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हिंदी समय में पंकज चतुर्वेदी की रचनाएँ
कविताएँ
1947 में
अगर यही प्रेम है
आख़िरी बात
आते हैं
आभार
आलोचक
इतना सहज नहीं है विश्व
इन बातों को पंद्रह-बीस बरस बीते
इसी कोलाहल में
उम्मीद
एक अँजुरी प्रकाश चाहिए मुझे
एक ऐसे समय में
एक खो चुकी कहानी
एक स्वप्न का आख्यान
एक ही चेहरा
और कुछ कर पाऊँ या नहीं
कुछ चीज़ें अब भी अच्छी हैं
कुछ सवाल
कृतज्ञ और नतमस्तक
कमीनों का क्या है
कला का समय
कैसे रहोगे
गोया
जैसे वह एक आँसू था
जाति के लिए
टैरू
तुम जहाँ मुझे मिली थीं
तुम मुझे मिलीं
तीन बातें
दरवाज़े होंठ हैं तुम्हारे
दरवाज़ों के पीछे एक जंगल है
धोखा क्या है
न मेरे पास
निरावरण वह
प्रेम
प्रेरणा
पुरुषत्व एक उम्मीद
पहला सफ़ेद बाल
पाँच महीने के अपने बच्चे से बातचीत के बहाने
फँस गए हैं
बस में स्त्रियाँ खड़ी थीं
बहुराष्ट्रीय
बारिश
मंगल-भवन
मछली की चाह
मेरे दरवाज़े सुबह
मुसीबत में
मिश्र जी के पैर
मोक्ष
याद आती है
रक्तचाप
राष्ट्रपति जी !
लगता है कि जैसे
वृक्षारोपण
वह इतना निजी
शमीम
संध्या
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हिंदी
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