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निबंध

ऋतु-पावस नियरानी
श्‍यामसुंदर दुबे


यह संसार एक प्राकृतिक यज्ञ है। यह यजन महोत्सव प्रकृति में निरंतर है। बसंत ग्रीष्म, वर्षा, शरत आदि ऋतुएँ इस यज्ञ में हविष्य बन रही हैं। हवि बनकर ये ऋतुएँ ही काल की ऊर्जा का आधार बनती हैं। काल या समय कोई निरपेक्ष सत्‍ता इसलिए नहीं है कि वह अपनी भौतिक उपस्थिति प्रकृति की गतिशीलता के पहचान चिह्नों से अभिवयक्त करता है। जबकि इन पहचान चिह्नों की अंतर्वर्ती क्रियाशीलता से प्रकट होने वाले उद्रेकों से एवं इनकी छवियों से समय की धारणा और आकृति का अनुभव होने लगता है। इस स्तर पर समय प्राकृतिक घटनाओं से ही रूपायित होता है। मनुष्य की मेधा ने प्राकृतिक घटनाओं की संरचनात्मक को विखंडित करके ही समय की लघुतम इकाइयों की अवधारणा का सूत्रपात किया। ऋतुएँ समय की पहचान को जाहिर करने वाली बाह्य और आंतरिक सत्‍ताएँ हैं। वर्ष-चक्र की परिधि को केंद्र से संयुक्त करने वाली इन छह ऋतुओं को आरा की तरह निरूपित किया गया है। केंद्र की परिभ्रमणशीलता को परिधि में प्रकट करने वाली ये ऋतुएँ न केवल केंद्र और परिधि के संवाद को प्रकट करी हैं, बल्कि केंद्र के आंतरिक गति उत्प्रेरकों की प्राण सत्‍ता को परिधि में प्रक्षिप्त करके उसकी क्रिया-चेतना को इंद्रिय संवेदनों के नाना सन्निकर्षों में रूपायित करती हैं।

पृथ्वी बाँझ रह जाती यदि ऋतु-लीला का यह चक्रमण पृथ्वी पर, संभव नहीं होता। पृथ्वी ऋतुमति है, इसलिए उसमें प्रजनन की क्षमता है। धरती का आर्तवकाल ऋतुओं की परिवर्तन वेलाएँ हैं। धरती का समस्त सत्य, समस्त ऋत इन्हीं ऋतुओं में समाया है। मैंने यह जो ऋतुओं के साथ जुड़े रूपकों की चर्चा की है, यह मेरी अपनी रूपकबाजी का परिणाम नहीं है। यह हमारे आर्षवाड़्मय की ही अंतर्दृष्टि है, जो इन रूपकों में परिव्याप्त है। ऋतुएँ अपना अंतर्ध्वंस करके ही सृजन के उर्वर क्षणों को पृथ्वी की कोख में जाग्रत करती हैं। यही अंतर्ध्वंस उनका निरंतर हवि होना है। ऋतुओं का अंतर्ध्वस जिस प्राणग्नि से संभव होता है-वही कालानल है। व्यक्ति चेतना की संवेदनशीलता इसी कानालन की परिणाम है। समय-अग्नि की ज्वलन-तीव्रता ही व्यक्ति-चित्‍त की द्रवणशीलता की अनुमापक होती है। जिनके भीतर समय अग्नि को यह ज्वलन शीलता संभव नहीं होती है, वे तुलसी बाबा की दृष्टि में विमूढ़ ही हैं। सबते भले विमूढ़ जिन्हें न व्यापे जगति-गति। इनके चित्‍त ऋतुओं की लीला-भूमि नहीं बन पाते हैं। ऐसा इसलिए कि ऋतुओं की लीला तो ऋतुओं के अंतर्ध्वंस में ही छिपी है। और यह अंतर्ध्वंस प्रकारांतर से द्रवणशील चित्‍त का ही होता है। ऋतुओं की सक्रियता जितनी बाह्य प्रकृति में सन्निविष्ट है उतनी ही वह आंतरिक प्रकृति में भी समाविष्ट है। एक तरह से ऋतुएँ संवेदनशीलता का आंतरिक उत्स भी हैं और संवेदनशीलता को सृजन में रूपांतरित करने की उत्‍तेजनाएँ भी हैं।

संवेदना का जन्म और संवेदना का कला माध्यम में रूपांतरित होना रचनाकार के चित्‍त का अंतर्ध्वस ही है। यह अंतर्ध्वस जिस चित्‍त में जितना अधिक संभव होता है, वह चित्‍त उतना ही सृजनक्षम होता जाता है, इसलिए यह कोई अचरज भरा निष्कर्ष नहीं है कि कविता में ऋतुओं की उपस्थिति कवि-चित्‍त के अंतर्ध्वस का ही परिणाम है। चित्‍त का यह अंतर्ध्वस ऋतुओं उत्‍तेजना के उस आक्रमण से होता है, जहाँ ऋतु में अपनी उत्‍तेजना में स्वयं विगलित हो, निरंतर नया होने के लिए अपने-आप में अंतर्ध्वंसित होती रहती है। कालिदास ने ऋतु-वर्णनपरक अपने गीति काव्य का नाम 'ऋतु संहार' करते समय शायद इस नए अर्थ का अनुभव किया हो। संहार का एक अर्थ मार डालना भी है। ऋतुओं को मारकर उन्‍हें संवेदना बनाकर शब्‍दार्थ के द्वार तक लाना ऋतुओं का मनुष्य हो जाना है। ऋतु को मानवीय अंतरंगता में पा लेने का अर्थ है। ऋतुओं का प्राकृतिक घटना से अधिक मानवीय स्वभाव में समृद्ध हो जाना।

लोक-जीवन में ऋतुएँ जीवन-चक्र का ही एक हिस्सा हैं। लोक का खुलापन पाकर और ऋतुओं से साझेदारी करके ही जीवन का विस्तार और निरस्तार संभव होता है। ऋतुएँ ही लोक-जीवन चक्र घुमाती हैं और लोक ऋतु-चक्र में अपने को सुरक्षित अनुभव करता हुआ-ऋतुओं में अपने होने की तलाश करने लगता है। यही वहज है कि लोक का ऋतु-चिंतन जड़ प्रकृति की चित्‍त-धर्मिता से अधिक मानवीय चेतना के गतिशील जीवंत बिंबो की केमिस्ट्री में ही संपन्न है। स्पष्ट है कि प्रकृति का सहजात सान्निध्य लोक को सदैव अपने स्वभाव में ढालता रहात है। यही वजह है कि लोक ने अपनी कविताओं में सबसे पहले ऋतुओं को अपने इंद्रिय संवेदनों में अनुभव किया और ऋतुओं की उत्‍तेजनाओं को भी अपनी शारीरिक तथा मानसिक उत्‍तेजनाओं में शामिल किया। लोक की कालगणना में यद्यपि छह ऋतुओं का अभाव है। उसने छह ऋतुओं को बारह महीनों में विभक्त और विस्तारित करके अनुभव किया है। यही वजह है कि लोक में ऋतु-वर्णन परंपरा का एक ढाँचा 'बारहामास' के रूप में प्राप्त होता है।

'बारहामास' केवल काल-गणना का नियत वर्ष चक्र भर नहीं है-यह एक वार्षिक जैविक घड़ी है। इस बायोलॉजीकल क्लॉक के अनुसार न केवल लोक का बाह्-व्यापर निर्धारित रहता है, बल्कि लोक की अंदरूनी जैवकीय भी इसके अनुसार क्रियाशील होती है। बारहमास का मॉडल लोक से ही जायसी तक पहुँचा है। गोया जायसी की लोक-दृष्टि ही उनके बारहमास में अभिव्यक्त होती है। उस बारहमास में ऋतु की जैविक घडी और कर्म-व्यापार की समय घडी की टिक्-टिक् एकमेक होकर ध्वनित होती है। आषाढ़ आता है तो नागमती की चिंता द्विआधारी हो जाती है। 'हों बिनु नांह मंदिर को छावा'। मैं बिना प्रियतम के हूँ। मेरा घर अब कौन छाएगा? एक बहुत सामान्य-सी चिंता घर-गृहस्थी से जुड़ी चिंता लेकिन बड़ी चिंता इस रूप में कि आषाढ़ में तो सबको आश्रय की जरूरत रहती है। आषढ़ में छानी, छप्पर की चिंता लोक की पहली चिंता है। 'लोगो मास असाढ़ सुहावन बादर गरजन लागे। घर-टापर की छौनर करवे चित्‍त किसान के जागे।' जायसी ने इस लोक-प्रसंग को अपने बारहमास में स्थान दिया है। प्रकट रूप में जायसी की राजरानी की यह भूमिका सामान्य स्त्री की भूमिका मानी गई है और यह निष्कर्ष निकाला गया है कि ऋतुपरक गार्हास्थिक चिंता में वह सामान्य व्यक्ति चेतना से ही उद्भूत होती है। चाहे सूर की गोपियों का उलाहना हो की किधौं घन बरसत नाहिं उन देसन। या फिर माँ कौशिल्‍या की राम-लक्ष्मण के प्रति चिंता हो। 'काहू बिरछ तरें भींजत हुईएँ राम-लखन दोऊ भाई लोक से जायसी का गहन तादात्म्य था, इसलिए उनकी महाकाव्यीय दृष्टि लोक उद्भूत काव्य-दृष्टि है। यही वजह है कि वे अपने इस ग्रंथ के लिए लोक-मोटिफ को आधार बनाते हैं। इतिहास में लोक का इतना गाढ़ा और इतना अंतर्भेदी संश्लेषण विरले कवि कर पाते हैं। इसलिए जायसी की उक्तियाँ इकहरी नहीं हैं।

'हौं बिनु नांह मंदिर को छावा' में जितनी घर छाने की चिंता है-उतनी ही घर को घर अनुभव करने की चिंता है। घर छाने का अर्थ छानी-छप्पर छाना मात्र नहीं है। बल्कि यह घर के होने की अनुभूति भी है, जो प्रिय रत्नसेन से जुड़ी है। जायसी इस केंद्रीय भाव को 'बारहमास' के केंद्रीय तत्व के रूप में प्रतिस्थापित करते हैं। ''जिन घर कंता ते सुखी तिन गारो अरु गर्व। कंत विचारा बाहरे ते सुख भूला सर्व।'' घर उजड़ना, घर छाना, घर बसाना जैसे भाषिक मुहावरों में मात्र क्रिया-व्यापार का संधान भर नहीं है। वह एक समग्र घटनानुसंधान भी है। तुलसी यदि लिखते हैं कि ''यह पापिनहिं सूझ का परेऊ। छाए भवन पर पावक धरेऊ।'' तो यह वह समग्र अनुभव है, जिसमें राम-विहीन परिस्थितियाँ कुछ इस तरह निर्मित हो रही हैं कि पूरी अयोध्या जलती जुई दहकती हुई-सी अनुभव की जा रही है। घर छाना या घर के छप्पर पर आग धरना ये भाषिक मुहावरे जहाँ फूटते हैं-वहाँ घर की भौतिकता फेडअप होते हुए लुप्त हो जाती है। जबकि इन मुहावरों में घर की भावमय उपस्थिति का ही अवधान है। वर्षा में घर की भौतिक उपस्थिति का अनुभव अधिक सघन हो उठता है। जब जीवन घर की चहारदीवारों में घिरकर सिमट आता है तब मन को मानो पर लग जाते हैं। घर की आश्वस्ति का अनुभव करता और घर के द्वारा दी जा रही सूरक्षा के घेरे में वर्षा में भींजता-भींजता मन अपने हाथ में नही रह जाता है। वह स्मृतियों की पगडंडियों पर दौडने लगता है। वर्षा स्मृतियों का ऋतु है, लोक घर घुस्सू नहीं है, फिर भी वर्षा उसे घर में कैद कर देती है। किंतु जीवन-व्यापार तो रुकता नहीं है। प्रिय को खेत-खलिहान, देश-परदेश की यात्रा तो करनी ही पडे़गी, इसलिए स्मृति के साथ प्रिय की कुशल-क्षेम का तीव्र अनुभव घर घुसी वर्षा चर्या मं केंद्रित है।

लोक में 'बारहमास' प्रिय की स्मृति, प्रिय के सुख-दुख की चिंता और अपने सुख-दुःखात्मक द्वंद्व की ऊहापोह से रचा गया काव्य-विधान है। यद्यपि बारहमास बार महीनों के स्मृत्याभासों की उद्दीपनकारी प्रकृतिपरक वृत्‍त-चर्या है, किंतु अन्य महीनों में प्रिय के रक्षा-विधान की चिंता उतनी नहीं है, जितनी वर्षा में है। यह एक और तथ्य है कि बारहमास जैसी रचनाओं के रचयिता-पुरुष कवि हैं, किंतु प्रायः बारहमास की सभी उक्तियाँ स्त्री-कथन हैं। चित्‍त के विस्फारण और चित्‍त की विगलता की क्रियाएँ स्त्री-चित्‍त में सर्वाधिक सघनता से संभव होती हैं। शायद इसलिए रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि उनके व्यक्तित्व में एक स्त्री सक्रिय है, जो निरंतर अपनी वेदना से उन्हें गीला-गीला किए रहती है। स्त्री अपना अंतर्ध्वंस करना जानती है इसलिए ऋतुओं की आर्तव-लीला को स्त्री-प्रकृति का मेल अधिक गहनता से स्थापित हो जाता है। यह मेल जैविक स्तरों पर प्रभावशाली होते हुए भी भावना के स्तर पर होने वाला भी है। स्त्री-मानस के विश्लेषकों का काम संबंधी स्फुरणाओं के संदर्भ में तो यही कहना है कि न केवल ऋतुओं की विभिन्न प्राकृतिक उद्दीपनाओं से बल्कि चाँद की घटती-बढ़ती कलाओं से भी स्त्री-चित्‍त में विक्षोभ की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। संभवतः स्त्री-शरीर धरती और प्रकृति के सबसे नजदीक है। अपनी सृजनधर्मी सहज प्रकृति के कारण वह पृथ्वी की जाति की है।

सामान्यतः बारहमास में ऋतुओं की बदलती उत्प्रेरणाओं से प्रभावित होने वाली विरह-भावना की विभिन्न आत्म-स्थितियों का निरुपण होता है। ऋतुओं के परिवर्तन का पहला प्रामाणिक प्रभाव प्रकृति के पंच तत्‍वों में परिलक्षित होता है। पंच तत्‍वों की भौतिक तासरी ऋतुओं के परिवर्तन के साथ बदलती है। इस पाँच तात्विक प्राकृतिक परिवर्तन का असर सीधे-सीधे मनुष्य के शरीर पर पड़ता है। विशेषताः मनुष्य के रक्त-प्रवाह में अत्यंत सूक्ष्म ढंग से ऋतुओं की हलचल सिमट आती है। इस हलचल का प्रत्यक्षीकरण फिर मनुष्य के मानस पर होता है। इसलिए विभिन्न ऋतुओं के संदर्भ में मनुष्य के मूड्स परिवर्तित होते रहते हैं। परिवर्तित मूड्स का संबंध जिन प्राकृतिक उपादनों से होता है। वे उपादन ऋतु-विशेष की पहचान देने वाले होते हैं। 'बारहमास' में ऋतुओं के ये पहचाना चिह्न प्रायः रूढ़ से हो गए हैं। लोक ने जिन पक्षियों, जिन फूलों, जिन जीव समुदायों और जिन वनस्पतियों, हवाओं, बादलों आदि को ऋतु-विशेष में प्रभावशाली माना है, उनका चित्रण 'बारहमास' में लोक ने किया है। लोक बोलियों में प्रचलित 'बारहमास' के प्रभाव को ही विभिन्न कवियों ने षडऋतु वर्णन में भी ग्रहण किया है।

जायसी ने बारहमास को सीधे लोक से उठाया है, तो लोक के संस्कार उसकी आंतरिक संरचना में अनायास आ गए हैं। बाह् प्रकृति और अंतः प्रकृति का जो अद्भुत मेल लोक में है-वैसा ही जायसी के बारहमास वर्णन में भी है। परंपरा, प्रकृति, शरीर, मन और कर्म-व्यापार के मिले-जुले सरोकारों को कैसे कविता-भाषा, एक बिंदु पर एकत्रित करती है-यह जायसी के वर्षा-वर्णन से जाना जा सकता है। नागमती कहती है कि मघा-नक्षत्र झकोरा मार कर बरस रहा है। और मेरे दोनों नेत्रों से आँसू ऐसे प्रवाहित हो रहे हैं-जैंसे घर की ओरी से पानी टपक रहा हो। 'बरसे मघा झकोरि झकोरी। मारे दोऊ नैन चुएँ जसओरी।' मघा नक्षत्र परंपरागत ज्योतिषीय परिदृश्य को प्रस्तुत कर रहा है। और वर्षा की लगातारता में सम की स्थिति वाले संकेत दे रहा है। मघा आते-आते बादल झकोरों में अटूट रूप से झलाझला बरसने लगते हैं। वर्षा का यह सम संतृप्त काल है। मघा जब बरसता है-तब धरा संतृप्त होती है। 'मघा ने बरसे भरे न खेत। माता न परसे भरे न पेट।' मघा की बूँद झकोरों में अर्राती है। जैसे मघा बूँद अर्राय (आल्हा)। आर्राना का तात्पर्य है-लगातार फूट-सा पड़ना। मानो बादल से बूँद टपक नहीं रही है। फूट पड़ रही है। बूँद की यह गति ओरी के चूने में छिपी हुई है। ओरी घर-गृहस्थी का बिंब दे रही है। वर्षा के स्वभाव का घर बैठे व्यक्ति को ओरी से पता चलता है। ओरी से पानी उल्ला का गिरता है, तो ओरी से पानी चू कर भी निकलता है, और ओरी से पानी टपकता भी है। मघा नक्षत्र की बारिस चूने वाली है। बादल से पानी जिस तरह चू रहा है-उसी तरह वह ओरी से चू रहा है। ठीक इसी तरह नत्रों से आँसू चूते हैं। विरह का सातत्य और आँसुओं का निरवच्छिन्न प्रवाह विरह के परिपाक काल का अनुभव देता है। लोक में नेत्रों से गंगा-यमुना जैसे आँसुओं का बहना-बहते हुए आँसुओं से बेला ताल का भर जाना आदि भाषिक मुहावरे प्रचलित हैं। 'माता के रोए गंगा-जमुना बहत हैं, पिता के रोए बेलाताल।' विरह की निरंतरता आँसुओं को अनवरत बनाए है। प्रिय की स्मृति-श्रृंखला एक क्षण को भी नहीं टूट रही है। राजभवनों के मध्य ओरी के चूने का दृश्य लोक संपृक्ति प्रधान बिंब रचना है। ये लोक-चिह्न कवि-मानस में अंतर्निहित जातीय स्मृतियों से ही प्रकट हुए हैं।

'बारहमास' वर्णन में एक तकनीक और काम में लाई गई है-वह है-बाह् परिस्थितियों के साथ आत्म-सत्य की टकराहट। इस टकराहट में निरंतर आत्म-निविड़ता के अकेलेपन से आक्रांत होते जोने की स्थिति, एक संपूर्ण सुखी-संरचना में असहाय होते जा रहे चित्‍त की व्याकुलता को व्यक्त करती है। यह क्षोभ प्रकृति और व्यक्ति के मध्य उपजे विरोध का परिणम है। लोक में ऋतुओं की बदलती प्राकृतिक छवियाँ सदैव सुखकारी हैं। ऐसा इसलिए कि लोक की निर्भरता प्रकृति की बदलती छवियों की संपूर्णता पर टिकी हैं। ग्रीष्म में अगनऊवा का प्रखरता से तपना। 'अगनऊवा जो तपै निरासा। तो जानो बरसा की आसा।' वर्षा में चौमासे भर जल का बरसना। नदी-नालों का जल से भरपूर हो ना। वनस्पतियों की नजर पसार हरीतिमा। 'चौमासे भर बरसे पानी। तो जानौ लौटी जिनगानी।' ठंड में खूब कँपाने वाली शीत लहरी का चलना, फलों में, फूलों में रस भरने का दौर आना। 'मकर के पंद्रह धन पच्चीस। जड़ो परहै दिन चालीस।' चालीस दिनों की यह ठंड ही फसलों की भरपूरता की और प्राणियों में स्थस्थ रहने की प्रतिभूति देती है। तो ऋतुएँ अपने गुण-धर्म की अनुकूलता में ही सुखदायी मानी गई हैं। किंतु बारहमास में व्यक्ति-चेतना की निर्मम एकांतिकता ऋतुओं की सुखद अनुभूतियों में व्यक्ति को रमने नहीं देती।

ऋतुएँ विरुद्ध संरचनाओं में संलग्न हो जाती हैं। आषाढ़ के मेघों के गर्जन-तर्जन जहाँ धरती के व्याकुल बीजों में और खेतों की तपी-तची मिट्टी में प्राण-विधुत का संचार कर रहा है-वहीं बारहमासा की विरहिणी को लगता है कि युद्ध के नगाडे़ बजने लगे हैं और उसके ऊपर ससैन्य काम का आक्रमण हो रहा है। भादों की मेघ-मंडित अँधेरी रात्रियाँ उसे डराती हैं। हरे-भरे पेड़ों की डालों पर पड़ें झूलों पर झूलती सखियों की हँसी-खुशी उसे बाण की तीखी अनी-सी वेधती हैं। इस स्तर पर ऋतु-परक-कर्म व्यापार से जुड़े तीज-त्यौहार भी विरहिणी के भीतर उल्लास संचारित नहीं कर पाते। ऋतुओं के आम स्वभाव ओर उसके विपरीत व्यक्ति के सच का असर, एक साथ ऋतु-कविता में जिस द्वंद्व की रचना करता है-वह द्वंद्व मनुष्य की अंतः प्रकृति और प्रकृति के अंतः संवेदनों तथा बाह्म संवेदनों की टकराहट से ही उत्पन्न हो रहा है। ये द्वंद्व यह भी स्पष्ट करता है कि प्रकृति की सच्चाई अस्वीकार नहीं है। बल्कि वह जिस तरह से उल्लास की उद्दीपिका का है-ठीक इसके विरुद्ध वह अपने इसी स्वभाव में दुःख की उद्दीपिका भी है। बारहमासा में प्रकृति और उसकी उत्‍तेजनाओं से आविष्कृत जीवन-प्रविधियाँ तो एक व्यापक परिधि का परिदृश्य निर्मित करती हैं। जबकि इनका केंद्र व्यक्ति है। और व्यक्ति-चेतना अपने मनोभावों के आराओं से इस परिधि से संलग्न है। परिधि-वृत्‍त के परिभ्रमण में केंद्र की ऊर्जा इन मनोभावों के आराओं से जिस रूप में परिधि तक फिंकती है-उस रूप में परिभ्रमण का वेग, परिभ्रमण की दिशा और परिभ्रमण से प्राप्त परिणाम व्यक्त होने लगते हैं।

काव्य में ऋतुओं की साझेदारी केवल विषाद संदर्भी नहीं है। वह अपने बिंदास रूप में, अपने खिलंदडे़ रूप में, अपने नटखट रूप में, अपने अपरिमित सौंदर्यपरक नव-नवोन्मेषशाली रूप में कविता की अंतर्वर्ती शक्ति बनकर प्रकट होती रही है। किंतु 'बारहामास' जैसी कविता प्रणाली में व्यक्ति चेतना का ऋतुओं के साथ वैरानुबंधी संघर्ष अधिक चलता रहा है। यह वैरानुबंध कहीं-न-कही आत्म प्रीत्यर्थ ही रहा है। कवि-चेतना और युगीन परिदृश्य के परिणाम स्वरूप ऋतु वर्णन में यह वैरानुबंध अपने इष्ट विषय की संलग्नता में ऋतु प्रकृति के वैपरीत्य को रेखांकित करने वाला है।

पहली बार निराला की कविता में बारहमास की आत्मोन्मुखी विरह केंद्रिता का लोक प्रभावी परिदृश्य विलोपित होता है। निराला ने वर्षा के आवेगी और उत्क्रांतिक स्वरूप को सामाजिक परिवर्तन की क्रिया-शक्ति की तरह उपस्थित किया है। क्रांति का आवेग जन-उत्पीडन का परिणाम है। निराला बादलों को जन-उत्पीड़न से उत्पन्न आवेग का बिंब देते हुए कहते हैं- ''तिरती है समीर सागर पर यह तेरी रणतरी भरी आकांक्षाओं से, अस्थिर सुख पर दुःख की छाया, जग के दग्ध हृदय पर विप्लव की प्लावित माया''। निराला के यहाँ वर्षा की बिंब एकदम बदला हुआ है। क्रांतिधर्मा आत्म-चैतन्य का प्रपीड़ित रूप और उसके भीतर उमड़ती जीवन की आकांक्षा का उल्लासित विस्तार इतने प्रभावशाली संश्लेषी बिंब में उभरा है कि ऋतु का संज्ञान ही पूरी तौर पर बदल जाता है।

सुख का भ्रम और दुःख की निरंतर उपस्थिति का बिंब 'तिरती है समीर सागर मे' अस्थिर सुख पर दुःख की छाया में उभरा दुःखवाद-दार्शनिक प्रपत्ति नहीं है। बल्कि यह आकांक्षा की वह कौंधती बिजली है जो काले-काले गाढ़े-गराने बादलों के अँधेरे मे से चमक जाया करती है। विषाद नैराश्य से घिर कर आत्म-हनन की दिशा देता है, जबकि विषाद में अशा का संचार क्रांति की भूमिका निर्मित करके व्यक्ति-चेतना की जिजीविषा को व्यक्त करता है। विषाद् में आशा का संचार आकांक्षाओं की उछाल से होता है। यहीं से प्राप्य को वरण करने के लिए मन के युयुत्सभाव को जाग्रत किया जाता है। वर्षां का युद्धक बिंब निराला के यहाँ 'यह तेरी रणतरी' पद में अभिव्यक्त हो रहा है। जायसी और निराला में यह युद्धक भाव वर्षा के अलग-अलग आसंगों में निष्पन्न है। युद्ध का फलित और युद्ध की प्रक्रिया दोनों में भिन्न-भिन्न है। जायसी ने सारा युद्धक परिदृश्य काम के आक्रमण से जोड़ दिया है इसमें व्यक्ति-वासना की केंद्रियता है, किंतु निराला का युद्ध-बिंब इस व्यक्ति-वासना के विरोध में है। बादलों में गर्जन-तिर्जन ऊँची अट्टालिकाओं को आतंक भवन में परिवर्तित कर रहा है। अँगना के अंग से लिपटे आत्मग्रस्त विषयीजनों में बादल की क्रांति मुद्रा भय-संचारित करती है। वर्चस्ववादी ताकतों का तोड़ वर्षा की प्रकृति में सकेंद्रित करने वाले निराला ने दूसरी तरफ अस्थि शेष रह गए किसान का बिंब दिया है जो मेघों के आने से प्रसन्न है। वर्षा किसान का अभिषेक कर रही है। हिल-हिल-खिल-खिल तुझे बुलाते ऐ बादल के वीर! वर्षा छोटे जनों को सुशोभित करती है।

निराला का मानवीय संघर्ष उनके वर्षा-वर्णन में कर्म-सौंदर्य की महत्ता प्रकट करता है। वैसे भी वर्षाकाल कर्म-चेतना का बीजारोपण काल है। 'कृषि निबेरहिं चतुर किसान' किसानी-कर्म का सूत्रपात इसी ऋतु में होता है। यह तनिक अचरज का विषय है कि समकालिन काव्य-परिदृश्य में ऋतुओं की बानक और बनक का वैसा चित्रण नहीं हो पाया है जैसा कि पूर्ववर्ती कविताओं में हुआ है। क्या हम इसे कवियों का लोक और प्रकृति से दूर होना मानें। इसे यदि हम सीधे-सीधे स्वीकार कर लें, तो यह सटीक ही होगा। ऋतुओं की साझेदारी काव्य में केवल ऋतु-अनुभवों का परिणाम नहीं है। कवि का आत्म-विगलन और आत्म-प्रसार ही ऋतुओं की आंतरिक संवेदनाओं को कविता में ढाल पाता है। इधर लोक से अनुप्राणित नवगीत ने ऋतुओं में अपनी रुचि प्रदर्शित की है। किंतु ऋतु-बिंबों की सौंदर्यपरक रचनाओं में नवगीतकार, चित्रकार अधिक हो गए हैं। यदा-कदा वे ऋतुओं के आत्मपरक अनुभवों के विक्षोभ को व्यक्त करते हैं-लेकिन कहीं भी वे आत्म-गोपित सत्य के साथ-परिगत उपस्थित बाह् परिवर्तनों को व्यक्त नहीं कर पाए हैं। ऋतुओं की यथातथ्यता के विरुद्ध उन्होंने अपनी हताशा, अपना अकेलापन, अपनी दुविधा, अपना अमर्ष जरूर व्यक्त किया है किंतु यह वर्णन समकालीन संघर्ष का व्यापक अंतदृर्शय प्रस्तुत नहीं कर पाता है। एक तरह से निराला की ऋतु वर्णन परंपरा का विकास स्थगित-सा ही है। नवगीतकारों ने यदा-कदा ही आषाढ़ को व्यापक सामाजिक संदर्भों में प्रकट किया है। पहला दिन मेरे आषाढ़ का कभी हुआ सूखे का कभी हुआ बाढ़ का। (नईम) जैसी पंक्तियाँ हमारे ऋतु-बोध को सामाजिक विस्तार में आकाश देती हैं।

उस पीढ़ी तक जिसमें ऋतुओं की झलक संस्कारों में शामिल है-ऋतु-बोध अपने विभिन्न आशयों और रूपों में कविता में ढलता रहा है। ऋतुपरक यह संस्कारिक साझेदारी यंत्रीकृत परिवेश में भी जीवित रही है। कविता के माध्यम से यहाँ तक ऋतुओं का पुनरुत्पादन संभव होता रहा है। एक ऐसी भाषा हमें मिलती रही है-जिसमें ऋतु-चेतना विद्यमान रही है। इन संस्कारों की क्षीणता के साथ कविता में ऋतुओं की उपस्थिति भी कम होती जाएगी और कविता अपने मूल संवेदनों से अटक-भटककर अपनी पाठकीय सामर्थ्य में क्षीण-सत्‍व होती जाएगी। कविता में ऋतुओं का पुनरुत्पादन प्रकृति और मनुष्य के अंतर्विमर्श का परिणाम है। अब जबकि असल ऋतुएँ हमारे परिदृश्य से गायब हो रही हैं-तब कविता में उनकी उपस्थिति का अभाव होता जाएगा। अब बड़े नगरों में प्लास्टिक के पेड़ सड़केां पर लगाए जा रहे हैं। ये पेड़ एक ही दृश्य सज्जा में सदैव तैनात रहेंगे। न इन कोयल बोलेगी, न इन पर भौरे डोलेंगे। ऋतु परिवर्तन के बोधकारी पहचान चिह्न से लोग अनभिज्ञ होते जाएँगे। कम-से-कम वे लोग तो अनभिज्ञ हो ही जाएँगे जो विशाल भवनों के संकुल में जन्म लेंगे और वे उन सड़कों पर तेज रफ्तार वाहनों में सवार होकर बड़े होंगे जिन सड़कों पर धरती का वानस्पतिक साहचर्य उन्हें उपलब्ध नहीं हो पाएगा। ऋतु-भाषा से नितांत अपरिचित जन टेक्नोलॉजी के सहारे भले ही अपनी इंद्रिया-संवेदनाओं की सुग्राह्मता और सामर्थ्य बढ़ा लें, लेकिन ये बढ़ी हुई सामर्थ्य उन्हें आस्वादन के धरातल पर प्राकृत नहीं रहने देगी। तब यह भी न हो सकेगा क कविताओं में उतरी ऋतुएँ उन्हें उत्‍तेजित कर सकें।


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