आइए पढ़ते हैं : स्वामी सहजानन्द सरस्वती रचनावली :: पहला खंड
देशांतर (22 दिसंबर 2017), मुखपृष्ठ संपादकीय परिवार

घुमक्कड़ी न भूलें
कैथलीन रूनी

(कविता का शहरी आवारागर्दी से समृद्ध इतिहास)

"दिन शहर में बदल गया / और शहर मस्तिष्क में।" जेसिका ग्रीनबौम कुछ इस तरह से अपनी एक वाक्य की कविता 'मैं तुम्हें न्यूयॉर्क शहर की सब खिड़कियों से अधिक प्रेम करती हूँ' शुरू करती हैं। अक्सर, जब हम किसी ऐसे भूदृश्य के विषय में सोचते हैं जहाँ कवि घूमते फिरते और अपना मन लगाते हों तो हमें शहर नहीं गाँव याद आते हैं। सर्जनात्मकता को उद्दीप्त करने के लिए देहाती शगल के तौर पर किए जाने वाले भ्रमण की संकल्पना बहुधा महान रोमांटिक कवियों के बहुप्रचलित ग्राम्य भ्रमण से आई है : जैसे विलियम वर्ड्सवर्थ का एक बादल की तरह अकेले भटकते फिरना और सैमुएल टेलर कोलरिज की लगातार एक सप्ताह तक कुंब्रियन माउनटेन में चलने वाली एकाकी यायावरी। लेकिन ग्रीनबौम की कविता न केवल स्वयं इसका हिस्सा बन जाती है बल्कि शहरी घुमक्कड़ी से समृद्ध कविता को परिभाषित करने में सहायक भी सिद्ध हुई है।

शहर की सड़कों पर बिना किसी मानचित्र या जीपीएस की सहायता के निरुद्देश्य भटकने की तुलना एक काव्य संकलन के पन्ने पलटने के अनुभव से की जा सकती है। वैसे ही जैसे आप किसी सड़क या पृष्ठ पर एक मोड़ लेते हैं, जैसे संरचनाओं और आकृतियों के प्रति आकृष्ट होते हैं, जैसे कुछ दुकानों या कविताओं को दूसरों के लिए नजरअंदाज करते हैं। माइकल द सेर्ता अपनी 1984 की पुस्तक 'द प्रैक्टिस ऑफ एवरी डे लाइफ' के एक खंड 'वाकिंग इन द सिटी' में कहते हैं, 'घूमने में भी एक प्रकार की आलंकारिक वाकपटुता है, मुहावरों और साहित्यिक अलंकारों को घुमा देने की कला किसी मार्ग की रचना करने के समान है'। फ्रैंक ओ हारा दिशाहीन घुमक्कड़ी के आनंददायक चित्रण के लिए सुविख्यात हैं भले ही वह साहित्यिक घुमक्कड़ी हो या पैरों पर चल कर की गई। उनकी 'मेडीटेशंस इन एन इमरजेंसी' इस बात का बहुत ठोस उत्तर प्रस्तुत करती है कि क्यों कुछ कवि गाँव देहात में घूमने के बजाय शहरी घुमक्कड़ी को तरजीह देते हैं और प्रकृति की बजाय संस्कृति के माध्यम से खोजबीन करना पसंद करते हैं। वे कहते हैं, "मैंने अपने आपको कभी देहाती जीवन की प्रशस्ति या किसी चरागाह में घटित अपने निर्दोष अतीत की पथभ्रष्ट करतूतों की स्मृतियों से अवरुद्ध नहीं किया। अपनी मनपसंद हरियाली का आनंद उठाने के लिए न्यूयार्क शहर को छोड़ कर जाने की आवश्यकता भी नहीं - क्योंकि मैं तो घास की उस तीखी धार की सुंदरता का आनंद भी तब तक नहीं उठा सकता जब तक कि मुझे पता न चल जाए कि उसके एन बगल में लोगों के गुजरने की एक पगडंडी, रिकॉर्ड स्टोर या ऐसा ही कोई और संकेत उपस्थित है जिससे लोगों में जीवन के प्रति रुचि और उत्साह का पता चलता है।"

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दस कहानियाँ

कैलाश बनवासी

कैलाश बनवासी हिंदी के चर्चित कथाकारों में से एक हैं। यहाँ प्रस्तुत उनकी कहानियों - गुरू-ग्रंथि, इस समय चिड़ियों के बारे में, जादू टूटता है, झाँकी, 'लव-जिहाद' लाइव, मुहब्बत जिंदाबाद!, उसके दरबार में, बस के खेल और चार्ली चैप्लिन, झुलना झूलैं मोरे ललना और बाजार में रामधन को कैलाश बनवासी की प्रतिनिधि कहानियों के रूप में पढ़ा जा सकता है। इन कहानियों में भारतीय निम्न वर्ग का यथार्थ बेहद व्यंजक तरीके से अभिव्यक्त होता है। इन कहानियों में जो जीवन प्रस्तुत किया गया है या कि जिस तरह के चरित्रों को प्रस्तुत किया गया है उन्हें पढ़ते हुए और इन चरित्रों के जीवन संघर्ष और सुख-दुख से गुजरते हुए हम जिस यथार्थ से रूबरू होते हैं वह एकदम हमारे आसपास का यथार्थ है। बाजार में रामधन पढ़ते हुए अनायास तरीके से प्रेमचंद की कहानी दो बैलों की कथा याद आ जाती है पर मुश्किल यह है कि अब बैलों की कहानी दिन पर दिन मुश्किल होती जा रही है। बयान की सादगी एक और चीज है जिसके लिए कैलाश बनवासी की इन कहानियों को बार बार पढ़ा जाना चाहिए।

संस्मरण
प्रयाग शुक्ल
अंबादास : चित्रभाषा का अपना जीवन

यात्रा संस्मरण
प्रतिभा कटियार
कस्बाई औरत की पहली विदेश यात्रा

आलोचना
श्रीराम परिहार
रच-रच मृदु छंदों के बंध
लोक और लोक-स्वर के पारखी

विशेष
अरुण कुमार त्रिपाठी
महाश्वेता का महासमर

सिनेमा
विमल चंद्र पांडेय
जिंदगी जैसी फिल्म : मेमोरीज ऑफ मर्डर
पापा बिजनेस के लिए बाहर गए हैं : व्हेन फादर वाज अवे ऑन बिजनेस

कुछ और कहानियाँ
आशा पांडेय
खारा पानी
जागते रहो
जेल से जेल तक
मर्ज
मेमने की चीख
यही एक राह...
सुरक्षा

कविताएँ
नीरजा हेमेंद्र

संरक्षक
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(कुलपति)

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फोन - 07152 - 252148
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ISSN 2394-6687

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