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आलोचना

यथार्थ में कल्पना, कल्पना में यथार्थ
वैभव सिंह


विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों पर केंद्रित

साहित्य में विनोद कुमार शुक्ल की पहचान एक सशक्त कथाकार तथा कवि के रूप में है। वास्तविकता में उनके यहाँ कथात्मकता और काव्यात्मकता, दोनों ही सगी बहनों की तरह हमेशा साथ-साथ दिखते हैं। उन्हें औपन्यासिक यथार्थवाद की शैली का अनुकरण करने के स्थान पर उसके साथ ज्यादा प्रयोगधर्मी संबंध कायम करने के लिए भी जाना जाता है। यथार्थ तक सीमित रह जाने के बजाय उन्होंने यथार्थ को अपनी कल्पनाशीलता के जरिए गहराई से समझा और यथार्थ से संबंध बनाए रखने के लिए कल्पनाओं से संबंध-विच्छेद करने की जरूरत नहीं समझी। शिल्प के स्तर विनोद कुमार के प्रयोगों ने पाठकों तथा आलोचकों का ध्यान काफी तेजी से आकृष्ट किया था, हालाँकि बाद में अत्यधिक प्रयोगधर्मिता ने आगे चलकर उनके कथ्य संबंधी संप्रेषणीयता को बाधित भी किया। पर उनकी मुख्य विशेषता यह भी रही कि उन्होंने प्रयोगधर्मी शिल्प के साथ प्रयोगधर्मी कथानकों का भी सृजन किया जिससे कथ्य तथा शिल्प में एक साथ ही नवीनता तथा ताजगी का अहसास होता रहा। भाषा के 'मेटाफरिक' रूपों को गढ़ने में उन्होंने अभूतपूर्व क्षमता का परिचय दिया। कह सकते हैं कि उनकी काव्य-संवेदना उनके पूरे सृजन की मुख्य शक्ति है जो उन्हें लेखकों की भीड़ में अलग शख्सियत और स्थान प्रदान करती है। ब्रिटिश लेखक-आलोचक राल्फ फाक्स के महान योगदान का परिचय देते हुए रामविलास शर्मा ने आलोचकों की एक श्रेणी का जिक्र किया था और वह थी - भावना शून्य वर्ग विश्लेषक। इसी के साथ उन्होंने 'आँकड़ेबाज आलोचकों' की करामातों का भी जिक्र किया था। ऐसे 'भावनाशून्य वर्ग विश्लेषकों' और 'आँकड़ेबाज आलोचकों' की निगाह की अपनी जड़ता सचमुच विनोद कुमार शुक्ल जैसे लेखकों की साहित्यिक क्षमताओं को परखने में आड़े आती रही।

विनोद कुमार शुक्ल का पहला उपन्यास 'नौकर की कमीज' 1979 में संभावना प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था और अपनी विषयवस्तु की आकर्षक सादगी और रूपविधान की विशिष्टता के कारण इस उपन्यास ने साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। कह सकते हैं कि जीवन के सामान्य रूपों को कथ्य का विषय बनाना और उनमें असाधारण संप्रेषीयता पैदा करना उनके रचनाकर्म की खूबी है। यानी केवल मौलिक होना उनकी चिंता में शामिल नहीं है बल्कि अनायास ही खुद को विशिष्ट बना लेना उनके सामर्थ्य में शामिल है। किसी आलोचक ने ठीक ही पूछा था, इस उपन्यास के प्रकाशन के बाद, कि 'क्या अपने अलग होने का क्रास विनोद को हमेशा ही ढोते रहना पड़ेगा?' विनोद कुमार शुक्ल के पहले उपन्यास नौकर की कमीज के बाद लंबे अंतराल के बाद ही उनके उपन्यास प्रकाशित हो सके। लगभग सत्रह साल के बाद। 1996 में उनका उपन्यास 'खिलेगा तो देखेंगे' और फिर अगले साल 1997 में 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' प्रकाशित हुआ।

नौकर की कमीज ऊपर से सरल कथानक वाला उपन्यास प्रतीत होते हुए भी एक विराट व्यंग्य रूपक बनकर हमारे सामने आता है। इसमें एक ऐसे कस्बे के परिवार, सरकारी महकमे, आम जनों तथा बाबुओं की जिंदगी का चित्रण है जहाँ अभी शहर की जटिल जिंदगी के प्रभाव नहीं पहुँचे हैं। उपन्यास के मुख्य पात्र संतू बाबु और उनके दफ्तरी जीवन पर इस उपन्यास की कथा केंद्रित है। संतू बाबू एक विवाहित पर निःसंतान व्यक्ति हैं जो बीए पास क्लर्क हैं। शहर के बीचों बीच वह एक नामी रईस डाक्टर के यहाँ पचास रुपये किराया देकर रहते हैं। मकान की छत खपरैले की है और बरसात में तो मकान फूटे हुए बरतन की तरह टपकता है। बाजार में सब्जी महँगी है, इसलिए कभी-कभार ही खरीद सकते हैं। दुकान से उधारी का सामान लाते हैं और बनिये का उधार न चुका सकने के कारण उन्हें लगता है - 'चूँकि मैं गुप्ता जी की दुकान से उधारी सामान लाता था, इसलिए उनका देखना मुझे घूरने जैसा लगता था।' दूसरी ओर वह ऐसे लोगों से ही खासतौर पर घिरे हैं जो अपने जीवन में संतुष्ट रहने और जीवन को शांति से बिताने की सलाह देते हैं। एक बूढ़े-बुजुर्ग की सलाह उन्हें मिलती है - 'तुम्हारी सारी कोशिश यह होनी चाहिए कि जो हालत तुम्हारी है, उससे खराब न हो। इससे तुम्हारे जीवन में शांति रहेगी। तुम्हें अपने काम को ठीक करना है। दुनिया का काम अपने आप ठीक चलता है। जैसा चल रहा है, चलने दो। उतनी ही आग और लकड़ी इकट्ठी करो जितनी खाना बनाने के लिए जरूरी है। दुनिया में आग लगाने की माचिस सात समुद्र नीचे है और वह भीगकर सैकड़ों बरस पहले ही खराब हो चुकी है। वहाँ कोई नहीं पहुँच सकता। दुनिया को कोई नहीं बदल सकता। अगर तुम अकेले बदल जाओगे तो बुरी मौत मरोगे।'

जीवन की ढेरों मुसीबतें संतू बाबू को शक्की और वहमी भी बना देती हैं और वह खुद महसूस करते हैं कि - 'हर वह आदमी जो अच्छा व्यवहार करता है, तो सोचता हूँ कि इसका कोई बड़ा स्वार्थ है, बेवकूफ बना रहा है। अच्छा व्यवहार और सहायता के लिए तत्पर होना, यानी आदमी को उस रेंज पर लाना है जहाँ से उसपर अचूक निशाना लगाया जा सके।' ठीक ही बात है कि चौतरफा असुरक्षा से घिरा इनसान शक्की हो जाए और उसका इनसानी नेकनीयती पर से पूरी तरह से भरोसा उठ जाए। सही मायने में सफल उपन्यास वह नही होता जो इनसान की सामान्य मानसिकता को उजागर करता है, बल्कि वह होता है जो उसकी मानसिकता के अब्नार्मल यानी असामान्य पक्षों के बारे में हमें सजग बनाता है। संतू बाबू को लगता है कि वह हर किसी के अहसानमंद हैं और हर किसी के अहसान का बोझ उतारने के लिए अभिशप्त हैं। उनकी पत्नी अपने डाक्टर मकान मालिक के यहाँ नियमित रूप से चावल पछोरने और खाना बनाने का काम करने लगती है और डाक्टर मानता है कि संतू बाबू और उनकी पत्नी को उनका अहसानमंद होना चाहिए। यह कथित अहसान क्या है? वह यह कि एक बार संतू बाबू बीमारी की हालत में अर्द्धबेहोशी की हालत में पहुँच गए थे और डाक्टर ने उनसे कुछ पैसे लिए बिना मुफ्त में इंजेक्शन लगा दिया था। तभी से डाक्टर साहब मानने लगे कि उन्होंने जीवन भर के लिए संतू बाबू पर अहसान कर दिया है। संतू बाबू कुछ नहीं कर पाते और पत्नी से इतना ही कहते हैं - 'उनका अहसान हमेशा भारी होगा। काम करके अहसान उतारा जाता तो लोग कुली और मजदूरों तक के अहसानमंद हो गए होते।'

यह उपन्यास जिस साल प्रकाशित हुआ था, उस दौरान पूरा हिंदुस्तान तूफानी उथलपुथल से गुजर रहा था। नक्सलबाड़ी का किसान आंदोलन भरपूर सरकारी दमन के बावजूद देश के अनेक भागों में चल रहा था। जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेसी शासन तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़े जनांदोलन का नेतृत्व किया था और परिणामस्वरूप केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार सत्ता में आई थी। 1975 का आपातकाल भी देश भुगत चुका था। समाजवादी आवरण के नीचे पूँजीवादी नीतियों को लागू करने की कोशिशों ने न केवल समाजवाद को बल्कि पूँजीवाद को भी विफल बनाने में योगदान दिया था। महँगाई, अवसरवाद और अस्थिरता देश की जनता के लिए समस्या से अधिक नियति बन चुकी थी। नौकर की कमीज में तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की सीधी-साफ झलक नहीं है पर साहित्य से यह अपेक्षा करना ज्यादती ही है कि हम उसमें सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों और घटनाओं का अविकल अनुवाद तलाश लें। पर उपन्यास में जिस प्रकार से संतू बाबू तथा अन्य छोटे कर्मचारियों तथा मजदूरों की दुर्दशा तथा असहायता प्रदर्शित की गई है, वह तत्कालीन सामाजिक परिप्रेक्ष्य से लेखक के जुड़ाव का संकेत है। बड़ी गहरी व्यंग्य चेतना से उन्होंने जता दिया है कि उनकी सहानुभूति समाज के किस वर्ग के साथ है। उपन्यास में जगह-जगह उन्होंने समाज के संपन्न तथा उच्च वर्ग के ढोंग तथा पाखंड का पर्दाफाश किया है। संतू बाबू जिस दफ्तर में काम करते हैं, वहाँ उनके साहब लगातार नौकरों के व्यवहार तथा अभाव से त्रस्त दिखते हैं। लेखक ने संतू बाबू के माध्यम से नौकरशाहों के दंभपूर्ण व्यवहार और जीवनशैली पर चोट करते हुए लिखा है - 'आश्चर्य था कि साहब को एक नौकर की जरूरत थी। नौकर की उन्हें कमी न थी। पर बिना कमी के भी जरूरत होती रहती है। जैसे बाई साहब के पास पचास साड़ियाँ हैं तो इसका मतलब है कि उनके पास पचपन साड़ियाँ नहीं हैं। नंबर से जरूरत का हिसाब पूरा नहीं होता। नंबर से जरूरत का हिसाब कम पड़ता है।'

इन साहब लोगों के पास आदर्श नौकर का साँचा है जिसमें वह अपने अधीनस्थों को फिट करना चाहते हैं। संयोग से एक दिन संतू बाबू उनके घर जाते हैं तो उन्हें ही घर छोड़कर चले गए नौकर की कमीज जबरन पहना दी जाती है। उपन्यासकार के शब्दों में 'नौकर की कमीज एक साँचा था जिससे आदर्श नौकरों की पहचान होती थी।' और संतू बाबू इस साँचे में फिट मान लिए जाते हैं। नौकर की कमीज, उसके लिए उपयुक्त व्यक्ति की खोज और संतू बाबू को इसे पहनाया जाना, ये घटनाएँ दरअसल किसी रूपक की तरह हैं जिसके सहारे रोज दिखने के कारण ओझल हो चुका यथार्थ हमारी चेतना पर फिर से ठकठक करता है। 'नौकर की कमीज' न केवल सत्ताधारियों की जोड़तोड़ बल्कि नौकरशाही की पूरी संस्कृति की भी प्रतीक है। पर संतू बाबू को उपन्यासकार ने पूरी तरह से रीढ़हीन नहीं दिखाया है, जबकि नौकरशाही को बेरीढ़ का जरूर दिखाया है। इसीलिए संतूबाबू कुछ समय तक तो अपने को अपमानित होते देखते हैं पर बाद में उसी नौकर की कमीज का सामूहिक दहन भी कराते हैं।

भारतीय नौकरशाही को आज के दौर में विकासमूलक नौकरशाही का दर्जा दिया गया है लेकिन यथार्थ इससे अलग है। जनता पर शासन करने की आदत उसे ब्रिटिश राज से विरासत में मिली थी और उसने इसका जमकर इस्तेमाल किया। नौकरशाहों ने खुद को एक क्लास में बदल लिया और लोकतंत्र, समाजवाद तथा समानता की बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को विफल बनाने में शासक वर्गों का साथ दिया। निजी प्रतिष्ठा, अकड़ और रोबदाब को इसने अपनी जीवनशैली बनाया और समाज में स्थिरता लाने के नाम पर उसके पिछड़ेपन को बनाए रखा। विशेषाधिकारों को उसने विषमता बनाए रखकर ही सुरक्षित किया। उपन्यास नौकर की कमीज में साहब अपनी पत्नी से बात करते हुए अपनी इसी मानसिकता को इन शब्दों में प्रकट करते हैं - 'मैं अपनी कमीज नौकर को कभी देना नहीं चाहूँगा। जो मैं पहनता हूँ, उसे नौकर पहनें, यह मुझे पसंद नहीं। मैं घर का बचा-खुचा खाना भी नौकरों को देने का हिमायती नहीं हूँ। जो स्वाद हमें मालूम है, उनको कभी नहीं मालूम होना चाहिए। अगर यह हुआ तो उनमें असंतोष फैलेगा। बाद में हम लोगों की तकलीफ बढ़ जाएगी। खाना उनको वैसा ही दो जैसा वे खाते हैं। जैसा हम खाते हैं, वैसा बचा हुआ भी मत दो।'

उपन्यास में संतू बाबू के समानांतर निम्न वर्ग के कई लोगों का जीवन उभरता है। महँगाई की मार के कारण बढ़ई, मोची जैसे लोग भी भीग माँगने के लिए मजबूर हो गए हैं पर भीख देने की संस्कृति का लोप हो गया है। एक नौकर पागल हो गया है जो हर जगह 'राम-राम साहब' कहता हुआ घूमता रहता है। ऐसे गंदी-अँधेरी झोपड़ियाँ दिखती हैं जिन्हें मिट्टी के तेल के दिये की भी जरूरत नहीं रह गई है या वे अब दिया जलाने का पैसा भी नहीं जुटा सकती हैं। उपन्यास में नौकर की कमीज के माध्यम से नौकरशाही की दुष्टताओं तथा निर्ममताओं को तो व्यक्त किया ही गया है साथ ही एक और तरह से समाज में नौकरों की माँग तथा आपूर्ति को व्यक्त किया गया है। एक ऐसा समाज बनते दिखाया गया है जहाँ व्यक्ति अपना रोजगार तथा स्वतंत्रता गँवा कर किसी अन्य को डरपोक तथा पराधीन नौकर बन जाए। कस्बे में नौकर बाजार लगता है जहाँ लगातार भीड़ बढ़ती जा रही है। देहातियों के झुंड शहर में प्रवेश कर रहे हैं और बर्तन, कंबल तथा लड़कियों आदि को बेचकर गुजारा कर रहे हैं। उपन्यासकार के शब्दों में - 'अच्छे खानदानी लोग भी बेशर्मी से जवान सुंदर लड़कियों को छाँटकर ले जाते थे।' सब कुछ बेचने के बाद नौकर पूरे परिवार के बाजार में साथ खड़े हो जाते हैं ताकि जीवन की गाड़ी को किसी तरह से खींच सकें। यानी व्यवस्था ऐसी हो चुकी है कि हर कमजोर आदमी किसी का नौकर है और वहाँ उसे अपमान तथा जूता-लात खाते हुए ही सही पर दो वक्त की रोटी की आस है। रोटी की कीमत पर इनसान का ऐसा दमन तथा शोषण वही व्यवस्था कर सकती है जिसने अभी क्रांतिकारी जन-हस्तक्षेपों का कसैला स्वाद ठीक से नहीं चखा है। यह भी कह सकते हैं कि उपन्यास किन्हीं राजनीतिक बहसों पर आधारित विमर्श केंद्रित उपन्यास नहीं है पर उसमें स्थितियों के चित्रण के माध्यम से उस व्यवस्था की विफलता की ओर संकेत किया गया है जिसमें इस देश की अधिकांश आबादी को अभावहीन जीवन देने के दावे झूठे पड़ गए हैं। उपन्यास के कम से कम दो अध्यायों में मजदूरी करके कमाने वाले, नौकरानी, नौकर, बढ़ई, कारीगर और मिस्त्री जैसे निम्नवर्ग के लोगों के जीवन-दैन्य, भूख, अभाव और बेरोजगारी जैसी समस्याओं को उठाया गया है। परंपरागत कामों में दक्षता के बदले रोजी कमाने वाले लोग नई व्यवस्था में अपने पारंपरिक कौशल को अप्रासंगिक पाने लगे हैं औरे बेरोजगार हो गए हैं। उपन्यासकार के ही शब्दों में - 'बहुत से मोची, बढ़ई भी खसरू मोची की तरह काम खोजने के बदले भीख माँगने लगे हैं। पर अचानक भीख देने की संस्कृति का लोप हो गया है।'

उपन्यास की विशेषता यह भी है कि इसमें सीधे-सरल पारिवारिक जीवन के कई प्रसंग रचे गए हैं जो उपन्यास को पठनीयता के गुणों से लैस करते हैं। रामचंद्र शुक्ल ने रामचरित मानस जैसी कालजयी रचना की महानता की प्रशंसा के संदर्भ में 'मार्मिक प्रसंगों की उद्भावना' को श्रेष्ठ लेखक का प्रमुख गुण बताया था। पर आज के लेखक के लिए मार्मिक प्रसंग से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया जीवन के त्रासद एवं अत्यंत साधारण प्रसंगों की उदभावना। जो त्रासद और साधारण है, वह जीवन का अंग है और उसका वर्णन लेखक का अभीष्ट है। विनोद कुमार के यहाँ इसी अर्थ में परिवार के साथ-साथ घर की संस्कृति का भी बड़ा केंद्रीय महत्व प्रकट होता है। उपन्यास का आरंभ ही संतू बाबू द्वारा अपने घर के बारे में सोचने से होती है जिसमें वह कहते हैं - 'घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है। बाहर जाने के लिए दूसरों के घर होते हैं, दूसरे यानी परिचित हों, या जिनसे काम हो।' विनोद कुमार शुक्ल के अन्य दोनों उपन्यासों खिलेगा तो देखेंगे और दीवार में एक खिड़की रहती थी में भी घर-परिवार के जीवन के प्रति एक दुर्दम मोह नजर आ जाता है। 'खिलेगा तो देखेंगे' में गुरुजी, उनकी पत्नी और बच्चे पहले तो पाठशाला को अपना घर समझते हैं। लेकिन एक दिन जब आँधी-तूफान से पाठशाला की छत हवा में उड़ जाती है, तब वे एक उजाड़ थाने के लाकअप में रहने के लिए आ जाते हैं। इसी थाने में गृहस्थी को बसाया जाना इस उपन्यास का दिलचस्प प्रसंग है। नए घर में आत्मविश्वास आ जाने पर गुरु जी सोचते हैं -

'एक दरवाजे को बंद कर हमने पूरे बाहर को बंद कर दिया है। अपने कमरे का दरवाजा बंद कर हमने सारी दुनिया को बंद कर दिया है। सारी दुनिया हमारी कैद में है। अपने दरवाजे को खोलकर हम दुनिया के कमरे में आ जाते हैं।' इसी प्रकार विनोद कुमार शुक्ल के तीसरे उपन्यास 'दीवार में खिड़की रहती थी' में भी समस्त घटनाओं, भावपूर्ण कल्पनाओं, आकांक्षाओं और कथा विस्तारों के बीच कथानायक रघुवर प्रसाद का घर मौजूद है। यह घर एक साथ यथार्थ और मायालोक, दोनों ही है। इस तीस रुपये महीना किराए वाले घर के पीछे एक बना सलाखों वाली खिड़की खुलती है जिसके पार सुरम्य बाग, छल-छल बहती साफ पानी की छोटी नदी, साफ-चिकनी चट्टानें, गोबर लिपी पगडंडियाँ, रंगीन अल्पनाएँ, चाय बनाने वाली नेकदिल बूढ़ी अम्मा और लाल मुँह वाला पालतू बंदर सभी कुछ उपस्थित है।

विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में ही नहीं बल्कि उनकी कविताओं में भी घर-परिवार के जीवन से जुड़े अनेक चित्र मिलते हैं जिनमें आत्मीयता, सुरक्षा, अनिश्चितता व अपरिचय हर प्रकार के रंग भरे हुए हैं। अपनी कविता संग्रह 'सबकुछ होना बचा रहेगा' की एक कविता में वह लिखते हैं -

घर संसार में घुसते ही

पहचान बतानी होती है

उसकी आहट सुन

पत्नी बच्चे पूछेंगे 'कौन?'

'मैं हूँ' वह कहता है

तब दरवाजा खुलता है

घर उसका शिविर है

जहाँ घायल होकर वह लौटता है।

पर घर के प्रति कौतूहल की भावना लेखक को खास बनाती है क्योंकि वह घर को कई कोणों से देखता है, उसके बारे में कई सवालों से भरा हुआ है। अपने घर के प्रति कौतूहल का यह भाव ही कवि से लिखवाता है -

दूर से अपना घर देखना चाहिए

मजबूरी में न लौट सकने वाली दूरी से अपना घर

कभी लौट सकेंगे, की पूरी आशा में

सात समुंदर पार चले जाना चाहिए।

घर से लगाव तीसरी दुनिया की वस्तुस्थितियों की उपज है जहाँ अभी घोर व्यक्तिवाद, स्पर्धा नहीं है और न ही घर के भीतर स्त्री-पुरुष दो भिन्न इकाइयों के रूप में किसी शक्ति-संघर्ष की स्थितियों में जा पड़े हैं। घर की महत्ता इसलिए भी है क्योंकि बाहर का संसार इतना गतिशील, मनोरंजक और उपभोगपूर्ण नहीं हुआ है कि घर छोड़कर उसमें डूबा जा सके। वहाँ न प्यालों की खनक है, न घुँघरुओं की रुनझुन। कबीर की तरह 'घर जलाकर' (जो घर जारे आपना...) बाहर निकलने या पाश की तरह काम से लौटकर घर आने की क्रांतिकारिता का विचार कोई बाहरी और अजनबी धारणा है। घर-परिवार को दकियानूसी से भी समझौतावादी जीवनशैली के रूप में देखने की चेतना विकसित नहीं हुई है। कह सकते हैं कि पूँजीवाद अपने चरम रूप में घर को बदलता तथा तोड़ता है ताकि बाजार का विकास हो सके। साम्यवादी क्रांतिकारिता की बुनियाद भी घर की सीमाएँ तोड़ने पर टिकी होती है ताकि जेंडर-वर्ग के भेदभाव को समाप्त किया जा सके। पर विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास इन दोनों ही से उदासीन हैं, इनके प्रभाव से किसी प्रकार का अपरिचय ही व्यक्त करते हैं। विनोद कुमार शुक्ल पूरी कुशलता से घर-परिवार के जीवन की चुनौतियों और उसकी अच्छाइयों को निभा ले जाने वाले रचनाकार हैं। इसीलिए 'नौकर की कमीज' में परिवार की सीमा के अंदर पति-पत्नी के परस्पर प्रेम को उजागर करने वाले अनेक छोटे-छोटे प्रेम प्रसंगों को भी वह रचते हैं और ऐसा लगता है कि स्वयं ही उसका भरपूर आनंद भी उठाते हैं। आमतौर पर हिंदी उपन्यासों से विश्व साहित्य के उपन्यासों में पति-पत्नी के पारिवारिक जीवन को बोझिल, नीरस बनाकर अधिक पेश किया जाता है। प्रेम के रोमांच, भावोत्तेजना तथा उद्वेलन की अभिव्यक्ति के लिए दांपत्य जीवन संबंधों को बहुत उपयुक्त नहीं माना जाता क्योंकि वहाँ प्रेम करना किसी जोखम या साहस का पर्याय नहीं होता है। उससे प्रेम करते हुए नायकत्व को अर्जित करने की मंशा भी नाकाम होती दिखती है। प्रेमचंद की रचनाओं को अपवाद मान लें तो अन्य सभी बड़े रचनाकारों के यहाँ प्रायः पारिवारिक जीवन की सीमाओं में प्रेमाभिव्यक्ति को रचनाओं की विषय वस्तु नहीं बनाया गया है। भगवती चरण वर्मा, यशपाल, अज्ञेय, जैनेंद्र, निर्मल वर्मा, मोहन राकेश, मनोहर श्याम जोशी आदि सभी के यहाँ प्रेम की परिकल्पना तथा प्रसंग प्रायः प्रेमी-प्रेमिका, अविवाहितों, क्रांतिकारियों या एक-दूसरे से अपरिचित स्त्री-पुरुषों के यहाँ विशेष रूप से फलीभूत और अभिव्यक्त हुए हैं। इसका एक कारण यह भी है कि भारत के परंपरागत तथा पुराने सामंती परिवेश में पारिवारिक जीवन इतना इकहरा, बासी और समझौतों से भरा होता है कि वहाँ रचनाकारों को जिम्मेदारियाँ तथा मजबूरियाँ तो नजर आती हैं पर प्रेम के ऐसे रूपों की संभावना नहीं दिखती जिसके वर्णन से पाठकों को आह्लादित तथा उत्तेजित किया जा सके। लेकिन विनोद कुमार शुक्ल के तीनों ही उपन्यास प्रेम के बारे में इस दृष्टिकोण का विकल्प प्रस्तुत करते हैं। उनके यहाँ परिवार में पति-पत्नी के मध्य जैसे संवेदनशील, प्रगाढ़ तथा गहरे संबंध वर्णन मिलते हैं, वे प्रायः हिंदी कथा-जगत के परिदृश्य में दुर्लभ से ही प्रतीत होते हैं। इसमें किसी कुंठा या आत्मदया का भाव भी नहीं है कि वह निम्नमध्यवर्गीय परिवार के अपेक्षाकृत ठहरे हुए और रोजमर्रा के क्रम से बँधे जीवन के बीच अपने लिए या कहें कि उपन्यास के लिए प्रेम, अनुभूति तथा कौतुक के प्रसंगों को सफलतापूर्वक तलाश रहे हैं।

उपन्यास का दूसरा आयाम वह भी है जहाँ रचनाकार ने स्त्रियों पर होने वाले शोषण तथा अत्याचार का भी हवाला दिया है। स्वयं संतू बाबू की पत्नी के रूप में जो स्त्री चरित्र उपन्यास में उभरता है, वह हमारे समाज की उन औसत स्त्रियों का प्रतिनिधि चरित्र है जिनका जीवन घर की चारदीवारी में कैद होकर ही बीतता है। संतू बाबू की पत्नी ही नहीं बल्कि उनके मकान मालिक डाक्टर साहब और साहब की पत्नी का जीवन भी इसी रूप में बीतता है। फर्क बस यह है कि वे गहनों से लदी-फँदी स्त्रियाँ हैं जिनके बारे में एडम स्मिथ ने कभी लिखा था - 'दे आर मोर आरनामेंटल दैन यूजफुल।' दूसरी ओर घर-परिवार की कामकाजी तथा आज्ञाकारी स्त्रियों के बारे में खुद संतू बाबू की यह टिप्पणी रहती है - 'बचपन से गाय को गाय कहना सीखा था। शादी के बाद पूरी समझदारी से उसी तरह पत्नी को पत्नी कहना सीखा।' उपन्यास हालाँकि स्त्री विमर्श नहीं करता है पर उपन्यास में स्त्रियों की हत्या, खुदकुशी, पिटाई के ढेरों प्रसंग नजर आते हैं। किसी स्त्री को जहर देने के बाद हल्ला मचा दिया जाता है - 'बहू हैजे से मर गई।' यानी स्त्री उत्पीड़न और हिंसा केवल अपराध नहीं है बल्कि एक विशुद्ध सांस्कृतिक कर्म है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कुछ सामाजिक संस्कृतियों में स्त्रियों से देह व्यापार कराने, उनका बालविवाह करने, उन्हें चोरी जैसे कार्यों का प्रशिक्षण देने आदि का काम किया जाता है। इसी तरह स्त्रियों की दैहिक प्रताड़ना भी संस्कृति का हिस्सा बन जाता है। उपन्यास का एक अन्य पात्र है संपत, जो रोजाना नियम से अपने पिता के साथ मिलकर माँ की पिटाई करता है और कहता है कि यह आदत उसकी बचपन से है और अब वह अपने को रोक नहीं पाता है। स्त्रियों के साथ होने वाले ऐसे ही अपराधों तथा हिंसा पर झल्लाकर राम मनोहर लोहिया ने लिखा था - 'भारतीय मर्द इतना पाजी है कि अपने घर की औरतों को वह पीटता है। सारी दुनिया में शायद औरत पिटती है, लेकिन जितना हिंदुस्तान में पिटती है, इतनी और कहीं नहीं।' (राममनोहर लोहिया : भारत माता-धरती माता, पृ. 104)

विनोद कुमार शुक्ल उपन्यासों को रूपवादी प्रयोगों के लिए 'खुला क्षेत्र' मानते हैं, खासतौर पर बाद के दो उपन्यासों में अपनी इस मान्यता का उन्होंने भरपूर इस्तेमाल किया है। उन्होंने कला को उपन्यास के भीतर सावधानी से ही नहीं बल्कि बड़े प्रयोगवादी ढंग से विन्यस्त किया है। भूलना नहीं चाहिए कि प्रसिद्ध रूसी क्रांतिकारी लेनिन ने भी साहित्य से उत्कृष्ट कला गुणों की माँग की थी। मार्क्सवादी साहित्यालोचन की पूरी परंपरा में साहित्य के रूप पक्ष के बारे में सहानुभूति से चिंतन परंपरा मौजूद है। इंग्लैंड के मार्क्सवादी साहित्य सिद्धांतवेत्ता राल्फ फाक्स ने भी 'उपन्यास और लोकजीवन' में लिखा था - 'कला के रूपवादी पक्ष की उपेक्षा करना मार्क्सवाद की आत्मा के विपरीत है। मार्क्स विषयवस्तु और स्वरूप को एक-दूसरे से अविच्छिन्न रूप से गुँथा हुआ, जीवन के द्वंद्वात्मक संबंधों से जुड़ा हुआ समझते थे। वह उपन्याकार, जो समाजवादी यथार्थवाद को अपनाता है, स्वरूप संबंध प्रश्नों को अत्यंत महत्वपूर्ण समझता है।'

'नौकर की कमीज' में मुख्य पात्र संतू बाबू का उपन्यास में चित्रण प्रायः आत्मसजग व्यक्ति के रूप में हुआ है। ऐसे आत्मसजग व्यक्ति के रूप में जो उपन्यास में घटनाओं के भोक्ता, वर्णनकर्ता, दोनों ही रूपों में मौजूद है। इस आत्मसजगता का प्रभाव शिल्प तथा भाषा, दोनों पर ही पड़ा है। इस आत्मसजगता के प्रभाव का मूल्यांकन भिन्न नजरियों से किया जा सकता है। आलोचक नामवर सिंह का मत है कि स्वचेतनता या 'सेल्फ कांशियसनेस' किसी भी श्रेष्ठ कृति की रचना में बाधक होती है। वह अपने एक साक्षात्कार में कहते हैं - अब मेरी अपनी यह धारणा है कि संसार के और अपने देश के क्लासिक्स को देखते हुए, कि एक श्रेष्ठ कालजयी सर्जनात्मक कृति की रचना के लिए यह 'आत्मसजगता' बाधक है। लेकिन अधिक आत्मसजगता को श्रेष्ठ कृति की रचना में बाधक मानने वाले नामवर सिंह नौकर की कमीज जैसी रचना को इसका अपवाद भी मानते है। इसी साक्षात्कार में वह कहते हैं कि नौकर की कमीज में आत्मसजगता शक्ति बन गई है क्योंकि 'इस उपन्यास का जितना बड़ा कैनवास है और जिस जीवन की विडंबना से जुड़ा हुआ उसका कथ्य है, उसमें नैरेटर की 'सेल्फ कांशियसनेस' स्वयं भी योगदान देती है।' (पूर्वग्रह : मार्च-जून 1984, पृः 12) पूरा उपन्यास 8 खंडों में विभाजित है और दृश्य-परिवर्तन तथा कथानकों को निश्चित मोड़ देने के लिए खंड विभाजन की इस शैली का प्रयोग किया गया है। हर खंड के आरंभ में बड़े और अधिक स्पष्ट अक्षरों में कुछ पंक्तियाँ लिखी हुई मिलती हैं जो कहीं तो निश्चित अर्थ ध्वनित करने वाले सीधे-सपाट वाक्यों के रूप में हैं और कहीं बेहद बिंबात्मक। बाद के उपन्यासों में भी विनोद कुमार शुक्ल ने इस पद्धति का प्रयोग किया है पर बाद में इसमें पूरे उपन्यास के शिल्प की तरह ही काव्यात्मक अमूर्तनता बढ़ती चली गई है। उपन्यास के विभिन्न खंडों को किसी एक कथ्य या घटना तक सीमित रखने के नियम का प्रयोग नहीं किया गया है। उपन्यास में घटना तथा कथ्य विभाजन के लिए पैराग्राफ शैली का व्यापक प्रयोग देखने को मिलता है। पर जो बात उपन्यास को महत्वपूर्ण बनाती है, वह है उसकी व्यंग्यात्मकता। उपन्यास के शीर्षक में ही व्यंग्य छिपा हुआ है। कथानक में तो छोटे-छोटे कई वाक्य हैं जो चुटीले व्यंग्य का काम सफलतापूर्वक करते हैं और लेखक की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति को व्यक्त करते हैं। एक जगह वह ठेकेदारों की बात करते हुए लिखते हैं - 'हम लोगों की सारी तकलीफ उन लोगों की होशियारी और चालाकी के कारण थी जो बहुत मजे से थे और जिनसे हमारा परिचय नहीं था।' इसी तरह ब्राह्मण व्यापारी की बेईमानियों का उपहास इस तरीके से उड़ाते हैं - 'ईश्वर ने उसे पाँच लड़कियाँ दी हैं, उनके दहेज के लिए वह व्यापार में बेईमानी करता था। अपनी बेईमानी के लिए उसने एक बहाना ढूँढ़ लिया था। हर बेईमान आदमी इसी तरह से बहाने ढूँढ़कर बेफिक्री से बेईमानी करता था और ईश्वर उसकी सहायता करता था।'

विनोद कुमार शुक्ल सूचनात्मकता को कविता तथा गद्य-काव्य की लय में ढालने का प्रयास लगभग हर स्थान पर करते हैं। कहीं कुछ असामान्य, रोमांचक या नाटकीय बनाने से पहले उसे बेहद साधारण और सहज बनाते हैं। उसे दृश्य-संकेत में ढालते हैं और और फिर आधुनिकवादी काव्य के जिस गुण 'तनाव' की इतनी प्रशंसा होती है, उसे अपनी रचनाओं में सरलता से संभव बना लेते हैं। बड़ी सरलता से कही गई बातें मन में उतरकर धीरे-धीरे काव्य-बोध को पैदा करती हैं। कह सकते हैं कि 'साधारणीकरण' के जिस गुण को कविता की विशेषता के तौर पर खासतौर पर चिह्नित किया गया, वह विनोद कुमार के उपन्यासों में घटित होने लगता है। जीवन के अति साधारण यथार्थ और उसके दोहराए जाने वाले क्रम को व्यक्त करने की प्रवृत्ति लेखक की कविताओं, कहानियों से लेकर उपन्यासों तक में निरंतरता के साथ उपस्थित रहती है। उनकी कविता है - 'एक सुंदर लड़की को देखना'। कविता की पंक्तियाँ कैसे साधारणपन के साथ आरंभ होकर उसी लय पर समाप्त होती हैं, इसे देखिए :

एक सुंदर लड़की को देखना

सौंदर्य को सुंदर देखना है

एक अकेली सुंदर लड़की

जब वह आई जब वह गई

बहुतों ने उसे देखा

वह चली जाएगी

शायद चली गई

जिन लोगों ने उसे देखा

उन लोगों ने उसे देख लिया।

एक ओर विनोद कुमार शुक्ल अमूर्तनता की सीमा तक जाकर वाक्य प्रयोग करते हैं तो दूसरी ओर वह उसमें एक सपाटपन लाते हैं। अमूर्त दुरुहता और मूर्त सपाटपन के बीच ही वह कहीं काव्य-बोध जगाने की चेष्टा करते हैं। 'दीवार में खिड़की रहती थी' उपन्यास का आरंभ ही एक सपाट ब्यौरा प्रस्तुत करने वाली शैली के साथ होता है - 'आज की सुबह थी। सूर्योदय पूर्व की दिशा में था। दिशा वही रही आई थी, बदली नहीं थी। ऐसा नहीं था कि सूर्य धोखे से निकलता था, उसके निकलने पर सबको विश्वास था। सूर्य के उदय होने के प्रमाण की तरह दिन था और सूर्यास्त के प्रमाण की तरह रात हो जाती थी।' बिना किसी तनाव या खिंचाव के सपाट ब्यौरे वाली इस भाषा के प्रयोग से उपन्यास में कई बार गतिहीनता का आभास कराने लगता है। लगता है जैसे कथ्य शिथिल और अवरुद्ध हो रहा है और अब उसमें किसी विकास की संभावना नहीं रही। लेकिन कविता हो या उपन्यास-कहानी, कथानक के गतिरोध को किसी सपाट अभिव्यक्ति में उलझाने के बाद रचनाकार अहिस्ता से दृश्य-परिवर्तन की तकनीक का प्रयोग कर उसके गतिरोध को भंग कर देता है। प्रायः यह परिवर्तन अकस्मात न होकर इस कदर धीरे से होता है कि लेखक पता ही नहीं चलने देता कि कहाँ से उसने किस नए प्रसंग की शुरुआत कर दी है। जैसे कि 'नौकर की कमीज' में ही संतू बाबू के परिवार के प्रसंग चलते रहेंगे, उसके बाद वह अचानक सड़क पर निकल आएँगे। फिर झुग्गी-झोपड़ी का वर्णन आरंभ हो जाएगा और फिर दफ्तर के चरित्रों, उनके हालचाल और वहाँ के वातावरण के बारे में लेखक बताने लग जाएगा। इस प्रकार जीवन में सामान्य को अति सामान्य की तरह प्रस्तुत करना और फिर अवरुद्ध कथानक को दृश्य परिवर्तन के माध्यम से दूसरी घटनाओं से जोड़ना, पूरे उपन्यास में एक सुचिंतित योजना के तहत ऐसे ही शिल्प का रचाव मिलता है। इसी तरह 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' की अंतर्वस्तु अधिक द्वंद्वरहित और कल्पना प्रधान होने के कारण उसके शिल्प, प्रयुक्त प्रतीकों-बिंबों और कल्पना प्रसूत कथोपकथन में एक जादुई आकर्षण पैदा करने का सफल प्रयत्न लेखक के द्वारा हुआ है। उपन्यास की भाषा की निश्छल सादगी पर राजेंद्र यादव की यह टिप्पणी ध्यान योग्य है - 'भाषा का इतना सहज रूप जैनेंद्र के बाद पहली बार विनोद कुमार ने ही दिया है। जैनेंद्र की भाषागत सादगी इसलिए सायास लगती है क्योंकि इसके पीछे दार्शनिक जटिलताएँ हैं - विनोद कुमार में वैसा कोई हस्तक्षेपीय तनाव नहीं है - न आर्थिक, न दार्शनिक। वह भीतर से बेहद इत्मीनानी (रिलैक्स्ड) लेखक की पारदर्शी भाषा है।' (हंस, अगस्त 1998, पृ-13)

विनोद कुमार शुक्ल के वर्णनों में, खासतौर पर 'नौकर की कमीज' में पात्रों के आपसी संवाद में असहाय, विश्लेषण, बंधन, कर्तव्य, निश्चित शंका, अधिकार, आश्चर्य इत्यादि सुशिक्षित व्यक्तियों के जीवन में प्रयुक्त शब्द काफी मिलते हैं जो कि उपन्यास की निम्नमध्यवर्गीय पृष्ठभूमि को देखते हुए थोड़े अटपटे लगते हैं। इसके अलावा शब्द प्रयोगों की दृष्टि से इस उपन्यास और बाद के दोनों उपन्यासों में साफ अंतर भी दिखता है। 'खिलेगा तो देखेंगे' में व्यापक सामुदायिक जीवन है, इसलिए शब्द अधिक हैं। स्थानीय संस्कृति के बहुविध रूप होने के कारण शब्दकोष बड़ा है। पशु-पक्षी, गाँव के कारीगरों के औजार, पेड़ तथा वनस्पति सभी कुछ अपने नामों के साथ उपन्यास में उपस्थित हैं। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में भी प्रकृतिमय वातावरण और उसके विविध अंगों का वर्णन है जो कुशल शब्द संयोजन के बगैर संभव नहीं हो सकता था। यानी अपने विकासक्रम में विनोद कुमार शुक्ल कहानी की भाषा से अधिक से अधिक कविता की भाषा की तरफ झुकते चले गए।

ऐसे समय में जबकि जीवन के ठोस यथार्थ जगत में मौजूद असमानता के विभिन्न स्तरों और रूपों का विरोध करने वाले उपन्यास हिंदी में लिखे जा रहे हैं, विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों का महत्व अधिक बढ़ जाता है। 'नौकर की कमीज' जैसे उपन्यास में किसी जनक्रांति की गूँज, दलित-स्त्री विमर्श या रोमांटिक विद्रोह की कथा नहीं है। पर कथानक में जीवन की प्रतिकूल स्थितियों तथा कटु अनुभवों से उपजे विक्षोभ तथा तिलमिलाहट ने व्यंग्य का रूप धारण कर लिया है। घटनाओं में अविश्वसनीयता की हद तक नाटकीयता है और इन सबके ऊपर तमाम तकलीफों के बीच जीवन के प्रति सहज रागात्मक लगाव, कौतुक, मस्ती और खिलंदड़पन का भाव है जो जीवन को जीने लायक बनाता है। निम्न मध्यवर्गीय परिवार शायद इतने विश्वसनीय तरीके के अमरकांत की कहानियों के बाद ही हिंदी कथा जगत में चित्रित हुए हैं। भाषा और रूपतंत्र की मौलिकता के सहारे लेखक यथार्थवाद की सीमाओं से स्वतंत्र होने का प्रयत्न करते हुए भी दिखता है। दूसरे स्तर पर, घर,परिवार, प्रकृति और परिवेश के छोटे-छोटे अनुभवों के प्रति रागात्मक लगाव रखना ही लेखक की जीवन-दृष्टि है। लेखक की यह खूबी कुछ-कुछ सुनार की चिमटी की याद दिलाती है जो हर महीन और बारीक चीज को भी कुशलता से पकड़ती है और उसके सुलगते रूपों को आँखों के आगे साकार कर देती है।


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