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आलोचना

भवंती, अंतरा और शाश्वती
प्रभाकर मिश्र


हिंदी की लघु गद्य विधाओं को समृद्ध करने का श्रेय अज्ञेय को है। 'भवंती' (1972) और 'अंतरा' (1975) तथा 'शश्वती' (1979) उनकी अंतः प्रक्रियाओं के संकलन हैं। ये अंतः प्रक्रियाएँ क्या हैं? अज्ञेय ने इन्हें अपनी रचना-यात्रा का 'लागबुक' कहा हैं। उन्हीं के शब्दों में 'भवंती' में उस यात्रा की लागबुक है जिसमें जब तक दिक्काल की माप की टीप लिखी जाती रही हैं। जसके कारण यात्रा के पथ-चिह्न अनुकूल और प्रतिकूल स्थितियाँ तथा धाराएँ, जोखम, भटकन, प्रत्युत्पन्न सूझ आदि का ब्योरा मिलता रहे।

उद्देश्य यही है कि मेरे पाठक उस पूरे परिदृश्य उस सागर-पथ का एक बार अवलोकन करके उसे पहचान लें, जिससे मैं गुजरता आया हूँ।' अपनी अंत प्रक्रियाओं के दूसरे संकलन 'अंतरा' के 'निवेदन' में अज्ञेय लिखते है :- 'इन दो संचयनी में इस बात का काफी संकेत मिल जाएगा कि पिछले दस-बारह वर्षों में कौन से, कैसे साहित्यिक या साहित्य संपृक्त प्रश्न मुझे उन्मथित करते रहे हैं अथवा चुनौती देते रहे है। केवल समकालीन घटना - पटल को देखने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसका अपना जीवन और कर्म उन प्रश्नों के साथ बँधा है। इसका भी कुछ संकेत पाठक को मिला होगा कि उन प्रश्नों से जूझता हुआ मैं किधर जा रहा हूँ। उस संघर्ष में कौन से प्रमाण मेरा संबल हैं। कौन सी युक्तियाँ मेरे साधन, कौन-से लक्ष्य मेरी प्रेरणा।'

अज्ञेय के उपर्युक्त वक्तव्य से स्पष्ट है कि भवंती, अंतरा और शाश्वती अंतःप्रक्रियाएँ है जो हिंदी गद्य में सर्वथा नवीन विधा की रचनाएँ है। 'ये न तो जीवनी है, न आत्मकथा, न यात्रावृत्त, न संस्मरण, न रेखाचित्र, न रिपोर्ताज। हाँ यदि ये किसी विधा के निकट है तो डायरी के - लेकिन पूरी तरह डायरी भी नहीं है। इनकी स्वतंत्र विधा है जिसे अंतःप्रक्रिया ही कहना सर्वाधिक उपयुक्त होगा।'

प्रस्तुत पंक्तियों के लेखक की दृष्टि में इन पुस्तकों में व्यक्त विचारों में लीरिक तत्व और वैचारिकता के साथ-साथ इसके रचयिता अज्ञेय का व्यक्तित्वाभिव्यंजन निबंध के तत्वों से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है अतः अज्ञेय के निबंध साहित्य के विश्लेषणात्मक परिचय के संदर्भ में इनकी पड़ताल उपयुक्त प्रतीत होती हैं। इन आंतःप्रक्रियाओं का संबंध अज्ञेय की रचना -यात्रा से सीधे जुड़ा हुआ हैं। इस प्रसंग में अज्ञेय लिखते है - 'जिन छोटे-छोटे प्रकरणों को जोड़-कर यह पुस्तक बनी हैं, वे प्रायः सभी छोटे-छोटे युद्धो के इतिहास है, प्रत्येक के पीछे एक यंत्रणा-भरी प्रक्रिया रही हैं। इतना ही है कि समूची पुस्तक में एक ही रचना की प्रक्रिया में पाई हुई यंत्रणा से मिलने वाली संहति नहीं है, वह फुटकर प्रक्रियाओं का फलन हैं जिसके पीछे उतनी ही फुटकर, विविध और वैचित्रमयी यंत्रणा रही है। संहति उसमें है तो रचना के माध्यम से नहीं, स्वयिता के जीवनानुभव के माध्यम से।'

वस्तुतः अज्ञेय एक चिंतक हैं - एक चिंतक रचनाकार। अपनी रचना यात्रा में उन्होंने जीवन, समाज, साहित्य, भाषा आदि के बारे में सतत चिंतन से हिंदी के भंडार की श्रीवृद्धि की हैं। ईश्वर, काल, धर्म, नैतिकता, स्वाधीनता, मूल्य, परंपरा, आधुनिकता, भारतीयता, यथार्थ, संस्कृति तथा छंद आदि अनेक विषयों के संबंध में उनका गंभीर चिंतन इन अंतः प्रक्रियाओं में संकलित है। ' अज्ञेय के चिंतन का दायरा बड़ा व्यापक हैं, फिर भी यह कहा जा सकता है कि इन अंतःप्रक्रिंयाओं के केंद्र में लेखक के मूल्य चिंता मुख्य रही है।

उस मूल्य चिंता को हम जीवन मूल्य कह ले या साहित्य मूल्य, कोई फर्क नहीं पड़ता।' 'भवंती' के निवेदन से ही स्पष्ट है - 'अंतिम कुछ नहीं है, सहयात्री, शिवा इस माँग के कुछ मूल्य हो जिनकी और बढ़ने जाया जा सके और सिवा उधर के यात्रा के आनंद के।' अपनी इस बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए अज्ञेय 'भवंती' की ही एक प्रक्रिया में लिखते है -

'अगर मेरे लिए मृत्यु नहीं, तो फिर जीवन भी मेरे लिए नहीं है। मैं आज जीता हूँ यह उतनी ही संयोगिक बात है जितनी यह कि कल मैं मर जाऊँगा। मुझे दोनों ही चिंता छोड़कर कुछ और से उलझना चाहिए, किसी दूसरी चीज को अपना लक्ष्य, साध्य, सोध बनाना चाहिए। वह 'और' क्या हो सकता है? मूल्य। लेकिन कौन सा मूल्य? लोग कहते है 'जीवन मूल्य'।'

भवंती और अंतरा की अनेक अंतः प्रक्रियाओं में अज्ञेय ने मनुष्य से बड़े इस मूल्य की चिंता को तरह-तरह से व्यक्त किया हैं। 'इन तीन पुस्तकों में अज्ञेय ने विगत जीवन में फैले चिंतन - संसार से कुछ अंश, विचार खंड, सूक्तियाँ, यात्राओं के इंप्रेशन्स जमा किए है उन्होंने इस चिंतन यात्रा की अवधि, समय, कानोलॉजी का कोई हवाला नहीं दिया, जो मुझे कुछ अजीब सी लगती है। हमें कुछ पता नहीं चलता कौन सी पुस्तक, उपन्यास या कविताएँ लिखते हुए या किन राजनैतिक, सामाजिक घटनाओं के संदर्भ में उनके ये विचार या प्रतिक्रियाएँ एक 'शाश्वत अर्थ' के अलावा एक निजी, तत्कालिक दबाव प्रस्तुत करती है।

इसीलिए इन पुस्तकों में सिर्फ एक फैला हुआ चिंतन प्रदेश मिलता है। यात्रा का उतार-चढ़ाव नहीं, मील के पत्थर नहीं जिन पर एक क्षण बैठकर हम लेखक के पाँव चिह्न आँक सके, कहाँ वह ठिठका था, कौन सी राह चुनी थी, किस पगडंडी पर कुछ दूर चलकर वापस मुड़ गया हमें यह भी पता नहीं चलता, किस ठोकर की आह और दर्द इन पन्नों पर अंकित हैं।'

किंतु इस संदर्भ में अज्ञेय की एक टिप्पणी यहाँ दृष्टव्य हैं - 'भोगने वाले व्यक्ति और मनीसा के अलगावॅ की पुरानी चर्चा में जब कहा गया था कि दोनों के बीच एक दूरी हैं और जितना बड़ा कलाकार होगा उतनी अधिक दूरी होगी।'

इससे स्पष्ट है कि इस अंतः प्रक्रियाओं का लेखक नहीं चाहता है कि अपना दर्द, अपनी व्यथा अथवा पीड़ा वह पाठकों के समक्ष व्यक्त करके बदले में उनकी सहानुभूति अर्जित करें। क्योंकि सर्जन प्रक्रिया का मूल तत्व ही कष्टमय होता हैं, और यह कष्ट जितना ही प्रबल होगा रचना उतनी ही महत्वपूर्ण होगीं।

'जब कभी अज्ञेय अपनी बुद्धि से उतरकर आँख पर आते है तो एक अद्भुत, मांसल, सेंसुअल लगाव का लैंड-स्केप आलोकित हो उठता है। शायद ही किसी आधुनिक लेखक ने 'चर-अचर' की दुनिया को इतने उत्सुक भाव से देखा हो, जितना अज्ञेय ने। कैमरे की आँख की तरह उनकी दृष्टि हर लय, थिरकन और ठहराव को पूरी डिटेल के साथ रजिस्टर कर सकती है।' 'पतझड़ के झड़ते पत्ते से अधिक सुंदर किसी चीज की कल्पना नहीं कर पा रहा हूँ। यह धीरे-धीरे लय के साथ गेलते हुए सरना मनो धरती के गुरूत्वाकर्षण से मुक्त होकर भार युक्त होकर तिरना-होना सृष्टि मात्र में इससे बड़ा सौभाग्य क्या और इससे बड़ा सौंदर्य क्या। पत्ते यूं झरते जाय और उन्हें देखता जाऊँ - लगता है कि इसी में काल मुक्त हो जाऊँगा।'

'इसे महज एक लिरिकल उच्छवास नहीं कहा जा सकता, इसके पीछे दृष्टि (सौंदर्य दृष्टि) को मर्मज्ञता के साथ 'खोने की पीड़ा' भी छिपी है साथ ही वह तीखा बोध भी कि जिस

युग और दुनिया में हम जी रहे है उसमें लय का नैसर्गिक स्पंदन और इस स्पंदन को देखने वाली दृष्टि धीरे-धीरे धुधलाती जा रही हैं। जिसके मूल्य में 'आधुनिक मशीनी संस्कृति' के प्रति एक बुद्धि जीवी की वितृष्णा और पीड़ा हैं।

'अज्ञेय का प्रकृति -बोध इस दृष्टि से छायावादी बोध से बहुत अलग है। वह पहाड़ों को देखकर मुग्ध होते है, तो नीचे जंगलों में पेड़ों के कटने का आर्तनाद भी सुनते है, बल्कि यु कहे, यह 'कटने' का बोध होने पर उन्हें प्रकृति के लगाव में 'एगुंइश' एक गहरी दरार अंकित कर सकता है।' 'अज्ञेय' अपने लेखन में सदैव परंपरा और भारतीय दृष्टि को पहचानने और स्वीकार करने पर जोर देते है।

'नव स्वतंत्र अफ्रीकी देशों का साहित्यकार अपनी स्मिता की आक्रोश भरी खोज को श्यामत्व (नेग्रिट्यूड) का नाम देता है। और हमारे आलोचक प्रशंसक के मारे आपे से बाहर हो जाते हैं। पर भारतीय साहित्यकार भारतीयता की बात करता हैं तो वे ही आलोचक लट्ठ लेकर उसके पीछे पड़ जाते हैं। और भारतीय अस्मिता के नाम से उन्हें चिढ़ है। क्योंकि उसका समर्थन दूसरे नहीं करते, जिनको उसमें अपना लाभ नहीं दिखता - भारतीयता का लाभ होगा या नहीं यह प्रश्न जिनके लिए असंगत है।'

यह एक प्रकार की हीन ग्रंथि है, इसलिए अज्ञेय इनका विरोध करते है। वे आस्था और विद्रोह दोनों को स्वीकार करते है। यह कहने कि लिए परंपरा से मुक्त है, भाषा का उपयोग करना कितनी बड़ी विडंबना है। भाषा हमारी सबसे पुरानी, सबसे कड़ी अनुल्लंध्य सांस्कृतिक रूढ़ि है। अपने दावे के लिए उसका सहारा लेना और दावे के लिए भाषा का सहारा अनिवार्य है। - सिद्ध कर देता हैं कि दावा बेमानी है।' इस संदर्भ में श्री निर्मल वर्मा क विचार उल्लेखनीय हैं - 'मेरे विचार मे समकालीन भारतीय लेखन की आधुनिकता की यह सबसे प्रामाणिक कसौटी है कि परंपरा से विगलित हो जाने के बावजूद स्वंय आधुनिक उपकरणों पर वह कितनी गहरी चोट कर सकता है, स्वयं चोट खाकर कैसे अपनी प्रतिक्रिया प्रकट कर सकता है। अज्ञेय चोट खाकर परंपरा की तरफ नहीं मुड़ते, न किसी भविष्यवादी दर्शन की ओर। वह अपनी तरफ मुड़ते है, जहाँ वह स्वतंत्र रूप से अपनी परंपरा से जुड़ सकते हैं। अपने भविष्य को चुन सकते हैं।

आलोचकों ने जिसे अज्ञेय का 'अहं' माना है, वह वास्तव में लेखक का कवच है, सिर्फ अपने को सुरक्षित रखने का यंत्र नहीं बल्कि उन मूल्यों को बचाने का साधन भी, जो नष्ट हो रहे हैं, जिन्हें जानबूझकर प्रगति, आधुनिकता और युग धर्म के नाम पर नष्ट किया जा रहा हैं।'

सब कुछ देखने और परिवर्तन के बाद यह कहना समीचीन जान पड़ता है कि इन अंतःप्रक्रियाओं में साहित्य में साहित्य और जीवन के बुनियादी प्रश्नों पर उनका मौलिक चिंतन व्यक्त हुआ हैं। हिंदी में बिना सोचे - समझे शब्दों का प्रयोग हो रहा है। अज्ञेय ने आज के साहित्य में बार-बार प्रयुक्त होने वाले ऐसे कई शब्दों के गलत अर्थों की ओर ध्यान आकर्षित किया हैं। उदाहरण के लिए - 'स्वातंत्र्योत्तर और समकालीन।'

इनका प्रयोग बहुत होता है। अज्ञेय के अनुसार इनके स्थान पर आजादी का युग या 'स्वातंत्र्य युग' तथा 'कालानुभूति में साझीदार' होना चाहिए। भवंती और अंतरा के क्रम में ही 'शश्वती' का भी उल्लेखनीय स्थान है : 'इनमें अज्ञेय ने कुछ चुहलबाजी और छेड़छाड़ भी की है। अपने समकालीनों पर या अपने समकालीनों की मान्यताओं पर विनोदपूर्ण प्रहार भी किया है। कहीं-कहीं तो नाम लेकर जैसे श्रीकांत वर्मा, शिवमंगल सिंह 'सुमन' धर्मबीर भारती, उपेंद्रनाथ अश्क, प्रभाकर माचवे, संजय गांधी या 'परिमल के सहयोगियों का।'

इस संदर्भ अंतरा के निवेदन में स्वयं अज्ञेय लिखते है - 'भवंती की भाँति अंतरा में भी हल्के स्थल भी है, चुहलबाजी भी है, छेड़छाड़ भी है, पर संघर्ष -क्षेत्र के ये विश्राम ताजा होने के लिए ही है, किसी को - चाहे वह विपक्षी भी क्यों न रहा हो - दुःख पहुँचाने या अपमानित करने के लिए नहीं है।' इसके एकाधिक उदारहण उल्लेखनीय है -

एक थे ध भारती, सकिन अतरसुइया,
मौके से छु आए बंग्लादेश की धइया।
       पदमश्री तो गए
       पर कविता गवाँ गए
(या यों ही हेरा गए होके बंबईया?)

इसी प्रकार के एकाधिक स्थल 'शाश्वती' के द्रष्टव्य हैं -

मंच पर पधारे युवा नेता संजय गांधी
यारों ने पहले से ही कैसी हवा बाँधी।
बोले क्या? बोलने को कह गए
सुनने को चमचे फकत रह गए
क्या है अंग्रेजी मुहावरा? 'चा की प्याली में आँधी!'

पुनश्च :

मेधावी थे माचवे पर होते गए पोंगा
कान से लगाए - लगाए अकादमी का चोंगा
        सबको मानते
        हाँ में हाँ मिलाते
घिघियाते- घिघियाते आखिर रह गए घोंघा!

इससे स्पष्ट है कि अज्ञेय बहुत बार लेखक से 'खेलक' हो गए है। भाषा के स्तर पर भी और अभिव्यक्ति के स्तर पर भी। वहाँ उनकी अभिव्यक्ति फबतियों और चुटकियों की हो गई हैं और भाषा में व्यर्थता का एक अहसास उतर आया है। ' ... शिवमंगल सिंह 'सुमन' और श्रीकांत वर्मा के विषय में ली गई उनकी भाषा का मजाक - सब कुछ इतना निजी है कि अज्ञेय को उनकी सहजता में प्रस्तुत करता हैं, उनके व्यक्ति रूप को उजागर करता हैं। चोट खाये हुए और चोट करने वाले दोनों व्यक्तियों का अंदाज इनमें हैं।'

कवि से कुलपति हुए एस. एम. सिंह सुमन -
पीठ को आचार्य मिला, कविता हुई गुम, न?

X X X

दोनों दुनिया देख लौटे श्रीकांत वर्मा
कहीं उन्हें मिला नहीं अपना समान धर्मा
ईश्वर की भी अर्जी पर
बोले वह : 'तुम मेरी मर्जी पर
चाहो तो मेरे तहत रहो विश्वकर्मा।'

X X X

वैष्णवीय चिंतितता!

आपके लेखकत्व की वैश्वानरी वर्चस्वता की आर्यताएँ आपके वानस्पतिक चिंतन को जडियता की जांगलिक गंधीयता से मुक्ति करके सम्पुंजीयता की आत्मिक आरेहता में प्रतिष्ठित करती है। मंत्रीय भावदशा की प्रकंपितता से संस्पर्शी व्यक्ति में भाषात्व और लेखनीत्व की उदात्तता के प्रति प्रतिक्रिया उत्पन्नित होती हैं। ऊध्वर्ता और समतलता के आयाम में चक्रीयता सिद्धांत की अनुसारता से उसकी देशगतता तथा कालगतता प्राप्त करती है। इसी विपरीतता से काव्य के वैष्णव व्यक्तित्व के प्रतिष्ठितता संपत्तित होती है। इति नमस्कारांते।'

वस्तुतः अज्ञेय में अपने व्यक्तित्व को अलग प्रमाणित करते रहने का भाव और सक्रिय प्रयत्न सदैव लक्षित किया गया है। 'साहित्यिक क्षेत्र से बाहर राजनीति के क्षेत्र में भी अज्ञेय अपनी इस मुद्रा के साथ उतरे है और साफगोई के अंदाज से बेडर होकर उतरे है। हौलदिली वहाँ भी नहीं हैं। यानि एक बार फिर लगता हैं कि अज्ञेय कर्म और चिंतन में कथनी और करनी में दूरी का बरताव नहीं करना चाहते। इस कर्म में वे सीधे ढंग पर विचार प्रकट करने में भी नहीं हिचकिचाते और प्रतीकों के माध्यम से भी अपने व्यंग्य को पूरा कर लेते है।'

'परिभाषाएँ ही उलट दी जा रही हैं। सात स्वतंत्रताएँ भी रद एक आदेश के बल पर!
एक रानी टुनटुनाली, सात पाखी नाक कटाली!
रानीर पक्खे उकील छाय
पाखीरा सब जेले जाय।'

भवंती और अंतरा के बाद शाश्वती ये तीन अंतः प्रक्रियाओं के संग्रह हैं। 'इन्हें अंग्रेजी में 'बेलेंस लेटर्स' कहा गया है। यह बहुत कुछ चंपू जैसी चीज हैं। फर्क यह है कि चंपू प्रायः पद्य-प्रधान होता है और यह गद्य-प्रधान है। कविताएँ शाश्वती में भी है, पर इनकी संख्या थोड़ी है। जो हैं भी वे तुक्तक के वजन पर रचित हैं और उनमें व्यंग्य और विनोद का भाव अधिक है, या फिर भाषा का एक खिलंदड़ी रूप और ढंग है।'

इस संग्रह में सबसे अधिक 'यथार्थ' के संबंध में लेखक ने अपना विचार व्यक्त किया है, जिनमें रचनाकार के विचारों में विशदता और मौलिकता दोनों के दर्शन होते हैं। लेखन ने एक स्थल पर उर्दू की नफासत की भी चर्चा की हैं और हिंदी से उसकी तुलना करते हुए लिखा हैं - 'उर्दू बड़ी नफीस जबान हैं। नफासत भाषा का आत्यांतिक गुण नहीं हैं, एक सामाजिक समाज में उसका इतना ऊँचा मूल्य हो और अगर वह समाज इसलिए उस दिशा में विकास करें। लेकिन नाद गुण आत्यांतिक गुण है। हिंदी का नाद-सौंदर्य उर्दू में नहीं हैं, कभी नहीं रहा, न उस दिशा में उसने विशेष उन्नति की हैं।'

इसी क्रम में शमशेर बहादूर सिंह, सुमित्रादंदन पंत, निराला, रघुपति सहाय, 'फिराक गोरखपुरी' आदि की भी चर्चा हुई है, और बहुत थोड़े में लेखक ने बहुत सटीक बातें कही हैं, जिससे उसकी गहन जातीय प्रकृति का बोध स्पष्ट लक्षित किया जा सकता है। सब मिलाकर यह कहना समीचीन जान पड़ता है कि इन पुस्तकों में अज्ञेय की जीवंतता और सजगता का प्रमाण हैं। इनमें अज्ञेय 'बेबाक ढंग से सर्जक से व्यक्ति और व्यक्तित्व से अंतरंग मित्र, आत्मशोधक और आत्मालोचक होकर आते है।

उनके गद्य में जितनी सीधाई है, उतनी ही व्यंग्य की चमक-दमक भी। अज्ञेय की अपनी ठसक भी यहाँ है।' किंतु इसका एक पक्ष दूसरा भी है जिससे झाँकने पर हम असहमत भी हो सकते हैं, 'उनकी कुछ मान्यताएँ गलत भी हो सकती है पर इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने प्रश्न पर गंभीर मौलिक ढंग से विचार किया है। - पूर्वग्रहों से मुक्त होकर।'

फिर भी प्रबुद्ध पाठक को 'लेखक के निजी दावों से जो आशा बँधती हैं, वह पूरी नहीं होती। एक अफसोस - सा होता है कि हम एक ऐसे दुर्लभ मौके से चूक गए, जहाँ हम एक लेखक की दुनिया को अंतरंग भाव से देख पाते, जिसके बीच स्वयं लेखक की प्रतिक्रियाएँ एक जीवंत संदर्भ ग्रहण कर पातीं। जरूरी नहीं, लेखक अपनी डायरी या जर्नल लिखे - स्वयं अज्ञेय इन्हे डायरी नहीं मानना चाहेंगे - किंतु यदि इन्हें महज विचार-सूत्रों के संकलन से कुछ अधिक होना था, तो जरूरी था, वांछनीय भी, कि हम लेखक के बौद्धिक आग्रहों के पीछे उन व्यक्तिगत अनुभवों की पीठिका भी जान पाते, जिनके रहते ही कोई विचार-सूत्र और अंर्तदृष्टि, अमूर्त चौखटे से उठकर निजी, विशिष्ट किस्म की गरमाई और स्पंदनशीलता ग्रहण कर पाती हैं।'


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हिंदी समय में प्रभाकर मिश्र की रचनाएँ