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निबंध

सइयाँ के जाए न देबों बिदेसवा
कृष्णबिहारी मिश्र


बचपन में सयानों के मुँह सुना था कि कमरूकमच्छा की औरतें जंतर-मंतर की मार से पुरुषों को भेड़ा बना देती हैं। पता नहीं, तब की देहाती औरतों पर इस धारणा का क्या असर होता था, मेरा शिशु-मन मंतर के आतंक से काँप जाता था। आदमी को भेड़ा बना देनेवाली शक्‍ति सचमुच डरावनी शक्‍ति थी। राग-स्वर समझनेवाली उम्र में जब प्रवेश किया तो सोहनी करते नारीसमूह-कंठ से गूँजता प्रथम राग 'सेर भरि सतुआ बरिस दिन खइबों, सइयाँ के जाए न देबों बिदेसवा' मेरे कानों में पड़ा और ग्राम-ममत्व की व्याकुल लहर ने मुझे बाँध लिया। राग-मर्म कुछ-कुछ पकड़ में आया था कि प्रिय का अपने गाँव-घर से दूर जाना कमरूकमच्छा के उस वातावरण में जाना था, जहाँ पुरुष को भेड़ा बनानेवाली मोहिनी मुद्रा का उल्लास थिरकता रहता है, और भीतर-भीतर जादू-मंतर की बंकिम शक्‍ति बराबर सक्रिय रहती है, जो पुरुष के स्वरूप-बोध पर सीधे चोट मारकर उसे अपनी धरती और आत्मीय परिवेश के ममत्व से विच्छिन्न कर देती है। शायद इसी आशंका-आतंक ने इस राग को जन्म दिया था।

धरती के मोह-ममत्व का बंधन इधर कुछ शीथिल हो गया है। आज 'परदेस करने जाने वाले के प्रति किसी के मन में आशंका नहीं होती कि 'परदेसी' माया से मोहविद्ध होकर वह भेड़ा बन जाएगा। गाँव से हमेशा के लिए नाता तोड़कर अन्यत्र जानेवाले को भी कोई टोकता-रोकता नहीं। मेरे गाँव की आबोहवा एकदम बदल गई है।

गाँव के उदास चेहरे, खामोश दरवाजे, सूना खलिहान और मूक गलियों पर नजर पड़ती है, और मेरा देहाती मन उदास हो जाता है। बारी की साँवली मोहिनी शोभा, फगुआ का उच्छल उल्लास और चैता का मादक राग कहाँ चला गया, बहुत ढूँढ़ता हूँ, मेरा गाँव नहीं मिलता। माटी के लिपे-पुते बोलते मकानों और अरहर के डंठल की हँसती अधिकांश दीवारों को ईंट की पक्की गूँगी दीवारों ने मार दिया है और इन नई दीवारों पर परिवार-नियोजन और उपज बढ़ानेवाली खादों के विज्ञापन-बोर्ड लटक रहे हैं। समूह छितरा गया जान पड़ता है और गाँव का सहज उल्लास बिखरकर बुझ गया है। लगता है, नसबंदी के अंधड़-आवेग में पूरे गाँव की जबानबंदी हो गई है। कुछेक कच्चे मकान हैं, जिनकी दीवारें खदरकर बेपहचान हो गई हैं। कैसे पाऊँ अपने गाँव को!

मेरी पीढ़ी के लड़के जाने किसके संकेत से सनकूर मिसिर को देखते ही 'मउँसा-मउँसा' कहकर पुकारने-चिढ़ाने लगते थे। भीतर से 'अगराकर' मउँसा हम लोगों को दाँत पीसते दौड़ाते थे। फगुआ में जोगीरा उच्चारने में सबसे बुलंद आवाज थी उनकी। गाँव की गंध से इतनी ममता कि दूर की बारात तक में न जाते, हितई-नतई और 'परदेस करना' तो दूर रहा। बाँस की मचान पर बैठे खैनी मलते मउँसा की शिथिल त्वचा में धँसी आँखों की ओर ताकता हूँ तो कहीं वह पानी नहीं दिखाई पड़ता जिसमें उनकी स्नेहिल आकृति छलकती रहती थी। मउँसा शायद मर गए हैं। मेरा पूरा गाँव ही जैसे मर गया है। शायद मैं दूसरे गाँव में आ गया हूँ। पराहू, कुर्मी, दहारी कमकर, राम बालक चमार, सुबहान मियाँ और अपने गाँव के भूगोल पर दृष्‍टि पड़ती है। मेरी उजड़ी बारी के दरवाजे पर स्थित कुआँ अपनी निष्ठुर अवमानना से श्रीहीन हो गया है। राह-घाट में जो चेहरे-चरित्र दिखाई पड़ते हैं, वे अपरिचित लगते हैं। उनका बात-व्यवहार समझ में नहीं आता। लगता है, किसी दूसरे गाँव के लोगों ने मेरे गाँव पर कब्जा कर लिया है और गाँव के मूल बाशिंदे कहीं अंते चले गए हैं। जो परिचित चेहरे दिखाई पड़ते हैं, वे अपनी बूढ़ी साँसों को समेटकर जाने की तैयारी में हैं। मैं अपने भूगोल के आँगन में अजनबी बना भटक रहा हूँ - आत्मीय आवाजों की तलाश में। मनन भैया ने इलाहाबाद में घर बना लिया, मालवी काका बेटा-बेटी का विवाह गोरखपुर से करने लगे, मदन भाई ने बुंदेलखंड की आकर्षक रातों के मोह में पड़कर अपने गाँव से मुँह फेर लिया, कामता लखीमपुर में बस गए, मेरे टोले की खुशी फुलकेशिया अपने गाँव के दुर्व्यवहार से रूठकर दूसरे गाँव में चली गई। मेरे बाल-सखा अपनी रोटी की तलाश में गाँव से दूर जाने कहाँ-कहाँ भटक रहे हैं। मगर भटकना कैसे कहूँ। भटक तो मैं रहा हूँ। जो अपने गाँव के आकर्षण से मुक्‍त होकर कहीं रस-बस गए हैं, वे मेरी तरह त्रिशंकु-दशा में नहीं हैं। मनीषी यायावर राहुलजी से उनकी भेंट हुई होती तो 'घुमक्कड़शास्त्र' के प्रणेता ने उनकी पीठ ठोकी होती। राहुलजी का विश्‍वास था कि 'जन्मभूमि का प्रेम और सम्मान पूरी तरह से तभी किया जा सकता है जब आदमी उससे दूर हो। तभी उसका सुंदर चित्र मानस-पटल पर आता है, और हृदय तरह-तरह के मधुर भावों से ओत-प्रोत हो जाता है।' गाँव से वियुक्‍त सबके हृदय में क्या गाँव-प्रेम जीवित रहता है? शायद नहीं। महानगर में रहते मेरा गाँव-प्रेम अभी जीवित है। महापंडित का हृदय धरती-प्रेम से ओत-प्रोत था। दुनिया के अनेक अपरिचित क्षेत्रों की यात्रा कर, असंख्य अज्ञात जर्रे और पन्नों की मर्मकथा का उद्‍घाटन करने के बाद राहुलजी की बोली-बानी और धरती-ममत्व में परिवर्तन नहीं आया था। 'आजमगढ़ की पुरातात्विक यात्रा' करते महापंडित ने अपनी धरती की समृद्ध कोख में छिपी संस्कृति-संपदा का संकेत किया है। कवि श्री नागार्जुन जब सिंध में प्रवासी थे, धूल-धूआँ और हरीतिमा में डूबे अपने 'तरौनी' गाँव के प्रति उनके हृदय में ऐसी ममता और अपने आँगन की शोभा के 'सिंदूर तिलकित भाल' की याद ऐसी उमड़ी कि एक अच्छी कविता का जन्म हुआ। अपने गाँव से दूर रहकर विद्या-साधना करनेवाले आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के साहित्य में उनकी धरती की मुखर शोभा, माटी-महिमा का उल्लास और उससे जुड़ी ज्वलंत समस्याओं को देखता हूँ। मुझे उनके मूल में स्वरूप-संधान के अभीप्सा-आवेग की बलवती प्रेरणा दिखाई पड़ती है। निराला का 'चतुरी-चमार' और 'कुल्ली-भाट' दिखाई पड़ता है और सोचने लगता हूँ, राहुल जी की धारणा बहुत कुछ ठीक है। नागर जिंदगी के विविध रूपों-स्तरों को देखने-भोगनेवाले 'उग्र' के मन से चुनार की आत्मीय आबोहवा कहाँ निकली। मैं अपनी दशा सोच रहा हूँ कि मेरा देहाती मन शहर में नहीं रमता, मगर मेरी पीड़ा है कि मेरा अपना गाँव ही मेरे लिए अपरिचित हो गया है। मेरे लिए किसी आँगन का दरवाजा नहीं खुलता, मुझसे मिलने की सहज ललक कहीं नहीं दिखाई पड़ती। कुछ पढ़वइए हैं, जो मुझे टेढ़ी दृष्टि से देखते हैं। कुछेक अध्यापक भी हैं। प्रबुद्ध एक ही हैं जो मुझे अपने गाँव घर का समझते हैं, खुलकर देश-दुनिया की, गाँव घर की, साहित्य-राजनीति की बात करते हैं और मेरा समय कटता है। कितना पीड़क है सचमुच कि जहाँ के हवा-पानी और धूल-धुआँ के संस्पर्श से मेरा उल्लास छलकता था, आज वहीं अजनबी की तरह समय काटना पड़ रहा है। वह बूढ़ा कुआँ भी समय काट रहा है। इससे मेरा पारिवारिक संबंध है। मेरे वृद्ध प्रपितामह की यह रचना है। पीढ़ियों की प्यास बुझाने वाला यह बूढ़ा जलाशय आत्मीय आवाज की बाट जोहते थक गया है। इसके जल से जीवन ग्रहण कर जो साँवली बारी खड़ी थी इसके सामने, वह चूल्हे की आँच बन गई। नंगी परती अपनी सूखी छाती खोलकर कुएँ के सामने खड़ी अपना दुर्भाग्य निवेदित कर रही है, और वह अपनी बुढ़ौती झेल रहा है। मउँसा की पीढ़ी के बचे-खुचे लोग भी मन मारकर अपरिचित आबोहवा को झेल ही रहे हैं। गाँव के मोह ने जिन्हें सिवान नहीं लाँघ ने दिया, अब बुढ़ौती में उन्हें पंख कहाँ से मिले कि शहर में जा बसें।

गाँव की ममता खींचती है तो मउँसा की पीढ़ी की तरह दीन या अजनबी बनकर रहिए, जरा उतान हुए कि गाँव की नई आबोहवा शहर की राह पकड़ने को मजबूर कर देगी। अपनी शक्‍ति के गुमान पर जो जरा टाँठ होकर जीना चाहता है, गाँव के नए सरगना उसे नरम करने पर तुल जाते हैं। शायद मजबूरी ही लोगों को शहरों की ओर भगा रही है, और गाँव खाली होता जा रहा है। आत्मीय चेहरों से रिक्त मेरा गाँव मुझे अपना गाँव नहीं परदेस लगने लगा है। साहित्य-प्रेमी अध्यापक महोदय मेरे गँवई प्रवास से प्रीत होकर कहते हैं, 'आप आते हैं तो मानसिक खुराक मिलती है। और कितने दिन रह गए हैं आपकी नौकरी के?' उन्हें विश्वास है कि नौकरी पूरी कर मैं अपने गाँव लौट आऊँगा। मैं उनकी मानसिकता और अकेलेपन की पीढ़ा को कुछ-कुछ समझता हूँ और उदास मन से सोचता हूँ, मेरी पीड़ा को इस गाँव में समझने वाला कौन है? मेरे गाँव के जो लोग अन्यत्र जाकर बस गए, उसके पीछे क्या शहरी सुविधा का आकर्षण ही था या कोई दूसरी अभाव-पीड़ा थी? मेरे टोले की मुखर खुशी फुलकेशिया किस आकर्षण से अपने बूढ़े बाप को लेकर दूसरे गाँव में जा बसी? दूसरे गाँव का आकर्षण नहीं, अपने गाँव की अश्लील हवा के हलके स्पर्श के गहरे आघात ने उसे अपना गाँव छोड़ने को मजबूर कर दिया। मुझे लगता है, साधारण सुविधा के प्रलोभन में अपनी जन्मभूमि से कोई अपना प्रगाढ़ रिश्‍ता नहीं तोड़ सकता। गाँव की स्वकीयता का टूट जाना ऐसी अभाव-पीड़ा है जिसे झेल पाना सबके लिए संभव नहीं है। इसलिए परिचित राह-घाट से जहाँ तक जाना संभव है, लोग गाँव छोड़कर जा रहे हैं, और गाँव सूना होता जा रहा है।

मुझे याद है, बाहर से आते ही गाँव का सिवान अपनी आत्मीय अँकवार में भर लेता था! आज ऐसा मुँह लटकाकर खड़ा है जैसे पहचानता ही न हो। ऐसी बेरुखी क्यों दिखा रहे हो सिवान बाबा! किस अपराध के लिए यह ब्रह्मदंड? सोचता हूँ, सिवान बाबा मुझे शायद उस दल का आदमी समझते हैं जो गाँव को जननी मानकर उसे पूजने नहीं, भोग्या मानकर भोग-उपकरण बटोरने शहरों से साल में एकाध बार आते हैं। मेरे मन में सहज सवाल उठता है, जिस धरती से हम नेह-छोह जोहते हैं, उसे अपनी शहरी मुद्रा दिखाने के सिवा देते क्या हैं? ऐसी मुद्रा को देखते ही सिवान बाबा मुँह लटका लेते हैं। गाँव के राह-घाट में अभी कुछ उदारता बच गई है, अन्यथा मेरे जैसे सुविधाभोगी शहराती लोगों को सिवान में प्रवेश ही न मिलता, लाठी लेकर सिवान बाबा शहर की सीमा तक दौड़ाते। उदार हैं, जो केवल मुँह बिदकाते हैं।

मेरे एक साहित्यिक मित्र मेरे गाँव-मोह को टोकते हैं, "पढ़ा आपने रेणु की डायरी? उनकी ऐतिहासिक कलम और उसकी नई सृष्टि चोरी चली गई। बड़ा प्रेम जागा था गाँव का। आप जानते नहीं, वहाँ के पत्ते-पत्ते में साँप चिपटे बैठे हैं, जो डँसने के लिए जीभ लपलपाते रहते हैं।" अपने मित्र से बहस नहीं करता। उनकी बातें सुनता हूँ और सोचता हूँ कि रेणु की कलम चोरी चली गई और देश-दशा से उन्मथित उनके ह्रदय में एक चोट दे गई। सचमुच गाँव-प्रेम की ऐसी सजा ठीक नहीं है। जानता हूँ, प्रेम में व्यावहारिक घाटा तो होता ही है, क्योंकि प्रेम के पीछे व्यवहार-बुद्धि नहीं होती। कौन-सा व्यावहारिक समाधान-सुख दिया था लमही और उनवास ने प्रेमचंद और शिवपूजन सहाय को, मगर बंबई, कलकत्ता, लखनऊ, पटना और काशी में काम करते जरा-सा अवकाश पाते ही वे अपने गाँव भागते थे। घर बनाने की साध उन्होंने पूरी की अपनी जन्मभूमि लमही और उनवास में। पसीने के पैसे कि शहर में खर्च कर वे अपने देहाती चरित्र पर शहराती जिंदगी नहीं ओढ़ना चाहते थे। मेरे मित्र का आक्रोश ठीक ही है कि गाँव-प्रेम ने रेणु की कलम छीन ली। और पीड़क सचाई है कि देश-प्रेम ने उन्हें दहका-दहका कर मार दिया। मगर ग्राम-संसक्ति और देश-प्रेम न होता तो रेणु की कलम बाँझ होती, गाँवों से जुड़ी विराट सक्रिय संवेदना न होती तो इतना बड़ा रचना-संसार खड़ा न हो पाता। शायद तब उस कलम का चोरी जाना कोई घटना न होती। मगर वह कलम थी, जो अपने ग्रामांचल के अंधकार से जुझती थी, रोशनी की रचना करती थी और रोशनी पर अंधाधुंध लाठी चलाने वालों को ललकारती थी। लाठी के प्रतिरोध में रेणु सड़क पर, राजनीतिक मुकामों पर छाती खोलकर खड़े हो जाते थे। नगरों-महानगरों की नफीस जिंदगी जी रहे, बार और रेस्तराँ की मेज पर क्रांतिकारी मुक्का मारने वाले कितने बुद्धिजीवियों ने गँवई रेणु की भाँति रिवॉल्वर का मुकाबला अपनी खादी से किया? कैसे मान लूँ कि उनका गाँव-प्रेम गलत था? गलत है, गाँव का अपनी शोभा-शक्‍ति से उदासीन हो जाना; ग्रामीण मानस का अपनी स्वरूप-चेतना से रिक्‍त हो जाना; भयावह दशा का संकेत है कि गाँव की अपनी चाल छूटती जा रही है कि गाँव अंधकार से घिरकर सांस्कृतिक शून्य में डूबते जा रहे हैं। गाँव की बेटी की शोभा को अश्लील मुद्रा में निहारना गँवई चाल नहीं है।

अपने मकान के पिछवाड़े के नीम गाछ की उदास मुद्रा को देखता हूँ तो श्यामवर्णा फुलकेशिया की याद हो आती है। अपने मुखर उल्लास से नहला-नहलाकर इसे हरी-भरी रखनेवाली फुलकेशिया आन गाँव में जा बसी। एक युवक के ढीठ आचरण ने उसकी भावना पर ऐसी चोट की कि अपना नेह-छोह समेटकर वह दूसरे गाँव की राह पकड़ने को विवश हो गई। गाँव क्या छोड़ा, अपने साथ गाँव की सारी खुशी उजाड़कर लेती गई। नीम की वह डाल, जिस पर वह समवयस्क लड़के-लड़कियों के साथ झूला झूलती रहती थी, अनाथ हो गई और पूरे गाछ पर उदासी का धुआँ छा गया। फुलकेशिया मेरे टोले की हँसी थी। हथेली के ऊपरी हिस्से में रेंड़ी का बीज रखकर हमउम्र लड़के-लड़कियों से रेंड़ी लड़ाती और अपने सहज कौशल से सबकी रेंड़ी चट्‍-चट्‍ तोड़कर जब खिलखिलाकर हँसती तो सावन की मुखर श्याम छटा उसके अंग-अंग से छलकने लगती। अधेड़ औरतों के साथ गोटी खेलती और अपनी किशोर कला से सिद्ध हाथों को लज्जित कर देती। मेरे गाँव की वह निर्मल शोभा मेरे गाँव से रूठ गई। लगता है, गाँव में मँडरा रही अश्‍लील गंध ने मेरे गाँव की सौंदर्य का गला घोंट दिया। गाँव की हरिअरी से जन्मे गीतों पर फिल्मी धुन चढ़ रही है और गँवई कंठ की पहचान लुप्त होती जा रही है। मुझे कभी-कभी शंका होती है कि गाँव की बेटी के शील को छोड़कर गाँव ने अदृश्य छिन्नमस्ता चंडी को आमंत्रित कर लिया है और उसकी विध्वंस-लीला ने गाँव की सौम्य मुद्रा को मार दिया है। फुलकेशिया के शाप की छाया में मेरा गाँव डूब गया जान पड़ता है। अश्लील मुद्रा से आहत होकर फुलकेशिया ने गाँव क्या छोड़ा, अपने साथ गाँव की उल्लास मुखर आत्मीय आवाज उजाड़ कर लेती गई और गाँव गूँगा हो गया। इंद्र के मन में भी एक बार अश्लील भाव जागा था, जिसकी कठोर सजा उन्हें भोगनी पड़ी थी कि पूरे व्यक्‍तित्व की शोभा विरूप हो गई थी। अभिशप्‍त इंद्र की ओर ताकते ही लोगों का चेहरा लाज से लाल हो जाता था। बड़ी बुरी दशा थी इंद्र की। मेरे गाँव की दशा कम बुरी नहीं है। प्रकृति माता अश्लील मुद्रा को बरदाश्त नहीं करतीं, शाप देती हैं। इंद्र को शाप लग गया था और व्यक्‍तित्व विरूप हो गया था। मेरे गाँव के उल्लास को अश्लील मुद्रा-स्पर्श ने बुझा दिया है। ग्रामीण मन से भक्‍ति-भावना बड़ी तेजी से उठती जा रही है। स्वभाव जहाँ म्लान हो गया है, वहीं भक्‍ति का अभाव है। कमच्छा की और अपने गाँव की और नारी-कंठ-समूह से गूँज अपने धरती-राग की बात सोच रहा हूँ। देवी के आँगन में भक्‍ति-रिक्‍त ह्रदय से जो जाएगा, उसके भेड़ा बन जाने में अचरज क्या है? शंकराचार्य ने भक्‍ति को संक्षेप में समझाया है कि अपने स्वरूप का अनुसंधान ही भक्‍ति है, 'स्वस्वरूपानुसंधान भक्‍तिरित्यभिधीयते।' और उन्होंने भगवती से आर्त स्वर में प्रार्थना की है, 'माँ! जहाँ-जहाँ मेरा मन जाए, वहाँ-वहाँ तुम्हारा रूप दिखाई पड़े और जहाँ-जहाँ मेरा सिर नमित हो, वहाँ-वहाँ तुम्हारे चरण कायम रहें -

'यत्रैव यत्रैव मनो मदीयं

तत्रैव तत्रैव स्वरूपम्।

यत्रैव यत्रैव मनो मदीयं

तत्रैव तत्रैव पदद्वयं ते॥'

संपूर्ण सृष्‍टि में देवी दर्शन की कामना-स्वरूप को पाने की स्पृहा ही है और पराशक्‍ति के चरणों के सामने ही झुकने की साध अपने स्वभाव की सही समझ और उसके ही गति-संकेत से चलने की आकांक्षा का संकेत है। शंकराचार्य की कामना-प्रार्थना में स्पष्ट आग्रह है कि स्वरूप-अनुसंधान-स्पृहा से हमारा मानस कभी रिक्‍‍त न हो, स्वभाव-सजगता कभी खंडित न हो इस चेतना को गँवाकर हमारा मन किसी दिशा में धावन कर सकता है और साधारण प्रलोभन के सामने हम लेट सकते हैं। अपनी अस्मिता-चेतना गँवाकर कहीं लेट जाना ही तो भेड़ा बन जाना है। हमारे गाँव का माना स्वरूप-बोध से रिक्‍‍त होता जा रहा है, गँवई स्वभाव टूट-बिखर रहा है। कमरूकमच्छा के आँचल-स्पृहा से बहुत दूर रहते अपने घर-आँगन में ही लोग भेड़ा बनते जा रहे हैं।

आज सोचता हूँ कि कमरूकमच्छा की उच्छल सौंदर्य-राशि को इंद्र की नजर से निहारने वाले पुरुषों को जरूर शाप लग गया होगा और हरी घाटी के अँधेरे अँतरे में वे भटकते रह गए होंगे; जिन्हें अपने गाँव-घर की राह मिली भी होगी, वे अपना पुरुष-भाव गँवाकर लौटे होंगे। 'परदेस' करने वाले नासमझों की जरा सी अनवधानता के चलते सौंदर्य की बाढ़ में बराबर डूबी रहनेवाली कमच्छा की जाग्रत भूमि की औरतें नाहक बदनाम हो गयीं। सौंदर्य-शक्‍त-स्फूर्ति देता है शंकर जैसे भोला मन को। शंकर ने अपनी पात्रता सिद्ध की थी, तभी सौंदर्य की अधिष्ठात्री देवी उनके बउड़म व्यक्‍तित्व पर रीझकर उनकी वामांगना बनी थी। शक्‍ति के पणिग्रहण का सद्यःफल शंकर को मिला कि उन्हें स्वरूप-साक्षात्कार हुआ। आगमवेत्ता बताते हैं कि आद्याशक्‍ति ही शिव के स्वरूप ज्ञान के प्रकाश के लिए निर्मल दर्पण रूप हैं। इस दर्पण के टूटते ही शिव आत्मज्ञान से विच्छिन्न हो गए। पत्नी वियोग में विक्षिप्‍त शंकर प्रिया-शव को कंधे पर लादे जब आँधी की तरह पूरे भूमंडल में दौड़ रहे थे, कमच्छा की चुंबकीय सौंदर्य-शक्‍ति ने शक्‍ति के कोमलांग (योनि-प्रदेश) को अपनी ओर खींच लिया था। और तभी कमच्छा शक्‍ति-पीठ बन गया। शक्‍ति-पीठ को अपनी प्रणति निवेदित करने एक बार आचार्य शंकर भी कमच्छा गए थे। शंकराचार्य के मोहक व्यक्‍तित्व की ओर कमच्छा की कामिनी-कटाक्ष-मुद्रा जरूर लपकी होगी, मगर उनके ऊपर किसी की जादू-मंतर नहीं चल सका। आत्म-प्रतीति से दीप्‍त व्यक्‍तित्व को मोहित करना खेल नहीं है। सो शंकराचार्य की गैरिक चादर बेदाग रह गई। कमच्छा से सटे पूर्वोत्तर पार्श्‍व में तंत्र-साधना की जाग्रत भूमि ज्ञानगंज है, जो साधक-दृष्टि को ही दिखाई पड़ती है और जिसके स्पर्श मात्र से साधक की कुंडलिनी शक्‍ति में जागरण-भाव शुरू हो जाता है। असंख्य साधकों को सिद्ध बनाने वाली भूमि शक्‍ति के जाग्रत प्रभाव से स्फूर्त है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने विपुल संस्कृति-संपदा के उद्धार के लिए इसी प्रदेश से तिब्बत में प्रवेश किया था। शक्‍ति-पीठ-प्रदेश के धूलि-संस्पर्श की महिमा से ही शायद राहुलजी के मार्ग के विकट प्रत्यूह ढह गए थे और अपना सारस्वत मनोरथ पूरा कर वे मारुति की जयी-मुद्रा में अपने मुकाम लौटे थे। उस दिन भी वह अंचल औरतों से खाली नहीं था, जब प्रिया-वियोग में पागल होकर शंकर वहाँ पहुँचे थे। मंत्र-शक्‍ति भी उस काल में कमजोर नहीं रही होगी, मगर शंकर पर उसका असर नहीं दिखाई पड़ा। शंकर को कमरूकमच्छा की औरतें भेड़ा नहीं बना सकीं, शायद भोला को भेड़ा नहीं बनाया जा सकता। देवराज की कुटिलता ही अभिशाप को निकट बुलाती है। कुरूप मन ही व्यक्‍तित्व को विरूप बनाता है। देवराज गद्दीनशीन थे। उनके मन में दुश्‍चक्र और विलास-वेग का उठना स्वाभाविक था। आज मेरे गाँव में जो शंकर की तरह दिगंबर है, वह भी देवराज इंद्र की मानसिकता-मुद्रा में जीता है। जिन्हें अपनी सौंदर्य-अस्मिता की चिंता है, वे फुलकेशिया की राह चुन रहे हैं, गाँव से नाता तोड़कर धूल-धुआँ और विषैले प्रदूषण से आक्रांत शहरों के अनात्मीय परिवेश को आत्मीय बनाने को विवश-विकल दिखाई पड़ रहे हैं। और मेरे मन में आज फिर आत्मीय धरती-राग, जो अपने गाँव के नारी-कंठ से सुना था - 'सेर भरि सतुआ बरिस दिन खइबों, सइयाँ के जाए न देबों बिदेसवा' - गूँज रहा है। सोचता हूँ, सइयाँ को परदेश न जाने देने का आकुल आग्रह क्या स्वभाव से अवियुक्‍त होने का आग्रह है? सइयाँ का परदेस जाना शायद स्वरूप-बोध से विच्छिन्न होना है। उदास मन से सोचता हूँ, मेरे गाँव में इस जाति का धरती-राग अब क्यों नहीं सुनाई पड़ता? गाँव की स्वकीय बानी-बोली और स्वभाव कहाँ चला गया? स्पष्‍ट दिखाई पड़ रहा है कि स्वरूप-प्रतीति जगाने में जिनकी कृती भूमिका हो सकती है, वे गाँव छोड़ रहे हैं और गाँव संस्कारहीन होते जा रहे हैं। अपनी शोभा-शक्‍ति के प्रति गाँव इतना उदासीन हो गया है कि आशंका होती है, कहीं गँवई चाल-चरित्र हमेशा के लिए अदृश्‍य न हो जाए। गाँवों से अपना संबंध तोड़कर शहर की ओर जाने वाले लोगों को कोई नहीं टोकता कि अपनी जन्मभूमि से, गाँव-घर से नाता तोड़कर परदेश की राह पकड़ोगे तो भेड़ा बन जाओगे। ग्रामीण नारी-कंठ से गूँजने वाला आत्मीय राग - 'सइयाँ के जाए न देबों बिदेसवा' - अब सुनाई नहीं पड़ता।


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