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निबंध

आदि और अंत
निर्मल वर्मा


मैं भारत भवन का आभारी हूँ, जिसने मुझे यहाँ 'अंत और आरंभ' विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित किया। बाद में जब मुझे बताया गया कि मेरा भाषण अज्ञेय स्मृति व्याख्यानमाला के अंतर्गत आयोजित किया गया है तो मेरे लिए यह एक प्रीतिकर आश्चर्य था। आधुनिक हिंदी लेखकों में जैनेंद्र के बाद अज्ञेय उन कम लेखकों में थे - शायद अकेले - जिन्होंने समय की भूल भुलैया में प्रवेश करने का जोखिम उठाया था। साहित्य अकादमी की प्रथम संवत्सर व्याख्यानमाला का उद्‍घाटन ही उन्होंने अपने भाषण 'स्मृति के परिदृश्य' के शीर्षक से दिया था। यहाँ आने से पहले जब मैं उसे पुन: पढ़ रहा था तो लगा, कितनी सटीक, सीधी-सादी तार्किक प्रांजलता के साथ उन्होंने भारत और पश्चिम की दो विभिन्न लगभग विपरीत समय की अवधारणाओं का विश्लेषण किया था। 'अंत' और 'आरंभ' केवल समय के दो बिंदु ही नहीं हैं, बल्कि उनके बारे में हमारी क्या धारणा होती है, इससे हमारा समूचा जातीय चरित्र प्रभावित होता है।

आज जब हम बीसवीं शताब्दी के कगार पर खड़े हैं तो पीछे मुड़कर गुजरी हुई राह को देखने का सम्मोहन अधिक प्रबल हो उठता है - किंतु यदि हम अपने लेखे-जोखे के नोट्‍स किसी अन्य सह-दर्शक से लगाएँ, तो कुछ आश्चर्य होगा कि पिछले सौ वर्षों में जो कुछ घटा, उसे हम-दुनिया के लोग-एक ही दृष्टि से नहीं देखते। हम वही देखते हैं, जिसने हमें सबसे अधिक प्रभावित किया है। यहाँ तक कि बासवीं शताब्दी के बारे में भी दो मत एक नहीं हैं। यह सही है कि कलेंडर के आधार पर हम उसका 'आरंभ-बिंदु' निर्धारित कर सकते हैं, किंतु बीसवीं शताब्दी केवल समय की श्रंखला नहीं है, उस श्रंखला के भीतर किन ऐतिहासिक दबावों के कारण मानव-चरित्र में परिवर्तन आया है, उसका मानचित्र भी प्रस्तुत करती है। किंतु मानचित्र का यह खाका क्या उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही आरंभ नहीं हो गया था? यदि मैं आपके सामने बिना किसी सोचे-समझे कुछ नाम रखूँ, जिन्होंने बीसवीं शती की जीवन-दृष्टि और भाव-बोध को मूलगामी ढ़ंग से झिंझोड़ दिया था, तो आपको आश्चर्य होगा, अपने-अपने क्षेत्रों में उन्होंने क्रांतिकारी अवदान (फ्रायड को छोड़कर) उन्नीसवीं शताब्दी में ही संपन्न कर दिया था - मार्क्स ने समाजशास्त्र में, नीत्शे ने दर्शन में, बाद्‍लेयर और मलार्मे ने कविता में, सीजाँ ने चित्रकला में। बीसवीं शती यदि यूरोपिय मनुष्य के आधुनिक भाव-बोध के चमत्कारिक आविष्कारों या अपने 'एस्थेटिक एडवेंचर' द्वारा मानी जाती है, तो यह रचनात्मक उत्थान कलेंडर की तारीख की प्रतीक्षा किए बिना उन्नीसवीं शती के अंतिम दशकों में ही आने लगा था।

क्या यह इतिहास का एक शाश्वत रहस्य है कि हम परिवर्तन का परिणाम तभी देख पाते हैं जब उसकी प्रतिक्रिया समाप्त हो जाती है? हम आरंभ पर उँगली रख पाएँ, इसके पहले ही वह व्यतीत चुका होता है, कुछ ऐसे रोगों की तरह जो देह पर तभी प्रकट होते हैं जब भीतर देखने के लिए कुछ भी बचा नहीं रहता? संभव है, ऐसा होता हो शायद ऐसा होता ही है, लेकिन मुझे लगता है, इतिहास हो या मनुष्य की देह, होने वाला परिवर्तन नंगी आँखों से न भी दिखाई दे, तो भी उसकी हल्की-सी भनक मिल ही जाती है। लगता है, हवा में कुछ बदल गया है। हम सहसा एक दिन दुनिया को दूसरी निगाहों से देखने लगते हैं... खुद हमारा अपने से नाता बदल जाता है। वह क्या है, हम नहीं जानते, जो जानते हैं, वह बता नहीं सकते। मेरी स्मृति में वे प्रेम-कविताएँ सबसे अमिट हैं, जब कवि ठीक उस क्षण को शब्द में बदलता है, जब प्रेम का अनुभव होता है, लेकिन वह अभी शब्द में प्रकट नहीं हुआ वह जो हमारे अनुभव में 'आरंभ' बनता है, उसका आरंभ कहाँ होता है, क्या इसके रहस्य को कोई भेद सकता है? रूसी गुड़िया की तरह एक आरंभ के नीचे पता नहीं कितने और आरंभ छिपे रहते हैं।

रहस्य अपनी जगह है, लेकिन इसको भेदने के प्रयास भी कम नहीं हुए हैं। इतिहासकार जब काल की अनंतता का अलग-अलग 'पीरियडों' में वर्गीकरण करते हैं तो बात समझ में आती है वह इतिहासकार कैसा जो विभाजन की कला में पारंगत न हो... किंतु जब साहित्यकार उसमें दखल देने लगें तो उनकी बात सुननी पड़ती है, क्योंकि साधारणतया वे ऐसा नहीं करते। मुझे यहाँ वर्जीनिया वुल्फ का (आप कहेंगे, भला और कौन!) वह असाधारण निबंध याद आता है, जब उन्होंने उपन्यासों में होनेवाले नए परिवर्तनों को लक्षित करते हुए कहा था कि 1910 के आसपास मनुष्य के चरित्र, उसके स्वभाव में ऐसा बदलाव आया है, जो विक्टोरियन युग के उपन्यासों में दिखाई नहीं देता। लेकिन 1910 ही में वह क्यों लक्षित किया गया? अपने एक संस्मरण में वह कहती हैं (जो उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ) कि उन्हें अब भी वह दिन याद है जब उनके युवा मित्र लिटन स्ट्रेची चाय पर उनके घर आए थे। सोफा पर वर्जीनिया वुल्फ की बहन चित्रकार वैनेसा बेल बैठी थीं| उनकी स्कर्ट पर कोई धब्बा देखकर लिटन स्ट्रेची ने अपनी छड़ी की नोक से इशारा करते हुए कहा - Is it semen? "उस शाम के बाद मुझे लगा", वर्जीनिया वुल्फ लिखती हैं, "हमारे भीतर जमी हुई विक्टोरियन वर्जनाएँ अपने आप झर गई।" जिस शब्द को सभ्य समाज में लोग बोलते हुए झिझकते हैं उसको कोई खुलेआम कह दे, और वह भी दो बहनों के सामने, जिसमें अभी एक अविवाहित थी - यह क्या छोटी क्रांति थी?

किंतु आरंभ और अंत के बिंदु एक जगह टिके नहीं रहते, अपनी जगह बदलते रहते हैं। जो घटना किसी युग का अंत जान पड़ती है, वही कालांतर में किसी दूसरे दौर का आरंभ बन जाती है। मुझे याद है, मेरे छात्रावस्था के दिनों में यह माना जाता था कि उन्नीसवीं शती के संसार का असली अंत प्रथम महायुद्ध की विभीषिका में हुआ। स्टीफेन ज्वायग ने अपनी मर्मस्पर्शी आत्मकथा The World of Yesterday में इसका उल्लेख करते हुए कहा है, कि "उस युद्ध के बाद वह सभ्यता समाप्त हो गई, जिसमें हर चीज की अपनी जगह थी, कुछ मानव-मूल्य चिर स्थायी माने जाते थे, हर मनुष्य की अपनी एक विशिष्ट निर्धारित छवि थी, जिस पर उसके वर्ग के संस्कार छपे रहते थे। रातों-रात सब कुछ बदल गया... लगा, हर चीज कितनी क्षणभंगुर है...जिसे हम यथार्थ समझ बैठे थे, वह कितना बड़ा इल्यूजन था..." स्टीफेन ज्वायग ने जिस संक्राति की कुहेलिका का इतना अंतरभेदी विश्लेषण किया था, उसकी गहरी छाया उन्हीं के शहर वियना में रहनेवाले विटगेंश्टाइन, फ्रायड, राबर्ट म्यूसिल जैसे समकालीन लेखकों के चिंतन पर देखी जा सकती है।

क्या यह सचमुच सभ्यता का अंत था? जब कॉलेज के दिनों में मैं मार्क्सवाद के प्रति आकर्षित हुआ तो हमसे कहा गया कि वह सभ्यता नहीं, एक विशिष्ट समाज की रोगग्रस्त अवस्था थी, जिसका मरण अनिवार्य था.. हमें उस 'नए मनुष्य' को गढ़ना है, जो क्रांति के बाद जन्मा है। और तब हमें पता चला कि बासवीं शती के बाकी सब आरंभ झूठ थे, उसका सही और सच्चा आरंभ तो 1900 में नहीं, 1910 में नहीं 1917 में सोवियत क्रांति से हुआ थी। बीच के वर्षों में इस 'नए मनुष्य' पर क्या बीती, मैं उस कहानी में नहीं जाऊँगा। वह शायद हमारी बीती हुई शताब्दी की सबसे देखद त्रासदी है। लेकिन आज में थोड़ा पीछे मुड़कर देखता हूँ तो आश्चर्य और दुख जरूर होता है कि बीसवीं शती के आरंभ की घोषणा जिस 'नए मनुष्य' के जन्मदिन पर की गई थी, वह उस शती का अंत देखने के लिए बचा नहीं रह सका।

लेकिन क्या वह मनुष्य भी बचा रह सका, जो दूसरे महायुद्ध की खंदकों से निकलकर नई शती के उजाले में आया था? हमें थोड़ा ठहरकर इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए, क्योंकि इसका उत्तर पाने के लिए हमें कोई दूसरा आरंभ बिंदु ढूँढ़ना होगा, जहाँ से यूरोपीय मनुष्य की आधुनिक पहचान बनती है, जिसमें वे सब आरंभ बिंदु शामिल हैं, जिनकी चर्चा हमने ऊपर की है।

आपके सामने शायद यह स्पष्टीकरण करना जरूरी नहीं है, कि यहाँ मैं फिलहाल यूरोपीय मनुष्य की बात कर रहा हूँ - मनुष्य मात्र की नहीं। उन परंपराओं में जन्में मनुष्य की नहीं जो एक भिन्न किस्म के कालबोध में अपनी दुनिया और अपने 'आत्म' की छवि बनाता है। और यदि ज्यादा सफाई से कहूँ तो यूरोपीय मनुष्य की भी उतनी नहीं, जितनी मनुष्य के उस विशिष्ट व्यक्तित्व की, जिसके 'पर्सोना' का अवतार मध्यकाल की समाप्ति और जिसे इतिहासकार यूरोप का नवजागरण युग कहते हैं, उसके आरंभ होने पर प्रकट हुआ था। मैं जान-बूझकर 'प्रकट होने' शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ, ताकि आप यह न भूलें कि हर संस्कृति के कुछ स्थायी बिंब अवश्य होते हैं, किंतु हर इतिहास परिवर्तन के नीचे इन बिंबो का सम्मिश्रण (configuration) बदलता रहता है, जिससे उसका एक नया रूप बनता है, जो अपने में स्थायी नहीं है-इसलिए मैंने उसके लिए 'पर्सोना' का शब्द उपयुक्त किया है। एक तरह का मुखौटा जो चेहरे की स्थायी पहचान नहीं हैं। यहाँ यह शब्द एक अतिरिक्त महत्व प्राप्त कर लेता है क्योंकि पिछले चार सौ वर्षों में जिस यूरोप ने अपने बाहर फैली जिन गैर-यूरोपीयन, गैर-ईसाई सांस्कृतिक परंपराओं - जिनमें भारतीय परंपरा सबसे प्रमुख रही है - को प्रभावित किया, तोड़-फोड़ा, बदला, या कही-कहीं, जैसे लातिन अमरीका में, उनको पूर्णतया नष्ट कर दिया - उसमें यूरोपीय मनुष्य के इस नए रूप या पर्सोना ने सबसे निर्णायक भूमिका अदा की थी। किंतु यह स्वीकार करते हुए भी मैं आपको थोड़ा सचेत कर देना चाहता हूँ कि आप यूरोप के इस आक्रामक तेवर को देखकर उसके आत्म-सशंकित, उद्‍भ्रांत, रोमांटिक, वल्नेबल पक्ष को न भूल जाएँ, जो हमें उसके कला, संगीत और साहित्य में इतना उद्वेलित करता है। शेक्सपीयर के रक्त-रंजित चेहरों के पीछे कितने आँसू छिपे रहते हैं, कौन नहीं जनता। हम चाहें तो कह सकते हैं, कि वह यूरोप का 'दूसरा चेहरा' था या उसी चेहरे का दूसरा पक्ष, द अदर साईड ऑफ यूरोप। इस बात का ध्यान रखना इसलिए भी जरूरी है कि आज हम भारतीय जब अपने 'आधुनिक युग' के आरंभ की बात करते हैं, वह चाहे जहाँ से भी शुरू हुआ हो, वहाँ हमें यूरोप के इन दोनों पक्षों का सामना करना पड़ेगा...गलत नहीं होगा यदि मैं कहूँ, कि अपने को जाँचने के लिए जैसे हम आज हैं, यूरोप के इस अंतर्विरोधी, संश्लिष्ट मानस को जानना जरूरी होगा।

हम स्टीफेन ज्वायग की आत्म-कथा की बात कर रहे थे... उन्होंने यूरोपीय मनुष्य की असुरक्षित, अस्थायी अवस्था की ओर संकेत करते हुए कहा था कि पहली बार उन्हें एक revelation सा हुआ, कि जिन चीजों मूल्यों और भावनाओं को हम 'श्वाश्वत' मानकर चलते हैं, वे कितनी नाजुक, कमजोर नीवों पर आधारित होती हैं... जरा-सा झटका खाते ही वे भरभारकर टूट जाती हैं।

अस्थायीपन सिर्फ वह अवस्था नहीं है जब पैरों तले की जमीन खिसकती दिखाई देती है, किंतु वह डाँवाडोल स्थिति भी है जब मनुष्य को अपने भीतर का संसार - जिसे हम उसका 'सेल्फ' कहें तो बेहतर होगा-वह भी अपनी चूल से डिगता जान पड़ता है। मनुष्य को अपने भीतर सहसा दो अंतर्विरोधी-सी दिखने वाली 'सेंसेशंस' का अनुभव होता है, एक तरफ वह अपने को बहुत हल्का, बोझ हीन, स्वतंत्र, समस्त पुरानी घीसी-पिटी परिपाटियों से मुक्त महसूस करता है - एक वर्जना मुक्त मनुष्य - जिनकी ओर वर्जीनिया वुल्फ ने संकेत किया था, दूसरी ओर उसे लगता था कि वह जो स्वतंत्र और मुक्त है - उसका मैं - आप उसे उसका अहम या ईगों, कुछ कह सकते हैं - वह अपने में ही हर क्षण बदलता, फिसलता, एक स्थायी अस्थिरता में जीता 'जीव' है, जिसकी अपनी परंपरागत पहचान तो लुप्त हो चुकी है, किंतु नई अस्मिता बन नहीं पाई है। येट्‍स ने जिसे बाहरी दुनिया का संकट कहा था, मनुष्य अब उसे अपने भीतर यथार्थ में जीने लगता है-'between two worlds, one dead the other powerless to be born.' एक समय में जो सामाजिक और धार्मिक संस्थाएँ उसे एक 'स्वत्व' का मालिक बनाती थीं, वे इतना धूमिल, भ्रामक, प्रपंचपूर्ण बन गई थीं कि वे उसका 'निजत्व' छिपाती अधिक थी, दिखाती कम थीं और जब हम उन्हें भेदकर उसके निज के अंदरूनी यथार्थ में प्रवेश कर भी पाते थे, तो पाते थे कि यथार्थ तो है, लेकिन उसका कोई केंद्र-बिंदु नहीं, कोई ऐसा वस्तुपरक निकष नहीं है, जिसकी कसौटी पर उसे नापा जा सके... क्या सच है, क्या झूठ, क्या टिकनेवाला है, क्या वह है, जो मिटने वाला है... एक ऐसा यथार्थ जिसे हम सही अर्थ में यथार्थ नहीं कह सकते, क्योंकि उसे अ-यथार्थ से अलग करना असंभव होता जाता है।

तो क्या हम मान लें, कि मनुष्य की अपनी कोई अखंडित, इंटीग्रल इयत्ता नहीं... कोई संपूर्ण इमेज नहीं, जिसे एक फ्रेम में जड़ा, पकड़ा जा सके.... वह सिर्फ बहते, मिटते, बदलते प्रभावों, इम्प्रेशंस, अनुभूतियों का पुंज-मात्र है? मनुष्य के इस विखंडित, विश्रंखलित, केंद्रहीन 'व्यक्तित्व' (यदि इसे व्यक्तित्व कहा जा सके) को जानने की एक ऐसी क्रांतिकारी शुरुआत थी, जिसने यूरोपियन उपन्यास के समूचे कथ्यात्मक ढाँचे को ही हिला दिया था। यदि यह बात सच है कि उपन्यास ने आधुनिक मनुष्य के भीतर होने वाले परिवर्तनों को वैसे ही पूर्वानुमानित (anticipate) किया है, जैसे कुछ जानवर आँधी आने से पहले उसके आसारों को हवा में सूँघ लेते हैं, तो प्रूस्त, जायस, वर्जीनिया वुल्फ के उपन्यासों में यूरोपीय मनुष्य के खंडित आत्मबिंबो की पूरी एक पोर्टरेट गैलरी दिखाई देती है। रेनेसाँ से उन्नीसवीं शताब्दी तक मनुष्य ने जो अपने अपने आत्मकेंद्रित सेल्फ की प्रतिमा बनाई थी, वह दॉस्तोएवस्की से गुजरते हुए हमारे समय तक आते-आते कितनी आहत और लुंज-पुंज हो गई थी, यह उपन्यास उसका जीता-जागता दस्तावेज हैं। क्या मनुष्य के अंदरूनी यूनीवर्स के बारे में प्रूस्त की खोज आइंसटाईन की अंतरिक्ष खोज से कम महत्त्वपूर्ण थी... यदि इन उपन्यासों का कोई एक समान शीर्षक देना चाहे तो शायद वह होगा-आत्म से निष्कासित मनुष्य की गाथा....

मनुष्य की अपनी सेल्फ से विदाई, इसे आरंभ कहें या अंत? यहाँ अंत अर्थ अंग्रेजी शब्द एंड के श्लिष्ट अर्थ 'लक्ष्य' या 'उद्‍देश्य' से भी किया जा सकता है। जब मनुष्य की 'बुनियादी' छवि ('बुनियादी' केवल व्यावहारिक अर्थ में, क्योंकि कौन-सी छवि मनुष्य की प्राथमिक है - आपकी शब्दावली में कहें, कौन-सी ओरीजिनल है और कौन-सी प्रिंट - कहना असंभव है। शायद आत्यांतिक शब्द बेहतर है) - जब उसे अपनी 'आत्यांतिक छवि' पर ही संदेह होने लगता है, तो उसके 'अंत' की अवधारणा में भी अंतर आता है। जब मनुष्य एक जादूगर की तरह अपने 'आरंभ' (origin) के बारे में एक 'मायालोक' रचता है, वह चाहे कितना संदिग्ध और छलनामय क्यों न हो, वह स्वयं अपने 'अंत' का भी एक सुरक्षा-स्थल खोज लेता है, वह चाहे कितना ही काल्पनिक क्यों न हो (ईसाई-यहूदी परंपरा में इसकी एक सुसंगत परिपाटी रही है, जिसकी चर्चा मैं बाद में करूँगा) किंतु जब किन्हीं ऐतिहासिक दबावों तले यह भ्रमलोक टूटता है तो मनुष्य अपने को दोबारा वहीं पाता है, अपनी अकेली अनाथावस्था की ठंड में ठिठुरता हुआ, तार को वस्की की फिल्म स्टाकर के पात्रों की तरह, जो एक लम्बी सुरंग से बाहर आकर जब चैन की साँस लेते हैं, तो हठात पाते हैं, कि वे उसी सुरंग के मुँह पर खड़े हैं, जहाँ से भीतर गए थे। ऐसी अवस्था में आत्म-विश्वास का आखिरी संबल भी छूट जाता है, जो 'ईश्वर' से विलगित होकर उसके पास बचा रह गया था-उसका अपना 'मैं', उसका सेल्फ, उसका आत्म। इससे दारुण विडंबना क्या होगी कि मनुष्य यह तो जानता है कि वह किन परंपराओं, परिपाटियों से मुक्त हुआ है, किंतु स्वयं उस सेल्फ के बारे में आश्वस्ति खो बैठा है, जिसकी मुक्ति के लिए वह स्वतंत्र होना चाहता था। अब उसका 'अंत' भी धूमिल और संशयग्रस्त बन जाता है, वह उसकी बनाई हुई 'नियति' को उजागर नहीं करता - एक लक्ष्य हीन मनुष्य - जो अपनी विवेक-मेधा को छोड़कर दूसरों द्वारा निर्मित लक्ष्यों पर गुजारा करने को विवश होता है। जब मनुष्य के अपने भीतर का देवता मर जाता है, तब वह 'झूठे' देवताओं की शरण में जाता है।

यह बात हमें दूसरी जगह ले जाती है जहाँ हमें यूरोपीय मनुष्य के सबसे विकट विरोधाभास का सामना करना पड़ता है। यूरोपीय संस्कृति, जो अपने वैज्ञानिक चमत्कारों और ज्ञान-प्रसार के आसीम साधनों द्वारा जानी जाती है, वह अपने बुद्धि-वैभव के ही कारण। तर्क, विवेक, ज्ञान, क्रिटिकल रीजन, रैशनेलिटी की जो मेधा यूरोप में प्रस्फुटित हुई थी, जिसने अपने ईर्द-गिर्द पूरी एक पश्चिमी सभ्यता का निर्माण किया था, उसी यूरोप के हृतस्थल में ऐसी मानव-विरोधी विचारधाराओं का जन्म हुआ, जो उसकी समस्त बौद्धिक परंपराओं का उपहास और तिरस्कार करती थीं ऐसा कैसे संभव हो सका?

क्या यह सिर्फ एक भूल थी, रजनीतिक अदूरदर्शिता का फल, आर्थिककारणों का परिणाम, अथवा बीमारी कहीं अधिक गहरी और संघातक थी, जो स्वयं यूरोपीय संस्कृति के भीतर से उत्पन्न हुई थी, स्वयं 'मनुष्य' की अवधारणा से जुड़ी हुई थी? क्या यह सिर्फ संयोग था कि यूरोप जो पश्चिमी सभ्यता का मुख्य प्रेरणा-स्रोत और बौद्धिक नवोत्थान (enlightenment) का ज्वलंत प्रतीक था, जिसमें एक तरह से एक पूरे बौद्धिक अभियान (age of reason) की शुरूआत हुई थी, वहीं यूरोप दो महायुद्धों के नर-संहार, जेनोसाईड, गुलग, यातना-गृहों के लिए भी उत्तरदायी ठहराया जाए? सभ्यता के गौरव-शिखर पर अभूतपूर्व बर्बरता का विस्फोटन, जिसका उदाहरण इतिहास में मिलना असंभव है, इसलिए नहीं कि विनाश और हिंसात्मकता कभी पहले नहीं हुई थी, बल्कि इसलिए कि स्वयं बुद्धि, rationality, ज्ञान-विज्ञान की उपलब्धियों के बौद्धिक ढाँचे के बीच बर्बरता का यह अंधकार कुछ वैसा ही अप्रत्याशित जान पड़ता है, जैसे चमकते सूर्य के बीच काला सुराख दिखाई दे जाता है। कहीं यह सुराख यूरोपीय 'रेशनेलिटी' के बीच ही तो नहीं कीड़े की तरह छिपा था? बुद्धि और बर्बरता के बीच पर्दा कितना झीना होता है - वह कभी-भी फट सकता है - जो नीचे दबा है, वह कभी भी ऊपर आकर समूची सभ्यता के आवरण को हटाकर मनुष्य को एक ऐसे यथार्थ से साक्षात् करा सकता है, जिसके अस्तित्व से वह बेखबर तो नहीं था, किंतु जिससे वह आँख मिलाने का साहस नहीं जुटा सकता था।

कैसा था वह यथार्थ? मैं समझता हूँ, वह मनुष्य के संपूर्णत्व का बोध था, जिसे यूरोपीय मानस ने 'आधुनिक' होने की लम्बी प्रक्रिया में अपनी विस्मृति में फेंक डाला था क्योंकि प्रगति, विकास और वैभव के रास्ते पर वह बोध ही उसका सबसे बड़ा शत्रु, सबसे बड़ा व्यवधान, सबसे घातक कंटक था। आधुनिकता की बलिवेदी पर अपने 'संपूर्णत्व' को चढ़ाकर ही वह एक स्वतंत्र व्यक्ति बनने का वरदान पा सकता था। यह एक तरह से चेतना का 'चढ़ावा' बुद्धि की वेदी पर था। किंतु देवी से जो वरदान मिला था, उसमें प्रसाद के कण भी थे - जो उस पर चढ़ाए गए थे - जैसा अक्सर होता है ये मनुष्य की चेतना में तब भी धड़क्कते हैं, जब ऊपर बुद्धि का वैभव अपराजेय दिखाई देता है। अपने खोए हुए संपूर्णत्व की स्मृति के कण्। मनुष्य अब एक ऐसी विभाजित स्थिति में जीने के लिए अभिशप्त है, जहाँ वह न एक का हो पाता है, न दूसरे का, रात के अँधेरे में वह अपना 'प्राकृतिक' जीवन जीता है, जो कभी उसका था, दिन के उजाले में वह अपना सभ्य जीवन बिताता है, जिसमें वह खुद अपने को अजनबी पाता है। आधुनिक यूरोपीय मनुष्य की भविष्य-रेखा पहली बार एक ऐसे ही आत्मसशंकित, आत्मविभाजित व्यक्ति की हथेली पर उजागर हुई थी। आज अक्सर इतिहास के अंतकी, आइडियोलॉजी के अंत की, यहाँ तक कि कला के अंत की भविष्यवाणियाँ की जाती हैं। मुझे नहीं मालूम, उनमें कितनी सच्चाई है, किंतु मुझे लगता है, ये सब अंत अगर सच है, तो 'व्यक्ति' के अवसान से जुड़े हैं, जिसने इतिहास के आतंक और आइडियोलॉजी के ज्वर को अपनी नंगी त्वचा पर झेला था, उसके अद्वीतीय असाधारण अनुभव को अपनी अवसादपूर्ण कला में अभिव्यक्त किया था। यूरोपीय साहित्य एक अर्थ में इसी 'संपूर्णबोध' के विस्मृत हो जाने का विलाप गीत माना जा सकता है। किंतु जो विस्मृत है, वह मृत नहीं हो जाता; एक बार जो अनुभव हो चुका है, वह हमेशा बना रहता है, जीवन में नहीं तो स्मृति में, नींद में, स्वप्न में, अवचेतन में। यदि इतिहास उसे अपने छद्‍अम उजाले से निष्कासित कर देता है तो वह आत्मा के अंधेरे में - जो असली है - शरण पा लेता है। काफ्का ने कहा था, हमारे सबसे मधुर गीत हमारे भीतर नीचले, दबे, गुह्मातम नरक से बाहर आते हैं - एक ऐसी विस्थापित आत्मा की पुकार, जो हमें बीथोवन के अंतिम क्वाट्रेट्‍स में रिल्के और होल्डरलिन की कविताओं मे, टामस मान के अभिशप्त कलाकार-नायकों की गाथाओं में सुनाई देती है। हर युग अपने पद चिन्ह दूसरे युग की आत्मा में लहूलुहान खरोंचों की तरह छोड़ जाता है।

यह कौन से युग की विदाई का गीत था? किसका अंत? मुझे लगता है, युग से अधिक वह एक विशिष्ट भावबोध - सेंसीबिलिटी - का अवसान था, जिसे इतिहाकार प्राय: मध्य युग कहकर एक खास काल-खंड में डाल देते हैं। उसे हम वह भाव बोध भी कह सकते हैं, जो 'आधुनिकता' के आक्रामण से पहले यूरोप में जीवित था - पूर्व आधुनिक काल। किंतु शायद उससे भी सही और सार्थक नाम वह होगा जो इतिहास के काल खंडों से मुक्त होकर खुद अपनी 'स्पेस' निर्धारित कर सके। मैं उसे मधयकाल की कोटि से उठाकर 'परंपरा की स्पेस' में लाना चाहूँगा। यह इतिहास का ऐसा निर्णयक मोड़ था, दो रास्तों का बॉर्डर पोस्ट, जिस पर जो निर्देशन तख्ती लगी थी उस पर दो तीरों के निशान खुदे थे - दो विपरीत दिशाओं की ओर निर्देश करते हुए - एक परंपरालोक की ओर मुड़ता हुआ, दूसरा आधुनिक संसार की ओर जाता हुआ। पहले संकेत के आगे लिखा था - परंपरालोक, जिस पर ईशवर का राज्य है - Kingdom of God, दूसरा, मनुष्य लोक, जिसमें व्यक्ति सर्वेसर्वा है। यह वह सीमा रेखा थी, जहाँ मनुष्य की संस्कृति में पहली बार लौकिक और अलौकिक के बीच फाँक पड़ी थी।

अगर आप ज्यादा ध्यान से सोचें, तो आपको कुछ आश्चर्य होगा कि यह 'सीमा-विभाजन' - मनुष्य के मानस को दो खंडों में विभाजित करने की घटना - जिसने यूरोप की संस्कृति को आधुनिकता की दोहरी पर लाकर खड़ा कर दिया था - कोई बहुत पुरानी नहीं है। मुश्किल से चार-पाँच सौ साल पुरानी, जो भला मनुष्य की सुदीर्घ यात्रा में क्या महत्व रखती है? लेकिन जरा देखिए, मनुष्य की वर्तमान प्रतिमा को गढ़ने में वह इतनी अधिक समर्थ रही कि आज वह सनातन प्रतिमा लगती है जैसे 'मनुष्य' हमेशा से ऐसा ही था, दुनिया की विभिन्न परंपराओं में गढ़ी मनुष्य की मूर्तियों को मिटाकर आज वह एक मॉडल मूर्ति की तरह कायम है। यदि आज आप किसी से कहें कि आधुनिक मनुष्य का यह व्यक्तिनुमा मॉडल, जिसे आज आप देखते हैं, चार सौ साल पहले यूरोप में नहीं पाया जाता था, तो वह आपकी बात हँसी में टाल देगा और यदि आप उससे कहें कि आज भी कुछ ऐसी संस्कृतियाँ, परंपरागत समाज हैं, जहाँ मनुष्य कुछ दूसरे ढाँचे में ढला है, जिसकी स्मृतियाँ और संस्कार कुछ दूसरे मिट्टी-गारे के बने हैं - हालाँकि देखने-सुनने में वह पेरिस-न्यूयार्क में चलते मनुष्य की तरह ही दिखता है, जो 'आज' के मनुष्य की छवि से बहुत अलग है, किंतु उनकी शक्ल-सूरत मनुष्य जैसी है - तो उसे विश्वास होगा या नहीं, आश्चर्य जरूर होगा।

कुछ संस्कृतियों के इतिहास में ऐसे मर्मघाती परिवर्तन आते हैं जो मानव इतिहास में भले ही बहुत 'ब्रेक थ्रू' माने जाएँ मनुष्य की मनीषा में एक फाँक-सी खींच जाते हैं। मध्य युग का अंत कुछ ऐसा ही था - एक पारंपरिक परिवेश में जीनेवाले मनुष्य की आस्थाओं का विघटन। हमने उसे ऊपर 'ईशवरीय लोक' (Kingdom of God) कहा था, सो इसलिए नहीं कि वहाँ ईश्वर वास करता था, मनुष्य जब भी उसके विलगाव के मरुस्थल में जीता था, बल्कि इसलिए कि वह अभी वह उसके सानिध्य-भाव को भूला नहीं था, उसे लगता था, ईश्वर चला तो गया है लेकिन बहुत दूर नहीं गया है, इतनी दूर नहीं गया है जहाँ मनुष्य की आवाज उस तक और ईश्वर का संदेश मनुष्य तक न पहुँच पाए, मनुष्य अब भी 'ईश्वरीय संरक्षण' के नीचे जीता था, इसलिए सुखी न भी हो, आधुनिक मनुष्य की तुलना में अपने को कहीं सुरक्षित महसूस करता था। आप इसे एक अंधविश्वास कह सकते हैं - कहते ही हैं - लेकिन जब सारे अंधविश्वास एक सुसंगत श्रंखला में जुड़ते हैं, तो वे अंधे हों, न हों, एक गहरी सांस्कृतिक अर्थवत्ता प्राप्त कर लेते हैं। यह अर्थवत्ता मनुष्य की 'रेशनेलिटि' को काटती नहीं, लेकिन उसके कटघरों में बंदी भी नहीं है, किसी समाज को रचने का दंभ भी नहीं करती, वह उसमें रहती है, जो पूर्व-प्रदत्त है, मानव-निर्मित नहीं। यह पूर्व-प्रदत्त दुनिया ईश्वर के नियमों पर चलती है - एक डिवाईन ऑर्डर में - जो 'अलौकिक' होकर भी लौकिक व्यवहार को पवित्रता प्रदान करते हैं। डिवाइन ऑर्डर रेशनेलिटी के तर्क-विधान पर नहीं, बिंबो और प्रतीकों की संरचना करता है-प्रतीक, जो इस दुनिया के होते हुए भी दूसरी दुनिया को निरंतर अपने में प्रतिबिंबित, प्रतिध्वनित करते रहते हैं। यह अकारण नहीं है, कि आनंद कुमार स्वामी आरम्भिक क्रिश्चियन कला और मिस्टिक-चिंतकों-भक्तों को भारतीय कला के इतना निकट पाते थे। भारतीय कला पर मनन करते हुए वह अक्सर मध्यकालीन यूरोप के दृष्टांतों को सामने रखते थे। दोनों संस्कृतियों के बीच बहुत-सी असमानताएँ थीं, लेकिन जो एक चीज समान थी, वह मूल्यवान थी - दोनों ही परंपरालोक के आलोक मंडल में रहती थीं, इस विश्वास के आधार पर रहती थीं केवल 'प्रतीकात्मक भाषा' में ही संपूर्ण सत्य ultimate reality, को जाना जा सकता है। ऑडेन प्रतीकों को अंधे की छड़ी कहा करते थे, जिसके सहारे वह अपना रास्ता टोह लेता है, कुछ वैसी ही भूमिका वे परंपरागत मानस में भी अदा करते हैं - मनुष्य लोक के चौराहे पर ईश्वर की दशा की ओर निर्देश करते हुए। कोई चौराहा ऐसा नहीं था जिसके केंद्र में ईश्वर की अनुभूति अनुपस्थित हो। किंतु सबसे उल्लेखनीय बात, जो इस 'परंपरालोक' को आधुनिक समाज से अलग करती थी, वह यह कि मनुष्य वहाँ सृष्टि के केंद्र में न होकर समूची सृष्टि को अपने केंद्र में - जो उसका आत्म था - लेकर जीता था। ब्रह्मांड में पिंड-मात्र, किंतु पिंड में ब्राह्मांड झलकता हुआ, जिसके आलोक में समूचा संसारी कार्य-कलाप एक दैवी कृपा divine sanction, प्राप्त कर लेता था। मनुष्य का जीवन इस धरती पर क्षणभंगुर भले ही हो, उसे अपने कर्म का दायित्व-बोध इसी 'सैक्शन' से प्राप्त होता था, जो मृत्यु के बाद भी सनातन रहता था, इसलिए सनातन परंपराओं में उसे धर्म बोध माना गया। वह एक ऐसी अखंडित संपूर्ण समदृष्टि से आप्लावित था, जो भारतीय अथवा यूरोपीय परंपराओं में आबद्ध न होकर मनुष्य मात्र के भीतर प्रवाहित होती थी। वहाँ प्रश्न यह नहीं था, किस 'धर्म' में कौन-सा ईश्वर पूजा जाता है, प्रश्न अगर पूछा जाता था तो यह कि वह ख्याल कहाँ से आता है, जिसके आगे माथा झुक जाता है। यह 'ख्याल' अगर यूरोप में दांते की डिवाईन कॉमेडी, मिस्टिक संतों की वाणी, एक हार्ट के चिंतन में ध्वनित होता था, तो भारत में तुलसी, मीरा, तुकाराम और कबीर काव्य-कर्म में भी उज्ज्वल होता था, क्योंकि दोनों ही की काव्य-परंपराओं में अभी तक आत्म का अन्य से दृश्य का अदृश्य से, आकार का निराकार से विच्छेद नहीं हुआ था। इसलिए वहाँ 'ईश्वर' की परिभाषा भी आज के ईश्वर से कुछ भिन्न थी, जिसकी सुंदर व्याख्या सिमोन वेल ने उपनिषद को उद्धृत करते हुए दी है। वह लिखती हैं, 'ईश्वर वह नहीं है, जो शब्द में गोचर होता है, बल्कि वह है, जिससे शब्द गोचर होता है, ईश्वर वह है जिसके द्वारा हर चीज गोचर होती है किंतु जो चीज किसी से गोचर नहीं होती, वह संकेतक द्वारा चिह्नित अंक नहीं है, किंतु 'वह' है, जिसके द्वारा सही अंक चिहिन्न किए जाते हैं।"

क्या यहाँ हम एक क्षण ठहरकर सोच सकते हैं, कैसे चिह्नित अंकों का यह 'प्रतीक लोक', जिससे एक समय में लाखों लोग जीने-मरने का अर्थ प्राप्त करते थे-एकाएक चरमरा कर ढह गया? यह भी एक अंत था या कहें यह भी एक तरह के मनुष्य का अन्त था। रेनेसा से यूरोप के 'उत्थान' का एक नया युग आरंभ होता है, इसकी गौरवगाथा तो बहुत गाई जाती है, किंतु उसकी इमारत के नीचे कितने विश्वासों के आस्थाओं अंतर्दृष्टियों की अस्थियाँ दबी हैं, क्या कोई इसकी कल्पना कर सकता है? आज हमें उसके अवशेष जरूर दिखाई देते हैं-गिरजे, ईसाई मठ, मिशनरी संस्थाएँ-वे अमेरिका के उन रिजर्वेशन फार्मस की याद दिलाते हैं, जहाँ इडियन कबीलों के बचे-खुचे लोगों को प्रदर्शन के लिए रखा जाता है, ताकि हम यह जान सकें कि एक समय ये आदिवासी ही इस धरती के असली निवासी थे। किंतु आज आपको लुप्त लोक के निवासी कहाँ मिलेंग, जहाँ 'ईश्वरीय बोध' धर्म प्रतिष्ठानों में, सामान्य जन-मानस में, उसकी मांस-मज्जा में रचा-बसा था? यह एक या दो विश्वासों का नहीं, यह आस्था पर आधारित पूरे एक सांस्कृतिक लोक का विस्मृति में चले जाना था।

खंडहरों के बीच जो बचा रह गया था, वह 'ईश्वर' था, किंतु क्या यह वही ईश्वर था, जिसे हमने उपनिषद के उपयुक्त उद्धरण में देखा था? खुद अगोचर होता हुआ भी सृष्टि को गोचर होता हुआ, समूची सृष्टि के आकार को अपने अनाकार से चमकता हुआ - दोनों के बीच भेद गिराता हुआ। मुझे डर है, वह 'ईश्वर' भी अब उतना ही अपने घर से निर्वासित था, जितना मनुष्य। किसी समाज के प्रतीक-मंडल में ही एक विशिष्ट ईश्वर का आवास होता है, ज्यों ही किन्हीं कारणों से वह प्रतीक-योजना छिन्न-भिन्न होती है, ईश्वर की छवि धूमिल पड़ जाती है, रहता वह अब भी है, किंतु अब समूची सृष्टि की जगह वह एक विशिष्ट धर्म-प्रतिष्ठान, एक विशिष्ट थियोलोजिकल आइडियोलॉजी का संरक्षक, देवता, दाता बनकर। क्या क्रिश्चियन मिस्टिक संतों का ईश्वर वही था, जिसकी प्रतिमा बाद में रोमन चर्च और वेटिकन ने अपने भव्य गिरजों में स्थापित की थी? दांते ने डिवाईन कॉमेडी में जिस ईश्वर की परिकल्पना की थी, उसका संत आगस्ताईन के Kingdom of God से दूर का नाता भी नहीं था; एक में ईश्वर का ख्याल था, जो कविता में आया था, दूसरे में धर्म की आइडियोलॉजी थी, जिसने कैथोलिक चर्च को जन्म दिया था। यह इतिहास में जन्मा ईश्वर था। उन्नीसवीं शती के छोर पर जब नीत्शे ने ईश्वर के मरण की घोषणा की थी वह यही ऐतिहासिक ईश्वर था। एक तरह से वह उस समूची ईसाई-यूरोपीय परंपरा को चुनौती देना था, जिसने उसकी ऐतिहासिक छवि को यूरोपीय अंतरिक्ष में अंकित किया था।

ईश्वर की छवि बनंती कैसे है? वह बनती नहीं, बनाई नहीं जाती, हर संस्कृति उसे अपने भीतर से उद्‍घाटित करती है वह अवधारणा नहीं, अवतार, है... सृष्टि और मनुष्य के बीच अवतरित होता हुआ वह अपना वैसा ही बिंब, इमेज, रूप सिरजता जाता है, जैसे मनुष्य प्रकृति या सृष्टि के साथ जुड़ता जाता है, या उससे अलग दिखता जाता है। इसलिए उसका एक रूप नहीं है। इसीलिए हमें भारतीय परंपरा में दी गई ईश्वर की परिकल्पना उससे इतनी भिन्न दिखाई देती है, जो उसका रूप हमें यहूदी-ईसाई परंपरा में दिखाई देता है। ईश्वर के एक विशेष बिंब-मंडल में हमें मनुष्य संस्कृति का विशिष्ट चरित्र उद्‍घाटित होता दिखाई देता है...

खास इस बिंदु पर 'आरंभ' की अवधारणा एक ऐतिहासिक महत्तव प्राप्त कर लेती है। मनुष्य यदि किसी स्वर्ग-वाटिका - Garden of Eden - से निष्कासित होकर ही इस धरती पर आया था, जो उसका पतन था, तो यह धरती भी उसके पाप से दूषित हो जाती है। उसका धरती पर आना ही ईश्वर से दूर होना है। यदि मनुष्य का इतिहास 'गिरने से आरंभ होता है तो उसका उठना उद्धार होना भी एक ऐसे आदर्श स्वर्गीय लोक में ही हो सकता है, जो हू-ब-हू न सही, कुछ वैसा हो, जिससे वह निष्कासित किया गया है, जहाँ कभी वह सुरक्षित और सुखी था, किसी भी पाप-बोध से मुक्त था। अगर वह वापस मुड़कर अपनी मिथकीय वाटिका में नहीं जा सकता, तो इस लौकिक समय में, जो इतिहास ने उसे प्रदान की है, अपने खोए हुए सुरक्षा-स्थल को प्राप्‍त तो कर सकता है। एलियट ने कहा था, मेरे अंत में ही मेरा प्रारंभ है... संस्कृति के आरंभ में उसका अंत निहित रहता है... दोनों बिंदु एक ही परंपरा-संस्कार से उपजते हैं। क्या मनुष्य के समस्त परिकल्पित सेक्यूलर यूटोपिया एक तरह से उस खोए हुए 'पैराडाइस' को पुननिर्मित करने की आकांक्षा नहीं है? एक ऐसे अंत को पाना, जो उसे उस आरंभ से मिला दे, जहाँ से वह स्खलित हुआ था ! और यदि इस आकांक्षा के पीछे इतिहास की शक्ति भी सक्रिय तो क्या मनुष्य का वर्तमान ही बीच का रोड़ा नहीं है, एक व्यवधान जिसे कुचलकर ही आकांक्षित भविष्य पाया जा सकता है? विरोधाभास यह है कि जो ज्ञान-इतिहास बोध-मनुष्य को निषिद्ध फल खाने से प्राप्त हुआ था, वही उसकी आकांक्षापूर्ति का सबसे कारगर साधन बनकर प्रस्तुत होता है - कुछ वैसे ही जैसे एक रात अचानक मेफिस्टोफिलिस फाउस्ट के अध्ययन कक्ष में प्रकट हुआ था? इतिहास की पाप-भूमि से स्वयं इतिहास का हाथ पकड़कर उबरना-क्या यह अपने में त्रासद विडंबना नहीं है।

भारतीय परंपरा यदि अपने को इस दुष्चक्र से पतन और उद्धार (fall and redemption) की त्रासद प्रक्रिया से मुक्त रख सकी तो इसलिए कि वहाँ 'आरंभ' और 'अंत' किसी खास ऐतिहासिक बिंदु पर अंकित नहीं किए जाते। यह नहीं कि उसमें मनुष्य के सृजन (creation) और अंत की परिकल्पनाएं नहीं हैं, किंतु वे ईश्वर और मनुष्य के बीच किए अनुबंध से, या उसे अनुबंध से, या उसे अनुबंध से, या उसे भंग करने के अपराध-बोध से उत्पन्न नहीं होतीं। इसीलिए भारतीय मानस पर, संस्कृति के बिंबो पर, कला और साहित्य के भावनात्मक जगत पर संस्कृति के बिंबों पर, कला और साहित्य के भावनात्मक जगत पर 'आरंभ' और 'अंत की अवधारणाएँ उस तरह का ऐतिहासिक हस्तक्षेप नहीं करतीं, जैसा हम पश्चिम की ईसाई-यहूदी परंपरा में देखते हैं। पश्चिमी परंपरा में यह विचार असंभव लगता है, कि समय का आरंभ उतना ही आरंभहीन हो सकता है, जितना उसका 'अंत' अंतहीन। चूंकि मनुष्य का अपना जीवन जन्म और मृत्यु के बीच सीमित है, वह हर प्रवाह की अनंतता को नकारते हुए उसे आरंभ और अंत के बीच आबद्ध करने को व्याकुल रहता है। विराट और असीम की रहस्यमयता में 'मनुष्य'को देख पाना, जैसा कि हम वैदिक ऋचाओं अथवा पौराणिक कथाओं में देखते हैं, एक बात है। किंतु उसकी अनंतता से आतंकित भी हुआ जा सकता है। आतंक से छुटकारा तभी पाया जा सकता है, जब असीम को इतिहास के आदमकद चौखटे में वर्गीकृत किया जा सके। ईश्वर को मनुष्य के रूप में अथवा मनुष्य को ईश्वर की इमेज में घटाने के पीछे भी यही कामना कार्यरत रहती है।

मिथक और इतिहास के बीच जो अंतर है, एक तरह से वह पश्चिमी संस्कृति और भारतीय परंपरा के बीच भी परिलक्षित होता है। इतिहास अपने चौखटों के भीतर काल की अंधी, अंतहीन गतिमयता को बाँधने का प्रयास है ताकि उसे किसी प्रकार की क्रमशीलता, सोद्‍देश्यता, अर्थवत्ता प्रदान की जा सके - अपने ज्ञान के मापदंड से वह उसकी अनंतता को भेद कर कहता है, यह आरंभ है, यह अंत और इस तरह उसे एक मानवोनुकूल, anthropomorphic, दिशा देने का प्रयत्न करता है, उस 'अंत' की ओर मोड़ता हुआ जहाँ उसका कोई अर्थ, कोई पैटर्न, कोई संगति निकल सके - और उसके अनुरूप मनुष्य अपनी 'नियति' (destiny), निर्धारित कर सके। इसी अर्थ में उसे messiahanic time जाता है-जहाँ किसी मसीहा की दृष्टि ही मानव नियति का प्रतीक बन जाती है। इसके विपरीत मिथक एक उल्टी दिशा निर्देशित करता है-वह मनुष्य को अपनी 'मानवीकृत' सीमाओं से उठाकर एक ऐसे सनातन बोध की ओर ले जाता है, जहाँ मनुष्य अपने 'होने' की अर्थवत्ता काल को खंडित करके नहीं, उसे अतीत और भविष्य में विभाजित करके नहीं बल्कि स्वयं उसकी अनंत प्रवाहमयता के भीतर संलग्नता (Connectedness) खोजने में निहित रहती है। संलग्नता के इस भाव में मनुष्य अपने भीतर जिस ईश्वर से सम्पर्क करता है, वह, वह ईश्वर नहीं है, जिसका कोई रूप निर्धारित किया जाए क्योंकि जैसा एक बौद्ध पाठ में कहा गया है, "ईश्वर को स्वयं नहीं मालूम, वह क्या है, क्योंकि वह कोई क्या नहीं है।" ईश्वर के बारे में यह अंतर्निर्दिष्ट वास्तव में उस असृजित, uncreated की ओर संकेत करती है, जो पश्चिमी परंपरा के केंद्रीय भाव से बहुत भिन्न है, जहाँ सृष्टि के 'क्रियेशन' को इतना महत्व दिया गया है। जो अनास्तित्व है, आरंभहीन है, उसका अनुभव कारण-कार्य की सांसारिक श्रंखला द्वारा निर्मित नहीं हो सकता।

विचित्र बात यह लगती है - जो सचमुच में विचित्र नहीं है कि समग्रता का यह संलग्न भाव पश्चिमी परंपरा के अवचेतन में हमेशा से विद्यमान रहा है, वर्ना हम उसे एकहार्ट, दांते, ब्लेक और गोएटे के सृजन और चिन्तन में कैसे देख पाते। यह एक जीवन-दृष्टि का दूसरी परंपरा में सेंध लगाकर आना नहीं है, बल्कि उसी 'दृष्टि' को बार-बार पाना है जो इतिहास की उन्मत्त 'विकास यात्रा' में बार-बार धुँधला जाती है। मनुष्य अपने भीतर एक काल-बोध नहीं, अनेक समय-संसार लेकर चलता है। क्षण में 'एटर्निटी' देखने का अनुभव सिर्फ एक कवि का दुर्लभ अनुभव नहीं होता, न ही वह एक परंपरा का विशिष्ट वरदान है। निष्कासन की पीड़ा, अधूरेपन और अलगाव की अनाथावस्था मनुष्य-जीवन का उतना ही सच्चा अनुभव है, जितना उसे अतिक्रमण करने की अदम्य, शाश्वत आकांक्षा। मनुष्य का 'आरंभ' किसी भी परंपरा में कैसा भी हो, वह अपने को आरंभ हर बार एक ऐसी आत्म-चेतन अवस्था में करता है, जहाँ दोनों की काल चेतनाएँ एक-दूसरे में अंतर्गुम्फित हैं। यदि 'आधुनिक' होने का अर्थ आत्म-विभाजित मानसिकता का बोध है, उसकी अपरिहार्य पीड़ा से गुजरना है, तो शायद ऐसा कोई युग नहीं था, जब मनुष्य आधुनिक नहीं था। ईश्वर के न होने की पीड़ा और उसके अस्तित्व में आस्था, दोनों ही एक आध्यात्मिक अनुभव के दो पहलू हैं। आधुनिक युग का अभिशाप यह रहा है, कि उसने स्वयं परंपरा के शाश्वत बोध को खंडित किया है, उसने आस्था की अभाव-पीड़ा को शून्यता के आत्महीन बोध में परिणत किया है। अत: प्रश्न आधुनिकता से छुटकारा पाना नहीं है, बल्कि स्वयं आधुनिक-बोध को उसकी ऐतिहासिकता से मुक्त करना है। शून्यता-बोध वह नहीं है, जिसे बौद्ध दर्शन में void माना गया है - जिसका अपना अस्तित्व है- आत्म-रिक्तता की ऐसी स्थिति है, जब मनुष्य स्वयं अपने स्वत्व से खाली हो जाता है, जो उसका सेल्फ था, उसका आधारमंच। इतावली नाटककार पिरांडेलो के शब्दों में, "मनुष्य एक ऐसा फिल्म-अभिनेता-सा बन जाता है, जो न केवल मंच से, बल्कि अपने से निर्वासित हो गया है। वह एक बेचैन-सा कर देनेवाला खालीपन महसूस करता है। उसकी देह अपनी मांसलता खो देती है, वह हवा में उड़ जाती है, वह अपनी वास्तविकता, अपना जीवन अपनी आवाज खो देती है, सिर्फ एक गूँगी इमेज में बदल जाती है, जो एक परदे पर झिलमिल कर खामोशी में खो जाती है। प्रोजेक्टर पब्लिक के सामने उसकी छाया से खेलेगा, जबकि स्वयं अभिनेता को कैमरे के सामने ही अपने खेल से संतोष कर लेना पड़ेगा।"

अब वह ऐसा मनुष्य नहीं, जो अपने को मनुष्य कह सके, अब वह इतिहास के पर्दे पर मनुष्य की छाया है, एक क्षण चमककर अँधेरे में लोप होती हुई। यदि हम सार्त्र के इस कथन को मान लें कि 'मनुष्य की कोई प्रकृति नहीं, सिर्फ उसका इतिहास है' तो मनुष्य का कोई ऐसा आदि रूप और नार्म नहीं बचा रहता, जिसके आधार पर हम यह जाँच सकें कि इतिहास की लैबोरेट्री से जो 'छवि' बनकर आएगी, उसे 'मनुष्य' की संज्ञा दे सकें।

क्या इस बिंदु पर आकर हमें सब अंतों के अंत में 'मनुष्य मात्र का अंत' नहीं दिखाई देता? कुमारस्वामी यदि आधुनिक कला के इतने तीव्र आलोचक थे, तो इसलिए कि उन्हें उसमें मनुष्य के अंत की रिक्तता दिखाई देती थी, एक ऐसी कला जिसने अपने को समूचे प्रतीक-मंडल से निर्वासित कर लिया था, जो पारंपरिक कला के बिंबो को एक दैवी आलोक में प्रतिबिंबित करता था। अधिकांश आधुनिक कला के बारे में उनकी धारणा मुझे सही जान पड़ती है, किंतु मुझे लगता है, कि आधुनिक कला का एक दूसरा पक्ष रहा है - उसका प्रच्छन्न पक्ष - जिसकी ओर मैंने कुछ देर पहले संकेत किया था। यह मनुष्य को 'अपने भीतर और अपने परे' देखने के लिए उन्मेषित करती है, जहाँ आरंभ और अंत के बिंदु किसी ऐतिहासिक क्षितिज के दो छोरों पर नहीं, स्वयं अपने भीतर के अनुभव-खंडों में एक-दूसरे के भीतर स्पंदित होते हैं। बीसवीं शती के मध्य में युंग ने एक पुस्तक लिखी थी - Man in Search of his Soul… आप उसे 'सोल' कहें या उसका सेल्फ, या आत्म, आधुनिक कला अपने सर्वोत्तम क्षणों में इस खोई हुई 'चीज' के सत्य, essence, से साक्षात करती है। कला में मनुष्य के तत्त्व उसके essence की खोज एक तरह से पूर्वी परंपरा का आधुनिक कला में उद्‍घाटन है। अपनी अमूर्तता में वह निराकार के उन बिंबो को खोजती है, जो सिर्फ मनुष्य की छवि में घटकर चुक नहीं जाते, बल्कि उसके परे विश्व और स्पेस के असंख्य अंतर्संबंधों को उद्‍घाटित करते हैं। वह अपने प्रतीकों और बिंबो में सेक्युलर युग की रिक्तता का अतिक्रमण करती हुई 'परम' का स्पर्श करती है -अनुभव के उस आयाम को स्पर्श करती है, जिसे सिर्फ 'पवित्र' का नाम दिया जा सकता है। आधुनिक कला के महान प्रवर्तक पिकासो ने पवित्र भाव-बोध के इसी उपेक्षित पक्ष की याद दिलाते हुए कभी अपने मित्र ब्राक से कहा था, "हमें इसे (पवित्र), इस शब्द को, या इसी तरह के शब्द को कहना चाहिए, लेकिन लोग इसे गलत समझेंगे और उसे वह अर्थ देंगें जो उसका है नहीं। हमें कहना चाहिए, कि इस या उस पेंटिंग में शक्ति की गरिमा इसलिए है क्योंकि वह 'ईश्वर-स्पर्श' से दीप्त है। लोग इसका गलत अर्थ लगा सकते हैं, किंतु यही हमारे लिए सबसे निकट का सत्य है।"

कला का यह क्षण ही मनुष्य की मृत्यु, उसके अंत को नहीं, उसे दुबारा पाने को है, ठीक वहाँ, जहाँ वह खो गया था, आधुनिक युग के मरुस्थल में।

आज बीसवीं शती के अंत में जब उत्तर आधुनिकता की बात करते हैं तो मनुष्य के आधुनिक बोध के इस आध्यात्मिक पक्ष को बिल्कुल भुला देते हैं, एक ऐसा बोध जिसकी संभावनाएँ कभी पूर्ण रूप से यूरोप में उद्‍घाटित नहीं हो पाईं। असली उत्तर आधुनिकता वह होती, जो आधुनिक मनुष्य की अधूरी, बीच में टूटी हुई यात्रा में परम का वह अंश जोड़ पाती। उस बीहड़ तनाव के बीच रास्ता बना पाती जो आधुनिक कला के आत्मसंघर्ष की आधार-भूमि थी। यह करने के बजाय उसने एक सुविधाजनक रास्ता अपनाया-स्वयं तनाव के केंद्रीय भाव से आँखें मोड़ ली। इसलिए उत्तर आधुनिकता की विचारधारा में जो बहुलता दिखाई देती है, वह खुलापन नहीं ढीलापन है-विश्रंखलता जो केंद्रहीनता से उत्पन्न होती है। आधुनिक मनुष्य के अंतर्विरोधों की पीड़ा और उनका अतिक्रमण करने का आध्यात्मिक गौरव-वह दोनों के प्रति निरपेक्ष जान पड़ती है। आत्म-विभाजित मानस में उद्‍बोधन के किसी भी चरण में अपने अखंडित संपूर्णत्व की ओर मुड़ने की आशा बनी रहती है, लक्ष्यहीन बहुलता की अवस्था में वह आशा भी लुप्त हो जाती है।

किंतु एक दूसरा रास्ता भी है। उसे ढूँढ़ने के लिए हमें कहीं अपने से दूर नहीं जाना होगा, क्योंकि मनुष्य की अंतहीन यात्रा में वह ठीक वहाँ उजागर होता है, जो उसका वर्तमान है, उसकी अपनी जमीन जो उसे धरोहर में मिली है, सँकरी, असुरक्षित, हर क्षण फिसलती हुई, किंतु यही उसका आवास स्थल भी है - एक ऐसी जगह, जहाँ मनुष्य देवता और पशु के बीच निरंतर अपनी अधूरी पहचान को पूर्ण करने का स्वप्न देखता है, अपने को परिभाषित और पुन: परिभाषित करने का कभी न खत्म होने वाला आत्म-अभिमान। यह अभियान उस पक्षी की तरह है, जो हवा के खिलाफ उड़ान लेने से पहले अपने पेरों से तौलता है, और तभी उसे पहली बार अपने पक्षीत्व का बोध होता है। दुनियाँ में कितनी परंपराएँ ऐसी हैं, जो आरंभ की अवधारणा 'पतन'से नहीं, 'उड़ान' से परिभाषित करती हैं? मनुष्य एक पापग्रस्त प्राणी नहीं, एक सतत विद्रोही, एक नकारवादी, निहिलिस्ट व्यक्ति नहीं। हमारा आदि विद्रोही मनुष्य यदि उसके आधुनिक विद्रूप से कुछ अलग है तो इसलिए कि वह केवल 'नकार' में जीवन की सार्थकता नहीं ढूँढ़ता, बल्कि वह अपने से बाहर दी हुई परिभाषाओं को इसलिए नकारता है, क्योंकि उनके चौखटों में उसका 'स्वत्व' नहीं समा पाता। यह महज संयोग नहीं है कि हर देश में रोमांटिक कवियों का प्रिय मिथकीय नायक प्रमथ्यु था, जो देव लोक से अग्नि को चुराकर धरती पर लाया; आदर्श पुरुष, जो आदि विद्रोही था। जिस ज्ञान के कारण मनुष्य स्वर्ग-वाटिका से निष्कासित हुआ था, उस ज्ञान को पाने की खातिर एक दूसरे आदि मानव ने स्वर्ग-लोक के देवताओं के प्रभुत्व को चुनौती देने का दुस्साहस किया था। दोनों को ही अपनी सीमा का उल्लंघन करने की घोर सजा मिली थी।

किंतु इस सजा का औचित्य क्या है? क्यों मनुष्य को अपने स्वाधीन कर्म के लिए देवताओं के कोप का भाजन बनना पड़ता है? इसमें क्या गलत या अनुचित है कि मनुष्य अपने को जिस अवस्था में पाता है, उससे असंतुष्ट होकर उसमें कोई ऐसा परिवर्तन लाने का प्रयास करे जो उसे एक बेहतर स्थिति में लाने में समर्थ हो? 'बेहतर स्थिति' से हमारा अभिप्राय है, जहाँ मनुष्य और जगत के बीच एक ऐसा सामंजस्य बन सके, जो दोनों के बीच फैली दूरी और अजनबीयत को पूरी तरह नष्ट नहीं तो कुछ कम कर सके। मानव-संस्कृति का विकास एक तरह से उत्तरोत्तर अधिक अर्थपूर्ण सामंजस्य हासिल करने का इतिहास रहा है। संगीत, साहित्य, कला और कुछ नहीं, मनुष्य की उस निराकार आकांक्षा को साकार करने का प्रयत्न है, जहाँ वह अपने और विश्व के बीच एक लय, एक संगीत, एक संवाद स्थापित करने में सक्षम हो सके। यह संवाद सतत्‍‍ है-न कहीं से शुरू होता है, न कहीं समाप्त होता है... सिर्फ कभी-कभी उसका बोध होता है, चेतना के अंतहीन प्रवाह में आत्मचेतन होने का क्षण।


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हिंदी समय में निर्मल वर्मा की रचनाएँ