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कहानी

किस्तों की मौत
संदीप मील


इनसान रोज ही नहीं हर पल मरता है, जब वह अंतिम रूप से मरता है तो दुनिया को लगता है कि फलाँ मर गया। लेकिन रोजाना जो किस्तों में मरता है उसका क्या?

राजस्थान के मरुस्थल में टीलों के पीछे इतने गाँव और ढाणियाँ (गाँव का छोटा रूप) बिखरे पड़े हैं कि अगर समेटने लगो तो एक समानांतर दुनिया तैयार हो जाएगी।

इन टीलों के बीच एक ऐसा ही गाँव था करमलिका। एक तरफ सड़क और तीन तरफ रेत के पहाड़, जिन पर कहीं-कहीं खेजड़ी के पुराने पेड़ अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे थे। इसी पेड के नीचे बैठकर पेमा पटेल ने अपना फैसला दिया था। इस खेजड़ी के पेड़ की अंतिम टहनी तक कोई चढ़ जाए, तो उसके साथ गाँव की किसी लड़की का विवाह कर देंगे। लेकिन आज तक कोई भी नहीं चढ़ पाया। ऐसी अनेक कहानियाँ हर पेड़ के साथ जुड़ी थीं। आज उन कहानियों के पात्रों को कोई नहीं जानता मगर लोगों की स्मृतियों में वे इस कदर बैठे हुए हैं कि रोज एक नई कहानी का जन्म होता है।

यह गाँव बस कहने भर को ही गाँव नहीं, असल में गाँव है। गलियों में कोलतार की सड़कों की जगह कच्ची ईंटों का रास्ता देखकर सिंधु घाटी सभ्यता की याद आ जाती है।

बीरसिंह और उसका बाप हीरसिंह, दोनों मर गए। जब हीरसिंह मरा, तो 150 बीघा जमीन का इकलौता वारिस बीरसिंह को छोड़कर गया। कभी-कभी ज्यादा जायदाद भी इनसान को कामचोर और निकम्मा बना देती है। फिर बीरसिंह किस खेत की मूली था? उसने होश सँभालते ही तय कर लिया था कि हाथ-पाँव हिलाना गधों का काम है और वह गधा नहीं है। बस, इसी सोच के कारण वह जल्दी ही अपने पैरों पर खड़ा हो गया, यानी जमीन बेचकर गुजारा करना शुरू कर दिया। जब जरूरत होती एक-दो बीघा जमीन बेच देता। और उसे लगातार जरूरत भी पड़ती रही।

वह सुबह उठते ही खेत की तरफ शौच के लिए जाता, वापस आते वक्त रास्ते में दो पव्वा देशी ठरका देता। बीरसिंह इतना ही काम करता, बाकी दिन-भर जो करना होता, दारू कर देती।

उसने 50 साल की उम्र में 50 बीघा जमीन खत्म कर ली और खुद को भी। उसके मरने से करमलिका गाँव में कोई खास बदलाव नहीं आया सिवाय बीरसिंह के खेत में तीन मूर्तियों की स्थापना के। उसके पाँच बेटे हैं जिनके नाम गिनाने से बेहतर है कि उन्हें नंबर से ही पहचाना जाए क्योंकि फिर कहानी में इतने 'सिंह' हो जाएँगे कि पाठक समझ नहीं पायेंगे। 1 नंबर बड़े वाला, 2 नंबर उससे छोटे वाला ...बाकी भी इसी क्रम में।

गाँव के उत्तर में एक तरफ सड़क थी और दूसरी ओर नहर, इन दोनों के बीच वह खेत था जिसे बीरसिंह अपनी तमाम कोशिशों बाद भी बेच नहीं पाया और उसी में उसके बेटों ने तीन मूर्तियाँ बना दीं। एक मूर्ति हीरसिंह की, दूसरी बीरसिंह की और तीसरा खाली चबूतरा...।

पास जाने पर पत्ता चलता है कि मूर्तियाँ सफेद संगमरमर की बनी हुई हैं। दो चबूतरों पर दो मर्द मूछों पर ताव दे रहे हैं और तीसरा फकत चबूतरा।

इसी खाली चबूतरे को देखकर उचित का दिमाग चकरा गया था कि ये क्या? वह 22 साल का नौजवान था लेकिन अजीब आदतों का धनी। फितरत से घुमक्कड़। खाली जेब। न कमाने की फिक्र और न ही कुछ खोने का डर। नतीजा यह था कि कब किसके यहाँ टपक जाए, तय नहीं था।

स्टेशन पर पहुँचकर फोन करेगा कि मैं तेरे शहर में आ गया, लेने आ जाओ। ऐसे ही इस गाँव का भी नंबर आ गया। लेकिन उस खाली चबूतरे को देखकर तो उसका दिमाग चकरा गया कि यह क्या? जब नजदीक गया तो तीनों चबूतरों पर कुछ लिखा हुआ था। एक पर हीरसिंह की जन्मतिथि और मौत की तारीख, दूसरे पर बीरसिंह की जन्मतिथि और मौत की तारीख। मूर्ति को देखकर कहीं से भी जाहिर नहीं होता था कि बीरसिंह दारू पीकर मरा है। पत्थर कितना कुछ छुपा लेते हैं और कितनी चीजें बयाँ भी कर देते हैं। अब तीसरा चबूतरा था जिस पर बीरसिंह की पत्नी रुकमा का नाम, जन्म तिथि और मौत की तारीख...। यह क्या!

'बीरसिंह और रुकमा की मौत की तारीख एक ही! क्या दोनों एक ही दिन मरे थे? अगर ऐसा था तो रुकमा की मूर्ति कहाँ है? मूर्ति नहीं रखनी थी तो चबूतरा क्यों बनवाया?'

ऐसे कई सवालों ने उचित को घेर लिए। झोले में से पानी की बोतल निकालकर उसने पानी पिया। सोचा, एक फोटू ले लूँ। ख्याल आया कि अभी असली कहानी तो जान ले। कैमरा वापस झोले में रखा और आकर नहर के किनारे बैठ गया।

शाम ढल रही थी। लोग खेतों से लौट रहे थे। उचित के दिमाग में वे अनसुलझे सवालात मोम की तरह जमे थे जिन्हें एक आँच की जरूरत थी कि पिघालकर बहा सके।

रास्ते से ऊँट गाड़ियों का रेला आ रहा था जिन पर बैठे रंग-बिरंगे कपड़े पहने स्त्री-पुरुष इंद्रधनुष बनाते हुए पसीने की बू बखेर रहे थे। एक, दो, तीन... लंबी लाइन थी। लाइन के आखिर वाली ऊँटगाड़ी जब नहर के ऊपर पुल से गुजरी तो उचित उसके पीछे हो लिया। ये सब किसान थे जो खेतों से लौट रहे थे। उसे यह रस-भरी जिंदगी पसंद थी जो रात-भर सींचे रस को सुबह खेत में बिखेरती हो और दिन-भर इकट्ठी की रस की ऊष्मा को शाम को घर लाती हो। धरती और किसान - एक दूजे के लिए।

बीरसिंह की हवेली गाँव के मुख्य चौक में पूर्व की तरफ थी। हवेली इतनी बड़ी थी कि पाँचों बेटों के लिए पर्याप्त। पाँचों उसी में रहते थे। रहते क्या थे, वह एक तरह से अखाड़ा थी जिसमें आए दिन कोई-न-कोई दंगल चलता रहता था। गाँव वालों के पास यह एक स्थायी मनोरंजन का साधन था। जिनकी छत पास में थी वे बालकनी का लुत्फ उठाते थे। बाकी दिवारों पर टँग कर काम चलाते। उचित कुछ दिन यहीं रुकने की ठान चुका था। रहने के लिए उसके गाँव का वो पोस्टमैन (बजरंग) था ही। बजरंग पोस्ट ऑफिस के पास एक किराए के कमरे में रहता था, जिसमें उचित भी दो दिन से रह रहा है और अब तो यह भी तय हो गया है कि वह आगे सात महीने यहीं रहेगा। यह उसने खुद तय किया था, होशो हवास में।

पोस्टमैन के कमरे में एक चारपाई थी, किसी से उधार ली हुई। कुछ खाने-पीने के बर्तन थे। उचित के हिसाब से काम-भर का सामान था। चीजें सब अस्त-व्यस्त थीं जैसे आम कुँवारों के कमरों में होती हैं। उस कमरे की एक खूबी उसके बहुत काम आई कि पीछे एक खिड़की थी जो बीरसिंह की हवेली के पिछवाड़े की तरफ खुलती थी। यानी वो अखाड़ा तो नहीं लेकिन नेपथ्य देख सकता था। उसके लिए नेपथ्य ही जरूरी था। वह वहीं से बीरसिंह की पत्नी रुकमा के हर क्रिया-कलाप को देख सकता था। पाँचों बेटों ने मिलकर पीछे पशुओं को बांधने की जगह रुकमा के रहने की व्यवस्था कर दी थी। व्यवस्था क्या थी, 6 ईंटों से एक चूल्हा बना दिया गया था। एक टूटी हुई चारपाई और ढक्कन वाले पीपे में आटा, नमक और मिर्च। एक तवा और चिमटा भी रुकमा को नसीब हुआ।

हाँ, एक चीज और थी - मूर्ति।

रुकमा की सफेद संगमरमर की मूर्ति, जो बीरसिंह के मरते ही दोनों की साथ ही बनवा दी थी। रुकमा का खाली चबूतरा खेत में था और मूर्ति घर में उसके मरने का इंतजार कर रही थी। यानी रुकमा आधी खेत में और आधी घर में।

'एक इनसान के सामने उसकी मौत का इंतजार करता हुआ पत्थर हो तो कैसे जीता होगा वह?' उचित उस खिड़की में बैठा हुआ अकसर यही सोचता था।

रुकमा के पास ही भैंस व बकरियों को बांधा जाता था।

वह सुबह उठते ही उस मूर्ति को देखती, दोपहर को देखती, शाम को देखती और रात को देखती यानी चौबीस घंटे में चार बार देखती।

एक दिन भैंस ने खूँटा तोड़ दिया।

बेटा नंबर 1 बोला, 'दिन भर पड़ी रहती है, एक खूँटा ठीक से नहीं गाड़ सकती।'

अब रुकमा चौबीस घंटे में मूर्ति को दो बार ज्यादा देखने लगी। ऐसे ही देखते-देखते रोज कोई परिवारवाला कुछ कह देता और रुकमा का गुस्सा मूर्ति पर उतरता। उचित मूकर्दाक था।

एक दिन सुबह-सुबह बेटा नंबर 5 के पास कोई मेहमान आया हुआ था और रुकमा के पास माचिस खतम हो गई। वह माचिस लेने हवेली में चली गई।

उसे देखते ही 5 नंबर बेटे को गुस्सा आ गया, 'हमने तो मरने से पहले मूर्ति भी बनवा दी मगर यह मरकर पीछा छोड़े तब न! मेहमान आया हुआ है और आ गई अपनी मनहूस सूरत दिखाने।'

रुकमा के पैर वहीं रुक गए, अब माचिस में क्या रखा था।

पिछवाड़े आकर दीवार का सहारा लेकर वह एकटक उस मूर्ति को देखने लगी। सुबह से शाम तक वैसे ही देखती रही। एक तरफ जिंदा औरत, जो मूर्ति जैसी खड़ी थी और एक तरफ मूर्ति, जो जिंदा औरत की थी।

उचित को लगा कि अब शायद कहानी खत्म हो जाए, मगर कहानी का अंत कुछ और ही था। रुकमा रात-भर भी वैसे ही खड़ी रही, बेटों को तो कुछ लेना-देना था नहीं, दूसरे इस मामले में भला क्यों पड़ते? दूसरे दिन भी वैसे ही। उचित कहानी के खत्म होने का इंतजार कर रहा था मगर कहानी खत्म नहीं हो रही थी।

अब उससे नहीं रहा गया, 'एक औरत मेरी आँखों के सामने जुल्म से तंग है और मैं कहानी लिख रहा हूँ ?'

डायरी में इतना ही लिखा हुआ है बाकी मैं अपनी याददाश्त के आधार पर लिख रहा हूँ।

उचित जाकर रुकमा को बोला, 'आप दो दिन से खड़ी हैं...।'

कोई उत्तर न मिलने के कारण उसने सोचा कि शायद कम सुनती होगी, जोर से कहा। मगर जवाब कहाँ था?

उसने कान में जोर से कहने के लिए हाथ पकड़ा ...ध...ड़ा...म !

वह तो कब की मर गई थी, हिलते ही गिर गई!

उचित कुछ समझ पाता इससे पहले ही 1 से 5 नंबर तक के बेटे आ गए और उसे पकड़ लिया कि उसने उनकी माँ को मारा है।

पुलिस आई। उसे थाने ले गई।

मुकदमा चला तो उचित एक ही बात कह रहा था, 'इनसान खुद नहीं मरता, दूसरे लोग मार देते हैं।'

जज जो भी सवाल पूछता, जवाब यही था।

मैंने भी उचित की बात को समझाने के लिए यह कहानी लिखी मगर जज साहब बोले, 'कानून किस्से-कहानियों को नहीं मानता, सबूत माँगता है।'

डाकिया कहाँ से सबूत लाता?

आस्था को आधार मानकर जिस मुल्क में फैसले आ रहे हैं, वहाँ कहानी तो चलनी ही चाहिए थी क्योंकि वह बहुत मजबूत तर्क और दृष्टि पैदा करती है। शायद जज साहब चीजों को समझ जाएँ, फैसले का इंतजार है।


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