आइए पढ़ते हैं : स्वामी सहजानन्द सरस्वती रचनावली :: पहला खंड
भाषांतर इस पखवारे संपादकीय सूचना

कविताएँ
रक्षक नायक

कैसे रहता वहाँ ?

जिस पेड़ तले खड़े हो
सूर्योदय से मैं सिंहरण करता
मुझे चौंका कर वह पेड़ बोला
जानते हो, षड्यंत्र चल रहा मेरे खिलाफ
फॉरेस्ट डाक बंगले में,
मैं तो पेड़, और कर भी क्या सकता
पेड़ ने झूठ नहीं कहा
पता चला उस ट्रक की कोख में
लिए जाने के बाद।
जिस पहाड़ से मैं सुनता हूँ इतिहास
साँझ ढलने पर, उसने एक दिन कहा
मेरा अंकित कर दो चित्र
मैं इतिहास बनने जा रहा हूँ
मेरे लिए जापान में ब्लास्ट फर्निस जल रहा।
पहाड़ ने कही थी मुझे अपनी देखी बात
केवल उसका इतिहास बाकी था
जो उसने कहा था
केवल चित्र बन
मेरी ड्राइंग कापी में रह गया।।
जिस नदी को मैंने नदी समझा
प्रेम करता, कि मुझे अपना मुहाना
दिखाया, उसने चुपके-चुपके कहा
मैं घर्षिता होने जा रही
योजना चल रही मेरे घर्षण की
कंपनी गेस्ट हाउस में।
देखा उसके थन से विष झर रहा था कुछ दिन बाद।
मैं कैसे रहता वहाँ
वे सिर्फ समझते मेरी भाषा,
कैसे रहता
उनके जाने के बाद?
वहाँ राज करते देख
एक भी आदमी किसी एक ने भी भूल से
कभी पूछा नहीं मुझे
क्या हुआ है?
तुम्हारे माथे पर इतना पसीना?



घर
अल्ट्राट्रेक या कोणार्क?
किससे छत बनाना अच्छा होगा?
वास्तु या आर्किटेक्ट ? दोनों मिला
एक फैसला करो।
हाथ उधारी जीपीएफ और कुछ दुस्साहस ले
जमीं खरीदी गई, माफिआ की ओट में,
जगह ठीक
पच्चीस वर्ष बाद यह होगी
शहर का केंद्र स्थल
तहसील, म्यूटेशन, पट्टा, चलो जोन के पीछे
छह महीने पचास लीटर और पंद्रह हजार।
आगे कुछ जगह रखें या उतनी पीछे?
हर शुभेच्छु एक-एक
अनुभवी इंजीनियर।

संपादकीय
अरुणेश नीरन
बादलों को उतरने के लिए थोड़ी जगह दें

वृक्ष खेती से वर्तमान समस्याओं का हल संभव : सुंदरलाल बहुगुणा

संवाद
डॉ. अमित कुमार विश्वास

वर्तमान दौर में भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के नाम पर जो विकास की आँधी चली है यह मनुष्य को खतरनाक मोड़ पर ले जा रही है। आज का विकास प्रकृति के शोषण पर टिका है जिसमें गरीब, आदिवासी को प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किए जाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। भूमंडलीकरण के द्वारा उपजी भोगवादी सभ्यता ने हम सभी को बाजार में खड़ा कर दिया है। प्रकृति को भी नकदी में बदला जा रहा है। लाभ-मुनाफे के खेल में समाज के हाशिए पर खड़े लोगों का विकास नहीं हो पा रहा है, इसका फायदा कुछ ही लोगों को होता है। हमें यह सोचना पड़ेगा कि प्रकृति सभी के लिए है और हमेशा के लिए है कुछ समय के लिए नहीं है।

कहानियाँ

कविता
नेपथ्य
अल्पना मिश्र
भीतर का वक्त
नीलम कुलश्रेष्ठ
जर्नलिज्म
प्रत्यक्षा
फूलपुर की फुलवरिया मिसराइन
स्वाति तिवारी
दिस इज वेस्टर्न कल्चर माय डियर

उपन्यास अंश
उषा किरण खान
अगन-हिंडोला

सिनेमा
अजय कुमार शर्मा
‘जन कलाकार’ बलराज

बाल साहित्य - कहानी
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’
बेबी माने अप्पी

निबंध
बुद्धिनाथ मिश्र
फूल आए हैं कनेरों में

आलोचना
प्रियम अंकित
उर्वशी : पुरुष अध्यात्म का रूमान

कविताएँ
राजकुमार कुंभज

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

संपादक
अरुणेश नीरन
फोन - 07743886879
09451460030
ई-मेल : neeranarunesh48@gmail.com

प्रबंध संपादक
डॉ. अमित कुमार विश्वास
फोन - 09970244359
ई-मेल : amitbishwas2004@gmail.com

सहायक संपादक
मनोज कुमार पांडेय
फोन - 08275409685
ई-मेल : chanduksaath@gmail.com

संपादकीय सहयोगी
तेजी ईशा
फोन - 09096438496
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तकनीकी सहायक
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विशेष तकनीकी सहयोग
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हेमलता गोडबोले
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