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आलोचना

‘कुट्टिचातन’ को पढ़ते हुए
रीता रानी पालीवाल


साहित्य की लगभग सभी विधाओं को अपने रचनाकर्म से संपन्न करने वाले सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' का गद्य लेखन उनके रचनाकार व्यक्तित्व की बनावट को समझने में हमारी सहायता करता है। पाँच दशकों में फैला वात्स्यायन जी का वैचारिक और वैयक्तिक अभिव्यक्ति परक गद्य लेखक की सर्जनात्मक रचनायात्रा का परिपार्श्व रहा है - उनके साहित्यिक सरोकारों, सामाजिक-सांस्कृतिक चिंताओं, मान्यताओं, रचनाकार की मनोभूमिका के विविध पक्षों का सिलसिलेवार ढंग से डॉक्यूमेंटेशन। अतः अज्ञेय के निबंध साहित्य को पढ़ते हुए हमें उनके रचनाकर्म की क्रांतिकारिता, प्रयोगशीलता, वैचारिक एवं बौद्धिक नवोनमेष संपन्न आधुनिक भावबोध की दृष्टि में रखना होगा। साथ ही उनके पत्रकार-व्यक्तित्व से जुड़ी उनकी चिंताओं,प्रश्नाकुलताओं और प्रतिबद्धताओं को भी ध्यान में रखना होगा, जिन्होंने उनके रचनाकार की बनावट में महत्वपूर्ण भूमिका निबाही है। तीस के दशक के मध्य 'सैनिक' और 'विशाल भारत' में छपे लेखों से शुरू होकर, चालीस के दशक के मध्य आए 'त्रिशंकु' नाकम निबंध संग्रह से 'स्मृतिच्छंदा' (मरणोपरांत प्रकाशित) तक बारह से अधिक संग्रहों में प्रकाशित वात्स्यायन जी के निबंध उनके क्रांतिकारी प्रयोगशील व्यक्तित्व साथ-साथ समय और समाज से उनके जुड़ाव के विभिन्न रूपों और पक्षों को उजागर करते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि, तर्क और विवेक की प्रधानता के साथ ही परंपरा, स्मृति, इतिहास, मिथक, आधुनिकता, औपनिवेशिकता के प्रभाव-दवाब, उनसे मुक्ति के प्रश्न, पर्यावरण, जन-बनाम-आभिजात्य, संप्रेषण- संचार, देशी-बनाम-पश्चिमी आदि के मुद्दे इन निबंधों में विवेचन के केंद्र में रहे हैं। कहना चाहिए कि उनकी कविता, कथा-साहित्य, संस्मरण, आलोचना आदि के केंद्रीय सरोकार उनके निबंधों के माध्यम से व्याख्यायित -विश्लेषित और पुष्ट होते रहे हैं। उनकी इस मानसिकता ने उनके वैचारिक निबंधों के साथ-साथ उनके व्यक्ति-व्यंजक अथवा ललित निबंधों को भी प्रभावित किया है।

उनका भाव-परक लेखन भी बौद्धिक दबाव से पूर्णतया मुक्त नहीं रहा, रह भी नहीं सकता था। 'शेखर : एक जीवनी' के लेखक अथवा 'तार सप्तक' के संपादक की प्रयोगशील क्रांतिकारिता उनमें निरंतर मौजूद रहती है। तर्क प्रधान बौद्धिक भाव बोध अज्ञेय के समस्त लेखन में मौजूद रहता है। नितांत व्यक्तिव्त-रंजित ललित निबंधों में भी। 'चिंतामणि' भाग -1 की भूमिका में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि इन निबंध में बुद्धि और हृदय का योग रहा है- 'यात्रा के लिए निकली है बुद्धि लेकिन हृदय को साथ लेकर।'

वात्स्यायन जी ने अपने जिन निबंध संग्रहों को ललित निबंध कहा है उनके विषय में यह कहा जा सकता है कि यहाँ हृदय की भावयात्रा में बुद्धि का लगातार साथ रहा है। व्यंग्य-विनोद का भी यथावसर समावेश रहा है; परंपरा और आधुनिकता, अतीत और वर्तमान परस्पर संवाद की स्थिति में रहे हैं श्रद्धावनत होकर नहीं तर्क और विवेक के साथ। वास्तव में इन निबंधों को ललित, वैचारिक, व्यंग्यात्मक आदि कोटियों में श्रेणीकृत करने से ज्यादा कुछ हासिल होने वाला नहीं है। अधिक श्रेणीकरण (कैटेगोराइजेशन) दिमागी बंदिशों ही पैदा करता है। अतः ऐसा न करते हुए यदि हम इनके माध्यम से उठाए गए मुद्दों और उन मुद्दों के प्रस्तुत स्वरूप की बात करें तो करीब पचास वर्षों में फैले अज्ञेय के गद्य लेखन में हमे दो पक्ष अवश्य दिखाई देते हैं जिन्हें हम उनके गद्य का पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष कह सकते हैं। इन्हें स्वाधीनता आंदोलन, स्वाधीनता प्राप्ति के बाद नेहरू युग और साठ के दशक के बाद की मानसिकता भी कह सकते हैं। यह बात 1946 में प्रकाशित 'सबरंग' 1959 में प्रकाशित 'सबरंग और कुछ राग' नाम से पुनः प्रकाशित तथा 1982 में प्रकाशित 'कहाँ है द्वारका' और 1984 में प्रकाशित 'छाया का जंगल' के निबंधों को आमने-सामने रखने से स्वतः स्पष्ट हो जाती है।

'सबरंग और कुछ राग' में हिंदी निबंध परंपरा कई तरह से झलकती -गूँजती -बजती महसूस होती है वैयक्तिक प्रज्ञा के प्रदत्त नवोन्मेष के साथ। निबंधों का रचयिता 'कुट्टिचातन' है और लेखक सच्चिदानंद वात्स्यायन। अनायास ही हमें 'शिवशम्भु के चिट्ठे' और बाल मुकुंद गुप्त याद आ जाते हैं। उधर भाँग के नशे में ब्रिटिश राज के काले कारनामों को चुनौती देने वाला काशी का लोक सामान्य शिवशंभु है तो इधर दक्षिणी लोक -जीवन का मसखरा बौना कुट्टिचातन- 'जो जिस -तिसके कंधे पर सवार होकर उसे मनमाने नाच नचाता है'। अपने समय और समाज की खबर लेता, उसे चेतावनी देता सामान्य पत्र का विशेष प्रतीक जिसका प्रमुख अस्त्र है व्यंग्य- तीखा पैना और लोक-स्मृति सिंचित व्यंग्य, मिथकों, प्रतीकों को समसामयिक जीवन से जुड़े सवालों को समझने-सुलझाने -हल करने में इस्तेमाल करता व्यंग्य। लोक और शास्त्र की परंपराओं को अलग-अलग दिखाते हुए, परस्पर जोड़ते हुए, स्वतंत्र स्थापित करते हुए लौकिक और जनवादी के नारे देने वालों को चिढ़ाता व्यंग्य इन निबंधों को हिंदी ललित निबंध की श्रृंखला में एक नई कड़ी के रूप में जोड़ देता है। कुट्टिचातन को व्यास की भूमिका में और अपने आप को गणेश की भूमिका सौंपते हुए वात्स्यायन जी उसे इन निबंधों का रचयिता कहते हैं और अपने को लेखक। महाभारत से रूपक ग्रहण करते हुए वह एक ओर तो उत्तर दक्षिण को संपृक्त करते हुए चलते हैं दूसरी और आधुनिक जीवन, आजाद भारत,नई-नई प्रशासनिक व्यवस्था, नौकरशाही, बुद्धिजीवी समाज, संप्रेषण माध्यमों और लोक मानस के संबंधों को। खास बात यह है कि अज्ञेय का आधुनिक भावबोध जब प्रचीन साहित्य संस्कृति की ओर मुड़ता है तो हजारी प्रसाद द्विवेदी अथवा विद्यानिवास मिश्र की तरह संस्कृति की भावयात्रा पाठक को सुखद कर देता है। 'अशोक के फूल' अथवा 'प्रचीन भारत के कला विनोद' अथवा 'भ्रमरानंद के पत्र' उसके मन में तैर उठते हैं। 'राष्ट्र के प्रतीक' शीर्षक निबंध का यह अंश पत्रकारिता के बहाने इसी तरह की भावयात्रा विनोदपूर्ण संदर्भों में लोक जीवन और लोक साहित्य के प्रमाणों से करता है।

उस दिन हम लोगों में गेंदे के फूल को लेकर बड़ी चर्चा हो गई। बात यों हुई कि उत्तर भारत के एक समाचार पत्र में कुछ दिनों से 'संपादक के चिट्ठी पत्री' वाले स्तंभ में इस बात को लेकर काफी चख चख होती रही कि लौकिक गणतंत्र भारत का प्रतीक अशोक की सिंहत्रयी हो या कि ओडिसा-अमरावंती के मदमाते गयंद ....... किस्सा कौताहः बात गेंदे की फूल की हो रही थी। राष्ट्र के प्रतीक पुराणों -काव्यों में से भी नहीं मिलते, और पुराखंडों से तो भला मिल ही क्या सकते हैं। सारनाथ के सिंह या रामपुरवा के वृष की बात न होकर अगर मैसूर के हाथी या बनारस के बिजार की बात होती तब तो उनकी बात सोची भी जा सकती थी। हमें तो जमनापारी बकरी या पँछाही भैंस पर भी कोई आपत्ति नहीं। अगर सम्राज्ञी 'राजमहिषी' हो सकती थीं, तो जिस अनुपम भैंस ने इस तुलना को जन्म दिया वह स्वयं क्यों नहीं लोकतंत्र का प्रतीक हो सकती?

संस्कृत में कहा है 'त्वमसरं परमं वेदितव्यमं ' और हिंदी में कहावतें है, 'काला अक्षर भैंस बराबर ' - तो क्या भैंस ही हमारी परम वेदितव्य नहीं हो जाती? लेकिन बात फूलों की हो रही थी। फूलों में भी गेंदे के फूल की। न मालूम क्या सोच कर कुछ लोगों ने कमल को राष्ट्र-प्रतीक बनाने का प्रस्ताव किया था -उसका तो नाम ही उसे अयोग्य ठहरा देता है, यह निर्णय पाने के लिए किसी चुनाव आयोग के पास जाने की आवश्यकता नहीं है। क-मल, पानी का मैल। पंक-ज कीचड़ से उत्पन्न । दिन में आठ बार नहाने वालों के देश के प्रतीक का ऐसा भरष्ठ नाप! और गेंदा तो लोक प्रमाण है। लोक-साहित्य में एक शायद गुड़हल को छोड़ कर कौना सा फूल गेंदे के आसपास भी आता है? कालिदास को ताक पर रख दीजिए। यह बताइए कि ग्रामवासी भारत के किस नायक ने प्रिया की कबरी का कमल किस ग्रामीण ने सैंया के सिरिस होना चाहा? आत्म निवेदन की पराकाष्ठा में वह कबरी बंध का गुड़हल का फूल होना चाहता है, तो वह सैंया की गोदी का गेंदा बनना चाहती है : चंपक और पारूल, पद्म पारिजात झक मारते रह जाते हैं।

लोक साहित्य पद प्रमाण है। लौकिक आदर्शों के इस युग में इससे बढ़ कर और प्रमाण क्या हो सकता है? जो रूढ़िवादी लोग अभी भी आर्ष प्रमाणों के सहारे चलना चाहते हैं, उन्हें भी यह याद करके संतोष करना चाहिए कि परम वेदज्ञ यास्क भी इसी मत के थे - वह भी कह गए हैं 'लोकं पृच्छं' - प्रमाण के लिए लोक- साधारण के पास जाओं (सब रंग और कुछ राग ' - 'राष्ट्र के प्रतीक' निबंध से)

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के ललित निबंध की रंजकता, विनोद और पांडित्य का तर्क तीनों ही यहाँ मौजूद हैं, साथ ही लौकिक-अलौकिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक तर्क प्रधान के बीच की बहस को व्यंग्य - विनोद के केंद्र में रखा गया है। दूसरी ओर इस संकलन के आखिरी निबंध - 'सेवा पुराण' में मिथक के माध्यम से मौजूदा व्यवस्था और प्रबंध पर व्यंग्य है।

'सवाल यह था कि किसने काम क्या-क्या किया - नहीं, क्या क्या कार्य किए, और उनके फल स्वरूप उन्हें क्या दंड मिलना चाहिए और कितनी जल्दी। क्योंकि खुदा का घर कोई खाला जी का घर नहीं' - ऐसा कुछ दिन पहले किसी से कहते हुए लाला चित्रगुप्त जी को सुना गया था : वह वास्तव में शरणार्थी शिविर हैं जितनी देर उनके तबादले का फैसला करने में लगे। स्थानीय रूप से वहाँ कोई नहीं रहता, सिवाय अधिकारियों के - कम से कम अब कोई नहीं रहता। सुना जाता कि पहले काफी लोग रह जाते थे, पर नए सेवा नियमों में उतनी अर्हता किसी की नहीं हो पाती - पुराना विधान निहित स्वार्थों को बढ़ावा देता था और नया अधिक डेमोक्रेटिक तथा प्रोग्रेसिव है। ...तो विचार यह हो रहा था कि कर्मफल कैसे निर्धारित होः दूसरे शब्दों में किस कर्म और कितना उत्तरदायित्व किस पर है और सफाई में सभी ने एक गुट अपनाया था : कि उन्होंने किया तो बहुत कुछ पर उत्तरदायित्व उसका उन पर नहीं है। अब जैसे पुलिस अधिकरी : उनका कहना था कि अधिकारी होने के नाते ही वह 'आज्ञाकारी सेवक' थे : एक बना बनाया दंड विधान और उस पर आश्रित कार्य नियमावली उनके सामने थी और उनका काम यही था कि उस पर अमल करते चलें। विवेक की स्वतंत्रता उन्हें नहीं थी, जैसे किसी भी सिपाही का नहीं होता। ... जो कुछ किया उसमें किसी भी बात के लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूँ सर, इसलिए मुझे कर्म विधान से मुक्त समझा जाए ... मैं हूँ आपका परम आज्ञाकारी सेवक .... '।

यह दूसरा कौन है? यह तो अपने को इंसान मानने से कतरा रहा है? मैं कैसे किसी बात के लिए उत्तरदायी हो सकता हूँ। मैंने तो कोई काम ही नहीं किया-बल्कि मैं तो व्यक्ति की नहीं हूँ, मैं तो केवल एक स्वर हूँ! कुछ करना तो दूर, मैंने तो कभी करने न करने के बारे में सोचा ही नहीं क्योंकि वह मेरे क्षेत्र के बाहर की बात थी। जी कुछ मेरे सामने रख दिया गया, मैंने केवल उसे स्वर दिया -वह मेरे द्वारा -'बुल' गया, बस! मेरे जमाने से पहले तो कभी-कभी ऐसा भी होता था कि सोचना पड़ जा सकता था- और नहीं तो इतना ही कि नियमावली का अर्थ कैसे लगायें - या कभी सलाह-मशविरा करना पड़ जाता था, जिससे कम से कम अपनी राय की जिम्मेदारी तो अपने ऊपर आती थी - पर अब तो फैसला 'जन-हित' के आधार पर हो जाता है : सब फैसले हो चुकने के बाद ही बात मुझ तक आती है और मेरे द्वारा केवल स्वरित हो कर शून्य आकाश में फेंक दी जाती है। मैं क्योंकि स्वयं जन हूँ, इसलिए जनहित की बात सोचने का मुझे हक नहीं है : अपना हित सोचकर काम करने से काम में वह निस्संगता नहीं रहती जो सरकारी काम में होनी चाहिए - खासकर जनता की सरकार के काम में '।

इन निबधों का भावबोध अस्सी के दशक में आए 'कहाँ है द्वारका', 'छाया का जंगल', 'स्मृति च्छंदा' के भावबोध से इस कार्य में भिन्न है कि उनमें विचार का, तर्क का दबाव गहरा और अपेक्षाकृत जटिल होता गया है। रचनाकार की मान्यताओं और स्थापनाओं को न केवल गाढ़ी रेखाओं से रेखांकित किया गया है बल्कि विविध तर्कों से पुष्ट किया गया है। 'कहाँ है द्वारका' 'छाया का जंगल' 'स्मृतिच्छंदा' अज्ञेय के गद्य का उत्तर पक्ष है। चिंतन की गहनता है - सम्यता समीक्षा और सांस्कृतिक सरोकारों का गहन मनन-विवेचन है। किंतु वैचारिक दवाब इन निबंधों को अमूर्त अथवा अबूझ नहीं बनाता न ही इन्हें लोक सामान्य से दूर ले जाता है। सच बात तो यह है कि इतिहास और काल की देशी समझ और पहचान विकसित करने में यह चिंतन हमारा सहायक बनता है। अज्ञेय के ललित निबंध में लोक की मौजूदगी सामाजिक सांस्कृतिक बदलावों और उनसे जुड़ी चुनौतियों के रूप में सामने आती है। 'सावन किस रूत आएगा' शीर्षक निबंध में लोक साहित्य अथवा लोक गीतों की चर्चा करते हुए अज्ञेय पश्चिम के इतिहास बोध और कालबोध तथा भारतीय लोक परंपरा बोध के बीच मौजूद बुनियादी अंतर को कोई कोणों से दिखाते हैं -

'......लोक परंपरा को हम साधारण तथा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष में नहीं देखते। वास्तव में लोक परंपरा को ऐतिहासिक चौखटे में न रखना तो उस पहचान का ही एक प्रभाव है जो काल के एक इतिहासातीत आयाम को भी देखती है। बल्कि इस बात को यों कहना सत्य के निकटतर होगा कि यह पहचान लोक-साहित्य को पश्चिम की हिस्टरी के काल से अलग, भारत के इतिहास काल में रख कर देखती है।

'इति ह आस' - ऐसा ही होता आया है - यह काल के उस आयाम को प्रस्तुत करता है जो आवर्ती है, सतत वर्तमान है और निरंतर अपना नवीकरण करता चलता है, जबकि हिस्ट्री घटनाओं की वह क्रम कथा है जो उन्हें अतीत में प्रतिष्ठित करके देखती है।

लोक-साहित्य जहाँ जन जीवन के साधारण दुख-दर्द और उसकी आशा अभिलाषा को परिवेश -परिजनों से उसके संबंधों को अभिव्यक्त करता चलता है वहाँ निरंतर इस बोध को भी अभिव्यक्ति देता है कि सब कुछ निरंतर अपना नवीकरण करता चलता है लोक मानस कालातीत भंडार है इस अर्थ में कि वह काव्यगत परिवर्तन को स्वीकार करते हुए केवल एक ही रूप को प्रमाण मानता है उस रूप को जो उस समय जीवंत रूप है। ...अभिजात समाज अथवा पाठक वर्ग का साहित्य धीरे-धीरे अमूर्त अवधारणा की ओर बढ़ता जाता है जबकि लोक-वाङमय निरंतर एक आनुष्ठानिक रूप ग्रहण करता जाता है ... क्योंकि लोक जन जब अपना गीत गाता है, तो उसे जीता भी है। उसके गीत के संचारी भाव गीत तक सीमित नहीं होते बल्कि उसके समूचे तत्कालीन अस्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं।' (आधुनिकता, संवेदना और संप्रेषण ' संपाः कृष्ण दत्त पालीवाल) में संकलित।

इस 'समूचे तत्कालीन अस्तित्व की अभिव्यक्ति' से हम भारतीय लोग भली-भाँति परिचित हैं। दैनिक कार्यकलाप से लेकर उत्सवों, पर्वों त्योंहारों आयोजनों, खेत-खलिहानों, नदियों समुंदरों, बादल वर्षा बदलती ऋतुओं में प्रकृति के साथ साहचर्य और संवेदनापूर्ण जीवन जीते हुए अनेक-अनेक तरह के लोक गीतों में हम इस समूचे तत्कालीन अस्तित्व की अभिव्यक्ति' महसूस करते चले आ रहे हैं - हम में से वे सभी जिन्हें महानगरीय जीवन ने इतना ज्यादा पालतू नहीं बना लिया कि देशी संवेदना और परिवेश से बिल्कुल विच्छिन्न महसूस करने लगे हो।

इस तरह अज्ञेय के व्यक्तित्व-व्यंजक अथवा ललित निबंधों में भी उनके चिंतापरक लेखों की भाँति तार्किक विवेचन अपनी बारीकी के साथ मौजूद रहता है। साथ ही भारतीय तथा पश्चिमी परंपराएँ एवं संस्कृतियाँ आमने-सामने होती हैं। वैज्ञानिक और तर्क प्रधान बैद्धिकता संयत्र पश्चिमी आधुनिकता को वह चुनौती देते प्रतीत होते हैं। 'छाया का जंगल' नामक निबंध संग्रह में अज्ञेय के रचनाकर्म और चिंतन से जुड़े सरोकार व्यक्तित्व रंजक निबंधों के माध्यम से उपस्थित हुए हैं। भारतीय कालबोध (कहना चाहिए एशियायी कालबोध क्योंकि अज्ञेय चीनी, जापानी चिंतन दृष्टि से भी भली-भाँति अवगत और प्रभावित थे) अज्ञेय के सृजन-चिंतन का महत्वपूर्ण अंग रहा है। 'संवत्सर' नामक पुस्तक इसी आवर्तीकाल अवधारणा को केंद्र में रखते हुए लिखी गई है, जिसके अनुसार हर घटना हर व्यक्ति, हर जीवधारी, हर प्रकृतिक परिवर्तन अथवा अवस्था काल के सातत्य में परिवर्तन का ही एक रूप है। 'अंतराल' नामक निबंध में वे खाली समय (दो कार्यों के बीच के अंतराल के समय) के ब्याज से भारतीय कालबोध की पश्चिमी कालबोध से तुलना करते हुए दोनों के बीच के अंतर को बड़े ही तार्किक और रंजक ढंग से उभारते है 'नदी के द्वीप' के अपने प्रिय और सुपरिचित रूपकात्मक बिंब को भी एक बार पुनः नए संदर्भों में नई अभिव्यंजना प्रदान करते हुए। संस्कृत की 'काव्यशास्त्र विनोदेन' और तमिल के संगीत नृत्य मिश्र कार्यक्रम ' कालक्षेपकम' का समय के अंतराल के रूप में उल्लेख करते हुए वह इस अंतराल के विषय में कहते है - 'एक छोटा सा कालद्वीप काल के ही अंतहीन प्रवाह में काल का ही एक छोटा सा द्वीप (नमक के सागर में नोन का पुतला! कुछ लोग उस द्वीप पर खो जाते हैं। उनके लिए काल की गति रूक जाती है और वह थमा हुआ काल फिर भी एक सखा-भाव लिए रहता है। ... अगर संस्कृति खाली समय के उपयोग की दीक्षा का ही नाम है, तब क्यों नही द्वीप पर से नदी और नदी के प्रवाह के बीच से द्वीप, दोनों एक से सुंदर दीखने चाहिए? सतत प्रवाह के बीच एक स्थिर बिंदु, एक अचल वृत्त के आस-पास सतत गतियुक्त अनंत विस्तार। ... गति से घिरी स्थिरता, फिर अचंचल में लय होती गति ... और हमारा विवेक तब अपनी रचनात्मकता का सहारा लेकर चित्र में एक और तत्व जोड़ देगा - नदी में बहती हुई वह छोटी सी डोंगी जो कि हम हैं या कि जिसमें हम हैं। और हम पहचानेंगे कि वह छोटी सी डोंगी भी तो उस काल-द्वीप के समकक्ष, समतुल्य और समरूप काल का ही एक बिंब है - काल के और हमारे परस्पर संबंध का एक पार्श्व।'- (छाया का जंगल में संकलित)

संस्कृति और काल के संदर्भों में मानवीय जीवन, जीवन की विविध गतिविधियों की निजता को रेखांकित करते हुए इस निबंध में काल की अबाध गति में छोटे से कालखंड की स्थिति को निरूपित व्याख्यायित किया गया है। काल और प्रकृति तथा मनुष्य के संबंध का यह विवेचन जापानी जैन-बौद्ध परंपरा में काल की अवधारणा से भी जुड़ता है,क्योंकि वह भी भारतीय चिंतन का विकास और विस्तार है। इसके साथ ही यह काल चिंतन अज्ञेय को क्षणवादी - अस्तित्ववादी करार देने वालों की भूल को भी अनायास ही उजागर तो कर ही देता है बल्कि सांस्कृतिक कार्यकलाप और काल के परस्पर संबंध को भी बहुत सटीक ढंग से रूपायित करते हुए संस्कृति चिंतन को नई दिशा देता है।

'छाया का जंगल' शीर्षक निबंध जहाँ प्रकृति, मिथक और फंतासी को एक साथ गूँथता है वहीं 'बरामदे में' नामक निबंध पर्यावरण संबंधी चिंताओं को केंद्र में लाने का प्रयास है।

विकास और प्रकृति ने किस तरह मनुष्य को प्रकृति से विच्छिन्न कर दिया है इस बात को अनुभूति कराने का प्रयास है इस निबंध में। बरामदे में शांत बैठकर पंछियों को देखने - सुनने अथवा बरसात के समय बच्चों को भीग-भीग कर खेलते हुए देखने के माध्यम से इस निबंध में बदलते हुए भाव बोध की प्रस्तुति है - वह भाव जो प्रकृति से हमें अनायास ही जोड़े रहता है किंतु जिससे हम धीरे-धीरे लगातार दूर होते जा रहे हैं। प्रकृति से तदाकार हो सकने की मानसिकता से धीरे-धीरे वंचित होते जा रहे हैं। प्रकृति से जुड़ने का अवसर, समय और आकांक्षा तीनों ही लुप्त हुए हैं। औद्योगिक प्रगति, उत्पादन और विकास की मौज में हमने सहज जीवन पद्धति को तिलांजलि दे दी हैं, प्रकृति से हम दूर हो गए हैं। विनिर्मित उत्पादों के पीछे पागलपन से दौड़ते हुए जिस तरह की ऊब यानी 'बोर' होने की मानसिकता का शिकार हुए हैं उसमें हमने छोटे बच्चों को भी धकेल दिया है। 'बरसात' नामक निबंध इस ऊब की अवस्था के कारणों को खोजने के साथ ही आदिम समाज और सभ्यता के विकास के बीच खोए मनुष्य के आत्म-तत्व की तलाश करता है।

'सभी बच्चों की एक विलक्षण बात है कि लीला के लिए उन्हें किसी उपकरण की जरूरत नहीं होती। बाल मुकुंद के लिए अपने पैरका अंगूठा ही यथेष्ट होता है। इस स्तर पर सभी बच्चे एक होते हैं -उन्हें किसी साधन, उपकरण या सामग्री की जरूरत नहीं होती। उनका लीलाभाव स्वायत्व और आत्म निर्भर होता है। यह हमी हैं कि बच्चों को बिगाड़ कर उन्हें एक से एक बढ़ कर जटिल टूटने या बिगड़ने वाले खिलौनों पर निर्भर करना सिखाते हैं और फिर कुढ़ते है कि आजकल के बच्चे इतनी जल्दी बोर क्यों हो जाते हैं। आदिम जातियों का बच्चा तो क्या, वयस्क प्राणी भी नहीं जानता था कि ' बोर होना' होता क्या है। लेकिन आज का सभ्य शहरी बच्चा है कि अक्षर बाँचना भी बाद में सीखता है लेकिन बोर होना क्या होता है यह खूब जानता है।

यह आधुनिक सभ्यता की देन है कि उसने हमारी स्वतःपूर्णता नष्ट करके हमें चीजों पर निर्भर रहना सिखा दिया है - निरी चीजों पर कैसी भी चीजों पर। शायद साम्यताओं की यहीं गति होती है - वे हमें आत्म -तत्व से तोड़ कर वस्तुओं से जोड़ती हैं। संस्कृतियाँ आत्म-संस्कार है, सभ्यताएँ वस्तुओं के निर्माण और उपयोग की दीक्षा। वहाँ तक भी ठीक होता लेकिन यह दीक्षा ऐसी है कि बहुत से ऐसे संस्कारों को मिटा देती है जिससे हमारी सर्जनशीलता जुड़ी हुई है। संस्कृतियाँ सर्जनशील होती है या हो सकती है, सभ्यताओं का संबंध निर्मितियों तक ही रह जाता है। भले ही उन निर्मिति में भारी कौशल लगा हो, लेकिन वह कौशल अंगों का या बुद्धि का चमत्कार होता है, आत्मतत्व उसमें सभी धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है। यह नहीं कि समस्याएँ प्राणवान हो ही नहीं सकती, लेकिन प्राणतत्व पर बल देने वाला पक्ष संस्कृति का है और जिसे हम आधुनिक सभ्यता कहते हैं उसकी तो सारी आधुनिकता मानो यंत्र कौशल पर टिकी हुई है - आत्मा की छुवन मात्र यंत्र की दक्षता को कम कर देगी ' (छाया का जाल)

'बरसात' नाम का यह निबंध पारंपरिक जीवन और साहित्य में वर्षा के प्रति आकर्षण के ब्याज से कई तरह के बुनियादी सवालों को उठाता है जिनसे हम आज जूझ रहे हैं जलवायु परिवर्तन के प्रश्न से लेकर प्रकृति से सहज जुड़ाव की मानसिकता के लोप और फिर आधुनिक सभ्यता का संकट जिसमें सहज जीवन को पिछड़ा असभ्य और वंचित मानकर हम स्वयं अपने आत्म तत्त से बंचित होते जा रहे हैं। विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी पारंपारिक सहज जीवन संस्कृति से बेदखल कर रहे हैं।

'कहाँ है द्वारका' निबंध की भूमिका के बारे में वात्स्यायन जी ने कहा है ' जिस प्रकार की ये रचनाएँ है, उसे ललित, व्यक्तिपरक,व्यक्तिव्यंजक आदि तो कहते ही है, मराठी में उसके लिए और एक नाम प्रचलित है जो कम उपयुक्त नहीं - राम रचना। सोचता हूँ कि इसे भाव रंजक भी कह सकते हैं ...मैं समझता हूँ भावों को रंजित करते रहने का काम संस्कृति के मुख्य प्रयोगो में से एक है और एक लीला अथवा क्रीड़ा -भाव संस्कृति की करयित्री शक्ति का अंग होता है। आज के विचारवादी युग में संस्कृति के इस पक्ष पर बल देना और भी आवश्यक है। भावों का विचार से कोई विरोध नहीं - 'विचार कविता' के अब मुमूर्ष आंदोलन की प्रतिज्ञाओं के बावजूद ... अगर मैं इन छोटी -छोटी निष्प्रयोजन रचनाओं को भावरंजनियाँ कहता हूँ तो आशय यही है कि भाव तो वहाँ है पर वह रंजित रूप में प्रस्तुत किया गया है ... यह सारी प्रक्रिया एक सांस्कृतिक कर्म व्यापार है। इसीलिए मैंने कहा कि इमारत मैंने खड़ी की है भूमि में पनपती है जो सब की होती है।... विचार निषिद्ध नहीं है, पर बह भावों के संप्रेषण पर है। भाव भी रंजित है (चाहे उन्हें विचारों जरा ही रंगा गया हो।) और वह रंजन भी सुख देने में सुख पाते हुए किया गया है।'

विचार द्वारा रंजित भाव ही है जो वात्स्यायन जी के इन निबंधों में हम पश्चिमी आधुनिकता की अवधारणाओं से मुक्ति का स्वर पाते हैं। मनुष्य को केंद्र में रख कर प्रकृति पर विजय पाने की पश्चिमी वैज्ञानिक दृष्टि और विकास की अवधारणा को,ज्ञनोदय की समग्र परिकल्पना को वात्स्यायन जी बहुत सूक्ष्म और बारीक ढंग से इन निबंध में चुनौती देते है। 'ऊँध ' नामक निबंध में वह डारविन के विकासवादी चिंतन से जुड़ी कालानुक्रम की अवस्था के परिणामतः 'आगे' को यानी बाद में आने वाले की पिछले के ऊपर रखने की प्रवृत्ति के दुष्परिणाम की ओर ध्यान दिलाते हैं - 'इस प्रकार की दिशा के मिस हम पहले काल की दिशा निर्धारित कर लेते हैं। है तो यह एक प्रकार का धोखा ही पता नहीं, हम अपने को धोखा दे रहे होते है कि दूसरों को। जो हो हम जीव जंतु को वनस्पतियों का परवर्ती, इसलिए उन से उच्चतर मानते हैं : मानव और भी पीछे आया इसलिए उच्चतर है ही।

यो मानव अपनी पीठ ठोकना चाहे तो उसमें क्या आपत्ति हो सकती है - निश्चय ही पेड़ तो इसका बुरा मानने से रहे। पर अपने को श्रेष्ठतर प्राणी मानकर मनुष्य कितने -कितने अधिकार भी तो अपने ऊपर ओढ़ लेता है। जैसे पेड़ काटने का अधिकार या पशु को खा जाने का अधिकार। भले आदमी, तू बाद में ही आया सही, तो जिन की बदौलत आया, जिनके आए बिना तेरा आविर्भाव होने वाला ही नहीं था, उनके प्रति तेरा क्या कोई उत्तरदायित्व नहीं? तू उन में से प्रकटा है इसीलिए तू ऊँचा है तो जो तुझ से 'नीचे' हैं वे तेरे रक्ष्य हैं कि तेरे भक्ष्य?

ऊँच-नीच के जो भरम मनुष्य ने पाल रखे हैं वे यहीं तक रूक जाते है ऐसा भी तो नहीं है। अपने ही समाज में भी वह इन्हें ले आया है, वहाँ भी उसने फूट और बैर का विषबीज बो रखा है। ... यह भी हुआ है कि इस कूड़मग्जी को उसने और ऊँचे -ऊँचे नाम दे दिया। वनस्पति तो काल के अधीन जीते हैं, अपने को परिवेश के अनुकूल ढालते हैं, मनुष्य परिवेश को अनुकूल बनाता है, इसलिए कालजित है,स्वाधीन है। जीव-जंतु भी इसी कसौटी पर किसी उच्चावच क्रम में रखे जा सकते हैं - कुछ अपेक्षया स्वाधीनता है, पर है सब मनुष्य से नीचे और सबकी स्वाधीनता भी हीनता कोटि की है। और -फिर मनुष्यों को भी एक नसैनी पर रखते हुए - उसने यह भी तय कर लिया कि कुछ मनुष्य कम स्वाधीन है - उन्हें कम स्वाधीन रखते हुए उन के सुख-सुविधा के विकास की स्वाधीनता। और इस लूट के आधार पर उसने अपना आसन थोड़ा और ऊँचा कर लिया।

यह 'स्वाधीनता' है बड़ी खतरनाक कल्पना। यों तो खैर, जिन भी कल्पनाओं में शक्ति होती है सभी बड़ी खतरनाक होती हैं। पर जहाँ कल्पना का करेला अदृश्य पूर्वग्रहों की नीम पर चढ़ा हो वहाँ क्या कहना। ...अब एक तरफ तो भाषा का सारा मुहावरा देखिए : हम कहते हैं ' आजाद पंछी ' 'फ्री इज ए बर्ड' - हर भाषा यें यह कल्पना मिल जाएगी कि पंछी हम से ज्यादा आजाद है। कुछ पक्षियों को तो 'आकाश के स्वायी' भी कहा जाता है, जैसे कुछ जंतुओं को वन का राजा। उन पर हम न केवल ऐसी स्वाधीनता का आरोप करते हैं जो हमारे सामर्थ से बड़ी है। उन पर हम अपनी महात्वाकांक्षा का भी प्रक्षेपण कर देते हैं जिसे हम ने अपनी उच्चता के कारण अपने लिए प्रेय और श्रेय दोनों मान लिया है - दूसरों पर राज करने की आकांक्षा का।'

अपनी इस भाव रंजिता में अज्ञेय न केवल काल की भारतीय प्रवहमान सातत्यता की अवधारणा के परिणाम स्वरूप प्रकृति -वनस्पति जगत और जीव-जंतुओं से मनुष्य के रिश्ते को पश्चिमी विकासवाद की अवधारणा के आमने-सामने रखते हैं बल्कि उस संवेदना अथवा मनःस्थिति को भी उजागर करते है जो उत्तरआधुनिकता की अवधारणा का बड़ा आधार है। जिसके अनुसार आधुनिकता के स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व के, विकास के, ज्ञानोदय के माध्यम से मनुष्य की प्रगति के समस्त दावे और वादे झूठे पड़ते दिखाई दिए हैं। मिशेल फूको, जॉक देरिदा, एडवर्ड सईद के सत्ताज्ञानमूलक विमर्श के माध्यम से उठाए गए प्रश्नों और सत्ता-शक्ति के सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को अज्ञेय अपने ढंग से अपनी शर्तों पर उठाते हैं। औपनिवेशिक आधुनिकता से मुक्त सोच के माध्यम से - देशी स्थितियों -परिस्थितियों से प्राप्त अनुभव और विवेक के माध्यम से।


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हिंदी समय में रीता रानी पालीवाल की रचनाएँ