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निबंध

पीपर तरु तर ध्यान सो धरई
श्‍यामसुंदर दुबे


उसकी उम्र अभी कोई पंद्रह-सोलह साल थी, हम लोग उसके हमउम्र थे इसलिए साथ-साथ खेलते थे। वह सुन और बोल नहीं पाता था। वह जिन स्वर संकेतों के साथ अपनी आंगिक भाषा को प्रकट करता था-उसी से हम लोग उसके आंतरिक भावों से संवाद करते थे-उसे सभी लोग बल्ला नाम से पुकारते थे। बल्ला हम सबके साथ बड़ा हो रहा था और उसके साथ ही बड़ी हो रही थी वह जन विश्वासी कथा जिसमें उसके बौरा होने का अभिशाप था। मेरे गाँव की पश्चिम दिशा में दूल्हादेव का पीपल था-इस पीपल के नीचे उसकी जड़ों पर ही मिट्टी का एक छोटा चबुतरा बना था-इस चबुतरे पर कोई देवता धामी की मूर्ति नहीं थी। चबूतरे को ही दूल्हादेव कहा जाता था। गाँव के किसी ब्राह्मण परिवार के किसी दूल्हा ने कभी किसी पुण्य कार्य निमित्त अपना उत्सर्ग कर दिया था-उसी की स्मृति में यहाँ दूल्हादेव को थाप दिया गया था।

पीपल का दरख्त काफी था, उसकी पीड से ही उसके पुरानेपन का बोध हो जाता था। खोहों और पोलों से सटा उसका तना इतना मोटा था कि दस आदमियों की प्रलंब बाहुओं के विस्तृत घेरे में ही उसके परिगत की अनुमाप संभव हो सकती थी। गोह, गिलहरियों, चमगादड़ों का आवास तो वह था-अनेक सर्पों का भी वह निवास स्थल था। हम लोग उसके पास तक जाने में डरते थे। बल्ला के घर में बकरियाँ पाली जाती थीं। कभी वह इसी पीपल की हरी-भरी डंगाल काटकर अपनी बकरियों के चर्वण हेतु पीपर पाती ले गया था। बस उसी दिन से उसकी बोलती बंद हो गई थी-वह बौरा हो गया था-पीपल की डाल काटना देवापराध है। पीपल वासुदवे वृक्ष है। स्वयं श्रीकृष्ण रूप! गीता में श्रीकृष्ण के कहे पर उस समय तक लोग विश्वास करते थे। 'अश्वत्थः सर्व वृक्षाणाम्' सभी वृक्षों में मै पीपल का वृक्ष हूँ। बल्ला ने पीपल की डाली काटी और वह अपनी वाणी खो बैठा-यह जन प्रवाद भी हो सकता है किंतु यह प्रवाद मेरे लिए वर्षों तक पीपल के वृक्षों की रक्षा का निमित्त बना रहा। पीपल को काटने से लोग डरते थे।

यह पूजनीय वृक्ष है। शनिवार को सुबह-शाम पीपल के नीचे प्रकाशित दीयों की जगर-मगर फैल जाती है। साढ़े साती शनि की चपेट में आने वाले जातकों के लिए यह दीप समर्पण, अनिष्ट मुक्ति का आधार है। पीपल साढे़ साती शनि की अनिष्ट की काट है। ज्योतिष के साथ जुड़ा कर्मकांड इस तथ्य की पुष्टि करता है। क्यों न करे पीपल दुरंत प्राण वृक्ष है। विज्ञान कहता है कि पीपल दिन-रात ऑक्सीजन छोड़तो है। प्राण वायु का अक्षय स्त्रोत हे यह वृक्ष! श्वास स्पंदनों को शाश्वत जीवनी-शक्ति के साथ-साथ वह कठोर-से-कठोर तल पर भी जन्म लेकर अपनी जड़ों की जकड़बंदी मे अपने आधार आश्रय को भी पकड़ लेता है। पीपल पुराने खंडहरों, किलों, मठों, मंदिरों से लेकर चट्टानों चरोखरों में कहीं भी अपनी जीवन-लीला रच लेता है। इसके बीजों का वपन एक तरह से प्राकृतिक वितरण न्याय पर आधारित है। चिड़ियों की बीट में साबूत बचे इसके दाने किसी भी रंध्र में धँसकर अपना प्राण रोपित कर लेते हैं। किसी पेड़ की शाखा विभाजक स्थली पर यदि इसका बीज अपना संक्रमण कर ले तो फिर मूल पेड़ की छाती फाड़कर ही वह चैन लेता है। अपनी अस्तित्व रक्षा में पीपल न केवल सजग और सन्नद्ध वृक्ष है बल्कि वह अपने साथ किसी को किटने भी नहीं देता। अपने इन्हीं गुणों के कारण पीपल की गणना महावृक्षों में की जाती है। संत तुलसीदास ने जो चार विशाल वृक्ष गिनाए हैं उनमें पीपल भी समाहित है। ''तिन्ह पर इक-इक विटप विशाल। बट पीपर पाकरी रसाला।' बट, पीपल, पाकड़ और आम ये चार वृक्ष ही विशाल वृक्ष हैं पीपल इन सब में अपनी दुर्निवार चेतना के कारण महत् प्राण वृक्ष है।

गीता में श्रीकृष्ण ने सृष्टि रचना को पीपल का रूपक ही दिया है - 'उर्ध्व मूलमधः शाखा मश्वत्थं प्राहुर व्ययम छंदांसि यस्य प्रर्णानि।' ये सृष्टि उल्टे पीपल पेड़ की तरह है इसकी जड़ें ऊपर है तना है। वेद की ऋचाएँ ही इसके पत्‍ते हैं। सृष्टि का यह वृक्ष रूपक सृष्टि की गतिशीलता का ही संसूचक है। आकाश चैतन्य में भी अपनी संस्थिति को दर्शाने वाले इस वृक्ष को जीव और परमात्मा का आश्रय स्थल भी कहा गया है। उपनिषद् कहता है। द्वा, सुपर्णा सहजा शखाया, पीपल की दो शाखाओं पर अलग-अलग आत्मा और परमात्मा सखा रूप में अवस्थित हैं। इनमें से एक स्वाद ले रहा। एक देख रहा है। यहाँ सृष्टि पीपल रूप ही है। पीपल दार्शनिकों के लिए भी सहारा बना। पीपल अनेक जीव-जंतुओं और पक्षियों का निवास है। तोता, कौआ, चिड़िया झुंड-के-झुंड उड़कर संध्या समय पीपल की सघनता में ही शरण लेते हैं। पीपल सृष्टि-विचार है, पीपल सृष्टि-भाव है, पीपल सृष्टि-छंद है।

झलर-मलर होते इसके चिकने पत्‍तों से सूर्य-किरणों का फिसलना हजारों काँच किरचों के चंदोबे में तब्दील कर देता है। दिन-भर निहारते रहिए इसको हरित और शुभ्र झकर-मकर इसे धूप-छाहीं स्वरूप् देती रहती है। बचपन में चित्रकारी सीखते हुए सबसे पहले पत्‍ता जो ड्राइंग कापी पर मैंने बनाया था वह पीपल का पत्‍ता ही थी, एकदम सुडौल मुकुटाकृति वाला पत्‍ता इस पत्‍ते की नशों की रेखाएँ खींचते हुए मैं मयूर पंख की ऊर्ध्ववर्तुल रंग सीमाओं की स्मृति में डूबकर पीपल पात को अपनी कल्पना में मयुर पंख जैसा ही अनुभव करता रहता था।बहुत दिनों बाद अपने सहकर्मी प्रोफेसर पंचरत्न के सान्निध्य में मुझे पीपल पात पर उकेरी अनेक चित्रबीथियों के दर्शन कराए। प्रोफेसर पंचरत्न अपनी कूचियों से पीपल के सूखे पत्‍ते पर एक-से-एक चित्र रचकर पीपल वृक्ष के रूपक में छिपे सृष्टि-विस्तार को ही जैसे अभिव्यक्ति दे रहे थे। पीपल को चल पत्र नाम भी दिया गया है। पत्रों का चैतन्य जो सदैव उन्हें चलित किए रहता है। सृष्टि की शाश्वत संचरणशीलता का ही गति बिंब देता है। तुलसीदास ने तो पीपल पात की इस अहर्निशि की क्षणबोधी करवट लीला को मन की संकल्पना-विकल्पना से जोड़ दिया है। मन की चंचलता को वे पीपल के पत्‍ते के रूपक में उजागर करते हैं, पीपर पात सरिस मन डोला। लगभग निर्वात में भी पीपल का पत्‍ता प्रकंपित रहता है। मन भी प्रति क्षण हिलता-डूलता रहता है।

इतने चलदल के नीचे ही तुलसी ने ध्यान धारणा को उपयुक्त माना है। 'पीपर तरुतर ध्यान सो धरई।' चंचलता के छत्र आच्छादन के नीचे ध्यान लगाना ही विपरीत के बीच अपनी सामर्थ्य को जगाना है। संपूर्ण शारीरिक हलचलों के मध्य मन की निश्चलता केवल साधना से संभव हो पाती है। पीपल की पत्र हल-चल माया के माहत्म्य का ही दिग्दर्शन है। पीपल विष्ण-स्वरूप है। अपनी प्राण पुष्टि धारणा के अंतर्गत। विष्णु सांसारिक आंदोलन के लिए जिस माया को सक्रिय करते हैं वही पत्रोत्कंठित तरंग भंगियों में अभिव्यक्त होती है। पीपल भारत से एकोऽहं वृक्ष है और बाहर से माया ब्रह्म की अनुवर्तनी सृष्टि संकल्पना का आधार है। पीपल की परिवेशगत पवित्रता के कारण भी उसके नीचे ध्यान लगाने को तर्कसंगत माना जा सकता है।

मुझे ध्यान के इस प्रसंग में वह पीपल याद आ गया जो मेरे विद्या अध्ययन काल में मुझे छाँव प्रदान करता रहता है। मैं जब हटा जैसे कस्बे में अपने अध्ययन के दौरान आया तो मेरा बटुक निवास बना यहाँ का रामगोपाल जी मंदिर। यह मंदिर सुनार नदी की कगार पर है-मंदिर से सुनार की तलहटी तक विस्तृत सीढ़ियाँ हैं। कगार के मध्य चबूतरे और मंदिर भी हैं। एक चबूतरे पर एक विशाल पीपल का पेड़ अपनी बुढ़ौती में भी अपनी धजा बनाए खड़ा था। नदी क जल में उसकी छाया पड़ती तो उसके पत्‍तों की झलमलाहट नदी के विस्तृत पाट पर प्रतिबिंबित होने लगती थी। अक्सर दुपहरियों में इसी पेड़ की छाया में मैं अपना अध्ययन करता था। शुरू-शुरू में यह पेड़ डरावना लगता था। डरावना इसलिए कि एक तो इसकी पीड़ की छाल सफेद, काली धूसर और मटमैली थी, दूसरे इस पर, सिंदूर, गुलाल और हल्दी के लेप के साथ लाल-नीले धागे़ लिपटे रहते थे। इन सबके कारण इस पीपल की पीड़ में कभी किसी की आँखें उभर आती थीं, कभी किसी की उँगलियों और कभी किसी के पैर के पंजों के निशान। यहाँ तक तो ठीक-ठाक था किंतु जब इस नगर में कोई मरता तो उसके दशगात्र तक इस पेड़ की टहनियों पर एक घट टाँग दिया जाता था। ऐसे कई-कई घट इसकी टहनियों पर लटके-लटके रात के अँधेरे में लगते थे कि अनेक बैताल सिर नीचा किए इस पेड़ से झूल रहे हों। बचपन कल्पना के भयद चिह्नों से डरने वाला होता है सो हम भी खूब डरते रहे इस पेड़ से, लेकिन सान्निध्यजन्य प्रभाव से धीरे-धीरे इस पीपल से हमारी निभने लगी-और हम इसके नीचे मजे से पढ़ने लगे। इस पीपल की छाया का इतना प्रभाव तो था कि जो चीज हम कई घंटों में रट पाते थे एक घंटे में ही वह हमें कंठस्थ होने लगी। तुलसी की बात से सहमत होने के लिए इससे बढ़कर और क्या प्रमाण होगा। पिछले वर्ष आई नदी की बाढ़ में यह वृक्ष उखड़कर ऐसा बहा कि आज तक उसका अता-पता नहीं चला।

पीपल का पेड़ सनातन भाव की वासुदेव धारण का प्रतीक चिह्न है। मृतक की स्मृति में लटके घट से रिसती एक-एक बूँद उसकी जड़ को सींचती हुई मृत्यु के भीतर भी जीवन के सातत्य का बोध कराती है। पीपल एक उच्च शीर्ष वृक्ष है यह अपने विस्तृत घेरे को शिखर में बदलते हुए अपने पत्‍ते की आकृति का ही रूप होता है। यह वृक्ष हिमालय को छोड़कर भारत भूमि में सर्वत्र पाया जाता है। इसकी हरीतिमा पतझड़ में भी एक-दो दिन को ही विलोपित होती है। आंतरिक बसंत को अपनी शिरा-शिरा में प्रवाहित करने वाला यह वृक्ष अपने लाला-लाल कौंपली उकसाव में टहनियों के जंजाल को अपनी रक्त ऊष्मा से ढँक लेता है। फिर इसकी लालिमा हरीतिमा में एकदम चिलकती हरीतिमा में बदल जाती है। इस समय इस पेड़ की लरजीत चमकती-सी हरी-भरी छाया अपनी शोभा में अपने नीचे आने को आमंत्रित करने लगती है। श्रीमद् भागवत का प्रारंभ जिस सत्यात्मन के स्मरण से होता है वह सत्यात्मन अपने सगुण साकार रूपों में लीला विलसित होते हुए जब दशम स्कंध में श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित होकर सत्य की रसात्मक अनुभूतियों का साथी बनता है। तब व्यास जी की संतप्त आत्मा को इस आहृाद से उपजी परम शांति का अनुभव होता है। श्रीमद् भागवत जीवन के सत्य की खोज का ग्रंथ है। मृत्यु के करीब पहुँचे परीक्षित को जीवन के सत्य की तलाश है। यह कथा उन्हें सत्य तक पहुँचाने का अनेक मार्गी प्रयास है। कृष्ण लीला के साथ इस सत्य की खोज जैसे अपनी अंतिम और चरम स्थिति में पहुँच जाती है। वासुदेव कृष्ण अपनी लीला का संवरण पीपल वृक्ष के नीचे ही करते हैं। पीपल का वृक्ष सत्य की प्रतिष्ठा का वृक्ष है। यह जीवन के लास्य की ऊर्जा से परिपूर्ण वृक्ष है। श्रीकृष्ण यदि अपने अंतिम क्षण के साथी रूप में इस वृक्ष को चुनेते हैं तो यह अनायास नहीं है। यह कृष्ण का विवेकपूर्ण चयन है। जिस पीपल के पेड़ के नीचे श्रीकृष्ण ने अंतिम स्वास ली थी वह पीपल का पेड़ अभी कुछ वर्षों तक गुजरात में एक युगांतकारी घटना का साक्षी था। जरा व्याध के बाण से विंधे श्रीकृष्ण ने पीपल की पीड़ से अपनी पीठ टिकाई होगी और सत्य के अव्ययी भाव में वे अपने वासुदेव भाव की सम्पुंजित करते हुए इसी वृक्ष की जड़ों के महाकाश में समा गए होंगे। पीपल श्रीकृष्ण का स्वरूप है।उस में परम भागवत श्रीकृष्ण समाहित हुए हैं। अयोध्या में भी सरयू नदी के गुप्तार घाट पर पीपल का एक पेड़ है। कहा जाता है कि श्रीराम अपनी जल-समाधि के पूर्व इसी पीपल वृक्ष के नीचे कुछ देर को बैठे थे।

पीपल गाँव में सत्य का अधिष्ठान रूप वृक्ष रहा है। नीर-क्षीर विवेकी सत्यान्वेषी पंचायतें इसीलिए गाँव में पीपल वृक्ष के नीचे संपन्न होती थीं। पीपल के नीचे झूठ सोचना, झूठ बोलना पातक परिणामी होता है। आज भी लोक-जीवन में ऐसी आम धारणा है। भगवान बुद्ध और पिप्पलीकानन कभी अलग-अलग नहीं हो सकते हैं। अपने आर्ष सत्यों को प्राप्त करने वाले गौतम बुद्ध का भी यह प्रिय वृक्ष रहा है। बुद्ध कालीन चित्र-चर्या में तथा तक्षण तल्प पर पीपल वृक्ष की आकृति तथा उसके पत्‍तों दर्शन हो जाते हैं। लोक में तो तैंतीस कोटि देवताओं का निवास ही पीपल के पत्‍तों में माना गया है। बुंदेखंड में जल केंद्रों के पास पीपल की उपस्थिति अक्सर दर्ज है। कुआँ, बावड़ी, तालाब आदि के साथ पीपल का पेड़ और इसके नीचे चबूतरे पर शंकर की पिंडी के दर्शन आज भी यत्र-तत्र सुलभ हैं। अब तो गाँव जलस्त्रोत सूख गए हैं किंतु पीपल अभी भी अपने विगत वैभव की स्मृति में वहाँ दिखाई दे जाते हैं। स्त्रियाँ जब कुएँ के पनघट पर पानी भरती थीं, नहाती थीं तब वहाँ पीपल के दर्शन और उसकी जड़ों में जल देने की सहूलियत रहा करती थी। एक लोकगीत में अपनी भाभी से हँसी-मजाक करता देवर कहता है कि भाभी भर दुपहरिया में कुआँ पर जल भरने मत जाया करो। वहाँ पीपल के पत्‍तों में देवता निवास करता है। ''भाभी पनियाँ ने जाओ पीपर के पत्‍तों में देवता।'' लोक-वृत्ति-प्रधान देवताओं का निवास ही पीपल के पत्‍तों में हचलची गतिविधियों को असीमित किए रहता है।

मेरे गाँव का दूल्हादेव पीपल अब नेस्तानाबूत हो गया है। खेत की सफाचट मेड़ पर दूल्हादेव का नदारत-सा चबूतरा अब भी कायम है। किंतु पीपल का वहाँ न होना प्रकृति के एक महत्‍तम अंश का गायब हो जाना है। पीपल का वासुदेव भाव अब जंगलों के विनष्टीकरण के कारण समाप्त हुआ है। हाथी जैसे जानवरों को जीमने के लिए पीपल की डालें पहले भी काटी जाती थीं, ऊँट और बकरियों को भी यह छूट सुलभ थी किंतु घर का चुल्हा सुलगाने, ठंडे में अलाव तापने और इमारती प्रयोगों के लिए पीपल की लकड़ी का प्रयोग महापातक माना जाता था। अब पीपल इन प्रयोजनों के उपयोग में लाया जा रहा है। जब हमने सत्य को ही अपने जीवन से निष्कासन दे दिया है तब भला पीपल की कौन सुनता है? पीपल के पेड़ों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है। प्राणप्रद वायु के ये स्त्रोत हमारी धरती की श्वास प्रक्रिया के सशक्त अंग थे। अब इनका टोटा धरती के प्राण रस को सुखाने की भूमिका निर्मित कर रहा है। पीपल अप्रयत्नज अवतरित होने वाला वृक्ष भले ही हो किंतु सीमेंट कंक्रीट के कालोनी कलेवरों में इसके उगने की संभावनाओं पर कुठाराघात हुआ है। पीपल की पूजा, सृष्टि के प्राणों की पूजा है। इसकी रक्षा का प्रबल भाव हमारी पृथ्वी के ऑक्सीजन कोष को ही भरेगा।


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