा। एक बार हल्के क्षणों में रात को उसने तुलसी से कहा, 'सरकारी कार्यालय का रास्ता मालूम करना हो, या कचरा बीनने जाना हो, दोनों के लिए नक्शा एक ही है।'

वह कपड़े का थैला समझावन की वेशभूषा का अंतरंग हिस्सा बन गया था। मटमैले रंग का थैला जिस पर काली धारियाँ हैं। घर से बाहर अब वह हमेशा उसे पहने रहता था। कंधे पर एक क्रास के रूप में जैसे भिश्ती मशक लिए चलता है या अमीन सीने पर क्रास बेल्ट पहनता है। झोलाधारी - कई बार सड़क पर, दफ्तरों में लोग, यहाँ तक कि बच्चे उसे इस नाम से पुकार देते थे। थैले में खाली कागज थे, दो बाल पाइंट पेन जिनमें एक काम करता था, हमेशा एक भूरे लिफाफे में जिस पर उसका नाम स्पष्टता से अंकित होता था - काली या नीली स्याही से या टाइप किया हुआ या एक चौकोर प्रिंटेड सफेद कागज जो लिफाफे पर चिपका होता था। लिफाफे पर कभी डाकघर की मोहर होती कभी नहीं, एक नंबर भी उस पर अंकित होता था, कभी 1927, कभी 253, कभी कुछ और। लिफाफा एक खामोश, अनचाहे तोहफे की तरह सदा दरवाजे के भीतर फर्श पर पड़ा मिलता था। मानों वह हमेशा से वहीं पड़ा हो या फर्श के नीचे से कहीं उग आया हो : चुपचाप, निरंतर, निर्जनता के क्षणों में, एक अजीब हठ की तरह। लिफाफा कभी समझावन को दिखता, कभी तुलसी को, दिन में, रात में, किसी भी वक्त। अक्सर यह होता कि उनमें से कोई बाहर निकल रहा होता या अंदर आ रहा होता तो लिफाफे पर पैर पड़ जाता था। और हर बार आश्चर्य से वे उसे देखते, फिर नीचे झुक कर उठा लेते। अगर लिफाफे मिल रहे थे तो जाहिर है कोई उन्हें भेज रहा था।


अफसर जिसका पहला नाम जगत था, और व्याप्ति, एक जवान, उद्दीप्त पत्रकार, जो अपने व्यवसाय में पहले कदम बढ़ा रही थी, पहली मुलाकात के शुरुआती क्षणों में ही तूफानी प्रेम में बँध चुके थे। यह पहली नजर का प्यार नहीं था। उसके लिए निर्दोष मन और आदर्शों की नादानी जरूरी है जो उनके पास नहीं था। पर यहाँ मिलन से भी पहले एक अलौकिक उन्माद उनकी किस्मत में लिख चुका था। जब उनकी नजरें पहली बार मिलीं, यह पूर्वज्ञान उनकी आँखों और दिलों में समाया हुआ था। वे इस तरह साथ आए जैसे एक दूसरे के लिए बने हों। वे टेबिल के एक तरफ पास पास बैठे थे और अफसर उसे प्रोजेक्ट के बारे में बता रहा था। नोटबुक पत्रकार की गोद में रखी थी, वह नोट्स ले रही थी। उनकी बाँहें छू रही थीं, उनके दिल दौड़ रहे थे।

' Advanced Research in communication technologies to facilitate the citizen govt. inter-face. यह प्रोजेक्ट का टाइटिल है।' अफसर ने बताया, ' इंटरफेस जिसे मैं स्पर्श सतह कहता हूँ, जैसे हमारी बाँहों की सुलगती, छूती सतह' वह बोला। फिर वह नागरिक सरकार इंटरफेस के बारे में अपनी प्रिय थ्योरीज के बारे में बताने लगा। वह उसे मैडम की जगह डार्लिंग पुकार रहा था। बोलते हुए वह उसकी वजनी साँसों को महसूस कर रहा था जो उसकी गर्दन के एक हिस्से में गर्म गोले बना रही थीं।

' मेरी चाँद, मेरी जान, क्रिटिकल चीज ये है कि सामान्य नागरिक को, हर नागरिक को लोक प्रशासन के केंद्र में, उसके कढ़ाए में कैसे खींचा जाए। यह कढ़ाया क्या है? यह तैयारी है, जलसा, निर्माण और बनना है, सामूहिक कार्य और अनुभव, सपने देखना, साझा विचार, हमारे देश की भव्य लोकतांत्रिक प्रशासन व्यवस्था के लिए। सबसे सरल और सबसे बढ़िया परिभाषा को नहीं भूलना चाहिए। जनता का प्रशासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए।'

वह फुसफुसाई, ' जैसे हमारे प्यार का इजहार हम दोनों के लिए, हमारे द्वारा, सिर्फ हम।' वह झंकृत हो गया। पत्रकार की नंगी पिंडलियाँ उसकी टाँग दबा रही थीं और उसके महीन बाल अफसर के शरीर में स्थिर विद्युत पैदा कर रहे थे।

' बहुत समय से, बहुत सारे लोग, शासन से दूर हैं। हम इसमें क्रांतिकारी बदलाव कर रहे हैं और एक तरह से सरकारी कार्यालयों को जनमानस को सौंप देना चाहते हैं।'

वह पास सरक आई, उसकी बातों में मशगूल होने का बहाना कर रही थी : ' पहला कदम यह है कि हम जानें हमारा सरोकार किससे है। हमें अपने क्लायंट यानी आम नागरिक का प्रोफाइल बनाना होगा, People's database और हमारा यह प्रस्ताव है कि जनता को इस प्रोजेक्ट में शामिल करने के लिए हम उन्हें स्वागत मेल भेजेंगे।' एक गहरे, काँपते आवेश के क्षण में वह उस पर झुक गई और उसके कान के मुलायम कोने पर अपने दाँत गड़ा दिए। एक सुखद, तीव्र दर्द से अफसर की साँसें लड़खड़ा गईं। वह एक खिंची स्प्रिंग की तरह व्याकुल हो गया था। अगली लाइनें उसे लगभग चीखते हुए कहनी पड़ीं, ' अगर बीमा कंपनियाँ, बैंक और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ नागरिक को अपने मेल और प्रोडक्ट में डुबो सकती हैं, तो हम क्यों नहीं, आखिर हम सरकार हैं, हमारी पहुँच बड़ी है, हमारे लक्ष्य उदात्त हैं।'


जब पहली बार लिफाफा मिला तो यह समझावन और तुलसी के लिए अजीब और अनूठा था। जिंदगी में इससे पहले उन्हें कोई पत्र नहीं मिला था। न ही उन्होंने कभी किसी को लिखा था। कोई था ही नहीं जिससे पत्राचार करें। जरूरत भी नहीं थी। यह क्या बला है समझावन ने सोचा जब उसने पहली बार लिफाफा देखा और भीतर का कागज देखा जिसमें सबसे ऊपर टंकित था : नोटिस! दूसरा सवाल उसके मन में आया कि यह नोटिस उसके घर पहुँची कैसे लिफाफे पर उसका नाम और कच्चा तालाब कालोनी लिखा था। तो क्या डाकिए ने उसका मकान पूछा होगा इस कालोनी के मकानों में कोई नंबर नहीं है। नगर निगम के मास्टर प्लान में यह जगह एक तालाब के नाम से दर्ज है, बरसों पहले, आजादी के पूर्व यहाँ, जैसा कुछ लोग बताते हैं, एक छोटा सा तालाब था जिसमें कभी कभार लोग मछली पकड़ने आते थे। वक्त गुजरा, तालाब सूख गया, मिट्टी भराई कर लोगों ने मकान बनवा लिए जो अनियमित थे। इसलिए सड़कों और मकानों को नाम और नंबर देने का कोई विधिवत तरीका नहीं था। हालाँकि हर चौराहे और हर मौकापरस्त खुली जगह में मूर्तियाँ स्थापित हो गई थीं। यहाँ के लोग अक्सर राहगीरों को मूर्तियों का वास्ता देकर रास्ता बताया करते हैं। समझावन ने तुलसी से कहा कि वह पता करे क्या इस तरह के लिफाफे आसपास किसी और को भी मिले हैं और क्या डाकिए ने उनका पता पूछा था। अगले कुछ दिनों में यह ज्ञात हुआ कि ऐसे लिफाफे किसी और को नहीं मिले हैं और अकेला समझावन ही इस इलाके में ऐसा है जिसे करीबन हर हफ्ते एक लिफाफा फर्श पर पड़ा मिल रहा है, निरंतर, बिना नागा। समझावन स्थानीय डाकघर गया।

उसके बाद क्षेत्रीय डाकघर में जाकर पूछताछ की। प्रधान डाकघर का भी उसने एक चक्कर लगाया। हैरत और मूढ़ता से उसने देखा कि हजारों, लाखों की संख्या में पत्र, पार्सल, पेटियाँ एक डाकघर से दूसरे, एक शहर से दूसरे शहर रोज आती जाती हैं। गोदामों और पार्सल वैन में उनकी लदान और ढुलाई का काम दिन रात चलता रहता है। उसे वह डाकिया मिला जो कच्चे तालाब कालोनी के क्षेत्र में डाक बाँटता था। डाकिया उसकी बात ध्यान से सुनता रहा, फिर उसने कहा, 'देखो भैया, अगर तुम्हारे नाम और पते की डाक हमारे यहाँ आती है तो मैं उसे पहुँचा देता हूँ, यह डाक कौन भेजता है यह मैं कैसे बता सकता हूँ, यह तो तुम्हें मालूम होना चाहिए।' जब समझावन ने उसे लिफाफे और नोटिस दिखाए तो उसने बताया कि इनमें से कुछ लिफाफे ऐसे हैं जो डाकघर से उसके यहाँ पहुँचे हैं। क्योंकि उन पर डाक विभाग की मोहर लगी है। बचे लिफाफों के बारे में उसने बताया कि चिट्ठियाँ किसी व्यक्ति या कूरियर कंपनी के जरिए आई होंगी। आगे के दिनों में अनेक बार समझावन ने इस डाकिए का पीछा किया। वह न जाने क्यों अपनी आँखों से डाकिए को लिफाफा लाते और उसे डालते देखना चाहता था। पर उसे सफलता नहीं मिली। ये नोटिसें कौन लाता है कब डाल जाता है ये पत्तों की तरह झर कर तो नहीं आ सकतीं, हवा के साथ उड़ कर तो नहीं आ जातीं। यह सब जानना एक सनक का रूप ले चुका था। दिन में समझावन के बाहर जाने के बाद तुलसी खूब देर तक दरवाजे की ओट में खड़ी रहती, कभी छिपी रहती। रसोई में काम करते, मसाला, पीसते, कपड़ा सुखाते, हल्के खड़के की आवाज पर वह दरवाजे तक दौड़ी चली आती। इतवार के दिन समझावन बाहर कुर्सी डाल कर बैठ जाता। रात में उसकी नींद अनेक बार उचट जाती। उसके मन में आशंका होती थी कि कहीं से नोटिसें रात में तो नहीं आते। पर वे उस अज्ञात पल को कभी पकड़ नहीं पाए, जब वह लिफाफे बाहर से भीतर आते थे। हर बार लिफाफा अप्रत्याशित रूप से पड़ा दिखाई देता था। वो कभी जान नहीं पाए यह कहाँ से, कैसे पहुँचा है और तब उन्हें लगता था कि पता नहीं यह कब से यहाँ सामने आँखों के सामने पड़ा है।

देश और विदेश में ऐसी विशेषज्ञ संस्थाओं और फर्मों की संख्या बढ़ती जा रही है जो संरचना और आँकड़ों का व्यापार करती हैं। यह साफ हो गया है कि इनसान जितना जानता है, हमेशा उससे अधिक वह जानना चाहता है। इस वजह से न केवल ऐसी फर्मों का उत्पादन बढ़ रहा है बल्कि इनकी नई और एकदम कल्पनाशील किस्में पैदा हो रही हैं। यह सूचना और आँकड़े न केवल आर्थिक संसार की एक विशिष्ट वास्तविकता रचते हैं, वे मनोरंजन और उपयोग के रसीले और चटपटे साधन बन गए हैं। और विकास का एक पैमाना यह भी है कि इनसान की कुल भूख का कितना औसत अंश आँकड़ों और सूचना की भूख है। इस लिहाज से समझावन से जुड़े आँकड़े भी एक संभावित प्रोडक्ट हैं जिनका बखूबी व्यापार किया जा सकता है। कौन जानता है, उसका केस एक मिसाल बन जाए, एक लाजवाब स्टोरी इस प्रोडक्ट की प्रेजेंट वैल्यू आँकने के लिए लेकिन रिस्क और रिसर्च दोनों की जरूरत होगी।

आँकड़े : विगत नब्बे दिन में बावन दिन ऐसे थे जब समझावन ने नोटिसों के बाबत सरकारी मशीनरी के चक्कर काटे। इस अवधि में उसने तेइस अलग अलग सरकारी विभागों से संपर्क कायम किया, वहाँ वह कई कई बार गया और इसमें अभी पुलिस विभाग शामिल नहीं था। हालाँकि इन कार्यालयों के नाम उसकी स्मृति में धुँधले पड़ गए हैं। जब विजय प्रकाश इस मामले की छानबीन करेगा, समझावन ये नहीं बता पाएगा कि वह कब कब किस किस सरकारी दफ्तर में गया था, और क्यों गया था इसका सुस्पष्ट जवाब देने की स्थिति में भी वह नहीं होगा। लेकिन सरकारी दस्तावेज और फाइलें पूरे घटनाक्रम को स्थापित कर देंगी। क्योंकि बहुत से सरकारी कर्मचारियों के बयान अंकित किए जाएँगे, उनके पास सबूत और साक्ष्य के रूप में मोटी मोटी फाइलें होंगी। समझावन उन कर्मचारियों की तसदीक करेगा क्योंकि वह उनसे मिल चुका है पर यह ठीक से बताने में वह असमर्थ होगा कि उसके इरादे, उसके मंतव्य क्या थे। और यह निस्संदेह रूप से सिद्ध हो जाएगा कि समझावन का आचरण सदा संदिग्ध था और उसका हर बयान विरोधाभासों से भरा है। और केस फाइल में यह टिप्पणी रिकार्ड की जाएगी : यह संभावना से परे है कि एक आदमी को इतने भिन्न भिन्न प्रकार के कार्यालयों में जायज और औचित्यपूर्ण कार्य हो सकते हैं। तथ्यों और अभिलेखों से और स्वयं आरोपी के बयान से यह स्पष्ट होता है कि वह जन्म-मृत्यु पंजीकरण विभाग, बाँट माप निदेशालय, आपूर्ति कार्यालय, निर्वाचन विभाग और नगर निगम जैसे असंबद्ध कार्यालयों में घुसपैठ करता रहा, उसका यह आचरण संदिग्धता की परिधि में आता है और आरोपी इस विषय में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे पाया...।

नौ कार्यालय ऐसे थे जिनमें समझावन पास न बन पाने के कारण घुस नहीं सका था। अगर वह उनमें प्रवेश करने में कामयाब हो जाता तो उसका केस और खराब हो जाता।

और इस प्रक्रिया में, जब इतना कुछ हो रहा है, आश्चर्यजनक तरीके से सबसे महत्वपूर्ण चीज से ध्यान छिटक गया है। मानों वह प्रश्नातीत है। और हैरत की बात यह है कि यह एकदम सहज और स्वाभाविक लगता है। इस कारण समझावन भी अनजाने ही दूसरी राहों पर निकल गया है। कपड़े के थैले में नोटिसें भूल से सबसे नीचे रखी पाई जाती हैं। उनके ऊपर तमाम कागज और दस्तावेज इकट्ठे हो गए हैं। जैसे सरकारी दफ्तरों के पास की पर्चियाँ, समझावन को आगाह किया गया था कि पास की रसीदें हमेशा अपने पास रखे, खोए नहीं, एक तो अगली बार पास बनवाने में आसानी हो जाती है, दूसरे ये रसीदें कभी कभी कानूनी मामलों में महत्वपूर्ण साक्ष्य का काम करती हैं, यह बात समझावन समझ नहीं पाया था और बहुत से आवेदनपत्र हैं, उनकी कापियाँ और उनकी पावतियाँ हैं, एक क्लर्क की सलाह पर समझावन ने पावतियों को संबंधित आवेदनपत्र की कापी के साथ पिन से जोड़ दिया था, बहुत सी पिन थैले में इकट्ठी हो गई थीं और समझावन के लिए मुसीबत बन गई थीं। जब भी उसे दफ्तर में जल्दी से कोई कागज या नोटिस निकालना होता, क्योंकि संबंधित क्लर्क का ध्यानाकर्षण ज्यादा देर तक बनाए रखना कठिन है, वह थैले में अधीरता से हाथ खोंस देता, संबंधी कागज मिले न मिले, एकाध पिन उसे जोर से चुभ जाती और वह कराह उठता था। आवेदन पत्रों के अलावा बहुत से अनुस्मारक भी थे।

शुरू में वह आवेदन नहीं लिखता था। अगर किस्मत अच्छी होती और पास बन जाता, तो वह सहमा सा सरकारी कार्यालय में घुसता था। फिर वह धीरे धीरे पूरे दफ्तर का एक चक्कर लगाता। ऐसा नहीं है कि उसके पास फालतू टाइम था और वह मौज के लिए वहाँ घूम रहा था, इससे पहले वह निश्चित कर पाता कि वह क्या करे, कहाँ रुके, किससे कहे और क्या कहे, एक चक्कर पूरा हो ही जाता था। अजीब बात ये थी कि वहाँ कभी तो उसे अथाह भीड़ दिखाई देती और कभी वे दफ्तर उसे लगभग खाली से लगते। ऐसी बदल जाती स्थितियों से वह घबरा जाता और उसकी सारी पूर्व योजना धरी की धरी रह जाती। वह यह बात नहीं कह सकता और इसके मतलब भी उसके दिमाग में साफ नहीं हैं, पर उसने अहसास किया कि इन दफ्तरों में एक गहरी और प्राचीन निश्चयात्मकता है; स्वतः पूर्णता का स्पष्ट भाव, स्वावलंबन का, स्वतंत्र और एकाकी होने का मानों उन्हें किसी और से कोई मतलब ही नहीं है, लिहाजा इन कार्यालयों की सृष्टि और संरचना में कहीं कुछ ऐसा नहीं था जो एक आगंतुक के लिए जगह बनाए या उसका स्वागत करे। वस्तुतः उसके लिए कोई आधिकारिक जगह नहीं थी, ऐसा लगता वह अपने रिस्क पर यहाँ पहुँचा है। चलते हुए, खड़े हुए समझावन को लगता था जैसे एक झीना सा परदा हमेशा उसके आगे रहता है और अगर वह पीछे मुड़ कर देखेगा तो वह पीछे भी होगा और इस तरह दफ्तर का हर कर्मचारी इस परदे की ओट में है और इस परदे की अपनी रफ्तार और अपने नियम हैं, उसने कुछ भी विपरीत किया तो वह इस परदे में फँस कर रह जाएगा। यह परदा छूने में मकड़ी के जाले सा लगता है, इस कारण समझावन ने इस झीने परदे की मर्यादा को हरदम निभाया। झीने परदे के अलावा उसके पास थैला, टिफिन और छतरी भी होती थी, जिन्हें वह साइकिल पर नहीं छोड़ सकता था, कुल मिला कर यह स्थिति बन जाती कि उसके हाथ भरे थे, झीने परदे की दिक्कत थी, इन सबको एक साथ निभाने में काफी समय निकल जाता था, दफ्तर का समय अधिकतम दस से पाँच होता है और उसकी उलझनों को देखते हुए यह समय बहुत कम प्रतीत होता था।

शुरू के दिनों में वह बस इतना चाहता था कि कोई उसे इतना बता दे कि ये नोटिसें उसे किसने भेजी हैं और इनका अर्थ क्या है। बस इतनी जिज्ञासा थी, इसके आगे कुछ नहीं सोचा था। बल्कि जब पहली नोटिस मिली थी तो उसे और तुलसी को एक पल के लिए सुखद आश्चर्य हुआ था कि उनके पास भी कोई पत्र भेज सकता है। पर आश्चर्य की बैकग्राउंड में एक आशंका की छाया भी थी जो आई और चली गई। समझावन ने दो तीन बार नोटिस को पढ़ा। उसे कुछ समझ में नहीं आया। तीसरी बार उसने अक्षर अक्षर उँगलियों से छूते हुए पढ़ा और मिटे, अस्पष्ट शब्दों और लाइनों को अंदाजे से भरने की कोशिश की। पर उससे कुछ फायदा नहीं हुआ। नोटिस भेजने वाले का नाम और पता मिटा था। मिटा था, मिटाया गया था या वह लिखा ही नहीं गया, कहना मुश्किल है। बीच बीच में कुछ शब्द और पूरे वाक्य नहीं थे। फिर भी, अजीब और हैरत की बात यह थी कि नोटिस अधूरी थी, किसने भेजा है, क्यों भेजा है, प्रयोजन क्या है कुछ भी जानकारी नहीं थी, लेकिन उसका संदेश साफ और प्रत्यक्ष लगता था। इसका ज्ञान समझावन को तब हुआ जब उसे दूसरी नोटिस मिली।

क्योंकि पहले नोटिस में कोई खास सूचना नहीं थी, वह अधूरी और अस्पष्ट थी, और पूरी तरह अप्रत्याशित था, समझावन की रोज की जिंदगी में ऐसा कुछ नहीं था जिससे वह इसे जोड़ सके, ऐसे मामलों में अनुभव न होने की वजह से वह किंचित लापरवाह भी था, और उसे पता भी नहीं था उसकी क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए, उन दिनों रूट प्लान का काम पूरे जोरों पर था, उसकी सारी ऊर्जा उसमें लगी थी, और सूरी भाई के साथ शराब पीते हुए वह बेतकल्लुफ हो गया था, वे श्मशान वाले कूड़ाघर के बगल में बैठे थे, उनका दिन बहुत सफल और अच्छा गुजरा था, सूरी ने उसका मजाक उड़ाया और कहा कि साले तू बड़ा तीसमारखाँ समझता है अपने को, तीसमारखाँ है या गधा, एक कबाड़ी से सरकार का क्या लेना देना। समझावन ने ठहाका लगाया था, उस शाम समझावन बहुत खुश था, घर पर तुलसी इंतजार कर रही थी, उसने आलू का झोल बनाया होगा और उसे बहुत भूख लगी थी, दिन भर वे स्कूटर पर घूमे थे और उनका पहला रूट प्लान करीब करीब तैयार हो गया था, लिहाजा उसने पहले नोटिस का वह कागज आग में फेंक दिया था। उसका कृत्य सरस, बालसुलभ और दोषरहित था, पर वह एक भयानक भूल भी थी।

तंत्र का अपना जीवन है, अपने नियम हैं। वह एक विशाल साँप है जिसके असंख्य घेरे, चक्कर और कुंडलियाँ हैं और वो जमीन की हर इंच पर रेंगता है। वह फुफकारता है, फन उठाता है, डसता है, उसे खुराक चाहिए और प्रयोजन। इसलिए वह सदा व्यग्र और बेचैन है, ताक में। बहुत कम जमीन बचती है जहाँ पैर रखने की जगह है और अगर किस्मत उम्दा है, तब इंच भर जमीन मिल जाती है, और पंजे के बल खड़े होने का साहस पैदा हो जाता है। तो बस इतना ही संभव है कि नियमों का पालन करते हुए किसी तरह इंच भर जमीन पर पंजों को जमाए रखा जाए, और तब, अनजाने ही चाहे, अगर कोई भूल होती है जो दोषरहित है, या किसी अनावश्यक, अनजान नियमों को नजरअंदाज किया जाता है, चाहे उसकी जानकारी किसी को भी न हो, या किसी संकेत या संदेश को अनदेखा किया जाता है, चाहे वह धुँधला या अदृश्य ही क्यों न हो, वह कुंडली अपना शिकंजा कसना शुरू करती है, पास और पास। वह दंड दे रही है क्योंकि भूल का कोई समाधान नहीं है, अनदेखी का कोई निवारण नहीं, और अंतिम क्षण और साँस में यह अहसास होता है कि वह साँप, उसकी फुफकार और उसके रेंगते शल्क तुमसे पूरी तरह अनभिज्ञ और असंपृक्त हैं।

तीन महीनों में समझावन को बीस नोटिसें मिलीं, हो सकता है दो एक कम या ज्यादा। बाद के दिनों में उसने गिनती रखनी भी बंद कर दी थी और शायद अंत के दिनों में वह लिफाफा खोलना भी भूल जाता था। वह उन्हें उठा कर थैले में रख लेता था मानों वह इन्हें प्राप्त करने और ढोने के लिए ही पैदा हुआ है। वे सब सही सही नोटिस भी नहीं थीं। उनमें कई अलग अलग किस्म के पत्र थे। कुछ का स्वरूप विज्ञप्ति की तरह था और कुछ इस तरह मानों कोई अधिसूचना हो। समझावन को इतना जरूर आभास था कि ये जो भी हैं, महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि उनकी प्रतियाँ बड़ी संख्या में विभागों, अनुभागों, सेल और कार्यालयों को पृष्ठांकित थी। अगर एक नोटिस की इतनी प्रतियाँ इतनी जगह भेजी जा रही हैं तो निश्चित ही उसका काफी महत्व है। एक व्यावहारिक दृष्टिकोण से और एक पावक की नजर से उन सब को नोटिस कहना भी अनुचित होगा, क्योंकि स्पष्टतः वे सभी समझावन को संबोधित थे और बड़ी गंभीरता से उसका ध्यान किसी विषय की ओर आकृष्ट कर रहे थे। उनमें से कुछ में, दूसरे, शायद पहले भेजे गए पत्रों के संदर्भ भी थे और कुछेक तो साफ तौर पर अनुस्मारक ही थे। जो भी भेज रहा था, वह गंभीर था, कर्तव्यनिष्ठ था निरंतरता में निष्ठुर।


अफसर हमेशा बहुत जल्दी में रहता था। जब वह खड़ा होता या चलता या चाय की प्याली में शक्कर हिलाता तो उसे लगता था समय नष्ट हो रहा है। किंतु अब पत्रकार के संग में सदा मौजूद कामुकता की तरंग ने उसमें कुछ ठहराव पैदा किया है, शांत ज्वालामुखी की तरह जो भीतर भीतर उबलता रहता है। उस दिन, पूरे समय, लगभग तीन घंटे उनके हाथ आपस में गुँथे रहे। लगातार वे एक दूसरे की हथेली मसल रहे थे। अफसर ने कुछ क्षण पत्रकार की उंगली को अपने होठों के बीच सोख लिया, मानों भीतर का कुछ पी रहा हो, सामर्थ्य या तृप्ति, फिर कहा, ' जाने जिगर, प्रशासन की स्वच्छता समानता और सहभागिता के दो गोलों पर टिकी है।' अचानक उसकी नजर पत्रकार के सीने पर हल्के से झूलती दो गोलाइयों पर सिमट आई : ' इनके बिना प्रशासन में भ्रष्टाचार और शोषण की कीचड़ हमेशा रहेगी। तंत्र और नागरिक के बीच संपर्क की खिड़की इनसानी कद की होनी चाहिए। एक नए अनुमान के अनुसार हमारे प्रदेश में जनता सरकारी तंत्र के रोजाना 3 लाख दस हजार चिट्ठी लिखती है, यानी एक साल में 11 करोड़ साढ़े इकत्तीस लाख पत्र। यानी एक साल में 2000 पृष्ठों की 5 लाख 70 हजार किताबें, ऐसी लाइब्रेरी की कल्पना करो, इन किताबों को सिर्फ रखने के लिए इस साइज के 1140 कमरों की जरूरत होगी। मतलब 11 मंजिलों की पाँच इमारतें! जरा कल्पना करो इस विशाल लाइब्रेरी में तंत्र के प्रति जनता की अपेक्षाओं, आशंकाओं, मजबूरियों और जरूरतों के माँग पत्र दफन हैं।' कल्पना से पत्रकार की आँखों में एक गुलाबी छाया गहरी होती जा रही थी। एक विशाल लाइब्रेरी जहाँ असंख्य किताबों और उनकी मादक सुगंध के बीच सिर्फ वे दो थे। कागजों की सेज पर वे अनवरत, दिनों रात प्यार कर रहे हैं...। यह अहसास अफसर तक भी पहुँचा, अपने लाल गर्म कानों को मसलते हुए वह बोला, ' इसके विपरीत प्रशासन तंत्र एक दिन में औसतन एक लाख पंद्रह हजार चिट्ठियाँ जारी करता है। और इनमें से अस्सी हजार पत्र वो होते हैं जो एक तंत्र दूसरे तंत्र को लिखता रहा है। बचे 35000 पत्रों में 25000 चिट्ठियाँ वो हैं जो कानूनी नोटिस, सम्मन या स्मरणपत्र हैं। यह आँकड़े सिद्ध करते हैं...।' अफसर की आवाज थोड़ी काँपने लगी थी, ' कि प्रशासन तंत्र और आम नागरिक के बीच संपर्क और संप्रेषण में भयानक असमानता है। यह तंत्र इतना बड़ा और विस्मयकारी है कि करीब 80 प्रतिशत समय यह आपस में बातचीत करता है और जनता के प्रति इसका रिस्पांस सिर्फ 3.2 प्रतिशत है। यानी एक नागरिक की अपेक्षाओं, जरूरतों और सवालों की गठरी 96.8 प्रतिशत अनुत्तरित रह जाती है। सोचो, इस कारण विषमताओं, असंतोष और विकृतियों का कितना बड़ा समुद्र सृजित हो रहा है।' बहुत देर बाद अफसर ने पत्रकार की आँखों में देखा था। गुलाबी रंग में आग के शोले से धधक रहे थे। इस बार पत्रकार ने उसकी उंगली को अपने होंठों में दबा लिया। उसकी जीभ उस पर नर्तन कर रही थी और उसके नथुने जैसे किसी उबाल की प्रतीक्षा कर रहे थे। पत्रकार ने सोचा हम दोनों के बीच कोई असमानता नहीं है। संपर्क और संप्रेषण पूरे सौ प्रतिशत है। यह संसर्ग है, मिलन है गहरा। हमें कुछ लिखने की भी जरूरत नहीं है, न कहने की। हमारा उफान इतना तीव्र और घना है, आकर्षण इतना गहरा और अभेद्य है कि हम हर स्तर पर, हर रेशे और गुफा में, हर कण और दशा में एक दूसरे में समाए हैं, एकाकार हैं।


उन नोटिसों में कुछ चीजें अद्भुत रूप से एक समान थीं। पहली यह कि प्रेषक का नाम और पता या तो नहीं था या अस्पष्ट और मिटा हुआ था। दूसरी यह कि उनमें तमाम चीजें लिखी थीं जिनमें धाराओं, अधिनियमों, नीतियों, उपविधियों और राज्य व्यवस्थाओं का भरपूर उल्लेख था, पर उनकी अंतर्वस्तु एकदम अज्ञात और अस्पष्ट थी मानों हो ही नहीं। तीसरी यह कि हर नोटिस में उसे उपस्थित होने के निर्देश दिए गए थे। तिथियों और कमरों का विवरण था। कुछ में यह उल्लेख था कि दिशा निर्देश संलग्न हैं या कहीं से सशुल्क या निःशुल्क पाए जा सकते हैं पर पता कहीं अंकित नहीं था। और चौथी नोटिसों की भाषा और संकेत। हर नोटिस में समझावन को लगा जैसे एक हाथ की उंगली उसकी तरफ इशारा कर रही है। और इसके साथ ही किसी और तरफ भी संकेत कर रही है। जैसे इन सबके पीछे और छिपा हुआ, अज्ञात और अनजान, कोई आरोप या दोष है; कोई भार या अभियोग या उत्तरदायित्व जिसका संबंध समझावन और सिर्फ समझावन से है।

इन स्थितियों से भी समझावन निपट लेता। आखिर वह कूड़े कचरे का बाजीगर है। बचेकुछे का, व्यर्थ और फिजूल का, अपशिष्ट और छिपे का, पीछे छूटे का मर्मज्ञ है। सहचर और जानकार। अज्ञात गुफाओं और गुप्त रास्तों को बूझना उससे बेहतर कौन जानता है। फिर उसका सीना फौलाद का है और उसके पास अपार धीरज है। जैसे सूरी भाई ने एक दिन बहुत तंग आकर कहा, 'ऐसा धैर्य और संतोष एक कबाड़ी में ही हो सकता है जो यह मानता है कि ढूँढ़ने पर गोबर में भी गुड़ की डली मिल जाती है और कब्र के पत्थर पर कभी कभी गुलाब के फूल उग जाते हैं!' वह डरपोक नहीं है। निराशावादी नहीं है। जल्दी से मन नहीं हारता। विपत्तियों से हमेशा लड़ता है, उनका सामना करता है। वह आत्मनिर्भर है। वह गलत काम नहीं करता, दूसरों को धोखा नहीं देता। पर जिस चीज के सामने उसने अपने आप को निहत्था महसूस किया, वह नोटिस की भाषा भी थी और वह संदेश या संकेत जो उसे उंगली से इशारा करते हाथ की तरह दिखाई दिया था।

न्याय की संकल्पना में अभियोग सर्वोपरि है। प्रतिरक्षा की जगह पीछे या नीचे है, अधिकतर कटघरे में। काफ्का ने तो यहाँ तक कहा था कि विधि की मुखाकृति में प्रतिपक्ष के लिए कोई जगह ही नहीं है। इस अवधारणा में विपरीत पक्ष सिर्फ न्याय की तथाकथित रहनुमाई का गोल घेरा पूरा करता है। उसके जिम्मे बचाव, सफाई और प्रतिवाद हैं जिनका तरीका निवेदन है, रहम की भीख है। तभी नोटिसों की भाषा, परंतुकों के जाल से लैस, एकपक्षीय और पूर्व नियत है। और इसलिए पूर्वलिखित भी - पहले से छपे नोटिस के प्रारूप सिर्फ हाँ या ना, टिक या क्रास की निशानदेही की गई है। हजारों वर्षों के प्रयास से न्याय की भाषा को इस तरह विकसित किया गया है कि उसमें व्यक्तिपरकता और आत्मनिष्ठा का एक अंश भी न रहे। इसका क्रूर, अनचाहा परिणाम यह था कि जहाँ नोटिसों में विधि और उपविधियों के व्यापक वर्णन थे, उन्हें समझावन से जोड़ने की कोई चेष्टा नहीं की गई थी। शायद इसकी जरूरत ही महसूस नहीं की गई जिसका आधार शायद यह हो कि वह स्वतः स्पष्ट है और उसका अलग से उल्लेख करना अनावश्यक और समय की बरबादी है। शायद इतना ही काफी था कि नोटिस समझावन को भेजे गए हैं।

'भेजे नहीं गए हैं, तुम्हें प्राप्त हुए हैं।' एक सरकारी कार्यालय के एक क्लर्क ने उसे एक दिन समझाया। वह समझावन को उसके केस के बारे में सलाह दे रहा था, उसकी शंकाओं का समाधान कर रहा था। इस सहायता के लिए समझावन ने उसे सौ रुपये नकद अदा किए थे। क्लर्क ने कहा, 'देखो, ये पत्र नहीं है और न ही ये कोई निमंत्रण है जिन्हें तुम अपने हिसाब से स्वीकर या अस्वीकर कर सकते हो। नोटिस भेजा नहीं जाता, वह जारी किया जाता है, समझे, जारी। जैसे आदेश या ज्ञापन जारी किए जाते हैं। जहाँ तक सरकारी दफ्तर की बात है, उसके लिए इतना काफी है कि नोटिस तुम्हारे नाम जारी कर दिया गया है। बल्कि इस मामले में तो सामान्य से ज्यादा सावधानी बरती है कि एक नहीं कई नोटिसें जारी की गई हैं। और वो सब तुम्हें मिल भी गई हैं, तो अब सारी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है कि तुम क्या करते हो।'

'पर मैं क्या कर सकता हूँ इनमें तो ये भी साफ नहीं है कि ये किसने भेजे हैं और मुझे कहाँ उपस्थित होना है।'

'तो क्या हुआ उपस्थित तो होना है न। इस बात से तुम इनकार नहीं कर सकते।' क्लर्क ने समतल स्वर में कहा।

'हाँ, पर इनमें तो यह भी नहीं लिखा है कि मामला क्या है, कारण क्या है, आखिर इनका कोई मतलब तो होना चाहिए।' चूँकि समझावन ने फीस अदा की थी, वह ऐसे सवाल पूछने में संकोच नहीं कर रहा था। उनके बीच रिश्ते का एक तीसरा स्तर निर्मित हो गया था जहाँ समझावन को इजाजत थी कि वह अपनी मुश्किल, कुंठा, नासमझी, क्रोध और निराशा प्रकट कर सकता है।

'यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है मेरे दोस्त।' क्लर्क ने कहा, 'नोटिसों में सबसे बड़ी दिक्कत यह रहती है कि पाने वाले के नाम और पते सही नहीं होते, या सही अंकित नहीं किए जाते, तब एकपक्षीय कार्यवाही हो जाती है और बाद में पता चलने पर तमाम दिक्कतें पैदा होती हैं। यह तो अच्छा लक्षण है कि कम से कम तुम्हें नोटिसें प्राप्त हो गई हैं। भगवान का शुक्र मनाओ।'

समझावन ने करीब तीन घंटे तक इस क्लर्क से सलाह मशवरा किया। वे शुरू में एक अँधेरे गलियारे में खड़े थे, फिर कुछ देर पेशाबघर के सामने खड़े रहे, और सीढ़ियों के नीचे रखे लकड़ी के बक्सों पर भी कुछ देर बैठे रहे। बार बार, बीच में, क्लर्क उसका हाथ पकड़ कर उसे किसी दिशा में ले जाता। नतीजा यह था कि वह एक कठपुतली की तरह उसके पीछे, उसके साथ चल रहा था। क्लर्क ने स्पष्ट किया कि यह जरूरी नहीं है कि नोटिसों में दफ्तर का नाम और विषयवस्तु अंकित हो। आखिरकार वह, उसने समझावन की ओर हँसते हुए इशारा किया, इन नोटिस का जायज प्राप्तकर्ता है, इसके बारे में तो कोई शंका नहीं है और समझावन इस बात को स्वीकार करता है, तो जाहिर है, समझावन को सामान्यतः यह जानकारी होगी कि उसका मामला किस दफ्तर से संबंधित है और उसकी विषयवस्तु क्या है। और इस मौके पर क्लर्क के काले चेहरे पर कुटिलता की परछाईं अचानक उभर आई थी, उसने समझावन के सीने को उंगली से धकेलते हुये कहा कि समझावन के मामले में समझावन से बेहतर कौन जानकार हो सकता है। अगले आधे घंटे तक समझावन उसे यह जतलाने की कोशिश करता रहा कि उसे सच में नोटिसों की विषयवस्तु की कोई जानकारी नहीं है, उसे वास्तव में यह इल्म नहीं है कि ये नोटिस उसके पास कहाँ से आ रही हैं। 'यह कैसे हो सकता है।' क्लर्क एकबारगी खीज गया, 'आखिर अपने जाँघिया का रंग; पहनने वाला ही तो जानेगा।' इस जहमत में समझावन को उसे पूरी रामकहानी बतानी पड़ी। जहाँ शुरू में उसके बयान और दलीलों में स्पष्टता और एकरूपता थी, बाद में उसका स्वर दीन हो गया और तर्क धुंधले हो गए थे। मानों उसे खुद पर ही संदेह हो रहा हो, कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वह कुछ जरूरी तथ्य भूल गया है, क्योंकि इस मामले की शुरुआत से अब काफी दिन बीत चुके थे।

इस बीच, और समझावन को इसका ठीक से भान भी नहीं हुआ, वह अपनी समस्याओं में इतना उलझा और खोया हुआ था, क्लर्क ने समझावन से चाय और समोसे मँगवाए जिसे उसने टीन के एक टप्पर के नीचे खड़े होकर खाया पिया, उसके बाद सादा पान के आठ जोड़े मँगवाए, सारे पैसे समझावन अदा कर रहा था, फिर समझावन थक कर चुप हो गया था और खोए मेमने की तरह टुकुर टुकुर ताक रहा था।

'अब मुझे क्या करना चाहिए।' समझावन ने वही सवाल पूछा जो उसने साढ़े तीन घंटे पहले पूछा था और जिसका उत्तर उसे नहीं मिल रहा था।

'तुम्हें नोटिस का पालन करना चाहिए' क्लर्क ने तपाक से उत्तर दिया। फिर जैसे टीके के लगाने के बाद रूई के फाहे से सुकून दिलाया जाता है, उसने जोड़ा, 'अगर तुम नोटिस का पालन नहीं करते तो यह स्वयं में एक कानूनी गलती होगी और इस गलती के लिए तुम्हारे पास कोई बहाना नहीं होगा। अगर यह भी मान लिया जाए कि नोटिसें स्वयं में गलत हैं या गलती से तुम्हें मिली हैं, हालाँकि यह कहना सही नहीं हागा, बल्कि अगर यह सही हुआ कि इन नोटिस से तुम्हारा कोई सरोकार नहीं है और तुमने किसी नियम का कभी भी कोई उल्लंघन नहीं किया, जबकि इसे सिद्ध करना असंभव होता है, सो इस दशा में भी नोटिस का जवाब न देना या उसका पालन न करना स्वयं में एक उल्लंघन होगा। इसलिए नोटिस का पालन करना बहुत जरूरी है।'

'मैं भी तो यही चाहता हूँ।' समझावन इतने धीमे से बोला था जैसे अपने आप से बात कर रहा हो। लेकिन क्लर्क ने मानों इस रिस्पांस को बिना सुने ही ताड़ लिया था, 'चाहने से क्या होता है समझावन, चाहता तो मैं भी बहुत कुछ हूँ, इसका मतलब ये तो नहीं कि सरकार सिर झुका कर मेरी बात मान लेगी, उसके लिए जतन करना पड़ता है, मिन्नतें, तकलीफ सहनी पड़ती हैं।' इसके बाद क्लर्क को रोकना या उससे कुछ पूछना नामुकिन हो गया, वह जैसे किसी सनक या जुनून में बोल रहा था। जैसे कुछ फट गया है, सब्र का बाँध टूट गया है हालाँकि सब्र का वास्ता समझावन से था, वह जैसे समझावन नहीं किसी अन्य पुरुष पर अपनी जानकारी चस्पा कर रहा था। इस डिस्कोर्स से उसने स्वयं को भी निष्कासित कर दिया था और उसका कथ्य पूरी तरह से अन्य पुरुष में था। और वह स्थिर भी नहीं था, वह कभी चलता, कभी बैठता और इस तरह समझावन ने उसे दफ्तर के हर जाने अनजाने कोने में खड़े, उसके पीछे चलते उसे सुना। यद्यपि दफ्तर में खासी भीड़ थी, सब व्यस्त और मशगूल दिखाई दे रहे थे, एक व्यावसायिक चीख पुकार सी मची थी, तो भी क्लर्क के अनोखे प्रदर्शन और मंचन पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। उसकी आवाज में गजब का उतार चढ़ाव था, कभी वह बुदबुदाने लगता, कभी जैसे मिन्नत कर रहा है, फिर उलाहने, चेतावनी के स्वर, कभी झिड़कना, डाँटना और जम कर कोसना शुरू कर देता, कभी सिर्फ गरगराहट उसके मुँह से निकल रही थी। और उस दौरान समझावन, जिसे साथ साथ छतरी, थैला और टिफिन सँभालना पड़ रहा था, को बीच बीच में क्लर्क के लिए काफी और संतरे का इंतजाम करना पड़ा। क्लर्क अतिरेक में एक दर्जन से भी ज्यादा केले खा गया था, समझावन एकाग्रता नहीं रख पा रहा था, एक चीज उसे रह रह कर परेशान कर रही थी कि क्लर्क उसे समझावन की जगह लहरावन के नाम से पुकार रहा है, और वह क्लर्क न जाने क्या क्या कह रहा है, फिर भी बीच बीच में समझावन को लगता कि बहुत मुमकिन है इसी क्लर्क ने नोटिस भेजे हों या कम से कम इस क्लर्क का उनसे गहरा संबंध है और इस परिप्रेक्ष्य में यह आदमी उसकी मुश्किलें हल कर सकता है, इस वजह से समझावन उसकी हर बात, हर लक्ष्य, हर इशारे और सलाह को जज्ब करना चाहता था। और संक्षेप में वह इतना ही समझ पाया कि क्लर्क ने कहा कि ऐसे मामलों में बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है और लाइनों, अक्षरों के बीच पढ़ना जरूरी होता है, जो कहा या लिखा नहीं गया है महत्व उसका ही है, क्योंकि गरज आखिर तुम्हारी है और अनेक बार बस एक गलती बरबादी के लिए पर्याप्त होती है।

और फिर जैसे वज्रपात हुआ, धमाके से कम नहीं, समझावन की जैसे दिल की धड़कन रुक गई, उसका दुःस्वप्न साकार हो गया। इतनी ऊहापोह के बीच क्लर्क की स्पष्ट, हथौड़े सी आवाज सुनाई दी : 'तुम्हारी समस्या से निबटने का बस एक ही तरीका बचता है, इस विचित्र मामले का तोड़ पहली नोटिस में मिलेगा। क्योंकि उसे ध्यानपूर्वक और बुद्धिमानी से देखने से यह निश्चित रूप से जानकारी हो जाएगी कि इन नोटिसों का प्रयोजन क्या है और इन्हें किसने जारी किया है। इसके लिए अनुभव का होना जरूरी है जो मेरे पास है। मुझे जरा वो नोटिस दिखाओ जो तुम्हें सबसे पहले मिली थी।'

'उसे मैंने जला दिया।'

'क्या!' ऐसा माहौल बन गया मानों समझावन ने किसी की हत्या कर दी है। या कम से कम एक घिनौना अपराध कर दिया है। क्लर्क के माथे पर नीले रंग की नसों का एक जाल त्रिशूल की तरह उठा दिखाई देने लगा।

क्रोध से उसका चेहरा तमतमा रहा था और अजीब तरह से विकृत हो गया था। उसके होंठ के कोनों से झाग निकलने लगी और उसने समझावन को जम कर कोसा, बुरा भला कहा, वह उसकी कोई सफाई को अब तैयार नहीं था। उसने कहा कि लगता है समझावन किसी बड़ी साजिश में शामिल है जिसमें वह उसे भी फँसाना चाहता है और फर्जी नोटिसों के बहाने वह कार्यालय के गुप्त दस्तावेजों को उड़ाने का प्रयास कर रहा है, इसलिए वह झूठ बोल रहा है। वह अत्यंत चालाक और खतरनाक किस्म का आदमी है, उसने पहली नोटिस को जला दिया, इससे साफ पता चलता है कि उसकी नीयत ठीक नहीं है, उसने जरूर कोई जघन्य अपराध किया है या करना चाहता है, जिसे छिपाने के लिए उसने यह कहानी बनायी है, अपनी हरकतों को छिपाने के लिए वह आरोप दूसरों पर मढ़ने की कोशिश कर रहा है, यह निर्विवाद है कि वह इन कागजों के बारे में सब कुछ जानता है और यह नाटक वह दूसरों को गुमराह करने के लिए और फँसाने के लिए कर रहा है, इस कार्यालय में ऐसे बदमाश अक्सर आते हैं जो कागजात उड़ाने और उनकी जगह नकली कागजात जमा करने के चक्कर में रहते हैं, जरूर वह अकेला नहीं है, वह किसी गिरोह में शामिल है और वह उसके झाँसे में नहीं आने वाला।

'सबूत नष्ट करने के लिए ही कागजात जलाए जाते हैं।' क्लर्क ने कहा और पैर पटकता हुआ मुड़ कर चला गया।

इस घटना के बाद समझावन को अहसास हुआ कि पहली नोटिस जला कर उसने बहुत बड़ी गलती की है और इस वजह से किसी के भी मन में संदेह होना स्वाभाविक है। आखिर तक वह इस गलती के लिए पछताता रहा और इसके गंभीर परिणाम भी उसे भुगतने पड़े। सबसे बड़ी समस्या यह बन गई कि वह खुले मन से एक निर्दोष व्यक्ति के रूप में खुद को प्रस्तुत करने में असमर्थ हो गया। एक रक्षात्मक भाव, गलती का अहसास, संदेह से बचने की प्रवृत्ति, इस तथ्य को छिपाने का अपराधबोध और इन सबसे उपजी दयनीयता और आशंका का भाव उसके आचरण के अंग बन गए और उसे स्वयं पर भी भरोसा नहीं रहा। कैसे होता एक खटका उसके दिमाग में बन गया कि शायद पहली नोटिस में वह सब जानकारी थी जिसे वह अब ढूँढ़ रहा है और जिस पर उसने तब ध्यान नहीं दिया और इसके लिए वह खुद दोषी है। अलग अलग कार्यालयों में उसका संपर्क अनेक लोगों से हुआ - क्लर्क, चपरासी, दलाल, वकील और कभी कभी निचले स्तर के कुछ अधिकारी उनमें से कुछ नर्म और धैर्यवान थे - उन्होंने उसकी बातों को ध्यान से सुना, उसके कागजों को देखा, उसके प्रति उनकी सहानुभूति साफ थी, यद्यपि उनमें से अधिकांश ने परामर्श और सहायता के लिए उससे पैसे लिए। उनका कहना था यह उनकी डेस्क का काम नहीं है और न ही उनकी जिम्मेदारी, वे उसकी सहायता अपनी ड्यूटी से आगे जाकर कर रहे हैं। अधिकतर वे अंत में उससे पूछते थे कि सबसे पहली नोटिस कौन सी है, उसे दिखाओ क्योंकि वही सबसे महत्वपूर्ण है, बाद के कागजात तो मात्र अनुवर्ती कार्यवाही हैं। अपने एक कटु और दहलाने वाले अनुभव के बाद समझावन में यह हिम्मत नहीं थी कि वह उन्हें सच्चाई बता दे। लिहाजा उसने झूठ बोला, कहा कि यही नोटिसें हैं जो उसे मिली हैं, या फिर कई बार कहा कि पहली नोटिस वह घर भूल आया है और उसे दूसरे दिन लाकर दिखाएगा। फिर वह दूसरे दिन उनके पास नहीं जाता था और अगर उस दफ्तर में दोबारा पहुँचता भी, तो उनसे बचता था। यह ऐसी दिक्कत बन गई थी कि वह समझ नहीं पाता इसका निराकरण कैसे हो।

कुछ समय बाद, जब वह सरकारी प्रक्रियाओं को कुछ हद तक जानने लगा, और कई लोगों ने सुझाव भी दिया था, वह कार्यालयों में आवेदनपत्र दाखिल करने लगा। आवेदन नहीं वे निवेदन या प्रार्थनापत्र थे जिन्हें वह दूसरों से लिखवाता या टंकित कराता था। इस काम के लिए बहुत सी सेवाएँ सुलभ थीं व्यावसायिक लिखैये या टाइपिस्ट जो दफ्तरों के गलियारों में, क्लर्कों की मेज के बगल में एक छोटे स्टूल पर या सड़क किनारे बैठ कर दिन रात ये काम करते थे, काफी प्रतिस्पर्धा थी और कारोबार बढ़ाने के लिए कार्डबोर्ड के तरह तरह के नोटिस और विज्ञापन दीवारों पर, पेड़ के तनों पर, कुर्सी, मेज और टाइपराइटरों पर चिपके दिखाई देते थे जिनमें रेट, सुविधाओं और गारंटी के आकर्षक विवरण थे, जगह न मिलने के कारण एक टाइपिस्ट ने ऐसा विज्ञापन अपने गले में ही डाल लिया था वह चलती फिरती, मोबाइल सुविधा उपलब्ध कराने का आश्वासन दे रहा था। अलग अलग दफ्तरों में समझावन ने अलग अलग तरह के प्रार्थनापत्र दाखिल किए और उनकी किस्म और विविधता टाइपिस्ट की बुद्धि, समझ और सोच के अनुसार थी। प्रार्थनापत्र लिखवाने और उसे दाखिल करा कर उस पर आवश्यक कार्यवाही कराने में कुछ वकील, दलाल और बेरोजगार युवक संगठन के कई सदस्य भी शामिल थे। दफ्तरों में अनेक योग्य और मेहनती क्लर्क थे जो अपनी डैस्क के काम के साथ यह काम भी चलाते थे और इस तरह कुछ अतिरिक्त कमाई कर लिया करते थे।

समझावन कैसे जान सकता था कि ये प्रार्थनापत्र ही बाद में उसके खिलाफ पढ़े जाएँगे और वह उनकी वजह से उत्पन्न स्थितियों का कोई सीधा और संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाएगा। उसे सलाह दी गई कि बेकार चक्कर लगाने, पूछने पाछने और मिन्नतें करने से कुछ नहीं होगा, उसका व दूसरों का समय बरबाद हो रहा है, दफ्तर में सारा काम लिखत पढ़त में होना चाहिए, यह मामला कानूनी और नियमबद्ध है, इसमें निर्धारित प्रक्रिया का बहुत महत्व है, इसलिए सबसे पहले उसे उन नोटिसों का औपचारिक संज्ञान लेना चाहिए, इसके अलावा बिना प्रार्थनापत्र प्रस्तुत किए कोई भी कर्मचारी उसके मामले को हाथ नहीं लगाएगा, चाहे वह जबानी कुछ भी कहे, फिर औपचारिक संज्ञान लेना और उसका साक्ष्य अपने पास रखना जरूरी है।

परंपरा और नाम के अनुसार सभी प्रार्थनापत्र बहुत ही दीनता और विनम्र भाव से लिखे गए थे, इसका सबसे बड़ा उदाहरण, जो बाद में समझावन के लिए घातक सिद्ध हुआ, यह है कि हर प्रार्थनापत्र के अंत में सादर अनुरोध के साथ यह भी लिखा था कि यदि प्रार्थी से जाने-अनजाने कोई गलती हो गई है तो उसके लिए वह क्षमाप्रार्थी है। पत्रों में नोटिस की प्राप्ति का हवाला देते हुए यह निवेदन किया गया था कि उसे, यानी प्रार्थी समझावन को अग्रिम निर्देश प्रदान किए जाएँ, वह अपनी उपस्थिति सूचित कर रहा है, उस नोटिस की एक स्वच्छ प्रति उपलब्ध कराने की कृपा की जाए जिसके लिए वह शुल्क, यदि है, तो अदा करने के लिए तैयार और तत्पर है, उसे अपनी सफाई प्रस्तुत करने का उचित अवसर प्रदान करने की अनुकंपा करने का कष्ट करें और अपने हितों को पूर्वाग्रह से सुरक्षित रखते हुए वह यह भी निवेदन करता है कि प्रार्थी एक ईमानदार, निष्ठावान और निर्दोष व्यक्ति है जिसने कभी विधि या नियमों का जान-बूझकर उल्लंघन नहीं किया है।

इस तरह वे अनजान और अधूरे नोटिस समझावन का प्रकरण बन गए और अलग अलग दफ्तरों के संबंधित अनुभागों में एक फाइल समझावन की केस फाइल के रूप में खुल गई। शुरू में ये फाइलें अस्थायी कवर में खुली थी पर पुलिस द्वारा तहकीकात प्रारंभ करने के बाद वे स्थायी और संवेदनशील फाइलें बन गईं। समझावन को सरकारी तंत्र में पाँव रखने की एक सूक्ष्म जगह मिली - एक आधार - सरकारी प्रक्रिया में सदस्यता ग्रहण करने की तरकीब, अपने मामले के निष्पादन के लिए एक छोटा सा द्वार। अब उसके सामने लक्ष्य था - एक मेज जहाँ उसकी फाइल ने जन्म लिया था, एक क्लर्क जो फाइल के विकास के लिए जिम्मेदार था, और एक अनुभाग जहाँ अपने केस के बारे में पूछताछ करने के लिए समझावन अधिकृत था। इस तरह की समानांतर प्रक्रिया का प्रारंभ लगभग सभी सरकारी कार्यालयों में हो गया था। अब समझावन के हाथ में सरकारी कार्यवाही की डोर का एक हिस्सा आ गया था और वह अपने केस के संबंध में अनुस्मारित कराने के लिए भी सक्षम हो गया था। मामला आगे बढ़ रहा है, समझावन ने तुलसी और सूरी भाई को बताया था।

प्रार्थनापत्र और उसके अनुस्मारक। जिन पर समझावन के दस्तखत थे और जिन्हें वह नकार नहीं सकता था क्योंकि उसने स्वेच्छा से उन्हें दाखिल किया था। इस तरह ऐसी चल, अपरिवर्तनीय प्रक्रिया का अनावरण हुआ जिससे समझावन अपने मूल प्रयोजन और दिक्कत से दूर होता चला गया, इतना कि नोटिस के आंतरिक दोष की प्रारंभिक दिक्कत जो असल में समझावन के निर्दोष होने का सबसे बड़ा प्रमाण थी, लुप्त हो गई। इतना कि समझावन स्वयं भी इस ओर से बेखबर होता चला गया और बाद में वह इस तथ्य को ठीक से स्मरण भी नहीं कर पाया। इस प्रक्रिया के आगे समझावन निरुपाय और अनभिज्ञ था, ऐसे सूक्ष्म और जटिल नियमों को जानने की सामर्थ्य उसमें नहीं थी।

समझावन कैसे जान सकता था कि फाइल की दिशा और निर्णय प्रक्रिया सिर्फ एक कागज पर निर्भर करती है और वह है विचाराधीन पत्र। यह व्यवस्था अंग्रेजों के समय से चली आ रही है और इस वजह से अधिकांश सरकारी कर्मचारी इस महत्वपूर्ण कागज को पी.यू.सी. के नाम से पुकारते हैं। यानी पेपर अंडर कंसीडरेशन। यह स्वतः स्पष्ट है फाइल में ध्यान और विचार सिर्फ विचाराधीन पत्र पर किया जाता है। इस प्रक्रिया की मूल दिक्कत यह है कि यदि एक विचाराधीन पत्र के लंबित रहते दूसरा पत्र प्राप्त हो जाता है तो एक छलाँग की तरह दूसरा पत्र विचाराधीन पत्र बन जाता है और वहाँ पताका लग जाती है। तब फाइल की प्रक्रिया तदनुसार उस ओर स्वाभाविक तरीके से मुड़ जाती है। इस तरह एक राह से दूसरी राह निकलती है, एक दिशा से दूसरी दिशा, और धीरे धीरे एक मोजेक, एक भूलभुलैया रचने लगती है। अगर समझावन सतर्क रहता तो इसे पहचान सकता था क्योंकि यह सिद्धांततः कूड़े के बहाव के समान है। इसलिए निर्णय की पूरी प्रक्रिया विचाराधीन पत्रों के क्रम और उनके समय के अनुपात पर निर्भर करती है। यह हो सकता है कि बरसों तक किसी एक फाइल पर विचाराधीन पत्र प्राप्त होते रहें, और परिणाम स्वरूप फाइल अलग अलग दिशाओं में चलती रहती है, वह दिशा विपरीत भी हो सकती है और एक भी विचारधीन पत्र का निस्तारण नहीं हो पाए, कागजों की बहुतायत से फाइल के कई खंड बन जाते हैं, उन्हें उठाना या सँभालना मुश्किल हो जाता है, और उसके बाद ये जानना लगभग असंभव है कि उस फाइल के कई खंडों में आखिर निर्णय या निस्तारण का मूल बिंदु क्या था। इसमें उस क्लर्क की भूमिका भी निर्णायक है जो यह तय करता है कि कौन सा पत्र किस पत्रावली का विचाराधीन पत्र है। उसे संदर्भ लिपिक कहते हैं क्योंकि वह पत्र को संबंधित फाइल पर मुस्तैदी से नत्थी करता है।

समझावन की केस फाइलों में असंभव दिक्कत यह थी कि प्रार्थनापत्र और उसके अनुस्मारक विचाराधीन पत्रों के क्रम थे और नोटिस का कागज कभी विचारधीन पत्र बना ही नहीं। इसलिए केस फाइलों में जिन बिंदुओं पर विचार किया जा रहा था उनका समझावन की समस्या से कोई सरोकार नहीं था। किसी भी फाइल ने इस तथ्य का संज्ञान नहीं लिया कि नोटिस अधूरे और अस्पष्ट थे और समझावन मात्र यह पूछ रहा था इन्हें किसने भेजा है और इनका प्रयोजन क्या है। बल्कि वास्तविकता तो यह थी कि विपरीत तथ्य के अभाव में, फाइल पर नोटिस की सत्यनिष्ठा और निश्चितता को प्रदत्त मान लिया गया था।

इसके बावजूद भी पत्रावलियों में पर्याप्त कार्यवाही हो रही थी। समझावन व्यस्त था, उसका दफ्तरों में आना जाना लगा रहा था। फाइलों के आकार में लगातार वृद्धि हो रही थी। यह सवाल उठता है कि जब मूल नोटिस के बिंदु पर विचार ही नहीं हो रहा तो आखिर क्या कार्यवाही हो रही थी और समझावन किस चीज में व्यस्त था यह सवाल सरकारी प्रक्रिया के प्रति अज्ञान प्रदर्शित करता है। क्योंकि परिभाषा के अनुसार कार्यवाही वही है जो फाइल पर हो रही है। और प्रक्रिया का तंत्र कभी रुक नहीं सकता। अलग अलग दफ्तरों में उनकी परंपराओं के अनुसार कार्यवाही में सतही भिन्नताएँ जरूर थीं। जैसे सबसे पहले यह निर्धारित करना था कि यह मामला किस अनुभाग से संबंधित है। इसके अलावा आख्या प्राप्त करना व जरूरी सूचनाएँ इकट्ठी करना भी आवश्यक था। कार्य बँटवारा नियमावली के अंतर्गत प्रकरण का परीक्षण किया गया। हर कोण से परीक्षण किया जा रहा था। क्योंकि मामला विधिक पहलुओं से संबंध रखता है, न्याय विभाग की राय प्राप्त करना उचित समझा गया। इस सबसे देर जरूर होती है पर ऐसी सावधानी बरतने से सही निर्णय लेने में सहायता मिलती है। क्लर्कों ने यह सब बातें समझावन को बताईं कि उसका मामला विधिवत रूप से विचाराधीन है और उसे इत्मीनान होना चाहिए। सभी के प्रयत्नों से गाड़ी आगे बढ़ रही है। कुछ दफ्तरों ने अपने विभागाध्यक्षों और क्षेत्रीय कार्यालयों से आख्या माँगी। इस बीच अनुभागों के बीच भी विचार विमर्श की प्रक्रिया चल निकली। फाइल एक अनुभाग से दूसरे अनुभाग भेजी जाती या अशासकीय नोट के जरिए संस्तुतियों का अनुरोध किया गया। फिर आख्या और जवाबों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। काम की अधिकता या लापरवाही के कारण कुछ क्षेत्रीय कार्यालयों से समय के भीतर उत्तर प्राप्त नहीं हुए। उन्हें अनुस्मारक भेजे गए, साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि 'प्रत्येक दशा में' आख्या निर्धारित अवधि के भीतर उपलब्ध कराई जाए, कम से कम दो कार्यालयों में विभागाध्यक्ष को चेतावनी दी गई और उनसे कहा गया कि वे व्यक्तिगत ध्यान देकर सूचना तीन दिन में भिजवाएँ, समयांतर्गत आख्या न भेजने के संबंध में उत्तरदायित्व निर्धारित करते हुए संबंधित कर्मचारी का स्पष्टीकरण प्राप्त करें और उसके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही करते हुए कृत कार्यवाही से अवगत भी कराने का कष्ट करें। दो तीन जगह समझावन को संबंधित वरिष्ठ अधिकारी से मिलने का अवसर मिला, उसने उन्हें व्यक्तिगत रूप से प्रार्थनापत्र सौंपे, वे अधिकारी तेज और कर्मठ थे, उन्होंने इस संबंध में बैठक आयोजित कर स्थिति की समीक्षा करने के निर्देश दिए। एक अधिकारी ने समझावन को उसके प्रार्थनापत्र पर दस्ती आदेश अपने हाथ से लिख कर दिया कि प्रार्थी के प्रकरण का निस्तारण प्रत्येक दशा में एक सप्ताह के भीतर कर दिया जाए और स्थिति से अवगत कराया जाए।

सरकारी कार्यालयों की कार्य प्रणाली में अद्भुत समानता है, यह किसी औपचारिक प्रशिक्षण की वजह से नहीं है, यह वर्षों के सामूहिक अनुभव का नतीजा है और यह समानता सिद्ध करती है कि यह कार्य प्रणाली गुणवत्ता की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है अन्यथा ऐसी समानता नहीं होती, पर यह स्पष्ट करना जरूरी है कि गुणवत्ता का आकलन कर्मचारी के दृष्टिकोण से है, प्रार्थी या क्लाइंट का दृष्टिकोण अलग या विपरीत हो सकता है। इस समानता के दृष्टिगत क्षेत्रीय और उपक्षेत्रीय कार्यालय भी उदासीन नहीं थे। विभागाध्यक्ष ने अधीनस्थ कार्यालयों को तत्काल आख्या प्रस्तुत करने के निर्देश दिए, तदनुसार क्षेत्रीय कार्यालयों ने तत्काल प्रधान कार्यालय से पत्राचार शुरू कर दिया। एक ओर प्रकरण से संबंधित सभी अभिलेख फैक्स करने का अनुरोध किया और साथ ही साथ यह सूचना दी कि मामले में जाँच की जा रही है और जाँच की कार्यवाही पूर्ण होते ही आख्या प्रेषित की जाएगी। प्रधान कार्यालय से प्राप्त संदर्भों की सूची में इस प्रकरण को सम्मिलित कर लिया गया और वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर अन्य संदर्भों के साथ इसकी भी नियमित समीक्षा की जाने लगी। यहाँ भी विभिन्न उप कार्यालयों के उत्तर में बारीक भिन्नताएँ थीं, आखिर दो क्लर्क पूर्ण रूप से एक समान तो नहीं हो सकते, कुछ उप कार्यालयों ने यह सूचित किया कि वे इस प्रकरण से संबंधित नहीं हैं और उनकी सूचना शून्य समझी जाए, अनेक ने अंतरिम उत्तर दिए, कुछ ने संबंधित अभिलेखों की माँग की और जिन्हें नोटिस की छायाप्रति प्राप्त हुई थी, उन्होंने उसकी स्वच्छ प्रति का अनुरोध किया क्योंकि भेजी गई प्रति पठनीय नहीं है। अनेक ने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया था। तो इस तरह अनेक विभागों और कार्यालयों में कार्यवाही का एक विस्तारित तानाबाना विकसित हो रहा था, जैसे तालाब में कंकड़ फेंकने के बाद तरंगें हर दिशा में फैलने लगती हैं, उनका कंकड़ से कोई सरोकार नहीं रहता, तरंगों का खेल, विचलन और कंपन पानी की सतह पर चलता है, हल्का और स्वतः लिप्त, कंकड़ अपने पथरीले वजन के साथ तल में पहुँच कर स्थिर हो जाता है, संपूर्ण पानी का दबाव झेलता हुआ, कंकड़ और तरंग के बीच वजह के नतीजे का शायद कोई संभावित थ्योरिटिकल संबंध है जिसे या तो अंतर्यामी जानता है या वह जिसने घटना के क्षण को खुद देखा है, फिर भी संभावित इसलिए क्योंकि कोई पत्ता, हवा का झोंका, पानी के भीतर किसी मछली की थिरकन भी उसी तरह की तरंगें पैदा कर सकते हैं और तरंगें एक समान और एक प्रकार की होती हैं और वह पानी के अणुओं का गुण है, और कुछ नहीं।

यह आशंका निर्मूल नहीं है कि यह प्रक्रिया शायद कभी खत्म न हो, और हमेशा इतनी ही गति और तत्परता से चलती रहे क्योंकि अंतहीनता इस प्रक्रिया की प्रवृत्ति है। इसका बहुत आसान सा बुनियादी कारण है। समझावन ने जिन सरकारी दफ्तरों में प्रार्थनापत्र दाखिल किए थे और जहाँ उन पर जाँच की कार्यवाही की जा रही थी, वहाँ से, वस्तुतः समझावन को नोटिस जारी किए ही नहीं गए थे और लाख में एक, अगर किया भी गया था तो नोटिस मिटी और अधूरी होने के कारण उसकी जनक फाइल को चिह्नित करना लगभग असंभव था। उप कार्यालयों में तो पूर्व संदर्भ उपलब्ध होने का सवाल ही नहीं था। इस तरह समझावन की प्रार्थना का सीधा और सही जवाब यह था कि महोदय इस कार्यालय से आपको कोई नोटिस जारी नहीं किया गया है, तदनुसार सूचित किया जाता है। दूसरे ही दिन यह जवाब दिया जा सकता था और समझावन की मुश्किल का समाधान हो जाता। पर यह जवाब देना सरकारी प्रक्रिया के लोक विचार में बिल्ली के गले में घंटा बाँधने जैसा है। यह विधि का मामला है, अपराध और दोष का बिंदु है, यह रिस्क कौन ले सकता है क्योंकि कोई माई का लाल कर्मचारी निश्चित रूप से यह रिकार्ड नहीं कर सकता कि नोटिस कार्यालय से जारी नहीं किया गया है। लिखने का मतलब होगा कमिट करना और जिम्मेदारी लेना, और हर कर्मचारी जानता है कि यह संभावना हमेशा प्रबल है कि शायद नोटिस जारी की गई हो, वह फाइल कहीं गुम हो गई है या मिसप्लेस हो गई है, या कागज किसी दूसरी फाइल में नत्थी हो गया है या शायद हजारों फाइलों के किसी ढेर में दब गया है, और एक बार उसके अस्तित्व से इनकार करने के बाद वह कहीं से अप्रत्याशित रूप से मिल गया तो क्या होगा, लेने के देने पड़ जाएँगे। यह परिस्थिति स्थायी है, इसलिए प्रक्रिया हमेशा लंबित और विचाराधीन रहेगी। हालाँकि इस लोक विचार के अपवाद भी हैं जहाँ कर्मचारी का रवैया बिल्कुल उल्टा होता है। मान लीजिए नोटिस के स्थान पर समझावन किसी प्रमाणपत्र या सुविधा या बकाया धन या स्वीकृति के संबंध में कोई प्रार्थनापत्र देता और ऐसी दस्तखत की पावती भी उसके पास साक्ष्य के रूप में रहती, तब भी कर्मचारी को यह अंकित करने में कोई संकोच नहीं होता कि ऐसा प्रार्थनापत्र कभी प्राप्त ही नहीं हुआ, जबकि वह तीन दिन पहले ही दिया गया है और प्रार्थी के पास उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। ऐसा विपरीत आचरण क्यों शायद इसका कारण यह है कि इस मामले में पहल और गरज क्लाइंट की है जबकि नोटिस के मामले में पहल सरकार द्वारा की गई थी और सरकार हमेशा विपरीत तथ्यों की उपस्थिति में भी, सही होती है।


वे अब लगभग रोज मिलते थे, अफसर और जवान उद्दीप्त पत्रकार। अफसर प्रोजेक्ट के क्रियान्वयन में पूरी तरह लिप्त था और बहुत मेहनत से प्रोजेक्ट का दर्शन, उसकी मीमांसा और सूक्ष्मताएँ पत्रकार को समझाता था। वह एक बड़े दैनिक अखबार में प्रोजेक्ट को लेकर पहले पृष्ठ के लेख की एक शृंखला प्रकाशित कर रही थी। दोनों ने प्रोजेक्ट पर फिल्मों और वृत्त चित्रों के निर्माण की एक योजना भी तैयार की जिसे वे मिल कर संचालित कर रहे थे। यह एक विशाल प्रोजेक्ट था और उनकी विशाल महत्वाकांक्षाएँ इस प्रयत्न में जुड़ गई थीं। यह उनके उन्माद के समानांतर था जो उन्हें लंबी, उमस भरी रातों में एक करता था। तब भी उनकी परस्पर जरूरत हर मिनट बढ़ती जा रही थी। हमेशा की तरह वे टेबिल के एक तरफ पास पास बैठे थे, उनकी टाँगें और बाँहें सटी थीं, वह नोट्स लेते हुए गहरी साँसे भर रही थी, अफसर की उँगलियाँ उसके बदन के कोमल हिस्सों पर कामुक आकृतियाँ रच रही थीं, वह प्रोजेक्ट के डिटेल्स बता रहा था। एक क्षण में पत्रकार ने उसके होंठों को एक गहरे चुंबन में जकड़ लिया और अफसर की भर्राई आवाज पत्रकार की जीभ के अंदरूनी हिस्सों पर सरक रही थी। अफसर कह रहा था, ' नागरिक राजा है और नागरिक अधिकार पत्र हमारी नित्य की पूजा है। यह एक सीवनरहित सरकार होगी जो अपनी सेवाएँ एकल खिड़की से उपलब्ध कराएगी। हर सेवा एक बटन के क्लिक पर। इलैक्ट्रानिक प्रशासन ने इसे संभव बनाया है। अगर नागरिक फेस टू फेस सेवा चाहता है तो सेवा जीभ के क्लिक पर उपलब्ध होगी। इतना सरल, इतना आसान है मेरी जान।' वह एक क्षण के लिए उसकी बाँहों में झूल गई, दोनों औसत नागरिक के प्रति संवेदना के समान भाव में गहरे से डूब गए थे और देर तक एक दूसरे की बाहों में सिमटे रहे। जब वे अलग हुए तो अफसर ने कहा, ' जानेमन, मेरी सेक्सी थाइज, बहुत लंबे समय तक प्रशासन ने नागरिक के ऊपर असीमित अ धि कारों का इस्तेमाल किया है। वह जब चाहे, जैसे चाहे जनता को सम्मन कर सकता है, नोटिस जारी कर सकता है। हमारा प्रोजेक्ट इस व्यवस्था को सिर के बल खड़ा कर देगा। यह नागरिक को ऐसे व्यावहारिक अधिकार देगा कि वह प्रशासन को नोटिस पर रखने में सक्षम हो जाए। प्रशासन की सीढ़ी जनता के दरवाजे तक पहुँचेगी, इससे कम नहीं।' यह सुनते हुए पत्रकार ने अपने बाल खोलते हुए कंधों पर लहरा दिए, उसकी उँगलियों ने अफसर की कलाई को दबोच लिया, इस क्रिया में एक गहरी, हिंसात्मक आविष्ट का बोध थिरक रहा था।


बीच में करीब एक महीने का ऐसा वक्त भी आया जब समझावन लगभग खुश और संतुष्ट था। जबकि उसके ऊपर काम का दोगुना बोझ था। वह बहुत व्यस्त था। एक ओर रूट प्लान की तैयारी का काम, वह रात रात जाग कर नक्शे की ड्राइंग पूरी करता, दिन भर सूरी भाई के साथ स्कूटर पर शहर के विभिन्न इलाकों में कूड़े के रास्तों और निकास की पड़ताल करता। चमकती धूप में उसका रंग काला पड़ गया, दोनों के गालों पर धधकते लाल धब्बे दिखाई देते, प्यास से उनके होंठ और जीभ बिलखते थे, अधमुदी आँखें जिन पर गर्म हवा के थपेड़े लगातार प्रहार करते और धूल के गुबार उनके बदन से लिपट कर मचलते रहते। सूरी गले में रूमाल की एक गाँठ बाँध लेता था और समझावन के माथे पर लाल काला रूमाल बँधा होता, सूरी स्कूटर चलाता और समझावन पीछे बैठ कर दिशाएँ बताता था, उनके जेहन में कचरे, कूड़े और कबाड़ का साम्राज्य बसा था, बदस्तूर दुनिया का बाकी कारोबार आँखों से ओझल होकर सफेद साया बन गया था। मुख्य सड़क और भरे बाजारों से गुजरते हुए वे आश्चर्यजनक रूप से तंग गलियों में प्रविष्ट होते जहाँ स्कूटर की गरगराहट टैंक का वजन पैदा करती, विश्वास नहीं होता ऐसी तंग गलियों के जाल के चारों तरफ हजारों मकान खड़े थे, मानों किसी दैत्याकार अदृश्य हाथ ने उन्हें माचिस की डिबिया की तरह वहाँ उठा कर रख दिया हो, और हैरत होती कि गली की लकीरों और माचिस की हजारों डिबियों के नीचे, भीतर और बाहर न जाने कितनी खुली और बंद नालियाँ हैं, वे चलते जाते जब तक रास्ता खुद खत्म नहीं हो जाता, बीच गली में बना कोई अधूरा निर्जन मकान या बस एक आश्चर्यजनक दीवार, कचरे के निकास का जाल यहाँ खत्म हो जाता था, कूड़ा या तो यहीं पसर जाता या दोबारा उलटी यात्रा शुरू करता इस थाह में कि निकास किसी दूसरे जाल से मिलेगा, और वे भी उसके साथ लौटते, वे इन जालों का अन्वेषण कर रहे थे, उनका नक्शा बना रहे थे। नक्शे पर पैमाने से समझावन अलग अलग रंगों में लाइनें खींचता, इस तरह कूड़े की पैदाइश से उसके निकास के कोण बनते। रह रह कर समझावन गुनगुनाने लगता, काम में मशगूल, यह आत्मीयता का राग था और सूरी भागते स्कूटर पर सिर्फ गर्म, तीखी हवा की साँय साँय सुन पाता, बाजारों, गलियों, घरों के चबूतरों पर बैठे लोग उन्हें दिन दिन घूमते, चक्कर लगाते देखते, वे कहते देखो इन बदमाशों को इतनी गर्मी में भी चैन नहीं, दिन भर आवारों की तरह मटरगशती करते हैं, इन्हें कोई शरम नहीं, आवारगी की हद होती है, ऐसी नाकारा औलाद भगवान किसी को भी न दे।

इस काम में जब भी समय निकालने की गुंजाइश मिलती, वह सूरी भाई को भाई होने का हवाला देकर इजाजत लेता, कंपनी के दफ्तर से साइकिल उठाता, और झोला, टिफिन और छतरी लेकर अपने केस की पैरवी और पैरोकारी के लिए निकल जाता। कभी कभी तो ऐसा भी लगता मानों वह इस समय का बेसब्री से इंतजार करता है, वह जानने को आतुर है उसके केस में पिछले चार दिनों में क्या प्रगति हुई, बाईस सरकारी विभागों में रोज एक साथ जाना तो संभव नहीं है, उप कार्यालय से हो सकता है जवाब आ गए हों, न्याय विभाग का स्पष्टीकरण आ गया होगा, और अगर वह मेरी तरफ हुआ तो मजा आ जाएगा, अनुभाग तीन का क्लर्क अलग से कैंटीन में मिलने की बात कह रहा था, उसने बताया कि उसके पास कुछ ऐसे शासनादेश हैं जिनका संबंध उसके केस से हो सकता है। वह अब अधिक सतर्क हो गया था, ज्यादा सहज और आशावान। उसका आत्म विश्वास बढ़ गया था। वह अधिक संतुष्ट था, उसे करीब करीब गर्व होता जब कोई क्लर्क कहता आओ समझावन मैं तुम्हें ही याद कर रहा था, आज सुबह मैंने पूरे दो घंटे तुम्हारी फाइल पर लगाए हैं। स्वागत कक्ष में बैठा अंधा क्लर्क उसे आवाज से पहचान लेता है। यह संतोष की बात है कि उसकी केस फाइलें बंद नहीं हैं, रोज उनमें कुछ न कुछ प्रगति हो रही है, मामला आगे तो बढ़ रहा है। फिर भी, किन्हीं क्षणों में जब वह शुरू के दिनों को याद करता तो सिहर जाता था। वह भयावह स्मृतियाँ, डर और आशंकाएँ उसके दिल में कौंध जातीं एकाएक, जब वह किसी दफ्तर के किसी अँधेरे गलियारे से गुजरता और पाता कि वहाँ जो अनुभाग बैठता था वह अचानक कहीं और चला गया है, या कोई क्लर्क उसे क्षण भर के लिए इस तरह देखता मानों पहले उसे कभी न देखा हो। ऐसे अवसरों पर एक संदिग्धता का अहसास, संदेह की चुभन उसे लील जाती। उसी तरह जैसे जब पहले उसे लगता था वह गलत है, उस पर आरोप है, वह भूल कर बैठा है, अनजाने में ही चाहे, पहले नोटिस के जलाने की बात छिपा कर वह तथ्यों को तोड़ मरोड़ रहा है, लाखों फाइलें है यहाँ और इतने जरूरी और जनहित के काम हैं, वह तो तिनके का अंश भी नहीं है, उसे खुद अपने केस के बारे में मालूम होना चाहिए, और अगर क्लर्क सीट पर नहीं मिलते या चाय पीने चले गए हैं तो आखिर इतनी व्यस्तता और तनाव में उन्हें भी आराम के कुछ क्षण चाहिए, वे गुलाम तो नहीं है, उसकी महज उपस्थिति ही एक तरह का नाजायज हस्तक्षेप है, यह कोई घर की खेती है क्या, और अगर कोई उसकी बात सुन लेता है तो उसका बहुत उपकार है। पूर्व में वह ऐसा महसूस करता था। पर अब ऐसा नहीं है।

मुफ्त लंच कभी नहीं मिलता, अर्थशास्त्री कहते नहीं थकते। सही बात है। समझावन के पैसे खर्च हो रहे थे। फाइल को एक अनुभाग से दूसरे अनुभाग में भिजवाना है, अद्यतन स्थिति की जानकारी चाहिए, किसी पत्र, शासनादेश या नियम की छायाप्रति की जरूरत है, फाइल को आज ही आगे बढ़ाने का अनुरोध, फिर सलाह - क्लर्कों, वकीलों, दलालों की, यह स्पष्ट नहीं हो पाता था कि कौन सरकारी मुलाजिम है, कौन बाहरी आदमी; यदाकदा दफ्तरों के सुरक्षाकर्मी उसे कठोर दृष्टि से देखते, उन्हें नर्म करना, इस सबके लिए समझावन पैसे अदा कर रहा था। कोई और तरीका भी नहीं था। बातचीत के दौरान और गप्प के बीच भी मेजबानी हमेशा समझावन को करनी पड़ती थी, गनीमत है कैंटीन में चाय और समोसे सस्ते थे, और ज्यादातर क्लर्कों को कोल्ड ड्रिंक का चस्का नहीं था। इस तरह पैसे का लेन-देन आम बात है पर समझावन के केस में यह थोड़ा अजीब था। मानों वह व्याप्त भ्रष्टाचार के लिए नहीं, महज उसके विचार के लिए रिश्वत देने की प्रक्रिया से गुजर रहा है। क्योंकि आखिर उसे मिल क्या रहा था एक तरह से उसकी ऐसी कोई माँग नहीं थी जो मूर्त और ठोस हो, जिसे संज्ञापित किया जा सके। लगता तो यह है कि वह इन बाईस कार्यालयों में अनजाने और बेचारगी में भटक रहा है। मानों कुछ टटोल रहा हो, ऐसे इनसान की तरह जो मिलावटी दवाई के सेवन से बीमार है और तमाम फार्मेसी जाकर वह दोबारा वही या दूसरी दूषित दवाइयाँ खरीद रहा है। अर्थशास्त्री दो तरह के भ्रष्टाचार की व्याख्या आम तौर पर करते हैं। पहली ऐसी रिश्वत जो किसी अनयिमित लाभ पाने के लिए दी जाती है। और दूसरी वह घूस जो मात्र निर्णय लेने के लिए दी जाती है जिसे स्पीड मनी कहा जाता है। पर समझावन के केस में तो यह अदायगी स्पीड मनी भी नहीं है। क्योंकि कार्यालयों में इस केस का कोई निर्णय या निस्तारण अपेक्षित ही नहीं था। जीवन और घटनाएँ कभी कभी खुद की पैरोडी रचती है और असलियत अपना स्वाँग बनाती है। यह मामला कुछ इससे मिलता जुलता है। सूरी भाई ने यह बात दूसरी तरह से कही, 'यह सब जो तुम कर रहे हो, इसकी कोई जरूरत नहीं है। यह करने के लिए किसी ने तुम्हें नहीं कहा, किसी ने जोर नहीं डाला। यह तेरी अपनी जिद है। अगर कोई इनसान अपने ही गले में फंदा डालना चाहे, खुद के बदन को चोट पहुँचाना चाहे, स्वयं गलफत में पड़ना चाहे तो उसे कौन रोक सकता है, समझावन, मेरे लाल!'

शहर में समझावन का एकमात्र दोस्त, हितैषी, अग्रज, विश्वासपात्र और संरक्षक सूरी भाई था। सात साल से वे एक दूसरे को जानते थे और उनके बीच कुछ ऐसे राज भी थे जिन्हें तुलसी भी नहीं जानती थी। समझावन के केस और उसके जुनून और जिद को लेकर (यह सूरी भाई का मत था) दोनों के बीच कई बार लंबी बहस और तकरार हुई। सूरी भाई ने अनेक बार उससे कहा, 'देख, मेरे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है, मैं अनुभव से कह रहा हूँ, ये नोटिस फोटिस की बात भूल जा। आती हैं तो आने दे, जब न जगह का नाम दिया है न कारण बताया है, न ये बताया है कि क्या करना है तो तुझे कौन सी पड़ी है। सरकारी दफ्तरों में तमाम उल्टी सीधी चीजें होती रहती हैं, तुझे मतलब ही क्या है।' दूसरी नोटिस मिलने के बाद समझावन ने कहा कि अपने इत्मीनान के लिए दो एक जगह पता कर लेता हूँ। अगर कुछ नहीं पता चला तो तुम्हारी राय पर अमल करूँगा। पर एक बार जो प्रक्रिया शुरू हुई तो समझावन उसमें फँसता चला गया। इत्मीनान तो दूर रहा, उसे नए नए सवालों और आशंकाओं ने घेरना शुरू कर दिया। सूरी ने गुस्सा किया कि उन्हें कंपनी से जो काम मिला है, सारी शक्ति उसमें लगनी चाहिए, अगर दोनों रूट प्लान से कंपनी के मालिक खुश हुए तो कौन जानता है कि उन्हें और अच्छा काम मिलेगा, कंपनी पक्की नौकरी भी दे सकती है, बार बार यह मौका नहीं आता। 'मेरे काम की तुम चिंता न करो, मैं डबल मेहनत करूँगा।' समझावन ने कहा। फिर एक बार, सूरी के दोबारा टोकने पर समझावन ने कहा, 'पता है मैंने एक बार तुम्हारी बात मानी और फँसते फँसते बचा।' 'कौन सी बात।' समझावन के चेहरे पर अनजाने ही धोखा खा जाने का कंपित भाव उतर आया जब सूरी को पहली नोटिस के जलाने और सुनील खरबंदा नाम के क्लर्क के साथ हुए वाकए के बारे में बताया। समझावन को यह जताने की जरूरत नहीं थी कि उसने सूरी भाई की राय पर ही यह गलत काम कर दिया था। उसने इस बात को एक से ज्यादा बार कहा कि यह तो सच है कि सरकारी नोटिस को इस तरह फेंक देना या जला देना एक कानूनी अपराध है और अब उसे यह बात छिपानी पड़ रही है। बल्कि अधिकांश लोगों की यह राय है कि अगर वे पहली नोटिस देख लेते तो उसे इस तरह भटकना नहीं पड़ता और सारी चीजें तुरंत साफ हो जातीं। इसके बाद सूरी भाई ने टोकना बंद कर दिया हालाँकि उनकी चुप्पी में एक तरह का प्रतिवाद और चिंता हमेशा महसूस की जा सकती थी। पर समझावन ही था जो अपने केस के नित्य बदलते परिदृश्य को किसी के साथ शेयर करना चाहता था, यह सांत्वना चाहता था कि वह सही रास्ते पर चल रहा है और जल्दी ही इस मामले का निस्तारण हो जायेगा। सूरी भाई और तुलसी, दो ही जन थे, जिनके साथ वह यह बाँट सकता था।

जिस दिन वे बिना नागा काम करते, देर शाम को घर लौटने से पहले श्मशान वाले बड़े कूड़ाघर चले जाया करते थे। वहाँ बैठ कर वे दिन भर के काम का आकलन करते, दूसरे दिन का कार्यक्रम तय करते और मिल कर शराब पीते थे। इस बीच शाम शहर की बदनसीबियों पर मुलामियत की झिल्ली डाल देती। जल्दी ही रात हो जाती। रात निर्मम होती है, वह बदनसीबी के साथ बदनसीबों को निगलना भी चाहती है।

इस जगह बहुत कुछ उनके बीच झर जाता है। अजीब बात है, यहाँ वो स्वच्छ और समग्र महसूस करते हैं। अनोखी जगह है। चितकबरे ढेर से सीसती दुर्गंध और धुएँ की नीली परतें हमेशा निकलती रहती है। सतह की ठोस निश्चलता है। हर वक्त कुछ गतियाँ बनी रहती हैं ज्यों पदार्थ और अवशेष की मिली जुली क्रियाओं से कुछ सरकता, रिसता, खिसकता रहता है। एक रूट प्लान पूरा हो गया था। सीढ़ी की शक्ल का रूट निकला था। जब समझावन ने दूसरी तरफ से नक्शा पकड़ा तो लगा ये सीढ़ियाँ कहीं पाताल में जा रही हैं। शहर के भेद कैसे कैसे रूपों में प्रकट होते हैं। भेद ही भेद है हर तरफ। अंधकार को चीरते हुए वे खामोशी में अपनी मौजूदगी दर्ज कर रहे हैं : वो दीया जो श्मशान की एक कब्र पर अपनी मौत का इंतजार कर रहा है, मछली की गंध जो हर दूसरी गंध को पछाड़ कर न जाने किस पर विजय पाना चाहती है; अपने आप जली आग से उछलती चिनगारियों का व्यग्र नाच; शराब की दूसरी बोतल जो दोनों साथियों के बीच लुढ़क कर न जाने किसका स्पर्श पाना चाहती है।

सूरी भाई की सिर्फ झपकती आँखें दिखाई दे रही थीं, शेष सरकती छाया सी थी, जब समझावन ने धीमे से कहा, 'मैं जानता हूँ तुम उस बात को लेकर मुझसे नाराज हो। मैंने उस दिन गलत बोल दिया था। वैसे मुझे लगता है ये मामला अब जल्दी निपट जाएगा। दूसरे रूट प्लान में कोई झमेला नहीं होगा, सच्ची।' एक क्षण के लिए लगा सूरी चुप ही रहेगा, फिर उसकी छाया जैसे हिली, 'क्या निपट जाएगा हाँ?'

'वो केस का कुछ डैफिनेट पता चलेगा, ऐसा बोला है।'

'अब अंग्रेजी भी सीख रहा है, धीरे धीरे, शाबाश मेरे लाल, जीओ।'

'नहीं, वो क्लर्क कहा है कि उसने बिल्कुल ऐसा ही केस और देखा है, उसने देखा है, या उसके किसी साथी ने, उसे जल्दी याद आ जाएगा, वो कह रहा था दोनों केसों में बहुत समानता है, उसने जैसे ही मेरी फाइल देखी, उसे उस केस की याद आ गई थी, बताया कोई सवा साल पहले की बात है, हो न हो दोनों केस का आपस में संबंध है। उसने कहा है वो अपने साथियों से बात करेगा, उन्हें भी शायद कुछ याद हो, फिर वो उस फाइल को निकलवाने की कोशिश करेगा, हो सकता है थोड़ा समय लगे, पर इस बार लगता है पता चल ही जाएगा।' बाद में समझावन की आवाज क्षीण हो गई थी क्योंकि सूरी की छाया में भी कठोरता दिखाई दे रही थी।

'अबे घोंचू क्या निपट जाएगा कुछ नहीं निपटेगा, तू करता रह समय की बरबादी, पैसे की बरबादी, मुझे तुलसी पर तरस आता है, इसलिए कहता हूँ वरना मुझे क्या पड़ी है। अबे घोंचू निपटेगा तब जब निबटाने को कुछ होगा। अगर वास्तव में कुछ होना था, तो अब तक हो गया होता।'

'तो ये नोटिसें जो मुझे मिल रही हैं, ये कुछ होने की बात नहीं है, ये ऐसे ही हैं क्या?'

'अबे गधे, जब उनका आगा, पीछा नहीं है, तो तुझे क्या पड़ी है। अबे तुझे क्या फरक पड़ता है कागज आता है साले को फेंक दे या रख ले, ये घूमने फिरने से क्या मिलेगा, और जो मिलना होगा तो घर बैठे मिलेगा, समझा तू समझता तू सब है, कितनी बार तो ये बात हो चुकी है यार।'

अचानक जन्में मौन में एक फिस्स सा धमाका हुआ। काँच टूटने और बिखरने की आवाज। बिजली के खंभे पर लटका अकेला बल्ब फूट गया था। एक कागज की चिंदी न जाने कहाँ से लपकती हुई आई और समझावन के गाल से सटने लगी। अँधेरा गहरा हो गया था। इस बार जब समझावन बोला तो यह ठीक से नहीं कहा जा सकता था कि वह बीच में रुक गई बातचीत को आगे बढ़ा रहा है, या कुछ और ही कर रहा है। लगा जैसे अँधेरा बोल रहा था।

'अगर शुरू में नहीं गया होता तो फिर कहीं नहीं जाता। पर जो शुरू हो गया है उसे मैं कैसे रोक सकता हूँ सूरी भाई। आप मेरी दशा नहीं समझते, जो मैं हर वक्त, न चाहते हुए भी इसी के बारे में सोचता रहता हूँ, इसका ही इंतजार करता रहता हूँ, किसी दूसरी चीज में मन नहीं लगा पाता। तुलसी और मैं एक दूसरे से आँख चुराते हैं, रात में जैसे ही नींद खुलती है, सबसे पहले देहरी पर नजर जाती है फिर दिन भर यही चिंता, घर पहुँच कर तुलसी का चेहरा देखना और उसे पढ़ने की कोशिश, वही सवाल दिमाग में, क्या आज भी नोटिस आया है और नहीं आया तो फिर दूसरे दिन, दूसरी रात, वही इंतजार फिर वही आशंका। ये डर है या क्या है, जैसे कोई छिपाने की बात है, हम पड़ोसियों को भी नही बताते, चोर की तरह लिफाफा उठाते हैं, किसी ने देखा तो नहीं, पता नहीं छिपाने की क्या बात है, जैसे कोई शर्म है मन के भीतर, यह मन में कैसे आ गया, और सूरी भाई, जब हम टीवी देखते हैं, अखबार पढ़ते हैं, सुनने में आता है, वहाँ पुलिस आई थी पूछताछ करने, वो खबर पढ़ी थी कि निगम ने पार्क की जमीन पर मकान तोड़ दिए, रोज चोरी और चाकूबाजी की घटनाएँ, अखबार में जितने नोटिस निकलते हैं, मैं उन्हें ध्यान से पढ़ता हूँ, टीवी पर देखा था कि पहचानपत्र बनाना जरूरी है और रजिस्ट्री कराना मकान की और जन्म का सर्टिफिकेट भी चाहिए, कालोनी में ही कितने मुकदमें चल रहे हैं... ये सब नया नहीं है पर जबसे ये शुरू हुआ है इन तस्वीरों और घटनाओं में कहीं मुझे अपनी छाया या तुलसी की छाया नजर आती है, जैसे हर अपराध, हर गैरकानूनी हरकत का संबंध उस नोटिस से तो नहीं है, मैं नोटिस दोबारा दोबारा पढ़ने लगता हूँ, हालाँकि कोई वजह नहीं है, फिर भी कितने कानून और नियम हैं, न जाने कब कभी कोई गलती हो गई हो, छोटी सी गलती, जिसका मुझे भी पता न हो, ये सब मेरे दिमाग में घूमता रहता है, कि कहीं कोई लफड़ा न हो जाए, मैं किसी लफड़े में नहीं पड़ना चाहता, इसलिए मैं चाहता हूँ इस मामले का आरपार निपटारा हो जाए...।'

समझावन कुछ देर और बोलता रहा या अँधेरे की आवाज झींगुरों की तरह गुनगुना रही थी। झनझन झनझन की आवाज, क्या कहा जा रहा है इस ओर दोनों अनभिज्ञ थे, इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता था। एक बिल्कुल ही अलग तरीके से समझावन शायद यह कहना चाह रहा था कि उन अनर्गल, अजीब नोटिसों का मिलते रहना, उनका खतरा, उनका अनवरत दबाव और प्रहार, शंकाओं और सवालों की लंबी फेहरिस्त, वह गोपनीय विश्वसनीयता जैसे निरंतर कोई खिड़की के सूराखों से, दरवाजों की दरारों से रोशनदान और दीवारों पर दस्तक से एक संकटापन्न संदेश फुसफुसा रहा है, इसका सामना वह सिर्फ एक तरह से कर सकता है कि वह इस फुसफुसाहट की अनुगूँज का पीछा करे और संकेतों से भरे इन संदेशों को हर सरकारी कार्यालय में खोजे। क्योंकि यही एक तरीका है जिससे कुछ हद तक संतुलन कायम हो सकता है, कम से कम इस बहाने सरकारी तंत्र में पहचान तो बनी, चाहे उसकी नींव बहुत कच्ची है, नहीं तो उस पर सीधा आरोप लगता कि उसने असहयोग और उद्दंडता का प्रदर्शन किया है, और जब भी निर्णय होगा उसके पास कम से कम यह कहने को तो होगा कि उसने भरपूर चेष्टा की, महज चुप्पी उसके लिए घातक थी, जिस तीव्रता और विचित्रता से उसे नोटिसें मिली हैं, उतनी ही तीव्रता से सरकारी तंत्र में याची और आवेदक बनना अनिवार्य था।

उस रात लौटने में उन्हें देर हो गई। लौटते हुए सूरी भाई ने कहा कोई बात नहीं, जो होगा देखा जाएगा। रात का अँधेरा बहुत गहरा और विशाल होता है। वह हर अनहोनी, पाप और विचित्रता पर सामान्यता की काली चादर डाल देता है। फिर समझावन तन और मन से जवान है। विचित्रताओं को जज्ब करने के लिए उसके पास काफी वक्त है। घर पर तुलसी उसका इंतजार कर रही थी।

उस एक महीने में जब समझावन कुछ हद तक खुश और संतुष्ट था, तुलसी को थोड़ी राहत का अनुभव हुआ। उसे लगा अब मुश्किल के बादल छँटने लगे हैं। और अब जल्दी ही धूप खिलने लगेगी, उनका जीवन सहज हो जाएगा। समझावन की तरह उसका भी कोई संरक्षक या संबंधी नहीं था। उसे भी कोई चिट्ठी नहीं लिखता था। इस वजह से जैसे एक नतीजे के रूप में वे एक दूसरे के लिए बने थे। वे इस तरह साथ आए जैसे किसी निर्जन टापू पर छूटे दो इनसान साथ हो जाते हैं। एक दूसरे के बिना जीना शायद उनके लिए कल्पनातीत था। यह अनिवार्यता उनके रिश्ते की बुनियाद थी। इच्छा स्वातंत्र्यवादियों की दुनिया से अलग, इस बुनियाद पर उनके बीच प्रगाढ़ प्रेम का सृजन हुआ। वे एक दूसरे के लिए जान दे सकते थे, कुछ भी न्यौछावर कर सकते थे, यह अर्थ था उनके प्यार का और इसमें कहीं अतिरंजना नहीं है। उनकी जिंदगी की शुरुआत इतने संकुचित दायरों में हुई थी कि एक कमरे के बराबर स्पेस में उनकी समूची इच्छाएँ समा सकती थीं। वे सच में ऐसे ही थे।

एक पहले का भी समय था। जब नोटिसों का आना उनके जीवन में शुरू नहीं हुआ था। रोज शाम तुलसी झाड़ू देती, अचानक एक परिंदा शाम के धुँधलके में खिड़की के सामने से गुजर जाता। और वह झाड़ू छोड़ कमर में खोंसती खिड़की पर लपक आती। उस एक गति में उम्मीद और चाहत के असंख्य डोरे समाए थे। जब तक समझावन लौटेगा खाना बन चुका होगा। खिड़की के झीने परदे हवा में हल्के से लहराएँगे। पश्चिम के आकाश में सुनहरे आलोक का नृत्य हो रहा होगा। उनके पास विकल्प होंगे। क्या आज घूमने जाना है तुलसी खिड़की के चौकोरे से मोहल्ले के पार की सड़क को दूर गुम होते हुए देखेगी। समझावन नहा कर निकलेगा। कंपनी की बात करेगा। तुलसी उसकी पीठ पर उभरती मछलियाँ देखेगी तब वह बाहों को दो बार गोल घुमाएगा। वह उसके पास पहुँचेगी और कहेगी कि आज घर पर ही रहेंगे और रात खुद ब खुद लंबी हो जाएगी।

रात बहुत लंबी थी। तुलसी का मन चाहता था यह रात कभी खत्म ही न हो। कैसी है रे तू - कभी खत्म ही नहीं होती, खिंचती जाती, बढ़ती जाती है - समझावन कहता है। तुलसी उसके पास सरक आई। गाल सटा दिया। मुँह तकिए के भीतर धँसा दिया। आँखें मूँदी तो समझावन का अक्स उसके और निकट चला आया। मन की तस्वीर में उसे तांबे की आभा, लोहे की चमक दिखाई दी। मेरा आदमी है, कितना पास है, यह सोच कर तुलसी को अच्छा लगा। तकिए के भीतर से तुलसी बोली बच्चा बनेगा तो इसी पखवारे बनेगा। एक झटके में समझावन ने उसे अपने ऊपर खींच लिया। बच्चे की चाह ने संसर्ग को पुलकित कर दिया। निर्वस्त्र तुलसी को किसी एक क्षण में लगा कि चाँद के साथ दुनिया भर के सितारे उसके आँगन में उतर आए हैं। पंजों के बल होकर वह उन्हें छू रही है। कई समंदर उसके पाँवों को धो रहे हैं...। इस रात में इतने अरमान भरे हैं कि खत्म होने के लिए वह उनका इंतजार करेगी। बहुत सुंदर बच्चा होगा, है न, मग्न स्वर में समझावन पूछता है। तुलसी कुछ नहीं कहती। बस मन ही मन एक पूरी किताब रच जाती है उसके दिल में। खामोश रहते हुए समझावन पूरी किताब पढ़ लेता है। 'पता है कंपनी ने मेरी पगार बढ़ा दी है।' समझावन ने कहा ढेर सारी चूड़ियों की खनक तुलसी को सुनाई दी। मन की बातें समझावन कहने लगा, 'शुरू में तुझे कितनी शरम आती थी। मेरा आदमी कूड़ा बीनता है, कबाड़िया है। पहले मुझे भी ऐसा ही लगता था। कबाड़ बीनने निकलता तो लगता खाक छान रहा हूँ, बेकार हूँ, रोजी के लिए दूसरों का फेंका सामान उठाता हूँ। पर धीरे धीरे पता चला यह बड़े हुनर का काम है। जब कंपनी वाले आए तो मुझे इन चीजों का इल्म हुआ। तेरे बच्चे का बाप कबाड़िया नहीं है, पता है। समझावन कूड़े का व्यापारी है, सुना...।' ये अंतर्मन की बातें हैं। तुलसी खूब सुन चुकी है उन्हें। पहले भी, आज भी।

अचानक समझावन मुस्करा उठता है। चाँदनी की एक टेढ़ी रेखा इस भाव को पकड़ती है और चादर में धँसे तुलसी के सीने तक ले जाती है। अनेकों स्तरों पर उनके मन जुड़े हैं। तुलसी का हाथ लहराता है, उँगलियाँ समझावन के होंठ सहलाती हैं - मुझ पर हँसते हो कबाड़ी कहीं के! इस पर मुस्कान फव्वारा बन कर दोनों को गीला,उन्मुक्त कर देती है। 'अच्छा हुआ स्कूल खंडहर बन गया। आज मैं कबाड़ी हूँ तो लोग कहते हैं, है तो कबाड़ी पर अध्यापक जैसा दिखाई देता है। जो सच में अध्यापक हो जाता, तो कहते समझावन अध्यापक है पर है देखने में कबाड़ी!' अंतर्मन की बातों का यह सरोवर धीरे धीरे नींद के आगोश में समा जाता है। रात इस प्रस्ताव का गारंटर बन कर मौजूद है। खिड़की, दरवाजे, दीवारें, गवाह हैं - भागीदार तो सब हैं - घर की हर वस्तु, हर चीज जो यहाँ मौजूद है। इस अवस्था को चाँदनी के नीलेपन ने ओढ़ रखा है। यह तस्वीर है उनके प्यार की अनिवार्यता की। पुनरावृत्तियों की ऐसी घरेलू भाषा उनके प्यार को तराशती है, सहज आत्मीयता रच देती है। संयम और स्वीकार की नींव डालती है। यही तो है प्यार का उजला हीर जो पहचान के अंतरंग भाव पर टिका है। बस दो जन हैं जो एक बिस्तर पर एक ही करवट लेटते हैं। सोते, जागते न जाने कितने भाव घटते हैं दोनों के बीच जिनकी गिनती वे भी नहीं जानते। शब्द है, मौन है, घृणा है अनुराग है, दुख सुख है, निकटता है, दूरी है, समझ है, अज्ञान है, भय, तृप्ति, आनंद, आज कल, बीते सभी के तो अफसाने हैं यहाँ। रहते, सोते वे इन सबकी पुनरावृत्तियाँ करते हैं, पहचान जग जाती है, भाव गहरे होते हैं। यही सूत्र है अमिट प्यार का जो उन्हें तार तार जोड़ता है।

नोटिसों की निरंतरता ही उनका निश्चयात्मक गुण था। न केवल वे परकीय आगंतुक थे, बल्कि उनका यह भी इशारा था कि तंत्र से बेखबर इस युगल के जीवन में बाहरी तत्वों का हस्तक्षेप होना चाहिए। तुलसी वह सब जानती थी जो जानने को था। समझावन उसे सब कुछ बताता था। हर घटना, हर प्रगति, वह किस दफ्तर में गया, किससे मिला, क्या हुआ, किसने क्या सलाह दी, उसने क्या किया, आगे क्या होना है, क्या संभावना है, कार्यालयों के नियम, उनकी प्रक्रियाएँ सब कुछ एक री प्ले की तरह। वह कुछ भी नहीं छोड़ता था। तुलसी खाना बनाती, उसे चाय देती, बिस्तर लगाती, बरतन करती, वे दोनों खाना खाते, और समझावन उसके पीछे पीछे, साथ साथ, सुनाता चलता। या खुद कमरे में बैठा बोलता रहता, तुलसी जहाँ भी होती उसे हल्का या साफ, कुछ कुछ सुनाई देता रहता। तुलसी का बस नहीं था कि वह कोई सवाल पूछे या सलाह दे। समझावन तुलसी का चेहरा पढ़ता रहता। वह शायद उसकी आँखों में, उसके चेहरे पर अपनी कार्यवाही की पुष्टि देखना चाहता था। मानों दिन में उन सरकारी कार्यालयों में जो भी हुआ वह अवास्तविक और भ्रामक सा है और तुलसी को सब कुछ बता कर वह उसे असल और ठोस बनाना चाहता है। सिर्फ एक चीज ने तुलसी को चिंतित किया कि इन सब में उनके पैसे भी खर्च हो रहे थे। इस एक चिंता के अलावा तुलसी ने सहजता से सब आत्मसात किया। जैसे वह दिन की धूल बुहार देती थी, उसी तरह स्त्री मन से वह इन घटनाक्रमों को भी बुहार देती थी। पर कहीं न कहीं तो यह सब इकट्ठा हो रहा था। रात होती, बिस्तर पर लेटने के बाद भी समझावन की बातें खत्म नहीं होतीं। वह समझावन को सहलाने लगती, और अक्सर न जाने किस क्षण में तुलसी की उँगलियों के स्पर्श और समझावन की बातों में भेद नहीं रहता और सब कुछ मिल कर एक प्रणय गीत या संसर्ग का अभिनंदन बन जाता और वे दोनों इसी दौरान एक कामुक अनुभूति में बह जाते। सो जब समझावन सरकारी कार्यालयों में अपने केस का अनुश्रवण कर रहा होता, इधर से उधर, उधर से इधर मारा मारा घूम रहा होता, नित्य नई सरकारी प्रक्रियाओं से रूबरू हो रहा होता, वहाँ का क्लांत वातावरण जिसमें सामान्य ज्ञान और संप्रेषण की कोई जगह नहीं थी, करुणा और इनसानियत के विचार को जहाँ से निष्कासित कर दिया गया था, वहाँ समझावन तब भी कुछ हद तक अपनी मानवता और सरसता को बचाने में कामयाब था क्योंकि एक भाव प्रवण, कामुक लय उसके भीतर हमेशा गुंजित रहती, क्योंकि वह घर लौट कर दोबारा इन घटनाओं को तुलसी के साथ पुनर्जीवित करेगा और तब स्पर्श और आत्मीयता की सुकोमल तरंगें साथ साथ प्रवाहित होती रहेंगी। यह सोच कर समझावन उन मनहूस कार्यालयों में भी पुलकित महसूस कर जाता था।

अज्ञात की निरंतरता के ऐसे प्रहार के लिए तीन महीनों की अवधि बहुत होती है। चेतना और मनोभाव के लिए यह तीन साल से कम नहीं है। इस प्रक्रिया से गुजरने का समझावन पर गहरा असर हुआ। उसके संज्ञान और बोध में कहीं वृद्धि नहीं हुई थी। उसके सिर के सामने के भाग पर कुछ उजले बाल चमकने लगे, वह अक्सर अपना सिर खुजलाता था, विभ्रम और आशंका के कण उसकी आँखों में समाए रहते और चलते हुए उसे अक्सर यह बोध नहीं रहता कि वह आगे जा रहा है या पीछे लौट रहा है। गनीमत बस इतनी थी कि सूरी भाई के सहयोग और सहायता से रूट प्लान के काम में अभी कमी नहीं आई थी।


अफसर स्क्रीन को जलती आँखों से देख रहा था। एक स्लाइड के बाद दूसरी स्लाइड एक क्लिक के साथ बदल रही थी। प्रोजेक्ट के अनुमानित लाभ के विवरण और ग्राफ Global Intiative for Good Governance नामक संस्था ने प्रोजेक्ट में गहरी रुचि दिखाई। पत्रकार उसकी गोद में बैठी थी, आगे झुकी, उसके नितंब उन्मादी तरीके से फैल गए थे, उसकी साँस उखड़ने लगी थी। अफसर ने कहा, ' यह लकीर, यह सतह, यह खिड़की यह दो तरफा पारदर्शी दरवाजा, नागरिक प्रशासन संपर्क सतह, इस प्रोजेक्ट की सर्वाधिक महत्व की इकाई हैं। जैसे मैं पहले कई बार कह चुका हूँ हमारा एकमात्र अभिप्राय यह है कि नागरिक को सरकार को नोटिस पर रखने का प्रशासनिक अधिकार हासिल होना चाहिए। और इस तरह सरकार का यह वर्तमान दैत्य हर क्षण नागरिक के प्रति जवाबदेह होगा, इस खिड़की के माध्यम से। इस तरह हम नागरिक और सरकार के बीच बराबरी की सतह बनाएँगे।' पत्रकार अब उसके बगल में उसी कुर्सी पर बैठ गई थी। उसकी बाँहें अफसर के कंधों पर झूल रही थीं और उनकी टाँगें आपस में एक उलझे विस्तार में लिपटी थीं। ' समतल, संतुलित सतह' अफसर ने आगे कहा, ' ताकि नागरिक और सरकार समान नजर से आपसी समझ कायम करें, आँख से आँख, खुलापन और मुक्त पारदर्शी विनिमय!' पत्रकार ने अपनी शर्ट का पहला बटन खोल दिया था, उसके सीने का उभार झाँक रहा था, अफसर की आवाज काँपने लगी थी, शब्द एक बाढ़ की तरह निकले, जब वह फुसफुसाया, ' हालाँकि सिद्धांततः मैं चाहूँगा कि वे हमारी तरह बैठें, दोनों एक तरफ on the same side साझा लक्ष्यों के प्रति उन्मुक्तता से समर्पित स्वच्छ प्रशासन के आदर्श और एक महान राष्ट्र महान समाज की सामूहिक कल्पना में आबद्ध!' बदन की चाहत और आदर्श लोक की संकल्पना में भीगे वे दोनों और पास सरक आए, एक गहरे आवेग में दोनों लिपट गए थे, उनके बदन थरथरा रहे थे, पत्रकार और अफसर, दोनों एक साथ नागरिक और सरकार, और ज्वालामुखी से लावा बह रहा था जिस पर उनका आनंद और उनके अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का प्रोजेक्ट टिका था।

' मैं तुम्हें प्यार करती हूँ, हर वक्त तुम्हारी कामना करती हूँ।' वह फुफकारने लगी, उसकी आवाज लरज रही थी।' ' मैं तुममें आविष्ट हूँगा और तुम्हारे अंतरतम को आत्मसात करूँगा।' अफसर उन्माद की उठती लहर में कह रहा था और इस तरह वे ऐसे समय की कल्पना करने लगे जब उनके प्रोजेक्ट के माध्यम से सरकार और नागरिक एक दूसरे की बाँहों में सदा के लिए एक हो जाएँगे।


पुलिस थाना समझावन के घर से करीब अढ़ाई कोस दूर था। औसत दर्जे का थाना, अधिकतर गरीब इलाका, यहाँ का इंस्पेक्टर इस चार्ज से ज्यादा खुश नहीं था। विजय प्रकाश की ऊर्जा के लिए यह निश्चिय ही नाकाफी था। समझावन करीब साढ़े बारह बजे वहाँ पहुँचा। हमेशा की तरह वह साइकिल पर आया था और छतरी, टिफिन और झोला उसके पास था। चूँकि उसके लंबित केस को तीन महीने से ऊपर हो गए थे, अब वह दूसरा झोला इस्तेमाल करता था जिसका आकार बड़ा था। झोला लगभग पूरा कागजों से भरा था कुछ कागजात बाहर भी झाँक रहे थे और उसने झोले को वही पहले वाले अंदाज में क्रास की तरह धारण किया था।

समझावन वहाँ एफ.आई.आर. दर्ज कराने के इरादे से नहीं आया था। वह अपने केस से अब कुछ मायूस होने लगा था। उसके प्रयत्नों और खर्चे से जरूर अनेक कार्यालयों में काफी प्रगति हुई थी और होती जा रही थी। क्लर्क और दलाल अब भी उसे कह रहे थे कि वह धीरज रखे, मामला चल रहा है और कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा। पर अब स्थितियाँ दूभर और दुरूह होती जा रही थीं। उसकी केस - फाइलें संख्या और आकार में इस तरह फैल रही थीं जैसे बाढ़ में नदी फैलती जाती है। समझावन किनारा खोज रहा था न कि जल की बढ़ती, फैलती गहराई। उसे डूबने का अहसास होने लगा था। एक व्यक्ति ने किसी संदर्भ में उससे कहा कि अच्छा होगा वह थाने से भी पूछताछ कर ले। अगर यह सब झूठा है या किसी षड्यंत्र का हिस्सा है तो पुलिस से संपर्क करना ठीक होगा, और वैसे भी जो जानकारी कहीं नहीं मिल पाती उसका सुराग पुलिस थाने से मिलने का अच्छा चांस होता है, वहाँ मुखबिर और फालतू किस्म के लोग तरह तरह की बातें करते रहते हैं। कुछ सुराग शायद हाथ लगे, समझावन ने ऐसा सोचा था। थाने के अहाते में एक विशाल बरगद का पेड़ है। उसके नीचे मेज डलवा कर विजय प्रकाश हजामत बनवा रहा था। उसके हूँ के इशारे पर समझावन ने अपनी रामकहानी कह डाली। विजय प्रकाश की मूरत सीधे और नाई के शीशे में नजर आ रही थी। विजय प्रकाश चुप था और नाई का उस्तरा रामकहानी के कुछ मोड़ों पर बीच बीच में रुक जाता था। जब समझावन ने अपनी बात खत्म की तो इंस्पेक्टर ने डपट कर कहा, 'अबे साले जल्दी खत्म कर।' वह नाई से कह रहा था। अंततः हजामत खत्म हुई। थोड़ी देर विजय प्रकाश समझावन और उसके झोले को देखता रहा।

'अबे साले तू है कौन?' विजय प्रकाश ने अचानक पूछा मानों बाकी सब समझने के बाद यही एक बात जानने की बची है।

'सर, कबाड़ी का काम है।' समझावन ने नाम, पता, परिवार कहाँ से है, सब बता दिया।

'उस झोले में क्या है?' अब इंस्पेक्टर ने पूछा।

'सर, नोटिस है और दूसरे कागज हैं मेरे केस के बारे में।'

नोटिस? ये साला कबाड़ी जरूर कुछ सिरफिरा है, विजय प्रकाश ने सोचा, साली जीप का इंजन बैठ गया है नहीं तो निकल ही लेता, उसने सोचा, लगता है अब ट्रांसफर के लिए पैसा देना ही होगा। यहाँ कटनी मुश्किल है। बेचैन, वह उठ कर चहलकदमी करने लगा। ये साला कचरा थाना, इसका चार्ज इस कबाड़ी को ही दे देना चाहिए। यह सोच कर वह हो हो कर हँसा। थानाध्यक्ष को हँसते देख समझावन ने थोड़ी राहत महसूस की और नोटिस के बाबत दोबारा कुछ बोलने लगा। इंस्पेक्टर ने उसे रोका नहीं। वह कुछ देर दाएँ बाएँ चलता रहा, फिर बरगद से लटके एक झूले पर बैठ गया। वह कई चीजों के बारे में सोच रहा था। जैसे एस.एस.पी. की लड़की, उसकी जाँघें, टकले जज की फटकार जो उसे कल सुननी पड़ी थी, ठीक है मेरा भी मौका आएगा बच्चू... बैकग्राउंड में समझावन का उतावली से बोलते जाना। समझावन बोलते हुए व्यग्रता से अपने हाथ नचा रहा था, उसके चेहरे के भाव तेजी से बदल रहे थे। थानेदार के मनोरंजन और टाइम पास के लिए जैसे वह आदमी स्वाँग प्रस्तुत कर रहा है, इसलिए विजय प्रकाश ने उसे टोका नहीं, बीच बीच में कुछेक शब्द उसके कान में पड़ जाते थे।

'षड्यंत्र अबे कैसा षड्यंत्र बे।' थानाध्यक्ष ने शायद यह शब्द सुन लिया था और उसकी तंद्रा भंग हो गई थी। बस इसी वक्त वहाँ सुनील खरबंदा (खरबूजा) पहुँच गया। यह नगर निगम का वही क्लर्क था जिसने समझावन से पैसे लिए थे, समोसे, पान, संतरे, मिठाई खाई थी, काफी और चाय पी थी, उसे सलाह दे रहा था और बाद में जब समझावन ने पहली नोटिस के जलाए जाने की बात कही, तो वह आगबबूला हो गया था, उसे बुरा भला कहा था और कहा था कि ऐसे आदमी नाटक करके दूसरों को फँसाने के चक्कर में लगे रहते हैं।

लगभग एक दूसरे से नाक सटा कर इंस्पेक्टर और खरबूज खुसपुस करने लगे। सिपाही ने तरबूज की प्लेट लाकर दी और दो गिलासों में बेल का रस। बीच बीच में तरबूज की फाँकें - गप्प करते हुए उनके होंठ, जीभ और नाक लाल हो गए थे। समझावन बैठा रहा हालाँकि उसका जाने का मन था। पर इसके लिए इंस्पेक्टर की इजाजत जरूरी थी। हर एक मिनिट में खरबंदा अधमिंची प्रश्नवाचक आँखों से समझावन की ओर देख रहा था।

'अरे ये तो वही है, ये यहाँ खुराफात करने आ गया।' अचानक खरबंदा लगभग चीखा।

'क्या?' इंस्पेक्टर के कान खड़े हो गए।

खरबंदा उठ कर टेबिल पर बैठा और लगभग विजय प्रकाश पर झुकते हुए उसे कुछ बताने लगा। समझावन को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था पर इतना वह जान गया कि दोनों अब उसके बारे में बात कर रहे हैं। उनकी यह गुपचुप बातचीत पाँच मिनिट तक चलती रही। पाँच मिनिट जो समझावन के लिए पाँच घंटे जैसे थे। बीच बीच में उनकी आँखें समझावन को घूरती थीं और हर बार क्रोध और विस्मय से वे अधिक फैली और चमकती दिखाई देतीं और हर बार समझावन आशंका और डर से गड़ता, सिकुड़ता जा रहा था। बाकी सब कुछ निस्तब्ध सा था मानों थाने के इलाके में कर्फ्यू लगा हो।

और फिर, एकाएक एक करतब की तरह थाने में प्रचंड हरकत शुरू हो गई। चीजें इतनी तेजी से हो रही थीं कि समझावन के लिए वे धुँधला चक्र सा बन गईं : 'इसकी साइकिल जब्त करो, जाने इसकी है या चोरी की, टिफिन छतरी का कब्जा लो, अबे मूर्खों इन्हें खोल कर देखो, झाड़ो और इसकी जेबों की तलाशी लो, लाओ इसका झोला, इन कागजों की फर्द बनाओ, ये नोटिस नोटिस बक रहा था, जितने नोटिस मिलें उनका अलग ढेर बनाओ, समझे, और जरा मुस्तैदी से उनकी जाँच करो। ये देखो इन कागजों पर सरकारी मोहर लगी है, जरा देख कर बताना ये अर्जी फर्जी तो नहीं है। पता है।' थानाध्यक्ष ने समय निकाल कर इस बीच खरबंदा को बताया, 'कोतवाली के पास एक गैंग गिरफ्तार हुआ है, साले सौ सौ के नकली नोट बना रहे थे, बाई गाड, दो नोट मैंने देखे, ये करारे करारे और पता नहीं चलता असली हैं या नकली।' दीवान, दरोगा और सिपाही तीनों बड़ी मुस्तैदी से इंस्पेक्टर के आदेशों का पालन करने लगे। समझावन की जेब से एक टेस्ट ट्यूब और एक पतली छुरी भी निकली जिनका इस्तेमाल वह कूड़े के सैंपल इकट्ठे करने के लिए करता था।

इंस्पेक्टर ने अपनी सारी कुंठाएँ और बेचैनी समझावन के ऊपर लाद दी थी। फर्स्ट, सेकेंड, थर्ड डिग्री लगाए, दबिश दिए, धरपकड़, लाठी चार्ज किए विजय प्रकाश को छह महीने से ज्यादा हो गया था। यूँ नहीं कि उसका थाना क्राइम फ्री था। बात ये थी कि अच्छा थाना न मिलने के कारण वह बदकिस्मती का गम मना रहा था। छुटभैये अपराधियों को देख कर उसे अपनी विफलता का अहसास होता, वह कल्पनाओं में उग्रवादियों और खूँखार गैंग के लोगों से मुठभेड़ करता, उसके साथी को इस साल वीरता का पुरस्कार मिला था, और वह कुछ नहीं कर सका था इसलिए वह इन दिनों बिल्कुल निष्क्रिय हो गया था, उसकी बेचैनी और उबाल बढ़ता जा रहा था। यह समझावन की बदकिस्मती थी कि आज उसका उबाल न जाने क्यों फट पड़ा। उसकी काल्पनिक और कुंठित नजर ने समझावन में अनजाने ही एक भयानक और दिलचस्प अपराधी लक्षित कर लिया।

करीब साढ़े तीन घंटे तक विजय प्रकाश ने समझावन से गहरी और सख्त पूछताछ की। पहले बाहर बरगद के नीचे, फिर अंदर लाकअप के बगल में बनी एक छोटी सी कोठरी में। हर बीतते क्षण के साथ विजय प्रकाश को यह भरोसा होने लगा कि यह उसका बड़ा केस हो सकता है। अखबारों और मैगजीनों में बड़े बड़े मामलों की तहकीकात और पर्दाफाश की स्टोरीज से उसे यह आभास था कि अधिकतर बड़े षड्यंत्रों और अपराधों का पहला सुराग एक मामूली, अनजान ब्रेक से शुरू होता है। इसलिए इस मौके को वह गँवा नहीं सकता। कौन जानता है। हो सकता है यह साला कबाड़ी किसी बड़े षड्यंत्र की पहली, अस्पष्ट कड़ी हो।

विजय प्रकाश अधीर और उत्तेजित हो गया था। वह उठा और बाथरूम चला गया। कुछ पल वह अकेले सोचना चाहता था। उसने एक सिगरेट पी और इस निर्णय पर पहुँचा कि इस मामले की तह तक पहुँचना अनिवार्य है। तहकीकात को आगे बढ़ाने के लिए उसे केस दर्ज करना पड़ेगा। कुछ बातें तो साफ थीं। यह कि साला कबाड़ी तीन महीने से तमाम अलग अलग सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहा है, बहुत से नोटिस टाइप के कागज उसके पास हैं जो इतने अजीब हैं कि प्रथमदृष्टया फर्जी लगते हैं, दूसरे कागज हैं, रसीदें, पास और बहुत से अजीब टाइप के प्रार्थनापत्र जो आरोप, अपराध और सबूत की बात कर रहे हैं, जाँच का जिक्र बार बार आ रहा है, मामला क्या है यह कबाड़ी ठीक से बता नहीं रहा। फिर एक कागज के जलाए जाने और नष्ट करने की बात कुछ संगीन लगती है। यह साला कबाड़ी आखिर ढूँढ़ क्या रहा है ये सच बोल रहा है या बेवकूफ बना रहा है। विदेशी कंपनी के लिए रूट प्लान कहने को कूड़े का रूट प्लान है। ऐसा तो नहीं सुना। फिर कैसा रूट प्लान हो सकता है और इसके पास पैसे कहाँ से आए ये सारे सवाल सामने आए, हो न हो इसमें कोई राज है।

इसमें कोई शक नहीं कि ये आदमी बेहद डरा हुआ था और चीजें छिपा रहा था। सुनील खरबंदा की खुसर पुसुर ने मामले को और रहस्यमय बना दिया कि उसने इस आदमी को नगर निगम के दफ्तर में सात आठ बार देखा है और एक मुलाकात के बाद वह जब भी उसे देखता तो वह बचता हुआ निकल जाता था। कच्चा तालाब कालोनी की रेपुटेशन भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। ये साला कोई विदेशी एजेंट फेजेंट तो नहीं है इंस्पेक्टर का दिमाग चल रहा था।

'मेरी बात मानिए, यहाँ कुछ बड़ा चक्कर है। या तो ये खुद कोई शातिर आदमी है और अपनी असलियत गोल कर रहा है, या ये किसी एजेन्सी के लिए काम कर रहा है और इसे पूरे चक्कर का मालुमात नहीं।' खरबंदा ने कहा।

अंत में विजय प्रकाश ने एफ.आई.आर. दर्ज करने का निर्णय किया। खरबंदा ने तुरंत रिपोर्ट लिख दी। विजय प्रकाश इतना कमीना इंस्पेक्टर भी नहीं था। वह लंबी रेस खेलने की ख्वाहिश रखता था। वह काफी पैसा बनाता था क्योंकि सब बनाते हैं, पर वह अनावश्यक शोषण भी नहीं करता था।

समझावन जमीन पर उकड़ूँ बैठा था, अब उसके पाँव काँप रहे थे, उसका दिल धम धम धड़क रहा था, क्यों मैंने पहली नोटिस को जलाया और क्यों खरबंदा को बताया, वह स्वयं को धिक्कार रहा था, सिपाही और दीवान उसके अगलबगल खैनी फाँक रहे थे, और खरबंदा एक कागज पर कुछ लिख रहा था, विजय प्रकाश ने पूछा, 'क्यों बे क्या नाम बताया था तूने?'

'सर, समझावन।'

'अब ये कैसा नाम हुआ?' उसके बाद विजय प्रकाश ने कहा था, 'मैं तुम्हें अंदर ले रहा हूँ पर तेरे खिलाफ जो चार्ज लगे हैं वो जमानती हैं, जमानत का इंतजाम कर लो, जा सकते हो, जब बुलाऊँ तब पूछताछ के लिए आना होगा, हर हफ्ते यहाँ हाजिरी देनी होगी।' फिर एक देवता की तरह सूरी भाई स्कूटर पर प्रकट हो गए थे।

सबसे घातक घटनाक्रम वह होता है जब इनसान का हर डरावना स्वप्न, हर भयानक कल्पना, हर आशंका एक के बाद एक सच होती चलती है। जमानत लेने के बाद जेल से लौटने के पश्चात का समय समझावन के लिए ऐसा ही था। उसे हर हफ्ते दो दिन, बुद्धवार और शनिवार को तफतीश के लिए थाने में हाजिर होना पड़ता था। उसे सुबह साढ़े नौ पहुँच जाने की सख्त हिदायत थी। उस समय दीवान हैंडपंप पर बने चबूतरे पर धारीदार जाँघिया पहने नहा रहा होता था, और विजय प्रकाश अपने क्वार्टर में शायद सोया रहता। एक नियम की तरह उसे सबसे पहले आठ दस बाल्टी पानी हैंडपंप से खींचना पड़ता और हफ्ते में कम से कम एक दिन दीवान जी के बदन पर सरसों के तेल की मालिश करनी पड़ती थी। पूछताछ की कार्रवाई करीब साढ़े ग्यारह बजे के आसपास शुरू हो पाती थी।

अगले करीब पाँच हफ्तों में समझावन की हर पगली आशंका, हर काला डर सही साबित हुआ और वह इस घटनाक्रम के सामने मात्र एक दर्शक सा बन गया था। और यह सोच कर कि यह सब उसका खुद का करा-धरा था, बीज उसी ने बोया था जिसकी फसल अब कट रही है, मानों दलदल में उसने खुद छलाँग लगाई थी, उसमें न जाने कौन सी मणि वह ढूँढ़ने निकला था, उसका चेहरा रोज अधिक बुझा, अधिक मलिन दिखाई देता, उसने तुलसी को बताना भी लगभग बंद कर दिया था, सिर्फ हूँ, हाँ करता रहता, तुलसी को खोद खोद कर सारी बातें पूछनी पड़तीं, तुलसी के पेट में उनका पहला बच्चा पल रहा था और यही एक खुशनुमा तार था जो उन्हें पहले के समय की याद दिला देता था, और कम से कम इस वजह से ही वे पूरी तरह हर चीज से निराश नहीं हुए थे।

समझावन ने उन सब लोगों को देखा जिनसे वह सरकारी कार्यालयों में पहले मिल चुका था, जिनसे उसने घंटों सलाह पाई थी, क्लर्क, स्वागत कक्ष के कर्मचारी, गार्ड और निचले स्तर के कुछ अधिकारी, उनमें से बहुतों को उसने पैसे अदा किए थे, जिनसे बाद के दिनों में उसका करीब करीब दोस्ताना रिश्ता हो गया था, अक्सर उनसे काफी बातें होती थीं, वो अक्सर उसे बुलाते थे। वे सब एक दूसरे को नहीं जानते थे, पर समझावन को वे सब जानते थे, उनके तरीके, हावभाव और फाइलें पकड़ने का अंदाज एक जैसा था। वे तहकीकात और पूछताछ के लिए एक के बाद एक थाने आए, उनके हाथों में मोटी मोटी फाइलें थी, समझावन की केस फाइलें। उन्होंने समझावन की ओर देखा तक नहीं, उसका अभिवादन स्वीकार करना या उससे बात करना तो दूर की बात थी, और उन्होंने विजय प्रकाश के सवालों के लंबे और स्पष्ट उत्तर दिए। लंबे लंबे नोट्स, टिप्पणियाँ और पत्र, दस्तावेजों की प्रतियाँ उन्होंने थाने में जमा कीं। विजय प्रकाश की तफतीश के दौरान वे सब काफी संयत और गंभीर दिखाई देते थे, ऐसा लगता था उनके पास हर सवाल का जवाब है, उनके बयानों में आपस में कोई मतभेद नहीं थे, बल्कि कुल मिला कर उनके निष्कर्ष लगभग एक जैसे थे और विजय प्रकाश ने जिन जिन संभावनाओं, अपराधों या षड्यंत्र के अंदेशों का जिक्र किया, वे सब उनसे सहमत थे और इस थ्यौरी में वे दो चार सूत्र और कोण अपनी ओर से भी जोड़ दे रहे थे। सारे साक्ष्य एक दूसरे के पूरक थे, एक दूसरे को सिद्ध कर रहे थे और पूरी कार्यवाही में समान बात यह थी कि हर कथन और हर साक्ष्य समझावन के खिलाफ जा रहा था और एफ.आई.आर. में लगाए गए आरोप पुख्ता हो रहे थे। इन सब लोगों ने भी अपनी ओर से अलग प्राथमिकी दर्ज कराई, तफतीश का दायरा बढ़ता जा रहा था और किसी भी एफ.आई.आर. में नोटिसों के बारे में कुछ नहीं कहा गया था, उनके अधूरे और अस्पष्ट होने के बारे में, जबकि हर प्राथमिकी में आरोपी द्वारा कुछ दस्तावेजों के नष्ट किए जाने का उल्लेख जरूर किया गया था।

विजय प्रकाश इतना बुरा पुलिस अधिकारी नहीं था। पूरे प्रकरण में उसने बस दो बार समझावन पर हाथ उठाया और दीवान जी से एक बार उसकी लाठी से पिटाई कराई। पर दशाएँ इससे खराब भी हो सकती थीं और एक दिन उसने समझावन को बता दिया कि अब उसके खिलाफ चार्जशीट तैयार करने की कार्यवाही शुरू की जा रही है और चार्जशीट कोर्ट में दाखिल होगी और वहाँ उसके मुकदमे का फैसला होगा। इसका मतलब यह था कि अब समझावन को मुकदमे के लिए एक वकील करना होगा पर अभी यह आगे की बात थी। और समझावन यह ठीक से नहीं जानता था कि मुकदमे की इत्तला उसे कैसे होगी, और उसका मुकदमा कहाँ चलेगा और उसे क्या कार्यवाही करनी होगी। यह क्षणिक विचार जैसे ही आता, समझावन सिहर जाता था।

दुःस्वप्न भी कभी न कभी खत्म होता है। एक दिन अचानक विजय प्रकाश का स्थानांतरण हो गया। उसकी तैनाती शहर कोतवाली में की गई जिसके वह सपने देखा करता था। सो जैसे ही उसे वायरलैस पर इत्तला मिली, उसने कैप सिर पर लगाई, वह मुस्कराया, इत्तफाक से उसी समय समझावन वहाँ पहुँचा था, शनिवार था, उसने समझावन की पीठ थपथपाई, दीवान जी से कहा, 'अरे दीवान जी इसका केस थोड़ा हल्का कर देना ये हमारे लिए गुड लक लेकर आया है।' और वह बिना पीछे मुड़े थाने से बाहर निकल गया। मोटर साइकिल की अचानक गर्जना से ज्ञात हुआ कि इंस्पेक्टर जा चुका है।

विजय प्रकाश के जाने के बाद समझावन के केस को लेकर किसी बड़े षड्यंत्र एजेन्सी की घुसपैठ, किसी बड़े गिरोह, जासूसी, गुप्त सूचनाओं की चोरी, कोई बड़े कांड से संबंधित होने का माहौल और अटकलें एकाएक स्वतः खत्म हो गईं। समझावन की एफ.आई.आर., उसका मामला और तफतीश हजारों में एक मामूली, गुमनाम रिपोर्ट बन गई, एक छोटा मोटा, महत्वहीन केस, जो सिर्फ कागजों के बीच जीता रहता है, महीनों तक, बरसों तक यूँ ही आगे पीछे सरकता रहता है, एक लंबित प्रकरण जिसकी ओर ध्यान देने की कोई आवश्यकता नहीं है, और जिसका कानून और व्यवस्था से, सामाजिक व्यवस्था और न्याय से कोई सरोकार नहीं है, किसी सूने, खाली गोदाम में रखा अचार का मर्तबान। यदा कदा किसी पुलिसकर्मी को उसकी याद आ जाती है और वह जायके के लिए उसमें से एक फाँक उठा लेता है और नियम यह है कि यह अचार का डिब्बा कभी खाली नहीं रहना चाहिए, इसलिए यह समझावन की जिम्मेदारी है कि वह इस बरतन को बीच बीच में भरता रहे, उसमें अचार की नई फाँक डालता रहे।

यह सब अब अतीत हो गया है, नोटिसों का आगमन, थाने में एफ.आई.आर., जेल की दो दिन की यात्रा। जितने अप्रत्याशित तरीके और अनजान कारणों से नोटिसों का आना शुरू हुआ था, इतने ही अप्रत्याशित तरीके और अनजान कारणों से उनका आना बंद भी हो गया। चूँकि दुनिया बहुत बड़ी है, चीजें अपनी सामान्य अवस्थाओं में धीरे धीरे लौट रही हैं। एक मौजूदा समय है जिसमें समझावन अंडरट्रायल है, उसकी तरह लाखों लोग अंडरट्रायल हैं, इसलिए यह कोई अनहोनी बात नहीं है। एक भविष्य भी है जिसके बारे में कोई नहीं जानता क्योंकि कभी न कभी, वक्त बेवक्त चार्जशीट दाखिल होने और मुकदमा चलने की संभावना तो बनी ही रहेगी। घटना के बारे में शहर के लोगों को जानकारी हुई। किसी को आश्चर्य नहीं हुआ न ही किसी ने कोई खास प्रतिक्रिया ही व्यक्त की। पर अधिकतर लोग इस बात से सहमत थे कि ये दोनों लोग, सूरी भाई और समझावन निहायत आवारा किस्म के लोग हैं जो दिन रात शहर के गंदे, खराब इलाकों में नाकारों की तरह घूमते रहते हैं। लोगों ने यह माना कि आश्चर्य तो सिर्फ इस बात का है कि सूरी इस केस से कैसे बच गया।

केवल दो एक चीजें रह जाती हैं जो दिलचस्प हैं पर जिनके बारे में कुछ ठीक से अंदाजा नहीं लग रहा।


क्या यह संयोग था कि अफसर ने एक स्वागत मेल साइन करते वक्त कहा था : ' समझावन ये भी कोई नाम है मैं शर्त लगा सकता हूँ कि हिंदुस्तान की किसी वोटरलिस्ट में यह नाम नहीं होगा। न इस नाम का कोई राशनकार्ड बना होगा। सरकारी लोन, राहत, अनुदान की तमाम सही और फर्जी सूचियों में कभी यह नाम अंकित नहीं किया गया होगा। न इस नाम से कोई लाइसेन्स, रसीद, पास बुक या रजिस्ट्रेशन दर्ज हुआ होगा। मेरी जान, इसलिए यह नाम, यह इनसान अनौपचारिक क्षेत्र, आप्लावित यानी छिपे हुए अर्थतंत्र का नायाब उदाहरण है, उसका आईना है। और जानेजिगर, इस स्वागत मेल, इस नोटिस के जरिए हम उसे अनौपचारिक परिधि से औपचारिक तंत्र में ला रहे हैं।' यह कहने के बाद अफसर और पत्रकार सम्मोहक अतिरेक में आपस में लिपट गए थे।


पर एक सवाल तब भी रह जाता था।

क्या अफसर का स्वागत मेल समझावन को कभी मिला था? क्या अफसर और समझावन के बीच नागरिक सरकार इंटरफेस कायम हुई?

इसका जवाब तो अफसर ही दे सकता है। वह गुणी है। उसकी विशेष ख्याति है। और उसकी सहायता के लिए पत्रकार भी है जो उसे तन और मन से बेहद चाहती है।


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हिंदी समय में राजू शर्मा की रचनाएँ