hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

कविताएँ
रंजना जायसवाल


कला के पारखी

अपनी हँसी

संवेदना की सीमेंट

साड़ी और जींस

मैं भी माँ हूँ

तीज

नौकर

हरियाली

प्रगतिशील

आजादी का सुख

डुप्लीकेट

फेसबुक पर स्त्री

एक लोकगीत को सुनकर

मेट्रो में महिला केबिन

रवना

हरे झंडे क्यों ?

सेमल

पेड़

फागुन

हरा पत्ता और पेड़

बेटी है कि माँ है घास

स्पर्श

जिंदगी की चैत में

पेड़ यह जानता है

क्योंकि तुम स्त्री हो, प्रकृति

मदार

पुरइन मगन हो जाती है

प्रेम कविताएँ

प्रेम में पुरुष

प्रेम

भर्तृहरि नियति

तुम्हारा चेहरा

तुम्हारे साथ

कला के पारखी

उनके ड्राइंग रूम में सजे हैं
पुष्ट, अधखुले अंगों वाली
खुले में नहाती
करतब दिखातीं
बच्चे को बिना आँचल से ढँके
दूध पिलाती
गरीब-बदहाल
आदिवासी युवतियों के
बेशकीमती तैलचित्र
वे कला के सच्चे पारखी हैं

 

अपनी हँसी

गंजे की टोपी छीनकर
हँसा वह
अंधे की लाठी छीनकर
लंगड़े को मारकर टँगड़ी हँसा
भूखे की रोटी छीनकर
सीधे को ठगकर
औरत को गरियाकर
हँसता ही गया वह
मैंने गौर से देखा उसे
वह बेहद गरीब था
उसके पास अपनी
हँसी तक नहीं थी

 

संवेदना की सीमेंट

घर की छत
सुकून नहीं दे रही
बाहर कोई छत ही नहीं
जीने के लिए चाहिए मगर
एक छत
संवेदना की सीमेंट से बनी


साड़ी और जींस

एक दिन जींस और साड़ी में हो गई तकरार
कहा साड़ी ने ठसक से -
मैं हूँ मर्यादा,परम्परा,संस्कृति-संस्कार
सौ प्रतिशत देशी
तू क्यों घुस आई मेरे देश में विदेशी

वैदिक काल से मैं स्त्री की पहचान थी
आन-बान-शान थी
घूँघट आँचल और सम्मान थी
बेटियाँ बचपन में मुझे लपेट
माँ की नकल करती थीं
दसवीं के फेयरवेल तक
पिता को चिंतित कर देती थीं
उनकी पुतरी-कनिया भी
मुझे ही पहनती थीं
भारत माँ हों या हमारी देवियाँ
देखा है कभी किसी ने
मेरे सिवा पहनते हुए कुछ
जब से तू आई है बिगड़ गया है
सारा माहौल
हर जगह उड़ रहा है
मेरा मखौल
बेटियाँ तो बेटियाँ
गुड़िया तक जींस पहनने लगी है
गाँव-शहर की बड़ी-बूढ़ी भी
तुम्हारे लिए तरसने लगी हैं
ना तो तू रंग-बिरंगी है
ना रेशमी-मखमली
फिर भी जाने क्यों लगती है सबको भली
नए-नए फतवे हैं तुम्हारे खिलाफ
नाराज हैं तुमसे हमारे खाप
फिर भी तू बेहया-सी यहीं पड़ी है
मेरी प्रतिस्पर्धा में खड़ी है |
मुस्कुराई जींस -
बहन साड़ी मत हो मुझ पर नाराज
मैंने कहाँ छीना तुम्हारा राज
हो कोई भी पूजा-उत्सव
पहनी जाती हो तुम ही
सुना है कभी जींस में हुआ
किसी लड़की का ब्याह
फिर किस बात की तुमको आह
मैं तो हूँ बेरंग-बेनूर
साधारण-सी मजदूर
ना शिकन का डर,ना फटने का
मिलता है मुझसे आराम
दो जोड़ी में भी चल सकता है
वर्ष-भर का काम
तुम फट जाओ तो लोग फेंक देते हैं
मैं फट जाऊँ तो फैशन समझ लेते हैं
अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष का भेद मिटाती हूँ
कीमती समय भी बचाती हूँ
युवा-पीढ़ी को अधिक कामकाजी
सहज और जनतांत्रिक बनाती हूँ
सोचो जरा द्रौपदी ने भी जींस पहनी होती
क्या दुःशासन की इतनी हिम्मत होती
फिर भी जाने क्यों पंडित-मौलवी और खाप
रहते हैं मेरे खिलाफ
दीखता है उन्हें मुझमें अंहकार
और तुझमें संस्कार
जबकि सिर्फ अलग हैं हमारे नाम
करते हैं दोनों एक ही काम
सुनो बहन
देशी-विदेशी, अपने-पराये की बात आज बेकार है
'बसुधैव-कुटुंबकम्' प्रगति का आधार है

 

मैं भी माँ हूँ

एक सपना
सूखे बीज की तरह
दबा रहा बरसो
मेरी कोख में
प्रेम-वर्षा में आकाश के
भीगकर कुछ पल
अंकुरित हुआ
बढ़ने लगा
अपनी छाती का रक्त पिलाकर
पाला उसे
बरसात में सूखा रखा
ग्रीष्म में नम
आज वह सबल, सक्षम वृक्ष है
पिता से हँसता-बतियाता है
दुनिया को देता है फल-फूल भरपूर
झुककर नहीं देखता कभी मेरी ओर
उसकी नजर में
मैं सूखी-बंजर जमीन हूँ
उसकी सफलता में कहीं नहीं हूँ
मैं भी जाने कैसी माँ हूँ !

 

तीज

आकाश ने भेजा है
धरती को हरितालिका तीज
लेकर आये हैं भाई बादल
हरी साड़ी चूड़ियाँ हरी
फल मिठाइयाँ खूब
किशोरी से युवती हो रही नदियाँ
उमड़ रही हैं देखकर बादलों को
मछलियों की चमक रही हैं आँखें
नाच रहे हैं मोर
गा रहे हैं दादुर
सीप और घोंघों में भी पड़ गयी है जान
बस तिलमिला रही है अकेली ननद धूप
छिपती -फिरती इधर -उधर
कि कब जायेंगे मुए बादल
और कायम होगा फिर से उसका राज
खुशी से उछल रही है धरती
रचा रही है मेहँदी झूल रही है झूला
गा रही है कजरी जबकि रो रहे हैं
भोकार पार बादल
देखकर बरस बाद बहन को पूछती है
धरती - गये थे क्या छोटी के पास भी रेगिस्तान?
भाई हैरान कि है एक बहन और
सुदूर रेगिस्तान सोच रहे हैं
वे -तो इसीलिए जाते हैं बड़े भैया
बहाने से कभी-कभार रेगिस्तान
बता रही है धरती छोटी ने किया था
प्रेम -विवाह बहिष्कृत होकर सबसे
रेत-रेत हो गयी भुगत रहे हैं
खमियाजा आज भी उसके बेटे पेड़
बहन तो आखिर बहन होती है वो भी सहोदरा
रोती है धरती मुँह पर डाल कर आँचल
करते हैं बादल वादा उससे
जायेंगे जरूर किसी न किसी सावन
छोटी को लेकर तीज हरी साड़ी चूड़ियाँ हरी
फल मिठाइयाँ खूब

 

नौकर

'कोई नौकर क्यों नहीं रख लेतीं
कोई गरीब बच्चा आराम हो जाएगा
ज्यादा लिख-पढ़ पाएँगी समय बचेगा
बचेगी ऊर्जा किसी बड़े को मत रखना
रख सकता है किसी रात गर्दन पर छुरी
स्त्री मिलेगी नहीं ईमानदार जरूरतमंद
रहेगा बच्चा ही ठीक
पहाड़ का हो तो और भी'
अक्सर मित्र सलाह देते हैं
सोचती हूँ मैं भी कि हो कोई ऐसा
सँभाल ले घर निश्चिंत होकर
कहीं आ-जा सकूँ
निपटा सकूँ बाहर के काम
सृजन करूँ और भी ज्यादा
पर ज्यों ही आता है सामने कोई बच्चा
मेरा मन जाने कैसा हो जाता है
यह काम करेगा मैं लिखूँगी-पढ़ूँगी
यह गुलाम होगा मैं आजाद
नहीं पच पाती मन को यह बात
हर बार मैं नौकर-विहीन रह जाती हूँ
और मित्रों में गरीब सोच की समझी जाती हूँ


 

हरियाली

हरियाली की बात करते -करते
बटोर लेते हैं वे अपनी कई
पीढ़ियों के लिए
हरियाली
और हमेशा हरे रहते है
भले ही चारों तरफ
सुखाड़ पड़ा हो

 

प्रगतिशील

जनेऊ की जगह
मांस की मोटी लकीर है
चोटी सिर के ऊपर नहीं
मस्तिष्क की शिराओं को
निर्देशित करती
अंदर गतिशील है
जी,सही समझे आप
ऐसे ही आज के
प्रगतिशील हैं


 

आजादी का सुख

खिलखिला रहे हैं घूरे के फूल
न खाद न पानी
न ममता न दुलार
न किसी की देखभाल
फिर भी गमले के फूलों से
ज्यादा चटख हैं
घूरे के फूल
धूप हवा बारिश का
सीधा प्रहार झेलकर
कचरे से खींचकर आहार
हृष्ट-पुष्ट,मस्त
और आजाद है घूरे के फूल
जबकि मुट्ठी भर
धूप हवा पानी खाद के साथ
प्यार -दुलार से बढ़े
गमले के फूल
कुछ फीके हैं
जानते हैं वे
कभी भी तोड़ कर उन्हें
चढ़ाया जा सकता है
देवताओं को
पूरी जिंदगी जीनी है उन्हें
एक कमरे की शोभा बनकर
वे सपने में भी नहीं सोच सकते
धूप हवा बारिश में भीगने
खुलकर जीने
और अपनी आजादी के बारे में
इसलिए उदास हैं कुछ |

 

डुप्लीकेट

बाजार में
भरी पड़ी हैं
डुप्लीकेट चीजें
जेवर
कपड़े
जूते से लेकर
आम जरूरत की
हर चीज
अमीर नाराज कि
छोटे-बड़े का अंतर मिटा रही हैं
ये चीजें ...
सड़कछाप भी उनके जैसे दीखते
कपड़े-जूतों में शान से निकलने लगे हैं
हजार के असली के बदले
सौ का नकली खरीद अकड़ने लगे हैं

 

फेसबुक पर स्त्री

कुछ ने संस्कृति के लिए खतरा बताया
कुछ के मुँह में भर आया पानी
कुछ ने बेहतर कहा तो कुछ ने सिर-दर्द
कुछ हँसे - इनके भी विचार ?
कुछ सपने देखने लगे कुछ दिखाने लगे
कुछ के हिसाब से प्रचार था
कुछ के विचार
कुछ दबी जुबान व्यभिचार भी कह रहे थे
हैरान थी स्त्री
इक्कीसवीं सदी के पुरुषों की मानसिकता जानकर
देह से दिमाग मादा से मनुष्य की यात्रा में
नहीं है पुरुष आज भी उसके साथ
कुछ को उसने फेसबुक से हटा दिया
हटने वाले कुछ झल्लाए
कुछ इल्जाम लगाए
कुछ चिल्लाए-एक औरत की ये मजाल!
स्त्री ने भी नही मानी हार
सोच लिया उसने
बदल कर रहेगी वह
फेसबुक की स्त्री के बारे में
पूर्वाग्रहियों के विचार|
एक लोकगीत को सुनकर

राजा ने आकाश में उड़ती मैना का शिकार किया
बाँधकर घर लाए
घर वालों को पकड़ने की वजह बताई
-'इसके पूर्व जनम का करम ही ऐसा था
कि मुझे शिकार का धर्म निभाना पड़ा |'
जबकि राजा को बौड़म बेटे के लिए
जीती -जागती मैना की दरकार थी
घर के पिंजरे में कैद, आज्ञाकारिणी
उड़ती मैना से उन्हें चिढ़ थी
राजा ने बेटे से कहा -ले जाओ इसे और खेलो
राजकुमार ने मैना के पंख नोच लिए
और कहा - उड़ो
पंख बिना मैना कैसे उड़ती
झल्लाकर राजकुमार ने मैना के पैर तोड़ दिए
और आदेश दिया - नाचो
मैना नाच न सकी
गुस्से से पागल हो उठा राजकुमार
मैना का गला दबाकर चीखने लगा -
गाओ ...गाओ ...गाओ
मैना निष्पन्द पड़ी थी
राजकुमार रोने लगा
कि गुस्ताख मैना ने नहीं मानी
उसकी एक भी बात
इससे अच्छी तो चाभी वाली मैना थी
राजा आए और राजकुमार को समझाने लगे -
तुमने नहीं सीखी अभी तक
स्त्री साधने की कला !
कुछ और नहीं करना था
बस दिखाते रहना था
मुक्ति का स्वप्न

 

मेट्रो में महिला केबिन

पुरुष नाराज हैं कि मैट्रो में महिला केबिन बन गए
ज्यादा नाराज हैं कि उनके केबिनों में भी
महिलाओं के लिए आरक्षित जगह है वे चाहते हैं
पुरुषों के भी ऐसे केबिन बनें
जहाँ महिलाएँ प्रवेश न कर सकें
वे कहते हैं, कितनी ज्यादती है पुरुषों के साथ
कि आपातकाल में भी नहीं रख सकते
महिला केबिन में पाँव
भले ही केबिन पूरी तरह खाली हो
और वे जब चाहें घुस आएँ
जनरल केबिनों में साधिकार
दोनों केबिनों के बीच
जो [बाघा] बार्डर है
होती है लगभग रोज ही लड़ाई
स्त्री-पुरुष के बीच
स्त्री का पक्ष है कि मेट्रो की भीड़ में
महिलाओं के बीच वे सुरक्षित हैं
अभद्रता छेड़खानी अवसर देख मनमानी
नहीं कर पा सकने से
पुरुषों में बौखलाहट है मैं चिंतित हूँ
निरंतर बढ़ती जाती
इस विभाजक रेखा से
बार्डर के दोनों तरफ
एक-दूसरे को शत्रु भाव से घूरते
गुर्राते-किटकिटाते
स्त्री-पुरुष आखिर
कौन सा इतिहास रच रहे हैं ?

रवना

क्यों रवना तुमने क्यों दी स्वीकृति
कि काट ले तुम्हारी जीभ
तुम्हारे ही कोख का जना
रक्त से पला-बढा पति आर्यभट की आज्ञा थी
काट ली जाए तुम्हारी जीभ
तुम दुराचारिणी नहीं थी ना ही तोड़ी थी
पिता या पति के कुल की मर्यादा
तुम्हारी जीभ पर सरस्वती का वास था
बस यही तुम्हारा अपराध था
|थी पाटीगणित में इतनी प्रवीण
कि भारी पड़ गयी गणितज्ञ पति पर
बुलाया गया राज सभा में सम्मान के लिए
पति के दंभ पर चोट लगी
दिया पुत्र को आदेश
कि काट ले तुम्हारी जीभ
जिस पर विराजती है सरस्वती
धर्मसंकट पुत्र का नहीं देखा गया तुमसे
दे दी स्वीकृति तुमने ऐसा क्यों किया रमना
क्यों नहीं खड़ी हुई इस अन्याय के खिलाफ
क्या नहीं जानती थी कि इस देश में
स्त्री को स्त्री होने का दंड दिलाया जाता है
पुत्र के हाथों
मातृत्व के महिमा-मंडन के नाम पर
कि स्त्री की दो अंगुल मात्र प्रज्ञा ही
सहन कर पाती है पितृसत्ता
अधिक बुद्धि महँगी पड़ती है उसे
अपाला से गार्गी तक का लम्बा इतिहास है
खड़ा होना चाहिए था तुम्हें इस व्यवस्था के खिलाफ
तुम्हारे व्यक्ति पर क्यों हावी हो गयी
वही सनातन स्त्री
जिसकी दुनिया घूमती है
एक छोटे दायरे में साजिशन
और ताना भी सुनती है वही
कि नहीं है बड़े दायरे के लायक
रवना आज भी जब किसान
तुम्हारी अन्वेषित पद्धति से
भविष्यवाणी करते हैं बारिश और सूखे की
सोचती हूँ मैं नहीं दिया होता जो तुमने
पुरूष की अहंकार-वेदी पर अपना बलिदान
कितना कुछ दिया होता संसार को |

हरे झंडे क्यों ?

वे चिंतित हैं कि कुछ छतों पर
हरे झंडे क्यों हैं? मुझे डर है
कहीं वे कानून न बना दें
पेड़ हरे पत्ते और फल न उगायें
हरी फसलों पर मुकदमे चलाए जाएँ
कि उनके आदेश से तोते किसी दूसरे मुल्क चले जाएँ
कि औरतें हरी साड़ियाँ तो कत्तई न पहनें
और इस बात का खास खयाल रखें
कि उनकी रसोई में हरी सब्जियाँ न आने पायें
कि उनकी कोख हरी न हो
दुर्लभ होते हरित -प्रदेश में
वे हरियाली की कुर्की कराने वाले हैं
पक्षियो फसलो और औरतो कृपया सावधान

सेमल

पत्ते पुत्र हैं कलियाँ बेटियाँ जानता है सेमल
बेटे रहेंगे देर तक साथ
बेटियाँ विदा हो जाएँगी
फूल बनते ही फिर भी भेद नहीं बरतता है
तब भी नहीं जब
कलियों के युवा होते ही
दूर-दूर से आने लगती है
रसिकों की टोली जानता है
जब तक बेटियाँ हैं घर जगमग है
जाते-जाते भी दे जायेंगी वे फल
जिसमें सृजित होगी श्वेत...कोमल ऊष्मा
जिसे जानेगा संसार उसके ही नाम से

पेड़

कड़ी धूप में तपते हुए भी
अपनी कद-भर छाया
ओढ़ा रहे हैं धरती को
जुड़ा रही है धरती
देखकर पुत्रों का प्रेम
उमड़ रहा है स्तनों में दूध
सींच रही है जिससे
अपनी कोख में फैली
उनकी जड़ों को
पाकर जिनसे शक्ति
लड़ लेते हैं पेड़
हर आपदा से
कैसा अद्भुत होता है
माँ-पुत्र का रिश्ता|

फागुन

कत्थई देह पर
गुलाबी...धानी हरे और पीले शेड्स वाले
फागुनी कपड़े पहने
साँवली बँहों में लाल फूलों की पिचकारी उठाए
आकाश को रंग रहा है सेमल खुश है
कि इस फागुन में पूरा कुनबा है साथ
बाल-युवा-वृद्ध पत्ते कलियाँ-फूल सब
चींटे..भ्रमर ..कौओं जैसे
अतिथियों की भी आगत है
फागुन तुम्हारा स्वागत है

 

हरा पत्ता और पेड़

हरा पत्ता लाख छटपटाए पेड़ भी चाहे
नहीं जुड़ सकते दोनों अलग होने के बाद
पत्तों की भीड़ में भी
कसकता रहता है पेड़ का मन
उस पत्ते के लिए
जो उसकी ही देह का हिस्सा था
पत्ते को भटकना ही होता है
सूखना ही पड़ता है समय से पहले
उड़ना होता है निर्मम हवा के संग
फिर नदी...पोखर...नाला या खेत
जैसी हो उसकी नियति
वैसे तो पूरी उम्र जीने के बाद
हर पत्ते की यही है परिणति
जानता है पेड़ फिर भी टूटता है
जब कोई हर पत्ता
फूट-फूटकर रोता है पेड़

 

बेटी है कि माँ है घास

माँ धरती की नंगी देह को
हरे मखमल से
ढाँक रही है
बेटी घास
हरी हो गयी है
धरती की सूखी देह
बेटी के शीतल,सुखद,कोमल
स्पर्श से
जानती है घास
कि माँ पर आधिपत्य है जिनका
नहीं भाता उन्हें माँ-बेटी का इतना प्यार
वे कभी भी सोहवाकर,चरवाकर
या मशीन चलवाकर
खींच लेंगे उनका सारा मखमल
वह भी सूख जायेगी
माँ से बिछड़कर
फिर भी मचल-मचलकर चिपक रही है
माँ की छाती से घास
माँ से ही सिखा है उसने माँ बनना
उसकी स्नेहिल गोद में भी
खेलते हैं बच्चे बिना चोट खाए
युवा प्रेम करते हैं निश्चिंत
सखी मानकर उसे
बूढ़े दुःख-दर्द बाँटते हैं
हमदर्द की तरह
फिर भी धरती की छाती से
चिपकती है वह बेटी की तरह |

स्पर्श

सेमल की कलियाँ वैसे तो साँवली हैं
पर सूर्य के परस से
वैसे ही लाल हो जाती हैं
जैसे सूखी-साँवली लड़कियाँ
ससुराल जाकर
गुलाब हो जाती हैं

 

जिंदगी की चैत में

प्रौढ़ हो गयी है हरी मटर
जिंदगी की चैत में
पीला पड़ रहा है रंग
ना पहले-सी कोमलता ना लचक
कड़ी हो रही है जिल्द
जड़ें,लतरें,टहनियाँ,पत्तियाँ
सब सूख रही हैं देख रही है मटर
कल तक जो पौधे लिपटाए रहते थे उसे
झटक रहे हैं दामन
यहाँ तक कि मेड़ों ने भी
तोड़ लिया है नाता जो अपनी पीठ पर
ममता से चढने देती थीं
वे सब तो पराये हैं
उसके अपने ... छिलके
जिनकी सुरक्षा में उम्र गुजारी
दिखा रहे हैं उसे बाहर का रास्ता
सखी मिट्टी की गोद में
लोट-लोट कर रो रही है मटर
मिट्टी समझाती है उसे -
पगली क्यों हो रही यूँ हलकान
सूखने पर भी नहीं खत्म होगा
तुम्हारा मान-सम्मान
रस भले ना रहे तुममें
बचा रहेगा रूप और स्वाद
भींगकर घुघनी-छोले
भूनकर चबैना-सत्तू दलकर दाल का
रूप लोगी तुम यहाँ तक कि तुम्हीं से होगी
नई हरी मटरों की फसल तैयार

पेड़ यह जानता है

इस बसंत सेमल में
नए,युवा और पुराने पत्ते साथ हैं
दूर से दिख रहे हैं सभी एक जैसे
पर पास से नए का धानी, युवा का हरा
और पुरानों का पीला रंग
साफ चमकता है
नयों में कमनीयता कोमलता और रस है
और पुराने हो रहे हैं तेजी से शुष्क और रसहीन
वैसे स्वभाव दोनों का एक हैं
क्षण में खुश क्षण में कुप्पा
जीभ भी तेज है दोनों की
हरा दोनों को सँभालता है
पेड़ यह जानता है
पुराने नयों में अपना बचपन पा रहे हैं
युवा पुराने में अपना भविष्य
बच्चे इन सबसे निश्चिन्त हैं
बूढों की सिकुड़ी त्वचा
उनके लिए खेल है ..कौतूहल है

 

क्योंकि तुम स्त्री हो, प्रकृति

बड़ीरचनात्मक हो तुम प्रकृति
अद्भुत है तुम्हारी कल्पना
मनुष्य की कल्पना
कहाँ पहुँच पाई है तुम तक
इतने आकार-प्रकार
रूप-रंग कहाँ से लाती हो तुम
नदी, पहाड़, झरनों आदि को तो जाने दें
देखें सिर्फ पेड़-पौधों को ही तो
चकित रह जाता है मन
कितनी बारीकी से एक-एक पत्ती
हर एक पुष्प में रंग भरती हो तुम
कई फूलों में तो होते हैं
कई-कई रंग
पँखुरी,कलँगी,पराग सबके अलग
|कैसी है तूलिका तुम्हारे पास
कि फैलता नहीं जरा-सा भी रंग
मजाकिया भी कम नहीं हो
ऐसी-ऐसी बना देती हो मुखाकृतियाँ
कि निकल पड़ता है अनायास ही
मुँह से वाह-वाह
जब भी इतराता है अपनी बुद्धि पर आदमी
दिखाकर करिश्मा हतबुद्धि कर देती हो उसे
जानती हूँ तुम स्त्री हो
इसलिए ऐसी हो
और इसीलिए तुम्हें नष्ट करने की
की जा रही हैं कोशिशें
भुलाकर इस बात को
कि वे भस्मासुर भी तुम्हारी ही कल्पना हैं
तुमसे ही है उनका अस्तित्व

 

आम्र वृक्ष

खामोशी की जड़ों को
गहराई में उतारकर
पत्तियों द्वारा बतियाता है
आम्र-वृक्ष
इसकी भाषा
नहीं समझते लोग
जड़ समझते हैं उसे
जबकि दिन में सूरज
और रात्रि में चाँद को
राजा बनाता है वही
धरती का दुःख-सुख
पक्षियों का जीवन-क्रम
हवा का मन
दुनिया का व्यवहार
सब समझता है
और मुस्कुराता है देखकर ऊपर
हम समझते हैं वह खड़ा है एक जगह
पर निरंतर चलता रहता है वह
जमीन पर नहीं आकाश की तरफ
काश उसकी शिक्षा
ग्रहण कर सकते हम

 

मदार

पाश काँलोनी में दरवाजों के पास
मदार के पेड़ देखकर चौंक पड़ी मैं
कैसे इतना पापुलर हुआ
उपेक्षित मदार
अब तक तो उगता रहा
कचरे के ढेर
और लावारिस जगहों पर
अपने-आप
नहीं चढ़ाया जाता
देवताओं को
[अपवाद बस शिव हैं ,पर वे भी तो देवलोक से बहिष्कृत हैं ]
किसी भी पौधे से कम आकर्षक नही है
मझोला मदार
चौड़े हरे पत्तों के बीच
दमकता है उसका सफेद
या फिर हल्का बैंगनी फूलों -सा चेहरा
मान्यता रही कि खतरनाक है मदार
फिर क्यों सजाया जा रहा है उससे द्वार
पता चला किसी बाबा ने बताया है
मदार के औषधीय शुभ गुणों से परिचित कराया है
पर सफेद मदार
रंग-भेद यहाँ भी ?
पुरइन मगन हो जाती है

जब भी जीती हूँ तुममें तुम आ जाते हो
मुझमें और हर लेते हो
मेरे अंदर का सूनापन
बाहर पसर जाती है एक चुप्पी
और भीतर मच जाती है हलचल
रातें सजल हो जाती हैं दिन तरल
|पोखर भर जाता है
पुरइन मगन हो जाती है |

 

प्रेम कविताएँ

1
मन की गुनगुनी आँच पर
पकते हैं कच्चे हरे शब्द
बनती हैं तब प्रेम की
सब्ज -नील कविताएँ
2
अपने ही अंदर से फूटती
कस्तूरी-गंध से विकल होकर
भागी थी तुम तक किन्तु
तृष्णा से विकल हो
खत्म हो गयी अंततः
क्योंकि वहाँ सिर्फ मरीचिका थी
तुम न थे
3
तुम्हारी तलाश में कई बार गिरी हूँ
दलदल में और हर बार जाने कैसे
बच निकली हूँ कमल -सा
मन लिए
4
जेठ की चिलचिलाती धूप में
नंगे सिर थी मैं और
हवा पर सवार
बादल की छाँह से तुम
भागते रहे निरंतर
तुम्हारे ठहरने की उम्मीद में
मैं भी भागती रही तुम्हारे पीछे
और पिछडती रही हर बार
5
हरी -भरी है मेरे मन की धरती
हालाँकि दूर हैं सूरज चाँद
तारे आकाश बादल और ..
6
प्रेम करना ईमानदार हो जाना है
यथार्थ से स्वप्न तक ..समष्टि तक
फैल जाना है त्रिकाल तक
विलीन कर लेना है
त्रिकाल को भी ... प्रेम में ... अपने
जी लेना है अपने
प्रेमावलंब में सारी कायनात को
पहली बार देखना है खुद को
खोजना है खुद से बाहर
मन को छूता है कोई पहली बार
बज उठती है देह की वीणा
सजग हो उठता है मन-प्राण
चीजों के चर-अचर जीव के ... जन के
मन के करुण स्नेहिल तल तक
छूता है कोई जब पहली बार
सुंदर हो जाती है हर चीज
आत्मा तक भर उठती है सुंदरता
अगोरती है आत्मा अगोरती है देह
देखे कोई नजर हर पल हमें

 

प्रेम में पुरुष

उसकी पलकों पर रहने लगते हैं मेघ
जो छलक आते हैं अक्सर आँसू बनकर
होंठों में छिपी दामिनी कौंध -कौंध जाती है
मोहक मुस्कान बनकर
उषा चेहरे पर जमा लेती है कब्ज़ा
कठोरता पर विजय पा लेती है
कोमलता अब वह समुद्र नहीं
नदी होता है सच कहूँ तो पूरी स्त्री होता है
प्रेम करता पुरुष

प्रेम

एक ने कहा -एक ही बार होता है प्रेम
कहा दूसरे ने -कई बार हो सकता है प्रेम
उसी भावना और समर्पण के साथ
जैसे हुआ हो पहली बार
पहला चिल्लाया-लस्ट है ऐसा प्रेम
दूसरे ने मुस्कुराकर इसे ही प्रकृति बताया
सोचने लगी मैं -भिन्नता कहाँ है दोनों की सोच में
प्रेम तो होता है सच ही एक
पहला ... दूसरा या तीसरा नहीं
अमूर्त प्रेम की चाह में
बढ़ जाए भले ही मूर्त प्रेमियों की संख्या
चेहरा बदल जाए
बदल जाए देह और अभिव्यक्ति
प्रेम नहीं बदलता भाग्यवान होते हैं वे
मिल जाता है जिन्हें साबुत प्रेम पहली ही बार
टुकड़े -टुकड़े में मिलता है जिसे प्रेम
जोड़कर बनानी होती है उसे
प्रेम की साबुत मूर्ति एक
प्रेम कभी लस्ट नहीं होता|

 

भर्तृहरि नियति

लगातार सूर्य के चक्कर काटती
धरती सोचा है कभी
सीलन भरे अँधेरे में गुमनाम
तुम्हें धारण करता है कोई हजार सिर-माथे पर
ढोता है तुम्हारी ममता का अतिरिक्त भार
निमिष मात्र की जिसकी विचलन
खतरा है तुम्हारे अस्तित्व के लिए
उसके स्पर्शों की सुरक्षा में हरी-भरी तुम
क्यों नहीं समझती उसका दुःख ?
सोचो धरती किसका प्रेम है सच्चा
तुम्हारा या शेषनाग का!
प्रेम की यह कैसी भर्तृहरि नियति है
कि जिसे चाहो वही चाहता है दूसरे को


तुम्हारा चेहरा

बार बार आँखों में
तिर आता है तुम्हारा चेहरा
हालाँकि समझा चुके हो तुम
दिल नहीं दिमाग से करना चहिए प्रेम
कि जिस समय कर रहे हों प्रेम
बस उतनी ही देर के लिए
ठीक होता है सोचना प्रेम के बारे में
जैसे खाने के समय खाना
सोने के समय सोना ठीक होता है
हर वक्त प्रेम में होना अच्छा नहीं
न वर्तमान के लिए न भविष्य के लिए
सच है तुम्हारा कहना भी
तेज रफ्तार में निरंतर भागता आदमी
कर भी कैसे सकता है इत्मीनान से प्रेम
सच यह भी है कि सारी बेइत्मीनानी के बावजूद
याद आता है मुझे प्रेम के इत्मीनान में डूबा
तुम्हारा चेहरा


तुम्हारे साथ

मैं होना चाहती हूँ तुम्हारे साथ
जैसे नीम जंगल रास्तों में जुगनू
रेत की दुनिया में होते हैं
जलद्वीप
गुलमोहर
मैं होना चाहती हूँ तुम्हारे साथ
जैसे सृजन में होती है पीड़ा
सिक्कों में होती है खनक
और संवाद में होती है सभ्यता
संस्कृतियों की कोख में
घृणा के बीज सा
नहीं होना चाहती मैं
तुम्हारे साथ
तुम अपने समय की शहतीरों पर
टाँकते रहो सितारे
या अपनी गुलेलों से
छेंदते रहो आसमान
खोद सको एक नदी
काट सको पहाड़ कोई
भले ही मेरे बगैर
मैं होना चाहती हूँ
तुम्हारे लिए जैसे
शीत के लिए होती है आँच
जीत के लिए होता है नशा
जैसे धरती के लिए हुआ था
कोई कोलंबस
मैं नही होना चाहती
गुलेल सी करुण
तुम्हारी चोट खाई मांसपेशियों के लिए
तुम मेरे बिना
मुझसे दूर भी रह सकते हो
अडिग
अपने बनाये रस्ते पर खा सकते हो ठोकरें
जी सकते हो दुःख
मैं होना चाहती हूँ तुम्हारे बिलकुल साथ
जैसे समय से घिर जाने पर
साथ होती हैं स्मृतियाँ
मस्तियों में होती है थिरक
होती है थाप
बुखार में बिलकुल सिरहाने होती है माँ
तुम्हारी कमजोरी को
अपनी सभ्यता का सबसे बड़ा मूल्य
बताने वाले बलिष्ठ स्वर सा
नहीं होना चाहती मैं तुम्हारे साथ

 


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में रंजना जायसवाल की रचनाएँ