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कहानी

बाकी मसले
संदीप मील


हवाओं के झोंके उधर से इधर आते और चंद पलों में ही धोरों की शक्लें बदल जाती। न जाने विभाजन के बाद कितने रेत के कण, परिंदे, इनसानी जज्बात और दुआएँ सरहद को बेमानी करती हुई उधर से इधर और इधर से उधर आती-जाती रही हैं और सियासी रंजिशों को अँगूठा दिखाती रही हैं। ऐसे में अफसोस यही है कि दोनों मुल्कों की हुकूमतें छाती ठोंककर दावा करती हैं कि उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता है। हुकूमतें जाने अपने दावे रणजीत सिंह को तो यह भी पता नहीं था कि यह पाकिस्तान और हिंदुस्तान के बीच लफड़ा क्या है?

क्रिकेट मैच के दौरान जिक्र आता कि पाकिस्तान नाम के मुल्क को हराना हिंदुस्तान की नाक का सवाल है और भला वह नाक भी किसने देखी थी। शायद 'नाक' मुल्कों के जिस्म के किसी गुप्त हिस्से में होती है, अतः वह हुक्मरानों को ही दिखती है, अवाम को नहीं। वैसे भी अवाम मुल्क की नाक से नहीं अपनी नाक से साँस ले रहा था जिसे हुक्म के हथौड़ों से चपटा किया जा रहा था।

बहरहाल, क्रिकेट मैच के दौरान रणजीत सिंह के गाँव में जिनके घरों में टीवी थे, वहाँ देखने वालों का मजमा लग जाता। इत्तफाक से बिजली गुल हो जाती तो देखने वाले बिजली विभाग की माँ-बहन करते हुए तुरंत रेडियो के पास मोर्चा सँभाल लेते। हर कोई अपने-अपने ढंग से पाकिस्तान के हारने की भविष्यवाणी करता। फिर हिंदुस्तान जिंदाबाद से शुरू हुए नारे वाया पाकिस्तान मुर्दाबाद होते हुए मुसलमान मुर्दाबाद पहुँच जाते।

बस, वह पाकिस्तान को इतना ही जानता था।

हिंदुस्तान दुनिया के किसी भी देश की नौसिखिया टीम से क्रिकेट मैच की हार बर्दाश्त कर सकता है पर पाकिस्तान से नहीं। शायद उधर भी यही हाल हो।

गजसिंहपुर से दस-पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर काँटों की सरहद थी जो जमीं को बाँटती थी दिलों को नहीं। उसी काँटों की सरहद से सौ फिट आगे जमीं के सीने पर खंजर की तरह भौंके हुए जीरो लाइन बयाँ करने वाले पत्थर थे। उससे उतनी ही दूरी पर पाकिस्तानी निगरानी टावर थे और वैसे ही टावर इधर भी खड़े थे। बस, इधर टावर और बाड़ के बीच एक सड़क थी। सड़क के किनारे भारी भरकम सर्च लाईटें जो रात के अँधेरे को दिन जैसे उजाले में तब्दील कर देती। दोनों तरफ बने इन टावरों पर बैठकर सैनिक एक-दूसरे की हरकतों पर नजर रखते हैं। दोनों ओर के टावरों के बीच की दूरी इतनी थी कि संवाद नामुमकिन-सा था।

उस सरहद पर कुछ सुनता था तो -

'हिंदुस्तान जिंदाबाद, पाकिस्तान मुर्दाबाद।'
'पाकिस्तान जिंदाबाद, हिंदुस्तान मुर्दाबाद।'

रणजीत सिंह जिंदाबाद-मुर्दाबाद की वजह जाने बगैर नारों को गगन की बुलंदियों तक पहुँचाने के लिए ऐड़ी-चोटी एक कर देता।

उसे मोर्चे पर आए हुए तीन महीने हुए हैं। एक सीधा-साधा नौजवान था जिसे प्रशिक्षण के दौर से ही नफरत के जहर के इंजेक्शनों से पोरा गया मगर शुक्र है कि वह अभी तक फटने वाला बम नहीं बना था।

रात की ड्यूटी के दौरान कभी-कभार तीसरे पहर उसका ठंडा पड़ा हुआ प्रेम शीत लहर से गर्म मिजाज हो जाता। चुनांचे वह किसी हिंदी फिल्म का गीत गाना शुरू कर देता। मगरमच्छ की तरह लेटे हुए रेगिस्तान में हवा की सनसनाहट साज का काम कर जाती। गला ठीक होने की वजह से गीत के बोल धोरों में गूँजते कि हवलदार मानसिंह दहाड़ उठता -

'ऐ छोरे, बड़ा भूरसिंह बण गया है रे तू।'

हवलदार की आवाज सुनकर रणजीत सिंह रुक जाता और सोचता कि यह भूरसिंह कौन था? उसके जहन में ऐसा कोई नाम व चेहरा न होने की वजह से एक दिन पूछ ही लिया -

'हवलदार साब, यह भूरसिंह कौन था?'

मानसिंह जो एक खेजड़ी के सहारे पीठ टिकाए आराम कर रहा था, खिलखिलाकर हँसते हुए बोला -

'तेरे जैसा गायक था, मेरे ही गाँव का। तेरी तरह पौं-पौं करके मर गया।'

यह व्यंग्य सुनकर रणजीत सिंह के खून की गर्मी बढ़ गई और वह तमतमाकर बोला -

'मेरे गाने से आपको क्या तकलीफ?'

'तेरी...। हिंदुस्तानी गाणें पाकिस्तानियों को नहीं सुणाए जाते।' हवलदार खड़ा हो गया।

रणजीत सिंह को इस बाबत ज्यादा जानकारी नहीं थी, अतः शांत होकर पूछा -

'तो फिर उन्हें क्या सुनाएँ?'

हवलदार ने ऊँची आवाज में कहा -

'पाकिस्तान की माँ...।'

'हिंदुस्तान की बहन...।' जवाब देने के लिए उधर जैसे कोई तैयार ही बैठा हो।

फिर काफी देर तक हिंदुस्तान-पाकिस्तान की माँ-बहनों को मोटी-मोटी गालियाँ दी गई। यह सुनने के बाद पता नहीं क्यों उसका दिल उचट गया और वह चुपचाप टावर पर बैठा सीमा ताकता रहा। उसे समझ में नहीं आया कि दोनों मुल्कों की माँ-बहनों ने सीमा का क्या बिगाड़ा है?

लेकिन धीरे-धीरे यह बात थोड़ी बहुत उसके समझ में आने लगी, जब सुबह से लेकर शाम तक उसकी टुकड़ी बेखौफ हिंदुस्तानी औरतों को भी गालियाँ देती। उसने तय कर लिया कि औरत का कोई मुल्क नहीं होता, उसे हिंदुस्तानी भी गाली देते हैं और पाकिस्तानी भी। वे सुबह मुँह भी गालियों से धोते हैं और रात का बिस्तर भी गालियाँ। जब कोई बड़ा अफसर टुकड़ी को सँभालकर जाता तो मुश्किल से दस कदम दूर पहुँचता कि सिपाही उसे दो-चार मोटी-मोटी गालियाँ दे मारते। अगर कान सही हैं तो यह उसे भी सुनाई दे जातीं पर वह मुड़कर नहीं देखता। इस प्रकार ये सेना के अलिखित नियमों में शुमार हो गई हैं।

जून का महिना था। कानों पर पड़ते 'लू' के थपेड़े जैसे कि पाकिस्तानी सैनिक लबलबियों में कारतूसों की जगह 'लू' का इस्तेमाल करते हों। टावर पर बैठकर दूरबीन से सरहद निहारना रणजीत सिंह का रोज का काम था। लोहे से बने हुए टावर पर तीन ही चीजें आमतौर पर देखी जाती - भूरे रंग का रेडियो, पानी की बोतल और खुद रणजीत सिंह। लबलबी और दूरबीन की पहचान रणजीत सिंह से ही जुड़ी हुई थी।

वैसे तो हवलदार मानसिंह सरहद से जुड़े हजारों किस्से सुनाता था जिनके सिर-पैर खोजने निकल जाओ तो उम्र बसर हो जाएगी। ऐसी कोई जिंदा या मुर्दा चीज नहीं थी जो सरहद दिखे और हवलदार साहब उस पर कोई किस्सा न जड़ दें। हवलदार का किस्सा सुनाने का अंदाज भी था - एकदम साँप के बदन जैसा चिकना।

रेडियो के बारे में उनका वह मशहूर किस्सा तो आपने सुना ही होगा -

एक बार गाँव में एक फौजी रेडियो लेकर आया। सारा गाँव उसे देखने आया। बहुत गजब का गाता था। फौजी सुबह घर से बाहर गया हुआ था कि उसके पिताजी ने रेडियो ऑन किया लेकिन रेडियो बजा नहीं। काफी मिन्नत-खुशामद करने के बाद भी नहीं बजा तो उन्हें गुस्सा आ गया और जोर से रेडियो को जमीन पर दे मारा। रेडियो टूटकर बिखर गया और उसमें से एक मरी हुई चुहिया निकली। फौजी के पिताजी ने घर वालों को समझाया -

'जब गायक ही मर गया तो गीत कौन गाता।'

जो भी हो, हवलदार साहब के किस्सों से टाइम पास जरूर हो जाता।

रणजीत सिंह के सामने वाले टावर पर एक नौजवान आया था। उसका हमउम्र, काली दाड़ी और बड़ी-बड़ी आँखें। शायद उसका आज पहला ही दिन था। ज्यों ही दोनों की दूरबीन एक-दूसरे के चेहरे पर पड़ी तो उनकी आँखें अंगारे बरसा रही थीं। वे एक-दूसरे को कच्चा चबा देना चाहते थे लेकिन दूरी इतनी थी कि यह काम मुमकिन नहीं था। मन ही मन में गालियाँ देकर रह गए। शाम तक यही हाल रहा। तंग आकर रणजीत सिंह ने रेडियो ऑन किया। यह वही रेडियो था जिसका जिक्र आते ही हवलदार साहब उस फौजी वाला किस्सा जड़ देते थे।

रेडियो पर समाचार आ रहे थे -

'भारत ने पाकिस्तान को चेतावनी दी कि अगर वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया तो करारा जवाब मिलेगा।'

'आज भारत ने मिसाइल 'विनाश 405' का सफल परिक्षण कर दक्षिण एशिया में ठोस दबदबा बना लिया है।'

'हट! साला कोई हिंदी फिल्म का गाना ही लगा देते, समाचारों से तो ठीक ही था। मन हल्का हो जाता पर यहाँ तो गोला-बारूद के अलावा कुछ नजर नहीं आता।'

'छोरे, फौजी होकर गोले-बारूद से डरता है। तेरी उम्र में हम तो आग से खेल जाते थे।'

'सुना है हवलदार साब आप तो हमेशा ऐसे ही थे, क्या आप कभी जवान भी थे?'

यह सुनकर हवलदार साहब को गुस्सा आ गया और उन्होंने एक पत्थर पाकिस्तान की तरफ इस अंदाज में फेंका जैसे बम दाग रहे हों। वे कोई किस्सा सुनाना चाहते थे पर अब गाली पाठ शुरू कर दिया। रणजीत सिंह उनका स्वभाव जानता था, कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

दूसरे दिन भी उधर वही नौजवान था। वैसे ही दोनों में तकरारें हुई और फिर रणजीत सिंह ने रेडियो ऑन किया। अँग्रेजी में समाचार आ रहे थे।

'मादर...। या तो गोला-बारूद देंगे या अँग्रेजी में समाचार। गधों को समझ नहीं आता कि सीमा पर तुम्हारा बाप अँग्रेजी जानता है।'

हवलदार साहब ने टूटी-फूटी अँग्रेजी में बड़बड़ाकर जताने की कोशिश की कि वह अँग्रेजी जानता है पर रणजीत सिंह ने जब इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया तो मजबूरन उसे चुप होना पड़ा।

उस तरफ का सैनिक भी रेडियो ऑन करके झल्लाना शुरू कर देता, शायद उसका भी वही हाल हो।

एक दिन दोनों सैनिकों ने उकताकर कुछ मजाक करने के लहजे में इशारे किए। रणजीत सिंह ने हाथ ऐसे हिलाया जैसे कि पाकिस्तान पर हमला बोल देगा, सामने वाले ने भी हिंदुस्तान को तबाह करने के अंदाज में जवाब दिया। वे कई दिनों तक ऐसी ही उट-पटाँग हरकतें करते रहे, लेकिन हाथों के इशारों की भी अपनी सीमाएँ होती हैं। अतः एक दिन तंग आकर रणजीत सिंह एक चॉक का टुकड़ा ले आया और टावर की लोहे की दीवार पर कुछ देशी गालियाँ लिख डाली। सामने वाला सैनिक गालियाँ समझ गया क्योंकि विभाजन के वक्त गालियाँ नहीं बाँटी गई थीं क्योंकि हुकूमतों के पास ये पर्याप्त मात्रा में थी और इन्हें ईजाद करने वाली सामाजिक मानसिकता भी थी। सामने वाले ने भी उससे ढाई सेर भारी गाली लिख डाली। यह सिलसिला चलता रहा और उन्हें पता भी नहीं चला कि वे कब गालियों से हटकर अपनी-अपनी दुनिया की बातें करने लगे।

सुबह आते ही दोनों की दूरबीनें एक-दूसरे के टावरों पर टिक जाती। एक दिन रणजीत सिंह को हवलदार साहब ने देख लिया। फिर क्या था, उन्होंने एक किस्सा सुना मारा जिसका लब्बोलुबाब यह था कि दुश्मन से दोस्ती और तलवार से शादी कभी भी गला कटा सकती है।

मगर आप तो जानते ही हैं कि रणजीत सिंह हवलदार साहब के किस्सों को क्या तवज्जो देता था।

आफाक नाम था उस तरफ के टावर वाले सैनिक का। यह बात भी रणजीत सिंह को चॉक ने ही बताई। जब पहली बार उसने यह नाम सुना तो इतना अच्छा लगा कि अपने होने वाले बच्चे का यही नाम रखने का इरादा बना लिया। लेकिन समस्या यह थी कि नाम मुस्लिम था और हिंदुस्तान में मुसलमानों की हालत से वह वाकिफ भी था। अतः भविष्य की समस्याओं को ध्यान में रखकर उसने समाधान निकाला कि बच्चे को घर में 'आफाक' कहा जाएगा और बाहर का कोई अन्य नाम होगा।

उन दोनों के बीच होने वाले इस वार्तालाप की भनक दोनों हुकूमतों को नहीं थी वरना कम से कम दो आयोग तो बैठा ही दिए जाते और मुमकिन है कि सैनिकों के साथ चॉक को भी कुछ न कुछ सजा मिलती। इन वार्तालापों के माध्यम से वे एक-दूसरे की कई चीजों के बारे में जानने लगे, मसलन खाने-पीने से लेकर फिल्मी गीतों तक। एक बात का अंश कुछ इस प्रकार है -

'यार, आज बहुत खुश नजर आ रहे हो ?'

'जनाब, खबर ही ऐसी है...'

'तो अब खबर सुनने के लिए रेडियो ऑन करूँ क्या, बता दो ना?'

'मेरी आपा का निकाह तय हो गया है।'

'ओए, फातू की शादी है और हमको बुला भी नहीं रहे हो।'

'यार तू भी कैसी बातें करता है, भला दोस्तों को भी दावत की जरूरत होती है। तेरे निकाह में हम 20 दिन पहले बिन बुलाए टपक जाएँगे।'

इतने में दोनों की नजरें काँटों की बाड़ पर पड़ी और दूरबीन टावरों से हट गई।

रणजीत सिंह के दिमाग में यही घूम रहा था - फातू, शादी, दावत, काँटों की बाड़, सरहद...। रात भर वह नींद को आँखों से हजारों कोस दूर पाया। अगले दिन आते ही उसने टावर पर अपनी पूरी कल्पना और यथार्थ को मिलाकर एक फूल बनाया। जब आफाक ने फूल देखा तो पूछा -

'भाईजान, इस उजड़े हुए चमन में यह गुल किसके वास्ते खिला है?'

'यार, गिफ्ट है।'

'तो फिर यह तोहफा किसके लिए?'

'आपकी बहन की शादी है ना, मेरी तरफ से उन्हें दे देना।'

इस बात पर आफाक का गला भर आया। टावर पर रोमन में 'शुक्रिया' लिखते वक्त उसके हाथ काँप रहे थे।

कई दिनों से मोर्चे पर हलचल नहीं हो रही थी। आफाक बहन की शादी में गया हुआ था, उसकी जगह किसी काले-से सिपाही ने ले ली। रणजीत सिंह मायूस रहने लगा।

अचानक पता नहीं क्या हुआ कि जंग छिड़ गई। छुट्टी पर गए हुए सैनिकों को वापस बुला लिया गया। आफाक भी आ गया। चिड़ियों की चहचाहट की जगह तोपों के धमाके सुनाई दे रहे थे। सैनिकों में दुश्मनी परवान पर थी।

रणजीत सिंह कुछ समझ नहीं पा रहा था कि गोली चलाने का हुक्म दे दिया गया। गोलियों की गड़गड़ाहट से आसमान गूँजने लगा। गोलियाँ कहीं रेत में तो कहीं सैनिकों के जिस्म में घुस रही थीं। रणजीत सिंह और आफाक आमने-सामने थे। टावरों पर चॉक से लिखी हुई वे तमाम इबारतें इनकी स्मृतियों में रील की तरह चल रही थी। बीच में रेडियो के समाचार और आपसी रंजिश के दृश्य भी आ रहे थे।

'तुम भी गोली चलाओ।' हवलदार मानसिंह दहाड़ा।

रणजीत सिंह के हाथ बर्फ हो चुके थे। उसके सूखे हुए गले और काँपते हुए होठों ने बस इतना ही कहा -

'हवलदार साब, बंदूक की नोक पर सरहदों के मसले हल नहीं होते।'

(यह अफसाना प्यारे मित्र ईशमधु तलवार के लिए।)


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