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विमर्श

दलित साहित्य-विमर्श में स्त्री
बजरंग बिहारी तिवारी


हिंदी में दलित लेखन की व्यवस्थित शुरुआत सन् 1980 तक हो चुकी थी। इस प्रकार एक आंदोलन के रूप में इस लेखन ने बीस वर्ष की अवधि पहले ही पार कर ली है। बीस वर्ष में एक पीढ़ी तैयार होती है। सामाजिक आंदोलन और साहित्य के इतिहास में इतना वक्त एक युग माना जाता है। दलित लेखन का पहला युग तमाम प्रश्‍नों और सैद्धांतिक मुद्दों के शमन, दमन और समाधान में लगा रहा। कई निर्णायक बिंदुओं पर उसका स्टैंड स्पष्ट हुआ। कई असुविधाजनक सवालों पर डटकर सामना किया गया तो कई सवाल स्थगित भी किये गये। कुछ सवालों को लेकर अभी भी अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है तो कइयों के जवाब से धुंधलका बढ़ा है। दलित लेखन को शुरू में नजरअंदाज करने की कोशिशें भी हुई। इसके प्रति हिकारत का भाव भी पनपा-पनपाया गया। इस पर कलाहीनता असाहित्यिकता आदि तरह-तरह के आरोप भी लगे। इन सारे आरोपों, प्रत्यारोपों को पार करते हुए दलित-लेखन ने अपना मौजूदा मुकाम हासिल किया है। हिंदी भाषी चिंतन-जगत और साहित्य समाज में अब स्थिति उलट गई है। अब इस उभार का चौतरफा स्वागत हो रहा है। सभी छोटी-बड़ी पत्रिकाओं के विशेषांक दलित-विमर्श को लेकर निकल रहे हैं। प्रतिक्रियावादी-पुनरूत्थानवादी संपादकों से लेकर अतिक्रांतिकारी संपादक तक इसकी तारीफ में बढ़-चढ़ कर बोल रहे हैं। सब दलित-अस्मिता की ऐतिहासिक भूमिका को लेकर आश्‍वस्त हैं। अंध-विरोध से लेकर अंध-समर्थन तक की यह छलांग चकित करने वाली है। हमारे कई सम्मानित आलोचकों ने हिंदी क्षेत्र को हद दर्जे का गतिहीन और दकियानूस इलाका कहा है। इस इलाके का शिक्षित वर्ग अगर किसी उभार पर लगभग सर्वानुमति बनाता है तो उस उभार की छानबीन की जानी चाहिए, ममता और द्वेष से परे रहकर इसका विश्‍लेषण किया जाना चाहिए कि आखिर इस आंदोलनधर्मी लेखन में ऐसा क्या है जो हिंदी क्षेत्र की सभी चिंतन-धाराओं को अपने-अपने काम का लगता है। दलित आंदोलन पर विचार करते समय यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इसका एक अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य भी है।

आमूल सामाजिक बदलाव की घोषणा करने वाले आंदोलनों की सफलता का पता कैसे चले? उसकी प्रगति-आख्या किस तरह लिखी जाए? प्रतिमान-निर्धारण के लिए कार्ल मार्क्स की सहायता ली जा सकती है। मार्क्स और ऐंगेल्स ने 'द होली फैमिली' में मानव-मुक्ति की वास्तविक स्थिति जानने के लिए फूरियर का यह कथन निष्‍कर्ष के रूप में प्रस्तुत किया था। 'ऐतिहासिक युग परिवर्तन हमेशा इस बात से तय होता है कि मुक्ति की ओर औरतों ने कितनी तरक्की की है-क्योंकि औरत से मर्द के संबंध में यानी कमजोर से ताकतवर के संबंध में ही बर्बरता के ऊपर मानवीय व्यवहार की विजय सबसे साफ तौर पर नजर आती है। मानव मुक्ति का स्वाभाविक पैमाना है कि नारी मुक्ति किस हद तक पहुंची'। कालांतर में मार्क्स ने अपने एक पत्र में उक्त निष्‍कर्ष को पुनःप्रस्तावित किया, ''सामाजिक उन्नति की माप ठीक इसी बात से होती है कि 'फेयर सेक्स' (रमणी?) के (बदसूरतों सहित) लोगों की सामाजिक हैसियत कैसी है?''

हम यह जानते हैं कि वर्णवाद असल में पितृसत्तात्मक दमनकारी व्यवस्था है जिसमें सवर्ण पुरुष का ही वर्चस्व है। दलित लेखन वर्णवाद को संपूर्णता में नकारता है। वर्णवाद को समाप्त करने का मतलब है दलित और स्त्री को समान रूप से शक्ति-संपन्‍न बनाना। ग्राम्‍शी का कहना था कि निम्न वर्गों को अस्वीकार की सीरीज में ही आत्म-सजगता अर्जित करनी होगी। हम यह देखें कि मनुवादी समाज-व्यवस्था की तमाम मान्यताओं का निषेध करने वाला दलित आंदोलन स्त्री प्रश्‍न पर मनुवादी समझ को कितना अस्वीकार कर सका है? स्त्री को शक्ति-संपन्‍न बनाने, उसके प्रति अपेक्षित संवेदनशील होने, उसके श्रम के मूल्य को उद्घाटित करने, उसके प्रति व्याप्त अन्यायपूर्ण पूर्वाग्रहों को समाप्त करने, कुल मिलाकर, स्त्री को स्वतंत्र व्यक्तित्व प्रदान करने में दलित रचनात्मकता की क्या भूमिका रही है? दलित आत्म-सजकता ने अपने लिए जो आकाश निर्मित किया है, उसमें स्त्री का क्या हिस्सा है? हमारा पारंपरिक मानस स्त्री को बहुमूल्य संपत्ति के रूप में देखता है। दलितवाद क्या स्त्री को मानुषी का दर्जा देने, दिलवाने के प्रति प्रयत्नशील है? तमाम सामाजिक आंदोलन स्त्री-प्रश्‍न पर चुप्पी साधे हुए मिलते हैं। दलित-विमर्श इस मुद्दे को किस रूप में व्याख्यायित करता है? उसकी व्याख्या के निहितार्थ क्या हैं स्वयं दलित समुदाय की स्त्रियां, दलित-विमर्श से किस तरह प्रतिश्रुत हो रही हैं? दलित चिंतक इनके प्रति कैसा रवैया रखते हैं?

मुक्ति का कोई भी सच्चा अभियान अंततः सभी की मुक्ति के लिए होता है। एक समुदाय की मुक्ति के लिए चलने वाला आंदोलन दूसरे तमाम मुक्ति आंदोलन के प्रति सहयोगी भाव रखे-यही स्वाभाविक स्थिति होगी। अस्मिता विमर्श एक मुक्तिकामी योजना है। एक उत्पीड़ित अस्मिता, मुक्ति के लिए संघर्षरत अन्य अस्मिताओं से जुड़कर एक वृहत्तर परिप्रेक्ष्य तैयार करती है। इस क्रम में वह अपने मुक्ति संग्राम को वांछनीय और वैध ठहराती है, साथ ही, मुक्ति की वह ज्यादा मानवीय, सर्वव्यापी परिभाषा भी रचती है। वैसे, अस्मिता की राजनीति के सामने ज्यादा प्रलोभन भरा, सहूलियतपूर्ण रास्ता यह होता है कि वह अपनी अस्मिता को ही अंतिम लक्ष्य मान ले। दूसरी दमित अस्मिताओं से जुड़ने उन्हें लामबन्द करने के बजाय स्वयं को एक प्रतिष्ठान में तब्दील कर ले। उसकी चिंता के केंद्र में समग्र संरचनागत परिवर्तन न होकर मात्र अपने समुदाय को वर्तमान सत्ता-तंत्र में अधिकाधिक रियायतें दिलाना भर रह जाए। कहना न होगा, ऐसा अस्मिता-विमर्श वास्तविक अर्थों में मुक्तिकारी नहीं रहता, कोई दूरगामी और निर्णायक असर नहीं डाल पाता।

हमारे समाज में दलित-विमर्श से पहले स्त्री-विमर्श का आगमन हुआ। तमाम वजहों से स्त्री-अस्मिता अपने को उस तरह से संगठित आंदोलित और राजनीतिक अर्थों में आक्रामक नहीं बना पाई जिस तरह से बाद के दिनों में दलित-अस्मिता ने अपने को बनाया। दलित-अस्मिता विमर्श ने अपना जो शुरुआती घोषणापत्र पेश किया, उसमें तमाम छोटे-बड़े मुक्ति-संग्राम अंतर्भुक्त होते दिखे-यह उम्मीद भी बंधी कि ब्राह्मणवाद का जो पितृसत्तात्मक रूप है, और उसमें स्त्री दमन की जो तमाम तरकीबें हैं, उनका अंत होगा और नई समाज व्यवस्था शोषणरहित, समतामूलक और अधिक मानवीय होगी। दलित आडियोलॉग मानते हैं कि इतिहास ने उन्हें व्यवस्था के रूपांतरण का एक दुर्लभ अवसर प्रदान किया। वे विभिन्न प्रसंगों में अपनी इस ऐतिहासिक भूमिका की चर्चा करते हुए भी दिखाई पड़ते हैं, इस अस्मिता के एक प्रमुख हस्ताक्षर का कहना है ''दलित मुक्ति के महान उद्देश्‍य हमारे सामने साफ हैं, और इतिहास निर्माण करने की जिम्मेदारियों ने हमारे कंधे मजबूत कर दिए हैं। साहित्य में नए युग का संपादन अब हम दलितों के हाथों से ही होना है।'' एलिस बाउल्डिंग के अनुसार ऐसी महान घोषणाओं को एक सवाल से अनिवार्यतः टकराना पड़ता है ''इतिहास वही सवाल सभी क्रांतिकारियों से पूछता है-क्या आप प्रभुत्व के पुराने ढांचों और व्यवहारों को ध्वस्त करके उनकी जगह मानव संबंधों के नए रूपाकार लाएंगे। अथवा पुरानी प्रभुत्व व्यवस्था में नए लोगों का प्रवेश भर करायेंगे?'' ब्राह्मणवाद का इतिहास देखते हुए इस प्रश्‍न की अहमियत और भी बढ़ जाती है ब्राह्मणवाद का मूलोच्छेद करने के लिए जिस सुनियोजित तैयारी की दरकार होती है, उसकी जगह अगर तुरत-फुरत कुछ कर डालने को हड़बड़ी दिखाई जाएगी तो विफलता ही हाथ लगेगी। वैकल्पिक व्यवस्था देने के लिए पूरी जीवन-पद्धति, भाषाई-संस्कार और नए विचार-स्रोतों का संधान करना होगा। इनमें से किसी एक को दरकिनार कर ब्राह्मणवाद का मुकाबला नहीं किया जा सकता। ब्राह्मणवादी रणनीति को अपनाकर यह सोचना कि उसके हथियार से उसे ही पराजित कर देंगे, मुगालते में रहना है। हां, इस प्रक्रिया में हो सकता है कि यह व्यवस्था प्रतिपक्ष को नेतृत्व देने वाले महत्वाकांक्षी लोगों का समायोजन कर ले और कुछ ऊपरी तब्दीलियों के साथ पूर्ववत बनी रहे।

हिंदी में दलित लेखन ने अपने शुरुआती दौर से जिन प्रश्‍नों को हल करना चाहा-उनमें से एक यह था कि स्त्री को दलित माना जाए या नहीं। दलित वर्ग की महिलाओं के संबंध में तो बेहिचक स्वीकारा गया कि वे दलित है, सारा विवाद गैर-दलित समुदाय की महिलाओं को लेकर पैदा हुआ। दलित विचारक इस प्रश्‍न पर अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाए हैं। कभी कहा जाता है कि सारी महिलाएं दलित वर्ग में आएंगी, तो कभी गैर-दलित समाज की महिलाओं को शोषक वर्ग का हिस्सा मानते हुए उन्हें अलग कर दिया जाता है, ऐसा असमंजस एक दौर में मार्क्सवाद में भी था। रोजा लक्जमबर्ग ने बलपूर्वक कहा था कि मताधिकार केवल सर्वहारा वर्ग की स्त्रियों को मिलना चाहिए, बुर्जुआ तबके की स्त्रियों को नहीं। वे तो 'परजीवी की परजीवी हैं।' बाद के नारीवादियों ने मार्क्सवाद से यह जवाब चाहा कि स्त्रियों को किस वर्ग में रखा जाए। लक्जमबर्ग की तरह अधिकांश मार्क्सवादी स्त्री को मात्र स्त्री के रूप में देखने में असमर्थ थे। वे विशेषताएं जो स्त्री को वर्ग से परे जाकर उसे एक सूत्र में बांधती हैं, मार्क्सवाद की विचार-परिधि में अंट नहीं सकती थीं। बुर्जुआ वर्ग की महिलाएं अगर ''परजीवी की परजीवी'' हैं तो सर्वहारा वर्ग की गुलामों की गुलाम। मार्क्सवाद की सीमा अगर वर्ग की अवधारणा थी तो दलितवाद की जाति है जाति से भिन्न आधार की कल्पना भी दलित-विमर्श के लिए विचलन है। दलित विमर्श का केंद्रीय संदर्भ बिंदु वर्ण व्यवस्था है। राजेन्द्र यादव कहते हैं कि वर्ण व्यवस्था चूंकि शूद्रों और स्त्रियों के साथ एक-सा सुलूक करती है इसलिए स्त्रियों को दलित मानना चाहिए, दलित विचारकों का तर्क है कि सवर्ण समाज की स्त्रियों की जीवन-स्थितियां दलित समुदाय की स्थितियों से समानता नहीं रखती। दलित समुदाय की स्त्रियों को जाति के नाम पर जो मान-अपमान झेलने पड़ते हैं, उन अनुभवों से सवर्ण समाज की स्त्रियां अछूती रह जाती हैं। एक डर यह भी है कि अगर ''दो प्रतिशत सवर्ण स्त्रियां दलित स्त्रियों के प्रतिनिधि'' मान ली जाएंगी तो यह 'दुर्भाग्य' ही होगा। रमणिका गुप्ता 'युद्धरत आम आदमी' की संपादक हैं। वे दलित विषयों पर निरंतर लिखती भी हैं। वे दलित मानी जायें या नहीं? सूरजपाल चौहान का कहना है, ''वाकई रमणिका गुप्ता ने दलित साहित्यकारों को एक मंच प्रदान किया है। इस बात में दो राय कतई नहीं है, लेकिन इस तरह अन्य कई सवर्ण साहित्यकार भी दलित लेखन कर रहें है तो क्या हमें उन्हें भी रमणिका गुप्ता की तरह दलित साहित्यकार मान लेना चाहिए? ''यहां दलित-दृष्टि सवर्ण स्त्री या पुरुष में कोई फर्क नहीं मानती। लेकिन इस उद्धरण के संदर्भ में प्रश्‍न उठाया जा सकता है कि यहां मसला दलित साहित्यकार की परिभाषा और परिधि का है, न कि स्त्री मात्र को दलित मानने का। लेकिन, दूसरे दलित चिंतक इस सवाल पर अपना पक्ष स्पष्ट करते हैं,'' मैं गैर दलितों की स्त्री को दलित नहीं मानता। द्विजों की नारियां दलित नहीं हैं, उनका हमारे साथ सुलूक उनके पुरुषों से भी ज्यादा कठोर है, और हमें उनकी उतनी ही बात से मतलब है इसके सिवा हमारा उनका कोई संबंध नहीं है।'' दलित चिंतक के ध्यान में है कि ''हिंदुओं के धर्म शास्त्रों में निश्चित रूप से स्त्री, शूद्रों को समान माना गया है, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि द्विजों की स्त्रियां दलितों की लड़ाई में दलितों का साथ देंगी... द्विज लोग अपनी स्त्रियों को कितना भी सतायें और मारें-पीटें, वे हमारी दलित स्त्रियों को साथ देने नहीं आ रहीं हैं।'' अपर्वजन की यह धारणा कई तत्वों से बनी हो सकती है। काल-क्रम से चला आ रहा सामान्य सामाजिक-अनुभव, हो सकता है, अस्मिता की राजनीति के दबाव में एक ही अर्थ मे रूढ़ कर दिया गया हो।

रचना की प्रामाणिकता, दलित-विमर्श के केंद्रीय आग्रहों में से एक है। किसी रचना को प्रामाणिक मानने के अनेक आधार हो सकते हैं, लेकिन दलित-विमर्श स्वानुभव को ही प्राथमिक और अंतिम मानता प्रतीत होता है। अनुभव का आत्यंतिक आग्रह अनुभववाद तक जाता है। ऐसे में रचना की परम्परासिद्ध तरकीब 'परकाया-प्रवेश' अर्थहीन सिद्ध होती है किसी रचना का मूल्य उसकी प्रामाणिकता से निर्धारित होता है और प्रामाणिक रचना देने के लिए रचनाकार सिर्फ और सिर्फ वही लिखे जो उसका अपना अनुभव हो। दूसरे के अनुभव जगत में पैठना, उसके संवेदन को आत्म-सात करना, उसे व्यक्त कर पाना संदिग्ध ही रहेगा। निष्कर्ष यह, कि रचना-जगत में प्रतिनिधित्व का तर्क नहीं चल सकता। इस मान्यता का ही परिणाम है दलित-साहित्य में आत्मकथात्मक रचनाओं की प्रचुरता। जिस समाज में एक बड़े समुदाय की इच्छाएं-अनिच्छाएं, संघर्ष और राग स्वयं उसके द्वारा अपवाद रूप में ही व्यक्त हो पाए हों, वहां 'प्रामाणिक अनुभव' की महिमा को बलपूर्वक रेखांकित किया जाना आश्‍चर्यजनक नहीं है। दिक्कत तब पैदा होती है जब आत्मानुभव को ही एक मात्र प्रतिमान बना दिया जाए। यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि 'अनुभव की प्रामाणिकता' के तर्क ने दलित साहित्य को जरूरी आक्रामकता दी है। इससे कलात्मक अभिव्यक्ति का आतंक टूटा है। लिखने का आत्म-विश्‍वास मजबूत हुआ है। लेकिन एक सीमा के बाद यह तर्क अनुभववाद में परिणत होता है। हम जानते है कि अनुभववाद कोई यूटोपिया नहीं दे सकता। इससे कोई विजन नहीं बनता। दीर्घावाधि की कोई कार्य योजना नहीं बन सकती। रचनाकार के जल्दी ही रीत जाने की आशंका रहती है। अनुभवाद इतिहास के साथ एक विशेष तरह का सलूक करता है। इससे इतिहास का बहुआयामीपन, संष्लिष्टता, व्याख्या की अंतहीन संभावनाएं आहत होती हैं। एक विचारधारा विशेष से जुड़ा हुआ अनुभववाद चयनधर्मी होता है। वह एक तरह की अ-संवेदनशीलता भी पैदा करता है, आपके अनुभव सर्वोपरि होते हैं। आप की पीड़ा ही विचारणीय रह जाती है। दूसरे समुदाय को आप एकीकृत इकाई मानते हैं, उसके किसी समूह की पीड़ा आपके लिए कोई मायने नहीं रखती। फरवरी 2001 में 'हंस' में प्रकाशित सूरजपाल चौहान की कविता देखें। इसमें एक दलित के दुख को सती प्रथा से समीकृत किया गया है और जाहिर है इस प्रथा की दारुणता बेमतलब की साबित हुई है :

काश!

तुम किसी दलित के घर पैदा होते

विशेषकर

दलितों में दलित कहे जाने वाले

भंगी के घर।

तुम्हें उठानी पड़ती

बजबजाती गंदगी

और ढोना पड़ता

गू-मूत से भरा टोकरा

सिर पर रखकर

विश्‍वगुरू होने का ढिंढोरा पीटने वालों

भूल जाते तुम

सती प्रथा बंद कराने की बातें

जो बनाई तुमने अपने लिए

सिर्फ अपने लिए।

दलित लेखन और चिंतन की पिछले बीस वर्षों की सघन सक्रियता ने उसे एक निर्णायक मुकाम पर पहुंचाया है। यह है-सामाजिक अस्मिता से सांस्कृतिक अस्मिता का सफर। सामाजिक अस्मिता की राजनीति में आक्रोश की अतिशयता तो होती है, मगर अवधारणाओं के निर्माण और ग्रहण के प्रसंग में लचीलेपन और खुलेपन की गुंजाइश भी बनी रहती है। इसके बरक्स सांस्कृतिक अस्मिता की राजनीति में आक्रोश का 'इंटर्नलाइजेशन' हो चुका रहता है। परिप्रेक्ष्य और अवधारणाएं प्रस्तरीभूत संरचनाओं में ढ़ाल दी जाती हैं। सिद्धांतों को विचारधारा का रूप मिलता है। और, पूरा समुदाय एक रूप, संगठित इकाई होने की भरसक चेष्टा करता है। क्योंकि सांस्कृतिक अस्मिता एक 'महान लक्ष्य' से परिचालित होती है, इसलिए वह उन सवालों से बचना चाहती है जो उसे असुविधाजनक लगते हैं। समुदाय के भीतर से उठने वाले विसंवादी स्वरों को अनसुना कर दिया जाता है। उन्नीसवीं सदी की हिंदू सांस्कृतिक अस्मिता का उदाहरण हमारे सामने है। इसने देश की राजनीतिक स्वाधीनता का महान लक्ष्य बनाया था। ऐसे सारे स्वर जो इस महान लक्ष्य से इतर या प्रतिकूल थे, जो स्वाधीनता की भिन्न अवधारणा प्रस्तुत कर रहे थे, एक सीमा तक उपेक्षित किए गए। बाद में उनकी नीयत पर ही शक किया जाने लगा। प्रचारित किया गया कि ऐसे लोग अंग्रेजों के मोहरे हैं और अंदर की कमजोरियों को उजागर करके आंदोलन को महान लक्ष्य के पवित्र पथ से भटका रहे हैं। प्रतिउपनिवेशीकरण के प्रश्‍न को प्राथमिक मानने वाले डॉ. अंबेडकर को इसीलिए अंग्रेजों का पिट्ठू कहा गया। सांस्कृतिक अस्मितावादियों ने समाज सुधार की कोशिशें बंद करायी थीं, आंतरिक शोषण के सवाल को नेपथ्य में डाल दिया था। डॉ.अंबेडकर के प्रति उनकी चिढ़ अब भी जब तब व्यक्त होती रहती है। दलित और स्त्री प्रश्‍न से डरने-बचने वाली हिंदू सांस्कृतिक अस्मिता आज सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में जानी जाती है।

दलित सांस्कृतिक अस्मिता भी कुछ प्रश्‍नों से कतराती देखी जा सकती है। प्रसंग ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी 'शवयात्रा' का है। इस कहानी का मूल कथ्य यह है कि दो दलित जातियां आपस में समानता का व्यवहार नहीं करतीं और अपने उच्चता-बोध के चलते एक दलित जाती दूसरी दलित जाति का अपमान भी कर सकती है। स्पष्ट है, 'शवयात्रा' कहानी कोई नवीन सूचना नहीं देती। भारतीय समाज से सामान्य परिचय रखने वाला व्यक्ति भी इस हकीकत से वाकिफ है। कहानीकार का मंतव्य है कि जाति-व्यवस्था की समग्र मीमांसा हो, विमर्श के केंद्र में वे बिंदु भी आएं जिनपर अब तक पर्याप्त चर्चा नहीं हुई है।

ब्राह्मणवाद की मजबूत पकड़ को दर्शाने वाली यह कहानी समकालीन जाति-विमर्श में नया आयाम जोड़ सकती है। लेकिन इस कहानी पर दलित विचारकों की जो प्रतिक्रियाएं आयीं, वे गौरतलब हैं। इससे इस धारणा को बल मिला कि सांस्कृतिक अस्मिता की राजनीतिक अपने घोषित उद्देश्‍यों में मुक्तिकामी होते हुए भी आंतरिक आलोचना का कोई अवकाश नहीं देती। 'महान लक्ष्य' को अनाहत रखने के तर्क से ऐसे रचनाकार 'संदिग्ध' करार दिये जाते हैं जो 'केंद्रीय विचार' से किचिंत भिन्न मत रखते हों। 'शवयात्रा' पर जो मूल्य-निर्णय दिये गए, उनमें से कुछ ये हैं :

(क) इस कहानी से सच्चाई कम, गलत-फहमियां अधिक पैदा हुई हैं।

(ख) ये दलितों के अंदरूनी अपने अन्तर्विरोध हैं। इसका आशय यह कदापि नहीं है कि इससे कोई तीसरा पक्ष लाभ उठाए... जागरुक दलित किसी तीसरे को हस्तक्षेप करने का अधिकार व अवसर नहीं दे सकता।

(ग) कुछ कमजोरियां हमारी अपनी भी है। हम कभी-कभी यह भूल जाते हैं कि हमारे इस साहित्यिक आंदोलन का व्यापक मूल लक्ष्य क्या है?

(घ) कहीं ऐसा तो नहीं कि दलित साहित्य का राजनीतिकरण हो रहा हो? इसमें पहला वर्ण एक ही श्रेणी (अछूत) की दो उपजातियों को आपस में लड़ा देना चाहता हो ताकि इसमें फूट पड़े और जिससे अधिकार मांगें जा रहे हैं, वह साफ बच निकले।

(ड़) फूटपरस्ती को बढ़ावा देने की मंशा से छापने वाले संपादक दलित साहित्य के इतिहासकार की नजर से बच नहीं सकते।

विचार और भावना के अनुकूलन पर सांस्कृतिक अस्मिता की विचारधारा का खास बल रहता है। एक तरफ यह कुछ सत्यों की प्राप्ति में लगी होती है, दूसरी ओर सत्य के कुछ क्षेत्रों को वर्जित-क्षेत्र बना देती है। इसके द्वारा तैयार संहिता यह सुनिश्चित करती है कि भावनात्मक प्रतिक्रियाएं और सत्यान्वेषण तयशुदा मॉडल के अनुसार हो। इससे सत्य का गोपन प्रारंभ होता है और सचाइयों की एक वर्जित, भूमिगत दुनिया तैयार हो जाती है। इस विचारधारा के सामने अपने विवेक का समर्पण न करने वाला रचनाकार भर्त्सना का अधिकारी होता है और कई बार अकेले पड़ जाने के भय से वह निर्धारित आचार-विचार संहिता का पालन करना शुरू कर देता है।

स्त्री-प्रश्‍न पर ओम प्रकाश वाल्मीकि बाकी रचनाकारों से भिन्न स्टैंड लेते दिखाई पड़ते हैं। एक इंटरव्यू में उनका कहना है कि ''स्त्री दलितों में भी दलित है।'' वे स्त्री होने के दोहरे अभिशाप को पारंपरिक व्यवस्था से जोड़ते हैं ''इसके लिए व्यवस्था जनित परंपरावादी सोच उत्तरदायी है, जो स्त्री को दूसरे दर्जे का नागरिक ही नहीं, पांव की जूती समझती है।'' उन्होंने यह भी स्वीकारने का साहस किया है कि ''दलित वर्ग में भी इस व्यवस्था की घुसपैठ है।'' वाल्मीकि की इस स्वीकारोक्ति के बाद दलित-स्त्रियां आश्‍वस्त हो सकती हैं कि उनकी दासता के प्रश्‍न को वाल्मीकि दलित-विमर्श के केंद्र में ले आएंगे, आत्म-परीक्षण, आत्मालोचन की प्रक्रिया शुरू होगी और मुक्ति का एक नया अध्याय जुड़ सकेगा। मुक्ति का कोई भी आख्यान तब तक अधूरा रहता है जब तक पीड़ित समुदाय का रचनाकार कमजोर बना दिये गए अन्य समीपस्थ समुदायों को शामिल करने का यत्न नहीं करता। जब प्रेमचंद ने सौंदर्य के प्रतिमान बदलने की बात कही थी, तब उन्होंने स्त्रियों के प्रति दृष्टि में बदलाव को अनिवार्य बताया था। इसी प्रसंग में वे क्रमानुपात का सवाल भी उठाते हैं। जो समुदाय दासता की जितनी दीवारों के भीतर है, उसे उसी क्रम और अनुपात में लेखन का विषय बनाया जाना चाहिए। इसे लेखक की संवेदनशीलता के 'इंडेक्स' के रूप में भी देखा जा सकता है। प्रेमचंद बलपूर्वक कहते हैं-उसका (लेखक का) दर्द से भरा हृदय इसे सहन नहीं कर सकता कि एक समुदाय क्यों सामाजिक नियमों और रूढ़ियों के बंधन में पड़कर कष्ट भोगता रहे? क्यों न ऐसे सामान इकट्ठा किए जाएं कि वह गुलामी और गरीबी से छुटकारा पा जाए? वह इस वेदना को जितनी बेचैनी के साथ अनुभव करता है, उतना ही उसकी रचना में जोर और सच्चाई पैदा होती है। अपनी अनुभूतियों को वह जिस क्रमानुपात में व्यक्त करता है वही उसकी कला कुशलता का रहस्य है।

'कला-कुशलता' की जो मान्य परिभाषा है, प्रेमचंद नए सौंदर्य शास्त्र के लिए उसे अप्रासंगिक ठकराते हुए नई समझ विकसित करने पर जोर देते हैं।

साहित्य में नए सौंदर्यशास्त्र की अनिवार्यता को रेखांकित करता हुआ हिंदी का दलित आंदोलन आकार ग्रहण करता है। इस नये सौंदर्यशास्त्र का स्वरूप कैसा हो, उसके आयाम कौन से हों, उसके केंद्रीय और अनुशांगिक सरोकारों की सूची किस तरह बने- आदि सवालों पर छुटपुट विचार होता रहा। करीब दो दशकों के बाद ओम प्रकाश वाल्मीकि ने इस विषय पर व्यवस्थित पुस्तक प्रकाशित करायी। 'दलित साहित्य का सौंदर्य-शास्त्र' नामक इस किताब में दलित आंदोलन में आधारभूत चिंताओं और दलित साहित्य के प्रमुख बिंदुओं को स्पष्ट किया गया है। यह जानना दुखद है कि इस ग्रंथ में वाल्मीकि स्त्री-प्रश्‍न पर अलग पोजीशन लेते प्रतीत होते हैं। स्त्री दलित है या नहीं-इस सवाल के संदर्भ में पहले वे राजेन्द्र यादव का मत रखते हैं, फिर उसकी काट में समानधर्मा आलोचक डॉ. श्यौराज सिंह 'बेचैन' को सहमतिपूर्वक उद्धृत करते हैं।

राजेन्द्र यादव दलित साहित्य को काफी व्यापक दायरे में देखते हैं, वे स्त्रियों को भी दलित मानते हैं, पिछड़ी जातियों को भी दलितों में शामिल करते हैं, लेकिन डॉ. श्यौराज सिंह 'बेचैन' उनके इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कहना हैः ''इससे सही स्थिति सामने नहीं आती। दलित साहित्य उन अछूतों का साहित्य है जिन्हें सामाजिक स्तर पर सम्मान नहीं मिला। सामाजिक स्तर पर जाति भेद के जो लोग शिकार हुए हैं, उनकी छटपटाहट ही शब्दबद्ध होकर दलित साहित्य बन रही है।'' बताने की जरूरत नहीं है कि यहां दलित साहित्य को दलित पुरुषों द्वारा लिखे गए साहित्य में 'रिड्यूस' करके देखा गया है। दलित संवेदना को सुखद व्यापकता प्रदान करते हुए वाल्मीकि 'सौंदर्य शास्त्र' में अन्यत्र लिखते हैं कि दलित साहित्यकार की दृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति और उसकी पीड़ा, उसके सुख-दुःख महत्वपूर्ण हैं। उसमें दलित हो या स्त्री, उसके प्रति रागात्मक तादात्म्य स्थापित करना दलित साहित्य का प्रमुख प्रयोजन हैं।

यहां प्रेमचंद द्वारा उठाया गया 'क्रमानुपात' का सवाल महत्वपूर्ण हो उठता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की समझ में अगर 'स्त्री दलितों में भी दलित है'। तो उसे उसी क्रम और अनुपात में विवेचन का विषय बनाया जाना चाहिए। 'सौंदर्यशास्त्र' के पृष्ठ 31 पर ओमप्रकाश वाल्मीकि ने दलित-चेतना के प्रमुख बिंदुओं का निर्धारण किया है। प्रमुख बिंदु कुल 13 हैं। क्रम संख्या 1 से लेकर 12 तक 'दलितों में दलित' का कोई जिक्र नहीं। क्रम संख्या 13 इस प्रकार हैः 'भाषावाद, लिंगवाद का विरोध।' 'दलितों में दलित' यहां भी प्राथमिकताओं में सबसे नीचे है। वह भी पता नहीं किस तर्क से 'भाषावाद' से संबद्ध होकर! भूमिका को छोड़कर पुस्तक में कुल सत्रह अध्याय, उपअध्याय हैं। किसी भी अध्याय को, स्त्री-समस्या पर विचार के लिए, आरक्षित करने की जरूरत नहीं समझी गई है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर दलित सौंदर्य शास्त्र की खामोशी मानीखेज कही जानी चाहिए, हम जानते हैं कि पितृसत्ता को समाज की बुनियादी इकाईयों, सामाजिक मूल्यों की विशिष्ट प्रकृति के सहारे सुरक्षित रखा जाता है। इन इकाईयों मूल्यों की पुनर्परिभाषा और विघटन से ही होकर स्त्री-मुक्ति को संभव बनाया जा सकता है। परिवार, विवाह, मर्यादा, नैतिकता, यौन-सुचिता पर विचार का मतलब है स्त्री-दासता के विविध पहलुओं से टकराना। 'दलित साहित्य का सौंदर्य शास्त्र' में पितृसत्ता की इन अहम संरचनाओं का नोटिस तक नहीं लिया गया है। टकराने की बात कौन कहे!

असल में, पितृसत्ता को बनाए-बचाए रखने वाली सांस्कृतिक अस्मिताएं स्त्री-समस्या पर विचार करने से बचती हैं। जब भी स्त्री की दासता का मुद्दा उठाया जाता है, वे या तो अपनी महान परंपरा का हवाला देने लगती हैं, या अपने 'व्यापक मूल लक्ष्य' में इसे शामिल बताकर संतुष्ट हो जाती हैं, या इसे 'शत्रु-अस्मिता' का षड़यंत्र घोषित कर देती है। दलित साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर डॉ.विमल कीर्ति (जिनका प्रशंसात्मक उल्लेख वाल्मीकि ने ' सौंदर्यशास्त्र ' में भी किया है,) स्त्री-प्रश्‍न को 'दलित मुक्ति आंदोलन के विरोधियों' के षडयंत्र के रूप में ही देखते हैं। ''स्त्री दलितों में भी दलित है-यह तर्क दलित मुक्ति आंदोलन के विरोधियो, आलोचकों द्वारा तब से प्रसारित किया गया है, जब से दलितों ने सवर्ण हिंदुओं और तथाकथित सुधारवादी हिंदुओं के महत्व तथा नेतृत्व को अस्वीकार कर दिया था।'' डॉ.विमल कीर्ति का सुझाव है ''स्त्री-पुरुष संबंधों का विश्‍लेषण अलग से होना चाहिए, इसको दलित स्त्री और पुरुष के बीच संघर्ष का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, जिसमें प्रतिक्रियावादी या हिन्‍दू उत्थानवादियों को लाभ मिल सके। जो लोग दलित मुक्ति आंदोलन के विरोधी हैं, वे लोग जानबूझकर दलित आंदोलन को कमजोर करने के लिए इस तरह के सवाल खड़े करते हैं।'' डॉ.विमल कीर्ति ने स्त्री मुक्ति तथा दलित मुक्ति का तुलनात्मक अध्ययन भी किया है। इस अध्ययन का निष्कर्ष है, स्त्री का दलितपन स्त्री-पुरुष संबंधों में है और दलित समाज की गुलामी का संबंध सामाजिक संबंधों में यानि हिन्‍दू धर्म में है... (इसलिए) स्त्री का दलितपन या दलित स्त्री का दलितपन भौतिक विकास के साथ, शिक्षा तथा आर्थिक विकास के साथ समाप्त हो जाता है। लेकिन दलित समाज का दलित तत्व केवल भौतिक विकास, शिक्षा तथा आर्थिक विकास से खत्म नहीं होगा, उसके लिए आपको हिन्दुत्व के खिलाफ भी लड़ना होगा।

'दलित समाज' से तुलनात्मक अध्ययनकर्ता का आशय 'दलित पुरुष समाज' जान पड़ता है। इस तुलना का संदेश है कि जब (दलित) स्त्री की मुक्ति की प्रक्रिया इतनी सीधी तथा आसान है तो उसके प्रति गंभीर होना (ऊर्जा) और बुद्धि का अपव्यय ही साबित होगा। 'दलित मुक्ति का प्रश्‍न और दलित साहित्य' नामक सद्यः प्रकाशित पुस्तक में दिनेश राम स्त्री-मुक्ति पर संभवतः इसी तर्क से विचार नहीं करते। दिनेश राम ने दलित साहित्य और विचार के जो मापदंड गिनाये हैं, उनमें स्त्री का संदर्भ कहीं नहीं आता। कौशल्या बैसंत्री की आत्मकथा पर विचार करते हुए वे यह जरूर प्रतिपादित कर देते हैं कि दलित पुरुष का संघर्ष एक दलित स्त्री की तुलना में बहुत अधिक होता है। स्त्री-श्रम का अवमूल्यन पितृ-सत्तात्मक भाव-जगत ही किया करता है। यह पुरुष का श्रम प्राथमिक मानता है, स्त्री का द्वितीयक-तृतीयक, पुरुष के संघर्ष की सार्थकता स्वयं सिद्ध होती है, स्त्री की हर हाल में संदिग्ध।

प्रसंगवश, यह देखना जरूरी होगा कि दलित समुदाय की लेखिकाएं अपनी स्थिति को किस रूप में आंकती हैं। इनकी रचनाओं को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि स्त्री-मुक्ति की राह बेहद कठिन, घुमावदार व रपटीली है। वर्णवादी से जन्मी स्त्री-विरोधी दृष्टि सिर्फ सवर्णों में ही नहीं है, और इसी से उनकी स्वतंत्रता की लड़ाई दुहरी-तीहरी हो जाती है। 'दलित महिला कथाकारों की चर्चित कहानियां' में शामिल 'सुनीता' कहानी की नायिका ''सुनीता अपने भाइयों को जब भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते देखती तो उसे खुशी होती। परंतु अपनी पढ़ाई के प्रति माता-पिता की अरुचि देखकर वह दुखित होती थी। वह भेदभाव महसूस करती।'' सुमन प्रभा की कहानी 'नई दुनिया की तलाश' की नायिका सुषमा पढ़े-लिखे परिवार में होकर भी उत्पीड़ित है। परिवार के मर्यादा का कोड़ा उसकी पीठ पर गाहे-बगाहे पटक ही दिया जाता है। अपनी बेटी के लिए सुषमा की मां की कामना स्त्री समुदाय की प्रतिनिधि कामना कही जा सकती है, ''हे भगवान मेरी इस अनजान बेटी को उसकी मनपंसद दुनियां दे दे। जहां वह स्वतंत्रतापूर्वक अमन चैन से रह सके...'' 'दोहरा अभिशाप' आत्मकथा की भूमिका में कौशल्या बैशंत्री ने पूरी शिद्दत से लिखा है ''पुत्र, भाई, पति सब मुझ पर नाराज हो सकते हैं परंतु मुझे भी तो स्वतंत्रता चाहिए कि मैं अपनी बात समाज के सामने रख सकूं। मेरे जैसे अनुभव और भी महिलाओं को आये होंगे परंतु समाज और परिवार के भय से अपने अनुभव समाज के सामने उजागर करने से डरती और जीवन भर घुटन में जीती हैं। समाज की आंखे खोलने के लिए ऐसे अनुभव सामने लाने की जरूरत है।'' सवर्ण समाज से तो कोई उम्मीद नहीं की जा सकती, कौशल्या बैशंत्री दलित पुरुषों को भी उसी श्रेणी में रखती हैं। रजतरानी 'मीनू' ने स्त्री-समस्या पर लिखी गई कहानियों के आधार पर दलित-लेखकों की स्त्री-संबंधी सोच का खुलासा किया है। वे लिखती हैं- ये कहानियां संदेश देती हैं कि दलित स्त्रियां बेहद चरित्रवान व साहसी हैं। यह सच है किंतु जेहन में एक स्वाभाविक प्रश्‍न यह भी कौंधता है कि क्या दलित स्त्रियों के समक्ष एक ही बड़ी समस्या है? क्या वे केवल बाहरी पुरुषों द्वारा दैहिक शोषण का ही शिकार होती हैं? क्या कष्टों से भरी उनकी जीवन-यात्रा शैक्षिक, पारिवारिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों की समस्याओं से अछूती रहती हैं? यदि नहीं, तो क्या कारण है कि दलित कहानीकारों की कलम बार-बार एक ही विषय पर चलती है?

दलित कवि कंवल भारती का आह्वान है -

'रचो ऐसी पारमिताएं

कि हम बन सकें एक राष्ट्र'

इस राष्ट्र की पारमिता (पूर्णता, उत्कृष्टता) की जो लोग रचना कर रहे हैं, उनकी पहली पंक्ति में दार्शनिक डॉ.धर्मवीर निर्विवाद रूप से मौजूद हैं। डॉ.धर्मवीर का स्त्री संबंधी चिंतन समय-समय पर प्रकाशित होता रहता है। स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व पर विचार के क्रम में डॉ.धर्मवीर सन् 1994 में अपनी स्थापना देते हैं : ''पूछा जा सकता है कि औरत पर असली आफत कब आती है? उस पर असली आफत तब आती है जब वह अकेली छोड़ दी जाती है। धरती की वह इतनी कमजोर मादा है कि अकेली रह नहीं सकती। वह अपना पेट भरना नहीं जानती तो दूसरों का क्या भरेगी?'' इसी लेख में वह बताते हैं कि देश का जो नैतिक अधःपतन हुआ है, उसकी बहुत कुछ जिम्मेदार स्त्रियां हैं। क्योंकि वह अपने पतियों पर जबरदस्त आर्थिक दबाव डालती हैं, इसलिए वे बेईमान हो जाते हैं और रिश्‍वतखोरी, मुनाफाखोरी और दलाली बढ़ती है। पुरुष सच्चरित्र, मेहनती और परिवार के प्रति समर्पित होता है ''लेकिन वह औरत जब जी चाहे, वेश्‍या बनकर उसके बसे-बसाये घर को उजाड़ देती है। क्योंकि औरत खाली है, इसलिए उसे सेक्स नहीं, चौबीस घंटे की सेक्स की बकवास चाहिए'' कोई चाहे तो डॉ.धर्मवीर के इन विचारों को देखते हुए उन्हें पश्चिमी परंपरा के शोपेन हॉवर, नीत्‍शे तथा भारतीय परंपरा के स्मृतिकारों, तुलसी जैसे कवियों का नवीनतम संस्करण मान सकता है। लेकिन, इसका ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए कि डॉ. धर्मवीर एक सांस्कृतिक अस्मिता के स्वीकृत प्रवक्ता हैं और उसकी मूल्य-सरणि रच रहे हैं। सन् 1997 में डॉ.धर्मवीर ने स्त्री-प्रश्‍न पर फिर ध्यान दिया। 'दलितों का दर्शन क्या हो' नामक लेख में उन्होंने अपने समुदाय को नसीहत दी कि ''दलितों को दूसरी कौमों से संघर्ष में पहले अपने घरों को जरूर देखना है। आखिर दलित जातियां दूसरी जातियों से मुक्ति किस-किस रूप में प्राप्त करना चाहती हैं? दूसरी जातियों के पुरुषों से अपनी बहू-बेटियों की रक्षा की बात बहुत जरूरी है। पर तब क्या किया जाए, जब इनकी बहू-बेटियां खुद दूसरी जातियों के पुरुषों के साथ भागना चाहती हों? इसी दूसरी बात के लिए दलित-स्त्रियों पर नियंत्रण रखना जरूरी है। दलित एक जाति के रूप में अब तक इस काम में चूकते रहें हैं। इसी से इनकी औरतें स्वतंत्र होने के बजाय उच्छृंखल हो जाती है। वे पर पुरुषों के साथ व्यभिचार कर बैठती हैं।' धर्मवीर जी का यह अनुशासन-पर्व वर्णवादी मानसिकता से किस रूप में भिन्न है कह पाना मुश्किल लगता है। वरिष्ठ चिंतक होने के नाते समग्र दलित चेतना पर उनका असर पड़े, यह स्वाभाविक है। दलित चेतना के दूसरे उल्लेखनीय हस्ताक्षर डॉ.एन. सिंह की मान्यता इसकी पुष्टि करती है ''महिला दलित वर्ग की हो या चाहे किसी अन्य वर्ग की हो, नियंत्रण के अभाव में उच्छृंखल हो सकती है।'' राजेन्द्र यादव का मत यहां विचारणीय लगता है कि ''जो जितना ही दबा-कुचला गुलाम है, उसका 'आदर्श आदमी' उतनी ही निरंकुश, अत्याचारी, अमानवीय है। पहला अवसर यह छूट मिलते ही यह दलित 'आदमी बनने' की उतावली में ठीक अपने मालिक का प्रतिरूप बन जाता है।'' राजेन्द्र यादव एक दलित के अमानवीय होने का जा 'जस्टीफिकेशन' दे रहे हैं, वह एक सामान्य, अनपढ़ तथा सुप्त चेतना वाले दलितों के संदर्भ में तो लागू हो सकता है, मगर मानवीय ज्ञान के अद्यतन विकास से परिचित प्रखर बुद्धिजीवियों के संदर्भ में नहीं। डॉ. धर्मवीर ने दलित औरतों पर कठोर नियंत्रय का जो प्रस्ताव रखा, उसका छिट्पुट रूप में ही सही, दलित महिलाओं ने विरोध किया था। इसके बावजूद डॉ. धर्मवीर अपनी मान्यता पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं समझी, सन् 2001 में वे अपनी एक नई थ्योरी के साथ उपस्थित हुए। इस थ्योरी में दलित-दुर्दशा का कारण दलित महिलाओं को बताया गया है। डॉ. श्यौराज सिंह 'बेचैन', डॉ. रजतरानी 'मीनू' द्वारा संपादित 'दलित दखल' में यह 'थ्योरी' दर्ज हुई है। यह अनुमान लगाते हुए कि जागरुक स्त्रियों द्वारा इस 'थ्योरी' का विरोध हो सकता है, संपादक द्वय ने इसका लगे हाथ उपचार कर दिया है। वे लिखते हैं, ''परंतु उनके डॉ. धर्मवीर के जवाब एक बार फिर नई बहस को जन्म देने वाले लगते हैं। जो आलोचना साहित्य-व्याख्यानों के स्वर उत्तेजित कर सकते हैं और कुछ महिला नेताओं की ओर से पूर्ववत, विवाद खड़ा करा सकते है, जिनमें रचनात्मक योगदान कम, व्यक्तिगत ईर्ष्या और अनुशासनहीनता अधिक दिखाई पड़ती है। इस तरह समस्या को जिम्मेदारी से समझने की बजाय वातावरण में कटुता बढ़ जाती है।' 'कुछ महिला नेताओं' द्वारा संभावित आलोचनाओं को संपादक-द्वय ने जिस तरह 'व्यक्तिगत ईर्ष्या', 'अनुशासनहीनता', 'कटुता' आदि से जोड़कर देखा है, वह उनकी पितृसत्तात्मक सोच का ही प्रमाण है। डॉ. धर्मवीर की नई 'थ्योरी ' क्या है? दरअसल यह 'थ्योरी' उनकी पूर्व मान्यताओं का ही स्वाभाविक विकास है। 'दलित-पराजय' की डॉ. धर्मवीर इस तरह व्याख्या करते हैं, ''इसका कारण क्या है कि एक कौम तीन हजार वर्षों से लगातार हारती चली आ रही है? उसकी एक बार भी जीत क्यों नहीं हुई? इस लगातार हार की मेरी व्याख्या यह है कि यह मातृसत्ता और पितृसत्ता की लड़ाई थी। दलितों में मातृसत्ता थी और आर्यों में पितृसत्ता थी। यदि दलितों में भी पितृसत्ता होती तो यह हार-जीत अवश्‍य अदला-बदली करती। दलितों की लगातार हार का कारण उनके समाज में मातृसत्ता का होना रहा है।'' 'व्याख्या' का आशय जरूरत से अधिक स्पष्ट है। अगर आज के दलित 'आर्यों' से ऐतिहासिक संघर्ष जीतना चाहते हैं तो उन्हें भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था अपनानी पड़ेगी। दलितों में मातृसत्ता का स्वरूप क्या है? वे कथित रूप में आसानी से विवाह-विच्छेद कर सकती हैं, उन्हें पुनर्विवाह की छूट है, वे अपनी आजीविका के लिए घर से बाहर निकलकर मेहनत-मजदूरी कर सकती हैं (हालांकि घर के काम उन्हें तब भी करने पड़ते हैं) दलित समाज को विजय दिलाने के 'महान उद्देश्‍य' में उन्हें अपनी इन छूटों का बलिदान करना होगा। वैसे भी, औरत के श्रम का कोई महत्व नहीं। डॉ. डॉ. धर्मवीर यह बता ही चुके हैं कि ''औरत के निठल्लेपन से सभ्यता और समाज का दम घुट रहा है।'' और दलित पुरूष? वह तो 'आर्य पुरूष' के मुकाबले अपराजेय है। उसकी हार की वजह दलित स्त्रियां हैं। ''मैं कहना चाहता हूं कि दलित पुरुष आर्य पुरुष से नहीं हारा है। बल्कि इसमें मातृसत्ता पितृसत्ता से हारी है तथा घर के भीतर वह अपनी मातृसत्ता से हारा है। इस प्रकार मेरे मत में दलित पुरुष की दो हारें हुई है, घर के बाहर वह आर्यों की पितृसत्ता से हारा है तथा घर के भीतर वह अपनी मातृसत्ता से हारा है।'' अन्यत्र वे सुझाव देते हैं, ''मैं चाहता हूं कि दलित समाज में पुरुष को दास और अनुचर बनाने की यह प्रथा बंद हो। मेरे खयाल से, दलित पुरुषों को दलित स्त्रियों के इस गुलामी से लड़ना चाहिए।'' दलित स्त्री डॉ. धर्मवीर की नजर में शोषक है, स्वामिनी है, निठल्ली और उच्छृंखल है जबकि पुरुष सर्वगुण संपन्‍न हैं। विचित्र है कि दलित समाज को 'मातृसत्तात्मक' से पितृसत्तात्मक में डॉ. धर्मवीर सवर्ण पुरुष से उम्मीद लगाते हैं, हालांकि वह पहले ही जानते हैं कि ''जहां तक दलित पुरुष की अपनी स्त्री से मुक्त होने में द्विज पुरुष की भूमिका की बात है, वह दलित स्त्री का पक्ष लेगा। ऐसा वह इसलिए करेगा क्योंकि यह उसकी रणनीति का हिस्सा है... वास्तव में, उसे हमारी दुर्गाओं, भवानियों और काली माताओं से भय नहीं है, बल्कि उसे हमारे शंबूकों और एकलव्यों से भय व्यापता है।'' डॉ. धर्मवीर दलित पुरुष की दो एक कमजोरियां भी गिनाते हैं। उनका मत जानने से पहले हम हाइडी हार्टमान द्वारा की गई पितृसत्ता की परिभाषा देख लें : ''पुरुषों के बीच सामाजिक संबंधों का एक समूह, जिसका एक भौतिक आधार है, और जो, हालांकि श्रेणीबद्ध हैं, परंतु पुरुषों के बीच अंतर्निभरता और एकजुटता स्थापित या निर्मित करते हैं जिससे उन्हें महिलाओं पर वर्चस्व स्थापित करने की शक्ति मिल जाती है।'' दलित स्त्री पर विजय के सिलसिले में डॉ. धर्मवीर द्विज पुरुषों की भूमिका की जो विफल आशा करते हैं, उसे इस परिभाषा के आलोक में और बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। दलित पुरुष के सांस्कृतिक अस्मितावाद को और परिपूर्ण बनाते हुए डॉ. धर्मवीर लिखते हैं, ''मैं कहना चाहता हूं कि दलित पुरुष एक संस्था के रूप में उच्छृंखल नहीं हो सका है। क्या वह अपनी उच्छृंखलता में गैर दलितों की औरतों को रख सकता है? हां, दलित पुरुष में जो बुराई हुआ करती है, वह दूसरे ढंग की है। वह उसके निठल्ले होने की है। लेकिन दलित पुरुष के निठल्ले होने से दलितों में मातृसत्ता और स्त्री राज का मेरा मत और भी पुख्ता हो जाता है। क्योंकि दलित पुरुष का निठल्ला होना उसके समाज में मातृसत्ता और स्त्री राज का लक्षण है, इसलिए दलित स्त्री 'उच्छृंखल' और दलित पुरुष 'निठल्ला'-ये दो बीमारियां एक-दूसरे से जुड़ी हैं।''

तुलसीदास अपने एक स्त्री पात्र से नारी जाति की परिभाषा करवाते हैं :

अधमते अधम अधम अतिनारी।

तिन्ह महं मैं मतिमन्द अघारी।।

डॉ. धर्मवीर का लक्षण-उदाहरण वाला रीतिशास्त्र इस परिभाषा की जोरदार ढंग से पुष्टि करता है। डॉ. धर्मवीर के साथ दूसरे दलित विमर्शकारों को पढ़ते हुए यह बात कही जा सकती है कि, जरूरी नहीं अस्मिता-निर्माण हर समय और सब प्रसंगों में मुक्तिकारी ही हो। सामाजिक अस्मिता से सांस्कृतिक अस्मिता की यात्रा तो निश्चित रूप से निरापद नहीं होती। गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक अस्मिता मात्र को शक के दायरे में रखती हैं। वे अस्मिता की जगह स्पेस-रचना का प्रस्ताव करती हैं और उसे ही मूल्यवान मानती हैं, विशेषकर स्त्री प्रश्‍न के संदर्भ में। उनका कहना है : मुझे अस्मिता अथवा स्वर के प्रश्‍न से परेशानी होती है। स्पेस के प्रश्‍न मुझे कहीं अधिक आकर्षित करते हैं। अस्मिता और स्वर के अवधारणा-रूपक इतने सशक्त हैं कि कुछ समय बाद आप यकीन करना शुरू कर देते हैं कि आप खुद वही हैं जिसके लिए आप संघर्ष कर रहे हैं। आगे चलकर, खासकर तब जब आप का संघर्ष सफल हो रहा हो और आप के साथ कोई प्रमुख सत्ता-समूह हो तो यह अवधारणा दमनकारी भी बन सकती है, मुख्यतः औरतों के लिए-जिसकी अस्मिता हमेशा हमले की जद में ही रहती है। दूसरी ओर, अगर आप एक परिप्रेक्ष्य की रचना के लिए स्पेस तैयार कर रहे हैं, तो यह एक आत्म-विच्छेदक प्रोजेक्ट होगा, जिसकी राजनीति वही होगी और जो इलाकाई दखल के विरूद्ध होगा, लेकिन इसमें अस्मिता, स्वर, 'मैं क्या हूं' आदि प्रश्‍नों को लाने की जरूरत नहीं होगी। वैसे भी ये तमाम प्रश्‍न बेहद व्यक्तिनिष्ठ भी हो जा सकते हैं।

सांस्कृतिक अस्मितावाद का सबसे खतरनाक प्रोजेक्ट इतिहास में हुए अन्याय का बदला चुकाने का होता है। असल में, इसी प्रोजेक्ट के सहारे सांस्कृतिक अस्मिता अपनी निरंतरता बनाए रख सकती है, बचाए रखना चाहती है। अतीत में हुए अन्याय का परिमार्जन कैसे हो? सांस्कृतिक अस्मिता का सीधा सा जवाब है-वर्तमान में उस अन्याय चक्र को उलटकर। हमारे साथ जैसा हुआ था, या कि जैसा हम मानते हैं कि हमारे साथ ऐसा ही हुआ था, वैसी ही पद्धति और प्रक्रिया अपनाकर। जिस तरह ''उन्होंने'' हमारे ''सम्मान के प्रतीकों'' और अवसरों को ध्वस्त किया था, उसी तरह हम भी एक-एक कर उनके ''सम्मान के प्रतीकों'' और अवसरों को नष्ट करेंगे। अब सवाल 'सम्मान के प्रतीक' चुनने का उठता है। स्त्री-विरोधी पितृसत्तात्मक सोच वाली सांस्कृतिक अस्मिता सबसे पहले स्त्री को ही सम्मान के प्रतीक के रूप में रखती है। अगर शत्रु-पक्ष से हिसाब चुकता होना है तो इसके लिए उनकी स्त्रियों पर हमला किया जाना अनिवार्य है। ऐसी सांस्कृतिक-अस्मिता कभी उनकी स्त्रियों का अपहरण करेंगी, कभी सामूहिक बलात्कार करेंगी और कभी बलात्कार करते हुए वीडियोग्राफी कराएगी और जब उसका दंभ खुराक मांगेगा वह उस 'पवित्र अनुष्ठान' को स्क्रीन पर देख लिया करेगी। कोई-कोई सांस्कृतिक अस्मिता ऐसा 'क्रूड' तरीका नहीं अपनाती। वह कविता-कहानी में ही ऐसे दृश्य रच दिया करती है। तरीका 'परिष्कृत' हुआ करता है, साथ ही, 'सुख-प्राप्ति' और 'गर्व-बोध' के अनुपात में भी कमी नहीं आती है। प्रतिशोध की स्याही में डूबी लेखनी साबित कर दिया करती है कि 'उनकी' स्त्रियां बदचलन, व्यभिचारिणी और पर-पुरूषगामी हैं। और, वह 'परपुरूष' कोई दूसरा नहीं, हम ही है। शत्रु पक्ष के पुरुष नामर्द हैं, नपुंसक हैं। हममें अपार पुंस है, अपरिमित वीर्य है। परिणामतः शत्रु पक्ष की संतानें जारज हैं, हमारा ही खून है जो उनकी रगों में दौड़ा करता है। इस कार्य-योजना का एक आयाम 'अपनी' स्त्रियों को महिमा-मंडित करने का भी होता है। तमाम पुस्तकों के रचयिता और वरिष्ठ दलित चिंतक डी.पी. वरूण कहते हैं कि दलित स्त्री का ''चरित्र एवं व्यवहार गैर-दलित स्त्री से सर्वदा भिन्न और श्रेष्ठ है। वह अभाव में रहकर भी अपने सम्मान का सौदा नहीं करती जैसा गैरदलित महिलाएं अकसर सुख-सुविधाओं के लिए अपने को समर्पित करती पायी गई हैं।'' डी.पी. वरूण सुझाव भी देते हैं कि दलित स्त्री के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करने के लिए डॉ. धर्मवीर के विरूद्ध न्यायालय में मान-हानि का मुकदमा किया जाना चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि अगर डॉ. धर्मवीर ने उक्त टिप्पणी गैर-दलित महिलाओं के बारे में की होती तो वह कतई अपमानजनक न होकर काबिले इस्तकबाल होती। गैर-दलित स्त्री को जानना हो तो भीमसेन संतोष की कहानी 'ममता और समता' से शुरुआत की जा सकती है। कहानी का नायक रवि दलित छात्र है। उसकी गिनती मेधावी छात्रों में होती है। कहानी की स्त्री पात्र 'ब्राह्मण घर की लड़की' है। उर्मिला रवि की तरफ 'स्वभावतः' आकर्षित है। ''उर्मिला पागलपन की सीमा तक उसकी दीवानी हो चुकी थी, परंतु रवि कभी भी उसकी तरफ ध्यान नहीं देता।'' उर्मिला ने जोर जबरदस्ती से रवि से शादी कर ली और अपनी 'सवर्ण प्रकृति' के अनुसार अंततः उसे धोखा दिया। उर्मिला रवि के बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती आखिर वह एक 'ब्राह्मण की बेटी' है जबकि रवि का आदेश है, ''तुम्हें अपने गर्भ से एक दलित, अछूत की संतान को पालना ही होगा।'' बच्चा पैदा होता है, मगर उर्मिला को उस ''बच्चे से घृणा है, उसमें लेशमात्र भी ममता नहीं है।''

सवर्ण समाज से संगठित प्रतिशोध लेने का उपक्रम दलित साहित्य के कुछ प्रमुख हस्ताक्षरों ने किया है। रजत रानी 'मीनू' इस उपक्रम की जानकारी देती हैं, दलित कहानीकारों ने गैर-दलित स्त्रियों और दलित पुरुषों के संबंधों का एक और पक्ष उद्घाटित किया है। दलित चेतना संपन्न रचनाकारों ने... इतर समाज की स्त्रियों की समस्याओं को भी कथाबद्ध किया है... ये तीन दलित कहानीकारों द्वारा कुछ समयांतराल में लिखी गई कहानियां हैं। इनमें सर्वप्रथम 'ग्रहण', 'चेता का उपकार' और अब इसी समस्या पर चंद्रभान प्रसाद की पहली और नई कहानी 'चमरिया मैया का शाप' भी विचारोत्तेजक है।

इन कहानियों से किस तरह की विचारोत्तेजना प्राप्त होती है, यह जानने के लिए हम इसका संक्षिप्त परिचय प्राप्त करें।

'ग्रहण' ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी है। इस कहानी को दो भागों में बांटा गया है। 'बिरम की बहू' दूसरा भाग है गांव के चौधरी ने अपने इकलौते पुत्र बिरमपाल का ब्याह रचाया दुल्हन ''रूप सौंदर्य में लक्ष्मी पार्वती से कम न थी।'' परिवार की लालसा थी बहू जल्दी ही बच्चा जन दे। दो साल तक कुछ ना हुआ तो तरह-तरह के टोने-टोटके किए गए। ''फिर भी बहू बंजर धरती की तरह ज्यों की त्यों सूनी ही बनी रही।'' परिवार में तनाव पसर गया। बेचारी बहू ''इतनी सुंदर और बांझ...'' सुनती रही। पूर्ण चंद्रग्रहण की रात थी। भादों का महीना। इस ''खबर ने भंगी बस्ती का हर्षोउल्लास से भर दिया।'' आज की रात उन्हें दान के रूप में अनाज मिलेगा। ग्रहण के वक्त बिरम की बहू भी अनाज बांट रही थी। भंगी बस्ती का युवक रमेसर अनाज मांगने आया। बहू ने उससे आग्रह किया कि वह अंदर की कोठरी से अनाज उठा दे। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने संभवत: अपनी किसी अन्य कहानी में संभोग का दृश्‍य नहीं रचा है। 'ग्रहण' में वे रचते हैं। आखिर यह सांस्कृतिक अस्मितावाद की मांग हैः

''लालटेन की रोशनी में रमेसर की अधनंगी बाहें और कंधे चमक रहे थे। अचानक बिरम की बहू के मष्तिष्क में पुरूष-गंध्‍ बिजली सी कौंध गयी। उसकी सांसें तेज-तेज चलने लगीं। उसके दिल-दिमाग पर रमेसर छाने लगा।''

''रमेसर, मेरा एक काम करोगे।''

''जी...!''

''देखो, किसी से कहना मत... वह कांप रही थी। जब तक रमेसर कुछ कह पाता बहू ने उसे पीछे से अपनी बांहों में जकड़ लिया। रमेसर हड़बड़ा गया। उसके शरीर में झन-झन कुछ बजने लगा। बिरम की बहू उसके लिए ठीक वैसे ही थी जैसे आकाश-गंगा के तारे। बिरम की बहू की नर्म मांसल देह की गर्मी से रमेसर का जिस्म पिघलने लगा। उसने स्वयं को संभाला। गिरफ्त से अलग करते हुए कहा, बहू जी, ये क्या करती हो?'' बहू ने रमेसर की कलाई पकड़ी और उससे लिपट गई। बहू के सौंदर्य की आग ने रमेसर की रक्त शिराओं और धमनियों में लहू तेज कर दिया था।

''बहू गिड़गिड़ा रही थी। उसकी आंखों में बाढ़ का गंदला पानी भरा हुआ था... बहू ने उसे खींचकर फर्श पर लिटा दिया। अंधेरी कोठरी में लालटेन की मद्धिम लौ कांपने लगी और दो जिस्म समय की मांग में सिंदूर भरने लगे।''

''...और जब ये शोर थमा, बहू अस्त-व्यस्त कपड़ों में कच्चे फर्श पर पड़ी थी। रमेसर ने अपने फटे-पुराने कपड़े संभाले और बहू की ओर देखा। बिरम की बहू तृप्त भाव से लेटी कृतज्ञ भाव से उसे निहार रही थी।''

हवेली को एक वारिस मिला। रमेसर को इस्तेमाल करने के बाद बिरम की बहू ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। सवर्ण स्त्रियों की प्रकृति ही ऐसी है!

ऐसा नहीं कि स्त्री-पुरुष के बीच ऐसे संबंध नहीं बनते। लेकिन, यहां इन संबंधों को शत्रु-अस्मिता से बदला लेने, नीचा दिखाने और उसकी पुंसत्वहीनता प्रमाणित करने के लिए इस्तेमाल किया गया है। रमेसर और बहू का संबंध दो व्यक्तियों का संबंध नहीं है। ये दो अस्मिताओं के प्रतिनिधि हैं। संभोग के 'ग्राफिक डिटेल्स' देने का यही कारण है।

'चेता का उपकार' सूरजपान चौहान ने लिखी है। गांव का दबंग ठाकुर जिले सिंह बच्चा पैदा करने में अक्षम है। ठकुराइन रमा की रुचि अछूत चेता में है। ''चेता नवयुवक तो था ही उपर से दिन-रात के कठिन परिश्रम से उसका शरीर गठीला बन गया था। चट्टान सा सीना, खंभे जैसी सुडौल जंघाएं थीं उसकी।'' एक बार ''ठाकुर काम का बहाना बनाकर शहर गया हुआ था।'' रमा को अवसर मिलाः

''यदि किसी ने देख लिया तो अनर्थ हो जाएगा।'' चेता बोला। ''डरपोक कहीं का।'' कहते हुए रमा ने चेता का हाथ थाम लिया। चेता को कुछ नहीं सुझ रहा था। रमा के हाथ का स्पर्श पाकर उसके शरीर में एक नशा सा छाता चला गया। उसे याद ही नहीं रहा कि रमा उसे खींचकर अंदर कोठे में ले आयी...''

बाकी दृश्‍य पाठक अपनी उर्वर कल्पना से जोड़ लें।

ठाकुर को परिणाम का जल्दी ही पता चला। रमा पेट से थी। ''ठाकुर जिले सिंह चाहते हुए भी कुछ ना बोल सका। उसका चेहरा आत्म-ग्लानि से झुक गया था।'' जाहिर है, ठाकुर जिले सिंह के बहाने पूरे सवर्ण समाज में ग्लानि बोध भरा जा रहा है। माध्यम बनाई गई हैं उस समुदाय की स्त्रियां।

ऐतिहासिक अन्याय का बदला लेने की यह आजमायी हुई, अचूक और आसान तरकीब है। सांस्कृतिक अस्मितावाद चाहे जिस समुदाय का हो, अमानवीय हो सकता है। एडवर्ड सईद ने उचित ही लिखा हैः ''पर अफसोस, मात्र पीड़ित समुदाय की सदस्यता अधिक उन्नत मानवता बोध की अनिवार्य गारंटी नहीं देती। दमन के इतिहास को सामने लाना जरूरी है, पर यह काम तब तक पूरा नहीं होता जब तक कि उस इतिहास को बौद्धिक प्रक्रियाओं की सरणि में न मोड़ा जाए और उसको इस हद तक सामान्यीकृत न कर दिया जाए कि इसके घेरे में सभी पीड़ित आ सकें। मगर, दमन के साक्ष्य का प्रस्तुतीकरण अकसर और अधिक क्रूरता तथा अमानवीयता को, या शब्दाडंबर और निरी 'उपयुक्त' मुद्रा को उचित ठहराने लगता है।''

ब्राह्मणवादी मानसिकता-उसकी क्रूरता, हिंसा और अमानुषिकता को दलित सांस्कृतिक अस्मिता-विमर्श ने बिल्कुल तज दिया हो, ऐसा नहीं लगता। ये सारी विशेषताएं तब प्रकट होती हैं जब प्रतिशोध के लिए 'उनकी' स्त्रियों को चुना जाता है। चंद्रभान प्रसाद की कहानी 'चमरिया मइया का शाप' देखकर ऐसा लगता है कि दलित साहित्य शेष हिंदी साहित्य से सचमुच ही भिन्न होगा। जो कुछ हिंदी साहित्य की परिधि में स्वीकृत है उसमें ऐसी बजबजाती घृणा दुर्लभ होगी। प्रगतिवादी आंदोलन के उभार के दौर में 'शोषण वर्ग' की स्त्रियों के प्रति इस तरह का नजरिया कहीं नहीं है। स्त्रियों को माध्यम बनाकर ऐतिहासिक अन्याय का बदला लेने में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही इसका समानधर्मा ठहरता है।

'चमरिया मइया का शाप' कहानी की शुरुआत में ही यह सूचना है कि ''दलित चेतना के उत्कर्ष पर समाजशास्त्री चिंतित हो उठे हैं।'' कहानी की मुख्य पात्र राजपूत परिवार की शोध छात्रा कामिनी है। वह दिल्ली से अपने पैतृक निवास फैजाबाद गई हुई है। वहां उसके चाचा रतन के यहां जुड़वां बच्चे पैदा हुए हैं। सूचना पाकर कामिनी 'हतप्रभ' हैः ''रतन चाचा के घर तो संतानों की वर्षा हो रही है। मानसून की जगह शुक्राणु तो नहीं छा गए हैं आकाश में?'' कामिनी मन ही मन बुदबुदा रही थी। ''बड़े भइया कुछ ही माह पूर्व पिता बने थे। छोटे कुंवर पिछले माह। मझले ठाकुर आज जुड़वां बच्चियों के बाप बन गए। कामिनी खयालों के चक्रवात में फंस सी गई थी। कहानीकार चक्रवात को देर तक नहीं बनाए रखता। कामिनी रहस्य जान लेती है।

''चाचा ने साढ़े तीन वर्ष पूर्व, बेटों की शादी के कुछ माह पूर्व ही रूदल चमार को हरवाह के रूप में रखा था।''

''जब हवेली संतान सुख से सराबोर हो गई तो चाचा ने रूदल को हटा क्यों दिया।''

''आखिर क्यों, क्यों! जब वर्षों से हरवाहे के बगैर काम चल रहा था तब बेटों की शादी के थोड़ा पहले एक रूदल चमार की क्या जरूरत आ पड़ी? और अब रूदल के बगैर काम कैसे चलेगा?''

वाकये को तफसील से जानने कामिनी रूदल के घर पहुंचती है। वहां रहस्य की कुछ पर्तें और खोली जातीं हैं :

''तुम्हें पहले चाचा के घर हरवाहा कब रखा गया था?''

''यही कोई पच्चीस साल पहले, ठाकुर रतन की शादी के कुछ माह पूर्व।''

''सच''

''हां सच में।''

''कब हटाया?''

''वही जब बहूरानी बाल-बच्चेदार हो गई थी।''

''ओह माइ गॉड कामिनी उछल पड़ी थी... उसने गुरुत्वाकर्षण का नियम मानो समझ लिया था।''

मतलब यह कि ठाकुर रतन सिंह के तीनों बेटे तो रूदल चमार की संतान हैं, इन तीनों बेटों की संतानें भी उसी ने पैदा की है। निष्कर्ष यह निकाला गया कि, ''बहुओं के आने के पूर्व हरवाह रखना, मां बनते ही हटा देना, यह कोई संयोग मात्र नहीं।''

कहानी आगे बढ़ती है। दशरथ हरवाह की इंट्री हुई। दशरथ कामिनी के घर का हरवाह है। कहानी फ्लैश बैक में जाती है। कामिनी के बचपन का दृश्‍य है। कामिनी की मां नहा रही है। हरवाह दशरथ नहला रहा है। पोर्नोग्राफी का पूरा अवसर। ''दलित चेतना से संपन्‍न कहानीकार'' अवसर को हाथ से क्यों जाने देः ''वे अब तनकर खड़ी हो गई थीं। वक्षस्थल और उभर उठा। पल्लू कसकर बांधी थी। मानो धोती फटने ही वाली हो। भरा हुआ वक्ष वस्त्र की कसाई से और सुदृढ़ हो गया... दशरथ उनका अवलोकन कर रहा था।''

इसी तरह का दृश्य विधान बेडरुम सीन तक पहुंचता हुआ। अंततः- ''दशरथ निहारता रहा। एक संतुष्ट पुरुष की तरह। थकावट का निशान नहीं।''

पाठक इन दृष्यों का परिणाम भी जानें :

''दशरथ उछल-उछलकर नाचा क्यों। जब मेरा छोटा भाई पैदा हुआ था हफ्तों तक वह ताड़ी के नशे में चूर रहा। उसने मम्मी से पैसा उधार लेकर छौना क्यों काटा था? वह मुझे बेटी कहकर क्यों पुकारता, ठकुराइन बेटी क्यों नहीं?''

कहानीकार का मन इतने से संतुष्ट नहीं हुआ। उसे तो पूरे सवर्ण राजपूत समाज से प्रतिशोध लेना है। अब बारी आती है कामिनी की मामी की। वीर्यवान नायक उपस्थित है - निरहू चमार का बेटा मनोहर चमार। मनोहर मामी को संस्कृत पढ़ाता है क्योंकि ''गांव का कोई ठाकुर संस्कृत पढ़ाने के लायक नहीं। ब्राह्मण भी नकल से पास होते, अतः वे भी इस काबिल नहीं।'' सवर्णों में न कोई वीर्यवान न कोई ज्ञानवान। एक विवाह समारोह में भाग लेने कामिनी अपने ननिहाल गई हुई है। वहीं उसे मनोहर और मामी के रिश्ते का पता चलता है। रात का वक्त है मनोहर ट्यूशन पढ़ाने आया हुआ है। मामी छत पर बनी कोठरी में ट्यूशन पढ़ रही है। कहानीकार के लिए पोर्नोग्राफिक चित्रण का एक और मौका :

''मामी ने बाल पीछे कर लिये। दोनों हाथ ऊपर उठ गए। हथेलियां सटी हुई। सूर्य-नमन जैसी मुद्रा में। पल्लू नीचे लुढ़क गया। ब्लाउज नारंगी। वक्ष इतने गोल, सुडौल कि मानों ब्लाउज फाड़कर बाहर निकलने ही वाले। ब्रा पहनी नहीं थी। क्या दृश्‍य।''

विकृत मानसिकता को आनंदित करने वाली ऐसी ही दृश्‍यावलियां।

वर्षों बाद कामिनी अपनी मामी से मिलने जाती है। कहानीकार मामी से राजपूत-गाथा लिखवाता हैः ''शादी के चार साल बाद भी बच्चा नहीं हुआ। तुम्हारे मामा भी दिल में कहीं न कहीं मनोहर की और भी उपयोगिताएं समझते थे।''

मामी तमाम ठकुराइनों के किस्से बताती हैं।

प्रतिशोध-कथा का आखिरकार उपसंहार होता हैः

हर ठकुराइन का एक स्वप्न होता है। जीवन में कम से कम एक बार हरवाहे के साथ संसर्ग का मौका मिल जाए। इतनी गरीबी पर इतने ताकतवर। मालूम है ये सुअर की चमड़ी कच्ची खा जाते है, आधा किलो तक ये सब ताकत कहां जाती है? देखा है इनकी औरतों को? गरीबी में भी कितनी सुखी, कितनी संतुष्ट रहती हैं... उनके साथ संसर्ग में मर्द जाति के प्रति सम्मान उत्पन्न होता है। असली संतुष्टि उन्हीं के साथ। किस ठकुराइन ने एक बार कोशिश नहीं की होगी, ऐसी मैं कल्पना भी नहीं कर सकती... जिन ठकुराइनों को मौका नहीं मिल पाता-वे देवी खेलती, चीखती कि चमरिया लग गई। चमार से सुअर के तेल की मालिस करवाने के लिए। मालिस के वक्त केवल चमार, ठकुराइन। घंटे भर का यज्ञ, कोई तीसरा नहीं होता। यह यज्ञ का नियम है। यह नियम चमारों ने नहीं, ठकुराइनों ने बनाया था।

यह कहानी दलित सांस्कृतिक अस्मिता को 'आत्म गौरव' प्रदान करने के लिए लिखी गई है। इससे दलित चेतना का उत्थान होगा और समाज में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे को बढ़ावा मिलेगा।

इस कहानी को कोई सामान्य कहानी न समझे। शंका हो तो दलित व्याख्याकार रजतरानी 'मीनू' की इस कहानी पर की गई टिप्पणी देख लें :

''आम धारणा है कि चमारिनें होती ही भोग के लिए हैं। सवर्णों ने ऐसी धारणा बना ली है तो उन्हें चमारों के बारे में भी अपनी राय दुरुस्त कर लेनी चाहिए। खासकर 'चमरिया मइया का शाप' पढ़ लेने के बाद'' इस टिप्पणी के बाद और क्या कहा जाए। इतना निवेदन अवश्‍य किया जा सकता है कि घृणा से संचालित सांस्कृतिक अस्मिताओं को मुक्तिकारी समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। नफरत से भरा प्रतिशोध जिन सांस्कृतिक अस्मिताओं का उपक्रम है, मूलमंत्र है, वे मानव समुदाय को बेहतर बनाने में कोई योगदान तो नहीं करते, उलटे स्थिति को और दारुण बनाते हैं। सूजन ग्रिफिन का यह अन्तर्दृष्टिपूर्ण कथन भुलाया नहीं जाना चाहिए।

जब कोई मुक्ति आंदोलन संभावना के इस विजन की अपेक्षा शत्रु के प्रति घृणा से प्रेरणा लेने लगता है तो (कहना होगा कि) यह अपने आपको ही नष्ट करने लगा है। इसकी क्रियाएं ही अब घावों को भरना बंद कर देती हैं। हालांकि यह (आंदोलन) अपने आप को मुक्ति का पक्षधर घोषित करता है पर इसकी भाषा मुक्तिकारी नहीं रह जाती। इसे स्‍वयं अपने ही भीतर एक सेंसरशिप की जरूरत होने लगती है। सत्य की इसकी अवधारणाएं संकीर्ण से संकीर्णतर होती जाती हैं, और जो आंदोलन सत्य का हृदयस्पर्शी आह्वान करते हुए शुरू हुआ था बाहर से पाखंड-सा प्रतीत होने लगता है। जिन चीजों का विरोध करने का यह दावा करता है वे सभी इसमें प्रतिबिंबित होने लगती हैं, क्योंकि अब यह भी कुछ सत्यों और वक्तव्यों को दबाने लगता है, और, पूर्ववर्ती दमनकर्ता की भांति ही यह भी अपने आप से छिपने लगता है।


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हिंदी समय में बजरंग बिहारी तिवारी की रचनाएँ