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कविता

चुनी हुई कविताएँ
अज्ञेय
संपादन - कन्हैयालाल नंदन


46. शक्ति का उत्पात
47. पावस-प्रात, शिलांग
48. सागर किनारे
49. दूर्वाचल
50. शरणार्थी 11 : जीना है बन सीने का साँप
51. कतकी पूनो
52. माहीवाल से
53. हरी घास पर क्षणभर
54. छंद है यह फूल
55. तुम फिर आ गए, क्वाँर?
56. बावरा अहेरी
57. जो कहा नहीं गया
58. आगंतुक
59. जितना तुम्हारा सच है
60. खुल गई नाव
61. तुम हँसी हो

62. ब्राह्म-मुहूर्त : स्वस्तिवाचन 
63. हरा-भरा है देश 

64. सोन-मछली
65. मैं देख रहा हूँ
66. सम्राज्ञी का नैवेद्य-दान
67. निरस्त्र
68. मन बहुत सोचता है
69. प्रार्थना का एक प्रकार
70. औपन्यासिक
71. काँपती है
72. शहतूत
73. देलोस से एक नाव
74. कहाँ
75. नीमाड़ : चैत
76. देखिए न मेरी कारगुज़ारी
77. हरा अंधकार
78. जो पुल बनाएँगे

79. नंदा देवी-1 
80. नंदा देवी-3


81. नंदा देवी-8
82. नंदा देवी-14
83. फूल की स्मरण-प्रतिमा
84. काल की गदा
85. नाच
86. महावृक्ष के नीचे
87. सभी से मैंने विदा ले ली
88. पत्ता एक झरा
89. मेरे देश की आँखें
90. मैं ने पूछा क्या कर रही हो
91. घर [1] [2] [3] [4] [5]
92. चीनी चाय पीते हुए
93. छंद
94. वसीयत
95. मैं वह धनु हूँ...

शक्ति का उत्पात

क्रांति है आवर्त, होगी भूल उसको मानना धारा :
विप्लव निज में नहीं उद्दिष्ट हो सकता हमारा।
जो नहीं उपयोज्य, वह गति शक्ति का उत्पात भर है :
स्वर्ग की हो-माँगती भागीरथी भी है किनारा।

 

पावस-प्रात, शिलांग

भोर बेला। सिंची छत से ओस की तिप्-तिप्! पहाड़ी काक
की विजन को पकड़ती-सी क्लांत बेसुर डाक-
'हाक्! हाक्! हाक्!'

मत सँजो यह स्निग्ध सपनों का अलस सोना-
रहेगी बस एक मुठ्ठी खाक!
'थाक्! थाक्! थाक्!'

 

सागर के किनारे

तनिक ठहरूँ। चाँद उग आए, तभी जाऊँगा वहाँ नीचे
कसमसाते रुद्ध सागर के किनारे। चाँद उग आए।

न उस की बुझी फीकी चाँदनी में दिखें शायद
वे दहकते लाल गुच्छ बुरूँस के जो
तुम हो।

न शायद चेत हो, मैं नहीं हूँ वह डगर गीली दूब से मेदुर,
मोड़ पर जिस के नदी का कूल है, जल है,
मोड़ के भीतर-घिरे हों बाँह में ज्यों-गुच्छ लाल बुरूँस के उत्फुल्ल।

न आए याद, मैं हूँ किसी बीते साल के सीले कलेंडर की
एक बस तारीख, जो हर साल आती है।
एक बस तारीख-अंकों में लिखी ही जो न जावे
जिसे केवल चंद्रमा का चिह्न ही बस करे सूचित-
बंक-आधा-शून्य; उलटा बंक-काला वृत्त,
यथा पूनो-तीज-तेरस-सप्तमी,
निर्जला एकादशी-या अमावस्या।

अँधेरे में ज्वार ललकेगा-
व्यथा जागेगी। न जाने दीख क्या जाए जिसे आलोक फीका सोख लेता है।
तनिक ठहरूँ । कसमसाते रुद्ध सागर के किनारे
तभी जाऊँ वहाँ नीचे-चाँद उग आए।

 

दूर्वाचल

पाश्र्व गिरि का नम्र, चीड़ों में
डगर चढ़ती उमंगों-सी।
बिछी पैरों में नदी ज्यों दर्द की रेखा।
विहग-शिशु मौन नीड़ों में।
मैंने आँख भर देखा।
दिया मन को दिलासा-पुन: आऊँगा।
(भले ही बरस-दिन-अनगिन युगों के बाद!)
क्षितिज ने पलक-सी खोली,
तमक कर दामिनी बोली-
'अरे यायावर! रहेगा याद?'

 

शरणार्थी 11: जीना है बन सीने का साँप

हम ने भी सोचा था कि अच्छी चीज़ है स्वराज
हम ने भी सोचा था कि हमारा सिर
ऊँचा होगा ऐक्य में। जानते हैं पर आज
अपने ही बल के
अपने ही छल के
अपने ही कौशल के
अपनी समस्त सभ्यता के सारे
संचित प्रपंच के सहारे

जीना है हमें तो, बन सीने का साँप उस अपने समाज के
जो हमारा एक मात्र अक्षंतव्य शत्रु है
क्योंकि हम आज हो के मोहताज
उस के भिखारी शरणार्थी हैं।

 

कतकी पूनो

छिटक रही है चाँदनी, मदमाती उन्मादिनी
कलगी-मौर सजाव ले कास हुए हैं बावले
पकी ज्वार से निकल शशों की जोड़ी गई फलाँगती-
सन्नाटे में बाँक नदी की जगी चमक कर झाँकती!

कुहरा झीना और महीन, झर-झर पड़े अकासनीम
उजली-लालिम मालती गंध के डोरे डालती,
मन में दुबकी है हुलास ज्यों परछाईं हो चोर की-
तेरी बाट अगोरते ये आँखें हुईं चकोर की!

 

माहीवाल से

शांत हो। काल को भी समय थोड़ा चाहिए।

जो घड़े-कच्चे, अपात्र! -डुबा गए मँझधार
तेरी सोहनी को चंद्रभागा की उफनती छालियों में
उन्हीं में से उसी का जल अनंतर तू पी सकेगा
औ' कहेगा, 'आह, कितनी तृप्ति!'

क्रौंच बैठा हो कभी वल्मीक पर तो मत समझ
वह अनुष्टुप् बाँचता है संगिनी से स्मरण के-
जान ले, वह दीमकों की टोह में है।
कविजनोचित न हो चाहे, यही सच्चा साक्ष्य है :
एक दिन तू सोहनी से पूछ लेना।

 

हरी घास पर क्षण भर

आओ बैठें
इसी ढाल की हरी घास पर।
माली-चौकीदारों का यह समय नहीं है,
और घास तो अधुनातन मानव-मन की भावना की तरह
सदा बिछी है-हरी, न्यौतती, कोई आ कर रौंदे।

आओ, बैठो।
तनिक और सट कर, कि हमारे बीच स्नेह-भर का व्यवधान रहे,
बस,
नहीं दरारें सभ्य शिष्ट जीवन की।

चाहे बोलो, चाहे धीरे-धीरे बोलो, स्वगत गुनगुनाओ,
चाहे चुप रह जाओ-
हो प्रकृतस्थ : तनो मत कटी-छँटी उस बाड़ सरीखी,
नमो, खुल खिलो, सहज मिलो
अंत:स्मित, अंत:संयत हरी घास-सी।

क्षण-भर भुला सकें हम
नगरी की बेचैन बुदकती गड्ड-मड्ड अकुलाहट-
और न मानें उसे पलायन;
क्षण-भर देख सकें आकाश, धरा, दूर्वा, मेघाली,
पौधे, लता दोलती, फूल, झरे पत्ते, तितली-भुनगे,
फुनगी पर पूँछ उठा कर इतराती छोटी-सी चिड़िया-
और न सहसा चोर कह उठे मन में-
प्रकृतिवाद है स्खलन
क्योंकि युग जनवादी है।

क्षण-भर हम न रहें रह कर भी :
सुनें गूँज भीतर के सूने सन्नाटे में
किसी दूर सागर की लोल लहर की
जिस की छाती की हम दोनों छोटी-सी सिहरन हैं-
जैसे सीपी सदा सुना करती है।

क्षण-भर लय हों-मैं भी, तुम भी,
और न सिमटें सोच कि हम ने
अपने से भी बड़ा किसी भी अपर को क्यों माना!

क्षण-भर अनायास हम याद करें :
तिरती नाव नदी में,
धूल-भरे पथ पर असाढ़ की भभक, झील में साथ तैरना,
हँसी अकारण खड़े महा-वट की छाया में,
वदन घाम से लाल, स्वेद से जमी अलक-लट,
चीड़ों का वन, साथ-साथ दुलकी चलते दो घोड़े,
गीली हवा नदी की, फूले नथुने, भर्रायी सीटी स्टीमर की,
खंडहर, ग्रथित अँगुलियाँ, बाँसे का मधु,
डाकिये के पैरों की चाँप
अधजानी बबूल की धूल मिली-सी गंध,
झरा रेशम शिरीष का, कविता के पद,
मसजिद के गुम्बद के पीछे सूर्य डूबता धीरे-धीरे,
झरने के चमकीले पत्थर, मोर-मोरनी, घुँघरू,
संथाली झूमुर का लंबा कसक-भरा आलाप,
रेल का आह की तरह धीरे-धीरे खिंचना, लहरें,
आँधी-पानी,
नदी किनारे की रेती पर बित्ते-भर की छाँह झाड़ की
अँगुल-अँगुल नाप-नाप कर तोड़े तिनकों का समूह,
लू,
मौन।

याद कर सकें अनायास : और न मानें
हम अतीत के शरणार्थी हैं;
स्मरण हमारा-जीवन के अनुभव का प्रत्यवलोकन-
हमें न हीन बनावे प्रत्यभिमुख होने के पाप-बोध से।
आओ बैठो : क्षण-भर :
यह क्षण हमें मिला है नहीं नगर-सेठों की फैयाज़ी से।
हमें मिला है यह अपने जीवन की निधि से ब्याज सरीखा।

आओ बैठो : क्षण-भर तुम्हें निहारूँ।
अपनी जानी एक-एक रेखा पहचानूँ
चेहरे की, आँखों की-अंतर्मन की
और-हमारी साझे की अनगिन स्मृतियों की :
तुम्हें निहारूँ,
झिझक न हो कि निरखना दबी वासना की विकृति है!

धीरे-धीरे
धुँधले में चेहरे की रेखाएँ मिट जाएँ-
केवल नेत्र जगें : उतनी ही धीरे
हरी घास की पत्ती-पत्ती भी मिट जावे लिपट झाड़ियों के पैरों में
और झाड़ियाँ भी घुल जावें क्षिति-रेखा के मसृण ध्वांत में;
केवल बना रहे विस्तार-हमारा बोध
मुक्ति का,
सीमाहीन खुलेपन का ही।

चलो, उठें अब,
अब तक हम थे बंधु सैर को आए-
(देखे हैं क्या कभी घास पर लोट-पोट होते सतभैये शोर मचाते?)

और रहे बैठे तो लोग कहेंगे
धुँधले में दुबके प्रेमी बैठे हैं।

-वह हम हों भी तो यह हरी घास ही जाने :
(जिस के खुले निमंत्रण के बल जग ने सदा उसे रौंदा है और वह नहीं बोली),
नहीं सुनें हम वह नगरी के नागरिकों से
जिन की भाषा में अतिशय चिकनाई है साबुन की
किंतु नहीं है करुणा

उठो, चलें, प्रिय।

 

छंद है यह फूल

छंद है यह फूल, पत्ती प्रास।
सभी कुछ में है नियम की साँस।
कौन-सा वह अर्थ जिसकी अलंकृति कर नहीं सकती
यही पैरों तले की घास?
समर्पण लय, कर्म है संगीत,
टेक करुणा-सजग मानव-प्रीति।
यति न खोजो-अहं ही यति है! -स्वयं रणरणित होते रहो, मेरे मीत!

 

तुम फिर आ गए, क्‍वार?

भाले की अनी-सी बनी बगुलों की डार,
फुटकियाँ छिट-फुट गोल बाँध डोलतीं
सिहरन उठती है एक देह में
कोई तो पधारा नहीं, मेरे सूने गेह में-
तुम फिर आ गए, क्‍वार?

 

बावरा अहेरी

भोर का बावरा अहेरी
पहले बिछाता है आलोक की
लाल-लाल कनियाँ
पर जब खींचता है जाल को
बाँध लेता है सभी को साथ :
छोटी-छोटी चिड़ियाँ, मँझोले परेवे, बड़े-बड़े-पंखी
डैनों वाले डील वाले डौल के बेडौल
उड़ने जहाज,
कलस-तिसूल वाले मंदिर-शिखर से ले
तारघर की नाटी मोटी चिपटी गोल धुस्सों वाली उपयोग-सुंदरी
बेपनाह काया को :
गोधूली की धूल को, मोटरों के धुएँ को भी
पार्क के किनारे पुष्पिताग्र कर्णिकार की आलोक-खची तन्वि रूप-रेखा को
और दूर कचरा जलाने वाली कल की उद्दंड चिमनियों को, जो
धुआँ यों उगलती हैं मानो उसी मात्र से अहेरी को हरा देंगी!

बावरे अहेरी रे
कुछ भी अवध्य नहीं तुझे, सब आखेट है :
एक बस मेरे मन-विवर में दुबकी कलौंस को
दुबकी ही छोड़ कर क्या तू चला जाएगा?
ले, मैं खोल देता हूँ कपाट सारे
मेरे इस खँडर की शिरा-शिरा छेद दे आलोक की अनी से अपनी,
गढ़ सारा ढाह कर ढूह भर कर दे :
विफल दिनों की तू कलौंस पर माँज जा
मेरी आँखें आँज जा
कि तुझे देखूँ
देखूँ और मन में कृतज्ञता उमड़ आए
पहनूँ सिरोपे से ये कनक-तार तेरे-
बावरे अहेरी।

 

जो कहा नहीं गया

है, अभी कुछ और जो कहा नहीं गया।

उठी एक किरण, धाई, क्षितिज को नाप गई,
सुख की स्मिति कसक-भरी, निर्धन की नैन-कोरों में काँप गई,
बच्चे ने किलक भरी, माँ की वह नस-नस में व्याप गई।
अधूरी हो, पर सहज थी अनुभूति :
मेरी लाज मुझे साज बन ढाँप गई-
फिर मुझ बेसबरे से रहा नहीं गया।
पर कुछ और रहा जो कहा नहीं गया।

निर्विकार मरु तक को सींचा है
तो क्या? नदी-नाले ताल-कुएँ से पानी उलीचा है
तो क्या? उड़ा दूँ, दौड़ा दूँ, तेरा हूँ, पारंगत हूँ,
इसी अहंकार के मारे
अंधकार में सागर के किनारे ठिठक गया : नत हूँ
उस विशाल में मुझ से बहा नहीं गया।
इसलिए जो और रहा, वह कहा नहीं गया।

शब्द, यह सही है, सब व्यर्थ हैं
पर इसीलिए कि शब्दातीत कुछ अर्थ हैं।
शायद केवल इतना ही : जो दर्द है
वह बड़ा है, मुझ से ही सहा नहीं गया।
तभी तो, जो अभी और रहा, वह कहा नहीं गया।

 

आगंतुक

आँख ने देखा पर वाणी ने बखाना नहीं।
भावना ने छुआ पर मन ने पहचाना नहीं।
राह मैंने बहुत दिन देखी, तुम उस पर से आए भी, गए भी,
-कदाचित्, कई बार-
पर हुआ घर आना नहीं।

 

जितना तुम्हारा सच है

1.
कहा सागर ने : चुप रहो!
मैं अपनी अबाधता जैसे सहता हूँ, अपनी मर्यादा तुम सहो।

जिसे बाँध तुम नहीं सकते
उसमें अखिन्न मन बहो।
मौन भी अभिव्यंजना है : जितना तुम्हारा सच है उतना ही कहो।
कहा नदी ने भी : नहीं, मत बोलो,
तुम्हारी आँखों की ज्योति से अधिक है चौंध जिस रूप की
उस का अवगुंठन मत खोलो
दीठ से टोह कर नहीं, मन के उन्मेष से
उसे जानो : उसे पकड़ो मत, उसी के हो लो।
कहा आकाश ने भी : नहीं, शब्द मत चाहो
दाता की स्पर्धा हो जहाँ, मन होता है मँगते का।
दे सकते हैं वही जो चुप, झुक कर ले लेते हैं।
आकांक्षा इतनी है, साधना भी लाये हो?
तुम नहीं व्याप सकते, तुम में जो व्यापा है उसी को निबाहो
2.
यही कहा पर्वत ने, यही घन-वन ने,
यही बोला झरना, यों कहा सुमन ने।
तितलियाँ, पतंगे, मोर और हिरने,
यही बोले सारस, ताल, खेत, कुएँ, झरने।
नगर के राज-पथ, चौबारे, अटारियाँ,
चीखती-चिल्लाती हुई दौड़ती जनाकुल गाड़ियाँ।
अग-जग एक मत! मैं भी सहमत हूँ।
मौन, नत हूँ।

तब कहता है फूल : अरे, तुम मेरे हो।
वन कहता है : वाह, तुम मेरे मित्र हो।
नदी का उलाहना है : मुझे भूल जाओगे?
और भीड़-भरे राज-पथ का : बड़े तुम विचित्र हो!
सभी के अस्पष्ट समवेत को
अर्थ देता कहता है नभ : मैंने प्राण तुम्हें दिये हैं,
आकार तुम्हें दिया है, स्वयं भले मैं शून्य हूँ।
हम सब सब-कुछ, अपना, तुम्हारा, दोनों दे रहे हैं तुम को
अनुक्षण; अरे ओ क्षुद्र-मन!
और तुम हम को एक अपनी वाणी भी हो
सौंप नहीं सकते?

सौंपता हूँ।

 

खुल गई नाव

खुल गई नाव
घिर आयी संझा, सूरज डूबा सागर तीरे।
धुँधले पड़ते से जल-पंछी
भर धीरज से मूक लगे मँडलाने,
सूना तारा उगा, चमक कर, साथी लगा बुलाने।
तब फिर सिहरी हवा, लहरियाँ काँपीं,
तब फिर मूर्छित व्यथा विदा की जागी धीरे-धीरे।

 

तुम हँसी हो

तुम हँसी हो-जो न मेरे ओठ पर दीखे,
मुझे हर मोड़ पर मिलती रही है।
धूप-मुझ पर जो न छायी हो,
किंतु जिस की ओर
मेरे रुद्ध जीवन की कुटी की खिड़कियाँ खुलती रही हैं।
तुम दया हो जो मुझे विधि ने न दी हो,
किंतु मुझ को दूसरों से बाँधती है
जो कि मेरी ही तरह इनसान हैं।
आँख जिन से न भी मेरी मिले,
जिन को किंतु मेरी चेतना पहचानती है।
धैर्य हो तुम : जो नहीं प्रतिबिम्ब मेरे कर्म के धुँधले मुकुर में पा सका,
किंतु जो संघर्ष-रत मेरे प्रतिम का, मनुज का,
अनकहा पर एक धमनी में बहा संदेश मुझ तक ला सका,
व्यक्ति की इकली व्यथा के बीज को
जो लोक-मानस की सुविस्तृत भूमि में पनपा सका।
हँसी ओ उच्छल, दया ओ अनिमेष,
धैर्य ओ अच्युत, आप्त, अशेष।

 

ब्राह्म-मुहूर्त : स्वस्तिवाचन

जियो उस प्यार में
जो मैं ने तुम्हें दिया है,
उस दुख में नहीं जिसे
बेझिझक मैं ने पिया है।

उस गान में जियो
जो मैं ने तुम्हें सुनाया है,
उस आह में नहीं जिसे
मैं ने तुम से छिपाया है।

उस द्वार से गुज़रो
जो मैं ने तुम्हारे लिए खोला है
उस अंधकार से नहीं
जिस की गहराई को
बार-बार मैंने तुम्हारी रक्षा की
भावना से टटोला है।

वह छादन तुम्हारा घर हो
जिसे मैं असीसों से बुनता हूँ, बुनूँगा;
वे काँटे-गोखरू तो मेरे हैं
जिन्हें मैं राह से चुनता हूँ, चुनूँगा।

वह पथ तुम्हारा हो
जिसे मैं तुम्हारे हित बनाता हूँ, बनाता रहूँगा;
मैं जो रोड़ा हूँ, उसे हथौड़े से तोड़-तोड़
मैं जो कारीगर हूँ, क़रीने से
सँवारता-सजाता हूँ, सजाता रहूँगा।

सागर के किनारे तक
तुम्हें पहुँचाने का
उदार उद्यम ही मेरा हो :
फिर वहाँ जो लहर हो, तारा हो,
सोन-तरी हो, अरुण सवेरा हो,
वह सब, ओ मेरे वर्य!
तुम्हारा हो, तुम्हारा हो, तुम्हारा हो।

 

हरा-भरा है देश

हरे-भरे हैं खेत
मगर खलिहान नहीं :
बहुत महतो का मान-
मगर दो मुठ्ठी धान नहीं।
भरा है दिल
पर नीयत नहीं :
हरी है कोख-
तबीयत नहीं।

भरी हैं आँखें
पेट नहीं :
भरे हैं बनिये के काग़ज़-
टेंट नहीं।

हरा-भरा है देश :
रुँधा मिट्टी में ताप
पोसता है विष-वट का मूल-
फलेंगे जिस में शाप।

मरा क्या और मरे
इसलिए अगर जिये तो क्या :
जिसे पीने को पानी नहीं
लहू का घूँट पिये तो क्या;

पकेगा फल, चखना होगा
उन्हीं को जो जीते हैं आज :
जिन्हें हैं बहुत शील का ज्ञान-
नहीं हैं लाज।

तपी मिट्टी जो सोख न ले
अरे, क्या है इतना पानी?
कि व्यर्थ है उद्बोधन, आह्वान-
व्यर्थ कवि की बानी?

 

सोन-मछली

हम निहारते रूप,
काँच के पीछे
हाँफ रही है मछली।

रूप-तृषा भी
(और काँच के पीछे)
है जिजीविषा।

 

मैं देख रहा हूँ

मैं देख रहा हूँ
झरी फूल से पँखुरी
-मैं देख रहा हूँ अपने को ही झरते।

मैं चुप हूँ :
वह मेरे भीतर वसंत गाता है।

 

सम्राज्ञी का नैवेद्य-दान

हे महाबुद्ध!
मैं मंदिर में आयी हूँ
रीते हाथ :
फूल मैं ला न सकी।

औरों का संग्रह
तेरे योग्य न होता।

जो मुझे सुनाती
जीवन के विह्वल सुख-क्षण का गीत-
खोलती रूप-जगत् के द्वार जहाँ

तेरी करुणा
बुनती रहती है
भव के सपनों, क्षण के आनंदों के
रह:सूत्र अविराम-
उस भोली मुग्धा को
कँपती
डाली से विलगा न सकी।

जो कली खिलेगी जहाँ, खिली,
जो फूल जहाँ है,
जो भी सुख
जिस भी डाली पर
हुआ पल्लवित, पुलकित,
मैं उसे वहीं पर
अक्षत, अनाघ्रात, अस्पृष्ट, अनाविल,
हे महाबुद्ध!
अर्पित करती हूँ तुझे।

वहीं-वहीं प्रत्येक भरे प्याला जीवन का,
वहीं-वहीं नैवेद्य चढ़ा
अपने सुंदर आनंद-निमिष का,
तेरा हो,
हे विगतागत के, वर्तमान के, पद्मकोश!
हे महाबुद्ध!
(जापान की सम्राज्ञी कोमियो प्राचीन राजधानी नारा के बुद्ध-मंदिर में जाते समय असमंजस में पड़ गई थी कि चढ़ाने को क्या ले जाए और फिर रीते हाथ गई थी। यही घटना कविता का आधार है।)

 

निरस्त्र

कुहरा था,
सागर पर सन्नाटा था :
पंछी चुप थे।
महाराशि से कटा हुआ
थोड़ा-सा जल
बन्दी हो
चट्टानों के बीच एक गढ़िया में
निश्छल था-
पारदर्श।

प्रस्तर-चुंबी
बहुरंगी
उद्भिज-समूह के बीच
मुझे सहसा दीखा
केंकड़ा एक :
आँखें ठंडी
निष्कौतूहल
निर्निमेष

जाने
मुझ में कौतुक जागा
या उस प्रसृत सन्नाटे में
अपना रहस्य यों खोल
आँख-भर तक लेने का साहस
मैंने पूछा : क्यों जी,
यदि मैं तुम्हें बता दूँ
मैं करता हूँ प्यार किसी को-
तो चौंकोगे?
ये ठंडी आँखें झपकेंगी
औचक?

उस उदासीन ने
सुना नहीं :
आँखों में
वही बुझा सूनापन जमा रहा।
ठंडे नीले लोहू में
दौड़ी नहीं
सनसनी कोई।

पर अलक्ष्य गति से वह
कोई लीक पकड़
धीरे-धीरे
पत्थर की ओट
किसी कोटर में
सरक गया

यों मैं
अपने रहस्य के साथ
रह गया
सन्नाटे से घिरा
अकेला
अप्रस्तुत
अपनी ही जिज्ञासा के सम्मुख निरस्त्र,
निष्कवच,
वध्य।

 

मन बहुत सोचता है

मन बहुत सोचता है कि उदास न हो
पर उदासी के बिना रहा कैसे जाय?

शहर के दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले,
पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव सहा कैसे जाय!

नील आकाश, तैरते-से-मेघ के टुकड़े,
खुली घासों में दौड़ती मेघ-छायाएँ,
पहाड़ी नदी : पारदर्शी पानी,
धूप-धुले तल के रंगारंग पत्थर,
सब देख बहुत गहरे कहीं जो उठे,
वह कहूँ भी तो सुनने को कोई पास न हो-
इसी पर जो जी में उठे वह कहा कैसे जाय!

मन बहुत सोचता है कि उदास न हो, न हो,
पर उदासी के बिना रहा कैसे जाय!

 

प्रार्थना का एक प्रकार

कितने पक्षियों की मिली-जुली चहचहाट में से
अलग गूँज जाती हुई एक पुकार :
मुखड़ों-मुखौटों की कितनी घनी भीड़ों में
सहसा उभर आता एक अलग चेहरा :
रूपों, वासनाओं, उमंगों, भावों, बेबसियों का
उमड़ता एक ज्वार
जिस में निथरती है एक माँग, एक नाम-
क्या यह भी है
प्रार्थना का एक प्रकार?

 

औपन्यासिक

मैं ने कहा : अपनी मन:स्थिति
मैं बता नहीं सकता। पर अगर
अपने को उपन्यास का चरित्र बताता, तो इस समय अपने को
एक शराबखाने में दिखाता, अकेले बैठकर
पीते हुए-इस कोशिश में कि सोचने की ताक़त
किसी तरह जड़ हो जाए।
कौन या कब अकेले बैठ कर शराब पीता है?
जो या जब अपने को अच्छा नहीं लगता-अपने को
सह नहीं सकता।
उस ने कहा : हुँ:, कोई बात है भला? शराबखाना भी
(यह नहीं कि मुझे इस का कोई तजुरबा है, पर)
कोई बैठने की जगह होगी-वह भी अकेले?
मैं वैसे में अपने पात्र को
नदी किनारे बैठाती-अकेले उदास बैठकर कुढ़ने के लिए।

मैंने कहा : शराबखाना
न सही बैठने लायक जगह! पर अपने शहर में
ऐसा नदी का किनारा कहाँ मिलेगा जो
बैठने लायक हो-उदासी में अकेले
बैठकर अपने पर कुढ़ने लायक?

उस ने कहा : अब मैं क्या करूँ अगर अपनी नदी का
ऐसा हाल हो गया है? पर कहीं तो ऐसी नदी
ज़रूर होगी?

मैं ने कहा : सो तो है-यानी होगी। तो मैं
अपने उपन्यास का शराबखाना
क्या तुम्हारे उपन्यास की नदी के किनारे
नहीं ले जा सकता?

उसने कहा: हुँ:! वह कैसे हो सकता है?
मैंने कहा : ऐसा पूछती हो, तो तुम उपन्यासकार भी
कैसे बन सकती हो?

उस ने कहा: न सही-हम नहीं बनते उपन्यासकार।
पर वैसी नदी होगी
तो तुम्हारे शराबखाने की ज़रूरत क्या होगी, और उसे
नदी के किनारे तुम ले जा कर ही क्या करोगे?

मैं ने जि़द कर के कहा: ज़रूर ले जाऊँगा! अब देखो, मैं
उपन्यास ही लिखता हूँ और उस में
नदी किनारे शराबखाना बनाता हूँ!

उस ने भी ज़िद कर के कहा: वह
बनेगा ही नहीं! और बन भी गया तो वहाँ तुम अकेले बैठ कर
शराब नहीं पी सकोगे!

मैं ने कहा: क्यों नहीं? शराबखाने में अकेले
शराब पीने पर मनाही होगी?

उस ने कहा: मेरी नदी के किनारे तुम को
अकेले बैठने कौन देगा, यह भी सोचा है?

तब मैंने कहा: नदी के किनारे तुम मुझे अकेला
नहीं होने दोगी, तो शराब पीना ही कोई
क्यों चाहेगा, यह भी कभी सोचा है?

इस पर हम दोनों हँस पड़े। वह
उपन्यास वाली नदी और कहीं हो न हो,
इस हँसी में सदा बहती है,
और वहाँ शराबखाने की कोई ज़रूरत नहीं है।

 

काँपती है

पहाड़ नहीं काँपता,
न पेड़, न तराई
काँपती है ढाल पर के घर से
नीचे झील पर झरी
दिये की लौ की
नन्ही परछाईं।

 

शहतूत

वापी में तूने
कुचले हुए शहतूत क्यों फेंके, लडक़ी?
क्या तूने चुराए-
पराये शहतूत यहाँ खाए हैं?

क्यों नहीं बताती?
अच्छा, अगर नहीं भी खाए
तो आँख क्यों नहीं मिलाती?

और तूने यह गाल पर क्या लगाया?
ओह, तो क्या शहतूत इसीलिए चुराए -
सच नहीं खाए?

शहतूत तो ज़रूर चुराए, अब आँख न चुरा !
नहीं तो देख, शहतूत के रस की रंगत से
मेरे ओठ सँवला जाएँगे
तो लोग चोरी मुझे लगाएँगे
और कहेंगे कि तुझे भी चोरी के गुर मैं ने सिखाये हैं!
तब, लडक़ी, हम किसे क्या बताएँगे!
कैसे समझाएँगे?

अच्छा, आ, वापी की जगत पर बैठ कर यही सोचें।
लडक़ी, तू क्यों नहीं आती?

 

देलोस से एक नाव

दाडिम की ओट हो जा, लड़की?
भोर-किरणों की ओट
देलोस की ओर से
एक नाव आ रही है!
क्या जाने, भोर-पंछियों के शोर के साथ
खित्तारे के स्वर भी उमड़ते हुए आने लगें!
मैं ने तो इसीलिए अंजीर की ओट ली है
और वंशी बजा रहा हूँ:
दाडिम की ओट हो जा, लडक़ी!
और सुन, तुझे बुला रहा हूँ!
(देलोस : एजियन सागर (पूर्वी भूमध्य सागर) के किवलदीस (साइक्लैंडीज़) द्वीप समूह का सबसे छोटा द्वीप। अपोलो का जन्म यहीं हुआ था, यहीं उसकी पूजा का प्रधान केंद्र था।)

 

कहाँ

मंदिर में
मैं ने एक बिलौटा देखा :
चपल थीं उस की आँखें
और विस्मय-भरी
उस की चितवन :
और उस का रोमिल स्पर्श
न्यौतता था
सिहरते अनजान खेलों के लिए
जिन का आश्वासन था उस के
लोचीले बिजली-भरे तन में!

बाहर
यह एक अजनबी नारी है :
आँखों में स्तम्भित, निषेधता अँधेरा,

बदन पर एक दूरी का ठंडा ओप!

भद्रे तुम ने मेरा बिलौटा
कहाँ छिपा दिया?

 

नीमाड़: चैत

1.
पेड़ अपनी-अपनी छाया को
आतप से
ओट देते
चुपचाप खड़े हैं।

तपती हवा
उन के पत्ते झराती जाती है।

2.
छाया को
झरते पत्ते
नहीं ढँकते,
पत्तों को ही
छाया छा लेती है।

 

देखिए न मेरी कारगुज़ारी

अब देखिए न मेरी कारगुज़ारी
कि मैं मँगनी के घोड़े पर
सवारी कर
ठाकुर साहब के लिए उन की रियाया से लगान
और सेठ साहब के लिए पंसार-हट्टे की हर दूकान
से किराया
वसूल कर लाया हूँ

थैली वाले को थैली
तोड़े वाले को तोड़ा
-और घोड़े वाले को घोड़ा।

सब को सब का लौटा दिया
अब मेरे पास यह घमंड है
कि सारा समाज मेरा एहसानमंद है।

 

हरा अंधकार

रूपाकार
सब अंधकार में हैं :
प्रकाश की सुरंग में
मैं उन्हें बेधता चला जाता हूँ,
उन्हें पकड़ नहीं पाता।

मेरी चेतना में इस की पहचान है
कि अंधकार भी
एक चरम रूपाकार है,
सत्य का, यथार्थ का विस्तार है,
पर मेरे शब्द की इतनी समाई नहीं-
यह मेरी भाषा की हार है।

प्रकाश मेरे अग्रजों का है
कविता का है, परंपरा का है,
पोढ़ा है, खरा है :
अंधकार मेरा है,
कच्चा है, हरा है।

 

जो पुल बनाएँगे

जो पुल बनाएँगे
वे अनिवार्यत:
पीछे रह जाएँगे
सेनाएँ हो जाएँगी पार
मारे जाएँगे रावण
जयी होंगे राम,
जो निर्माता रहे
इतिहास में
बंदर कहलाएँगे।

 

नंदा देवी-1

ऊपर तुम, नंदा!
नीचे तरु-रेखा से
मिलती हरियाली पर
बिखरे रेवड़ को
दुलार से टेरती-सी
गड़रिए की बाँसुरी की तान :

और भी नीचे
कट गिरे वन की चिरी पट्टियों के बीच से
नए खनि-यंत्र की
भठ्ठी से उठे धुएँ का फंदा।
नदी की घेरती-सी वत्सल कुहनी के मोड़ में
सिहरते-लहरते शिशु धान।

चलता ही जाता है यह
अंतहीन, अन-सुलझ
गोरख-धंधा!

दूर, ऊपर तुम, नंदा!

 

नंदा देवी-3

तुम
वहाँ से
मंदिर तुम्हारा
यहाँ है।
और हम-
हमारे हाथ, हमारी सुमिरनी-
यहाँ से-
और हमारा मन
वह कहाँ है?

 

नंदा देवी-8

यह भी तो एक सुख है
(अपने ढंग का क्रियाशील)
कि चुप निहारा करूँ
तुम्हें धीरे-धीरे खुलते!
तुम्हारी भुजा को बादलों के उबटन से
तुम्हारे बदन को हिम-नवनीत से
तुम्हारे विशद वक्ष को
धूप की धाराओं से धुलते!

यह भी तो एक योग है
कि मैं चुपचाप
सब कुछ भोगता हूँ
पाता हूँ
सुखों को,
निसर्ग के अगोचर प्रसादों को,
गहरे आनंदों को
अपनाता हूँ
पर सब कुछ को बाँहों में
समेटने के प्रयास से
स्वयं दे दिया जाता हूँ!

 

नंदा देवी-14

निचले
हर शिखर पर
देवल :
ऊपर
निराकार
तुम
केवल...

 

फूल की स्मरण-प्रतिमा

यह देने का अहंकार
छोड़ो।
कहीं है प्यार की पहचान
तो उसे यों कहो :
'मधुर, यह देखो
फूल। इसे तोड़ो
घुमा-फिरा कर देखो,
फिर हाथ से गिर जाने दो :
हवा पर तिर जाने दो-
(हुआ करे सुनहली) धूल।'

फूल की स्मरण-प्रतिमा ही बचती है।
तुम नहीं। न तुम्हारा दान।

 

काल की गदा

काल की गदा
एक दिन
मुझ पर गिरेगी।

गदा
मुझे नहीं भाएगी :
पर उस के गिरने की नीरव छोटी-सी ध्वनि
क्या काल को सुहाएगी?

 

नाच

एक तनी हुई रस्सी है जिस पर मैं नाचता हूँ।
जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँ
वह दो खंभों के बीच है।
रस्सी पर मैं जो नाचता हूँ
वह एक खंभे से दूसरे खंभे तक का नाच है।
दो खंभों के बीच जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँ
उस पर तीखी रोशनी पड़ती है
जिस में लोग मेरा नाच देखते हैं।
न मुझे देखते हैं जो नाचता है
न रस्सी को जिस पर मैं नाचता हूँ
न खंभों को जिस पर रस्सी तनी है
न रोशनी को ही जिस में नाच दीखता है :
लोग सिर्फ़ नाच देखते हैं।
पर मैं जो नाचता हूँ
जो जिस रस्सी पर नाचता हूँ
जो जिन खंभों के बीच है
जिस पर जो रोशनी पड़ती है
उस रोशनी में उन खंभों के बीच उस रस्सी पर
असल में मैं नाचता नहीं हूँ।
मैं केवल उस खंभे से इस खंभे तक दौड़ता हूँ
कि इस या उस खंभे से रस्सी खोल दूँ
कि तनाव चुके और ढील में मुझे छुट्टी हो जाए-
पर तनाव ढीलता नहीं
और मैं इस खंभे से
उस खंभे तक दौड़ता हूँ
पर तनाव वैसा बना ही रहता है
सब कुछ वैसा ही बना रहता है
और वही मेरा नाच है जिसे सब देखते हैं
मुझे नहीं
रस्सी को नहीं
खंभे नहीं
रोशनी नहीं
तनाव भी नहीं
देखते हैं-नाच!

 

महावृक्ष के नीचे
(पहला वाचन)


जंगल में खड़े हो?
महारूख के बराबर
थोड़ी देर खड़े रहो
महारूख ले लेगा तुम्हारी नाप।
लेने दो।
उसे वह देगा तुम्हारे मन पर छाप।
देने दो।

जंगल में चले हो?
चलो चलते रहो।
महारूख के साथ अपना नाता बदलते रहो।
उस का आयाम
उस का है, बहुत बड़ा है।
पर वह वहाँ खड़ा है।
और तुम चलते हो चलते हुए ही भले हो।

वह महारूख है
अकेला है, वन में है।
तुम महारूख के नीचे-
अकेले हो, वन तुम में है।

 

महावृक्ष के नीचे
(दूसरा वाचन)


वन में
महावृक्ष के नीचे खड़े
मैं ने सुनी
अपनी दिल की धड़कन।
फिर मैं चल पड़ा।
पेड़ वहीं
धारा की कोहनी से घिरा
रह गया खड़ा।

जीवन : वह धनी है, धुनी है
अपने अनुपात गढ़ता है।
हम : हमारे बीच जो गुनी है
उन्हें अर्थवती शोभा से मढ़ता है।

 

सभी से मैं ने विदा ले ली

सभी से मैं ने विदा ले ली :
घर से,
नदी के हरे कूल से,
इठलाती पगडंडी से
पीले वसंत के फूलों से
पुल के नीचे खेलती
डाल की छायाओं के जाल से।

सब से मैं ने विदा ले ली:
एक उसी के सामने
मुँह खोला भी, पर
बोल नहीं निकले।

हम
न घरों में मरते हैं न घाटों-अखियारों में
न नदी-नालों में
न झरते फूलों में
न लहराती छायाओं में
न डाल से छनती प्रकाश की सिहरनों में
इन सब से बिछुड़ते हुए हम
उन में बस जाते हैं।
और उन में जीते रहते हैं
जैसे कि वे हम में रस जाते हैं
और हमें सहते हैं।

एक मानव ही-हर उस में जिस पर हमें ममता होती है
हम लगातार मरते हैं,
हर वह लगातार
हम में मरता है,
उस दोहरे मरण की पहचान को ही
कभी विदा, कभी जीवन-व्यापार
और कभी प्यार
हम कहते हैं।

 

पत्ता एक झरा

सारे इस सुनहले चँदोवे से
पत्ता कुल एक झरा
पर उसी की अकिंचन
झरन के
हर कँपने में
मैं कितनी बार मरा!

 

मेरे देश की आँखे

नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं
पुते गालों के ऊपर
नकली भँवों के नीचे
छाया प्यार के छलावे बिछाती
मुकुर से उठायी हुई
मुस्कान मुस्कुराती
ये आँखें-
नहीं, ये मेरे देश की नहीं हैं...

तनाव से झुर्रियाँ पड़ी कोरों की दरार से
शरारे छोड़ती घृणा से सिकुड़ी पुतलियाँ-
नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं...

वन डालियों के बीच से
चौंकी अनपहचानी
कभी झाँकती हैं
वे आँखें,
मेरे देश की आँखें;
खेतों के पार
मेड़ की लीक धारे
क्षिति-रेखा को खोजती
सूनी कभी ताकती हैं
वे आँखें...

उसने
झुकी कमर सीधी की
माथे से पसीना पोंछा
डलिया हाथ से छोड़ी
और उड़ी धूल के बादल के
बीच में से झलमलाते
जाड़ों की अमावस में से
मैले चाँद-चेहरे सकुचाते
में टँकी थकी पलकें
उठायीं-
और कितने काल-सागरों के तार तैर आईं
मेरे देश की आँखें...

 

मैं ने पूछा क्या कर रही हो

मैं ने पूछा
यह क्या बना रही हो?
उस ने आँखों से कहा
धुआँ पोंछते हुए कहा :
मुझे क्या बनाना है! सब-कुछ
अपने आप बनता है
मैं ने तो यही जाना है।
कह लो मुझे भगवान ने यही दिया है।

मेरी सहानुभूति में हठ था:
मैं ने कहा: कुछ तो बना रही हो
या जाने दो, न सही-
बना नहीं रही-
क्या कर रही हो?
वह बोली: देख तो रहे हो
छीलती हूँ
नमक छिड़कती हूँ
मसलती हूँ
निचोड़ती हूँ
कोड़ती हूँ
कसती हूँ
फोड़ती हूँ
फेंटती हूँ
महीन बिनारती हूँ
मसालों से सँवारती हूँ
देगची में पलटती हूँ
बना कुछ नहीं रही
बनता जो है-यही सही है-
अपने-आप बनता है
पर जो कर रही हूँ-
एक भारी पेंदे
मगर छोटे मुँह की
देगची में सब कुछ झोंक रही हूँ
दबा कर अँटा रही हूँ
सीझने दे रही हूँ।
मैं कुछ करती भी नहीं-
मैं काम सलटती हूँ।

मैं जो परोसूँगी
जिन के आगे परोसूँगी
उन्हें क्या पता है
कि मैंने अपने साथ क्या किया है?

 

घर

1.

मेरा घर
दो दरवाजों को जोड़ता
एक घेरा है
मेरा घर
दो दरवाजों के बीच है
उसमें
किधर से भी झाँको
तुम दरवाजे से बाहर देख रहे होंगे
तुम्हें पार का दृश्य दीख जाएगा
घर नहीं दीखेगा।

मैं ही मेरा घर हूँ।
मेरे घर में कोई नहीं रहता
मैं भी क्या
मेरे घर में रहता हूँ
मेरे घर में
जिधर से भी झाँको...

2.
तुम्हारा घर
वहाँ है
जहाँ सड़क समाप्त होती है
पर मुझे जब
सड़क पर चलते ही जाना है
तब वह समाप्त कहाँ होती है?
तुम्हारा घर...


3.
दूसरों के घर
भीतर की ओर खुलते हैं
रहस्यों की ओर
जिन रहस्यों को वे खोलते नहीं।
शहरों में होते हैं
दूसरों के घर
दूसरों के घरों में
दूसरों के घर
दूसरों के घर हैं।


4.
घर
हैं कहाँ जिनकी हम बात करते हैं
घर की बातें
सब की अपनी हैं
घर की बातें
कोई किसी से नहीं करता
जिनकी बातें होती हैं
वे घर नहीं हैं।

5.
घर
मेरा कोई है नहीं
घर मुझे चाहिए :
घर के भीतर प्रकाश हो
इसकी भी मुझे चिंता नहीं है
प्रकाश के घेरे के भीतर मेरा घर हो-
इसी की मुझे तलाश है।
ऐसा कोई घर आपने देखा है?
देखा हो
तो मुझे भी उसका पता दें
न देखा हो
तो मैं आपको भी
सहानुभूति तो दे ही सकता हूँ
मानव होकर भी हम-आप
अब ऐसे घरों में नहीं रह सकते
जो प्रकाश के घेरे में हैं
पर हम
बेघरों की परस्पर हमदर्दी के
घेरे में तो रह ही सकते हैं!

 

चीनी चाय पीते हुए

चाय पीते हुए
मैं अपने पिता के बारे में सोच रहा हूँ।

आपने कभी
चाय पीते हुए
पिता के बारे में सोचा है?

अच्छी बात नहीं है
पिताओं के बारे में सोचना।

अपनी कलई खुल जाती है।

हम कुछ दूसरे हो सकते थे।
पर सोच की कठिनाई यह है कि दिखा देता है
कि हम कुछ दूसरे हुए होते
तो पिता के अधिक निकट हुए होते
अधिक उन जैसे हुए होते।

कितनी दूर जाना होता है पिता से
पिता जैसा होने के लिए!
पिता भी
सवेरे चाय पीते थे
क्या वह भी
पिता के बारे में सोचते थे-
निकट या दूर?

 

छंद

मैं सभी ओर से खुला हूँ
वन-सा, वन-सा अपने में बंद हूँ
शब्द में मेरी समाई नहीं होगी
मैं सन्नाटे का छंद हूँ।

 

वसीयत

मेरी छाती पर
हवाएँ लिख जाती हैं
महीन रेखाओं में
अपनी वसीयत
और फिर हवाओं के झोंके ही
वसीयतनामा उड़ा कर
कहीं और ले जाते हैं।
बहकी हवाओ! वसीयत करने से पहले
हलफ़ उठाना पड़ता है
कि वसीयत करनेवाले के
होश-हवास दुरुस्त हैं :
और तुम्हें इसके लिए
गवाह कौन मिलेगा
मेरे ही सिवा?

क्या मेरी गवाही
तुम्हारी वसीयत से ज़्यादा टिकाऊ होगी?

 

मैं वह धनु हूँ

मैँ वह धनु हूँ, जिसे साधने
में प्रत्यंचा टूट गई है
स्खलित हुआ है बाण यद्यपि ध्वनि
दिग्दिगंत में फूट गई है-

प्रलयस्वर है वह, या है बस
मेरी लज्जाजनक पराजय-
या कि सफलता! कौन कहेगा
क्या उसमें है विधि का आशय!

क्या मेरे कर्मों का संचय
मुझको चिंता छूट गई है-
मैं बस जानूँ मैँ धनु हूँ, जिस
की प्रत्यंचा टूट गई है!

 


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