आइए पढ़ते हैं : स्वामी सहजानन्द सरस्वती रचनावली :: पहला खंड
गांधी साहित्य (28 सितंबर 2018), मुखपृष्ठ संपादकीय परिवार

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास
मोहनदास करमचंद गांधी

प्रथम खंड : 9. बोअर-युद्ध

जिन पाठकों ने पिछले प्रकरण ध्यान से पढ़े होंगे उन्हें इस बात का खयाल होगा कि बोअर-युद्ध के समय दक्षिण अफ्रीका के हिंदुस्तानियों की दशा कैसी थी? उस समय तक अपनी दशा को सुधारने के लिए उन्होंने जो-जो प्रयत्न किए, उसका वर्णन भी किया जा चुका है।

डॉ. जेमिसन की सोने की खदानों के मालिकों के साथ जो गुप्त मंत्रणा हुई थी, उसके अनुसार उन्होंने 1899 में जोहानिसबर्ग पर धावा बोल दिया। दोनों को आशा तो यह थी कि जोहानिसबर्ग पर अधिकार कर लेने के बाद ही बोअर-सरकार को इस धावे का पता चलेगा। पर ऐसी आशा रखने में डॉ. जेमिसन तथा उनके मित्रों ने बहुत बड़ी गलती की। दूसरी गलती उन्होंने यह आशा रखकर की कि हमारे षड्यंत्र का भंडाफोड़ हो गया, तो भी रोडेशिया में तालीम पाए हुए निशानेबाजों (शार्प-शूटर्स) के सामने अनाड़ी बोअर किसान कुछ कर नहीं सकेंगे। उन्होंने गलती से यह भी मान लिया था कि जोहानिसबर्ग की आबादी का बहुत बड़ा भाग उनका स्वागत ही करेगा। उन भले डॉक्टर की यह आशा भी पूरी नहीं हुई। प्रेसिडेंट क्रूगर को सारे षड्यंत्र का पूरा पता चल गया था। उन्होंने अत्यंत शांति, कुशलता और गुप्त रीति से डॉ. जेमिसन का सामना करने की तैयारियाँ कर ली थीं, जो लोग उनके साथ षड्यंत्र में शरीक हुए थे, उन्हें गिरफ्तार करने की भी पूरी तैयारी कर ली थी। इसलिए डॉ. जेमिसन जोहानिसबर्ग के निकट पहुँचे उसके पहले ही बोअर-सेना ने अपनी गोलियों से उनका स्वागत किया। इस सेना के सामने डॉ. जेमिसन की टुकड़ी टिक ही नहीं सकती थी। जोहानिसबर्ग में कोई सरकार के खिलाफ विद्रोह न कर सके, इसके लिए भी प्रेसिडेंट क्रूगर संपूर्ण रूप में तैयार थे। इसके फलस्वरूप शहर की आबादी में से कोई आदमी सिर उठाने की हिम्मत नहीं कर सका। प्रेसिडेंट क्रूगर की सारी कार्रवाई से जोहानिसबर्ग के करोड़पति स्तब्ध रह गए। प्रेसिडेंट की इतनी सुंदर तैयारी का परिणाम यह हुआ कि धावे को पीछे धकेलने में पैसे का कम से कम खर्च हुआ और प्राणों की भी कम से कम हानि हुई।

डॉ. जेमिसन और उनके सब मित्र - सोने की खदानों के मालिक - पकड़ लिए गए और तुरंत उन पर मुकदमा चलाया गया। कुछ लोगों को फाँसी की सजा हुई। इन अपराधियों में से अधिकतर तो करोड़पति ही थे। लेकिन बड़ी (साम्राज्य) सरकार उनके लिए कुछ नहीं कर सकी, क्योंकि उन्होंने दिन-दहाड़े धावा बोलने का अपराध किया था। प्रेसिडेंट क्रूगर का महत्व एकदम बढ़ गया। उपनिवेश-मंत्री श्री चैंबरलेन ने उन्हें दीन वचनवाला तार किया और प्रेसिडेंट क्रूगर के दयाभाव को जाग्रत करके इन सब करोड़पतियों के लिए दया की भीख...

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हाउल
(लंबी कविता)
एलेन गिंसबर्ग

एलेन गिंसबर्ग अमेरिका के गहरे रूप से विवादास्पद और सिरमौर कवियों में प्रमुख हैं। सातवें दशक में जब संसार के अनेक सांस्कृतिक भू भागों में तब्दीलियाँ और प्रतिरोध हो रहा था, वे अमेरिका के बाहर भी पढ़े और जाने गए। अंततः अमेरिका के उस समाज ने जहाँ हर चीज की रेटिंग देने का आज एक पूँजीवादी चलन है, उन्हें बड़े कवि के रूप में स्वीकृत किया। 'हाउल' पर्याप्त बोलती हुई लेकिन एक कठिन कविता है। अमेरिका ने अपने बच्चों के साथ क्रूरता, अमानवीयता, दमन, बंधन और शूटिंग के अनेक दौर देखे हैं। यह कविता उसके विरुद्ध एक चीख है; अट्टहास, विलाप, आक्रोश, आर्तनाद, गर्जना और सुलगता हुआ नारा है। यह कविता अमरीका की सच्चाइयों के साथ पूरी तरह जीवंत है। अमरीकी आत्मा के इतिहास की वाल्ट व्हिटमैन जैसी उज्ज्वलताओं के समांतर उसकी दरिंदगी का दर्पण भी इस कविता में झलकता है; यह आज 2018 में भी अधिक बदसूरती के साथ बहुमुखी दिखता है। बल्कि वह अमरीका की भौगोलिक सीमाओं को तोड़कर दूसरी जगहों में भी पहुँच रहा है। (ज्ञानरंजन - पहल 111)

विशेष
देवेंद्र मोहन
हाउल : 'चीख' या आर्तनाद ?

आलोचना
अरुण होता
आँखें अब भी देखती हैं लहलहाती फसलों का सपना : मदन कश्यप
सुबोध शुक्ल
समय के बंजर में जमीन पर बारिश उगाता कवि : केशव तिवारी

निबंध
शर्मिला बोहरा जालान
अर्थ प्रेम का
महानगर और मॉल

कहानियाँ
प्रदीप श्रीवास्तव
नुरीन
हार गया फौजी बेटा
दीवारें तो साथ हैं
झूमर

विमर्श
डॉ. रतन लाल
गांधी :  एक विमर्श

बाल साहित्य - कहानियाँ
संजीव ठाकुर
हमें नहीं जाना
दो दोस्तों की कहानी

कविताएँ
फ़िरोज़ ख़ान

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ISSN 2394-6687

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